लेखक परिचय

कुमार सुशांत

कुमार सुशांत

भागलपुर, बिहार से शिक्षा-दीक्षा, दिल्ली में MASSCO MEDIA INSTITUTE से जर्नलिज्म, CNEB न्यूज़ चैनल में बतौर पत्रकार करियर की शुरुआत, बाद में चौथी दुनिया (दिल्ली), कैनविज टाइम्स, श्री टाइम्स के उत्तर प्रदेश संस्करण में कार्य का अनुभव हासिल किया। वर्तमान में सिटी टाइम्स (दैनिक) के दिल्ली एडिशन में स्थानीय संपादक हैं और प्रवक्ता.कॉम में सलाहकार-सम्पादक हैं.

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कांग्रेस, राकांपा समेत अन्य राजनीतिक दल द्वारा चुनाव चिन्ह के नाम पर तिरंगे से छेड़छाड़ का मामला सामने आया है। यह एक वाजिब सवाल है। यह देश की भावना से जुड़ा एक ऐसा सच है जिसे देश में आज तक एक मजबूत आवाज़ नहीं दी गई, क्योंकि देश में शासन उन्हीं राजनीतिक दलों का रहा था और ये दल अपने खिलाफ उठ रहे हर उस आवाज़ को दबा देने का काम करते थे।

क्या ये सच नहीं है कि यूपीए के ही सरकार में असीम त्रिवेदी द्वारा राष्ट्रीय चिह्न अशोक स्तंभ को लेकर बनाए गए कार्टून के विरोध में उन पर देशद्रोह का केस चलाया गया। इसी कांग्रेस के नेतृत्व वाले शासन में यह बात कही गई थी कि अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर लोग राष्ट्रीय चिह्नों और राष्ट्रीय स्मारकों को असीम त्रिवेदी जैसे लोगों की तरह इस्तेमाल करेंगे तो राष्ट्र की आत्मा को कुचलने का एक दौर चल निकलेगा जिसके परिणाम बहुत गंभीर हो सकते हैं। इसी कांग्रेस के शासनकाल में मानना था कि अभिव्यक्ति की आजादी का अधिकार तो होना चाहिए लेकिन इसकी एक सीमा स्पष्ट रूप से तय होनी चाहिए। फिर आज तिरंगे का अपमान देश क्यों बर्दाश्त करे।

इसी कांग्रेस के पूर्ववर्ती शासनकाल में न्यायलय ने मोबाईल कंपनियों को निर्देश दिया था की वो राष्ट्रगान को कालर बैक टोन ना बनाएं क्योंकि ये राष्ट्रीय सम्मान का अपमान है।

आपको बता दें कि हमार तिरंगे का अपमान कोई कर दे तो हम उस पर देशद्रोह का मुकदमा चलाते हैं। तिरंगा जमीन पर फेंका जाए या पैर से रौंदा जाए तो हम उस पर देशद्रोह का मुकदमा चलाते हैं। तो कांग्रेस का तो चुनाव चिन्ह तिरंगे से ही बना है, उसकी रैलियों में या ऐसे भी जो झंडे लगाए जाते हैं वो झंडे या स्टीकर्स, रैली ख़त्म होने के बाद वैसे ही धूल फांकते हैं तो क्या ये राष्ट्रीय सम्मान का अपमान नहीं है ?

भारतीय तिरंगे का अपना गौरवमयी इतिहास और महत्व है। भारतीय कानून के अनुसार ध्वज को हमेशा ‘गरिमा, निष्ठा और सम्मान’ के साथ देखना चाहिए। “भारत की झंडा संहिता-२००२”, ने प्रतीकों और नामों के (अनुचित प्रयोग निवारण) अधिनियम, १९५०” का अतिक्रमण किया और अब वह ध्वज प्रदर्शन और उपयोग का नियंत्रण करता है। सरकारी नियमों में कहा गया है कि झंडे का स्पर्श कभी भी जमीन या पानी के साथ नहीं होना चाहिए। उस का प्रयोग मेज़पोश के रूप में, या मंच पर नहीं ढका जा सकता, इससे किसी मूर्ति को ढंका नहीं जा सकता, न ही किसी आधारशिला पर डाला जा सकता था। सन २००५ तक इसे पोशाक के रूप में या वर्दी के रूप में प्रयोग नहीं किया जा सकता था। पर ५ जुलाई २००५ को भारत सरकार ने संहिता में संशोधन किया और ध्वज को एक पोशाक के रूप में या वर्दी के रूप में प्रयोग किये जाने की अनुमति दी। हालांकि इसका प्रयोग कमर के नीचे वाले कपड़े के रूप में या जांघिये के रूप में प्रयोग नहीं किया जा सकता है। राष्ट्रीय ध्वज को तकिये के रूप में या रूमाल के रूप में करने पर निषेध है। झंडे को जानबूझकर उल्टा, रखा नहीं किया जा सकता, किसी में डुबाया नहीं जा सकता, या फूलों की पंखुड़ियों के अलावा अन्य वस्तु नहीं रखी जा सकती। किसी प्रकार का सरनामा झंडे पर अंकित नहीं किया जा सकता है।

तिरंगा हमारी शान है। हमारी आज़ादी का प्रतीक है। इससे हमारी भावना जुड़ी है। हम आज तक शांत रहे, क्योंकि उसी पूर्ववर्ती सत्तासीन पार्टी का हर ओर राज था। शोर मचाने से कुछ न होता, लेकिन अब नहीं। हम तिरंगे से छेड़छाड़ पर चुप नहीं बैठेंगे। देश से आह्वान है कि आगे आएं, इस हौंसले के साथ कि हम संघर्ष करेंगे। हमारी भारत माता के साथ जो खिलवाड़ करेगा, किसी हद तक उन्हें माफ नहीं करेंगे। जय हिन्द। जय भारत।

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