लेखक परिचय

डॉ. दीपक आचार्य

डॉ. दीपक आचार्य

स्वतंत्र वेब लेखक व ब्लॉगर

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अतृप्त और अशांत होते हैं शोरगुल करने वाले

डॉ. दीपक आचार्य

सफर चाहे कैसा भी हो, हर कोई इसे शांति और सुकून के साथ पूरा करना चाहता है। पर आजकल हर प्रकार का सफर अशांति भरा और दुःखदायी हो गया है।

जहाँ देखो वहाँ शोरगुल, कानफोडू आवाजें और तरह-तरह के गीतों की भरमार। घर से लेकर गांव-शहर का हर कोना शोर से भरा हुआ है। आदमी के उठने से पहले शोर शुरू हो जाता है और उसके सोने के अर्से बाद तक इसका वजूद बना रहता है।

बात यात्राओं की करें तो टेम्पों-टैक्सियों और सिटी बसों से लेकर आम बसों, रेलों आदि सभी में पहले की तरह शांति कहाँ रही है। हर जगह किसी न किसी तरह का शोरगुल रमा रहने लगा है। इसी से पता लगता है कि आज का आदमी कितना अशांत, अधीर और अस्थिरचित्त है। आदमी जैसा होता है उसे ही बाहर भी तलाशता है।

पहले जमाने के लोग धीर-गंभीर और शांतचित्त हुआ करते थे और इसलिए उन्हें परिवेश में शोरगुल पसंद नहीं हुआ करता था। इसी कारण सभी जगह शांति और सुकून का माहौल पसरा हुआ रहता था।

आज आदमी हर तरह से अशांत है। यहाँ तक कि उसका मन-मस्तिष्क, हृदय और जिस्म के सारे अंग अशांत और अतृप्त हैं तथा ऐसे में बाहरी शांति और तृप्ति पाने के लिए इतने उतावले हैं कि हर क्षण शोरगुल में इनकी तलाश बनी रहती है।

कभी टेपरिकार्डर, स्टीरियो तो कभी टीवी स्क्रीन। और कुछ नहीं तो अब मोबाइल का खिलौना तो हर किसी के हाथ में है ही, चाहे उसके लिए इसका उपयोग हो या नहीं। मोबाइल अब आम जन का ‘स्टेटस सिम्बोल’ होने के साथ ही टाईमपास का सबसे बेहतरीन और निरापद जरिया बन गया है।

भौतिकता की चकाचौंध, भीड़ भाड़ भरे माहौल और लगातार भाग रही जिन्दगी के बीच आदमी दुनिया को पा जाने के लिए इतना उतावला है कि उसे कहीं तृप्ति या आत्मतोष का अहसास हो ही नहीं पाता और ऐसे में वह निरन्तर अशांत मन के साथ श्वानों की तरह भटकने लगा है।

किसी आदमी के चित्त की थाह पानी हो तो उसके चेहरे या हरकतों से अच्छी तरह पायी जा सकती है। आजकल मोबाइल ने इस समस्या को और अधिक हल कर दिया है। जिसके पास मोबाइल है और वह शांत है, इसका अर्थ है कि उसका चित्त भी शांत है लेकिन ऐसा बहुत कम ही दिखने में आता है।

मोबाइल का खिलौना पास में हो और आदमी चुपचाप बैठा रहे, ये कभी हो ही नहीं सकता। बिरले लोग ही मोबाइल पास होते हुए शांति और धैर्य धारण कर सकते हैं अन्यथा सारे के सारे कहीं बतियाते नज़र आएंगे, और कुछ नहीं तो गाने सुनने में व्यस्त हो जाएंगे। आदमी की फितरत में ही आ गया है कि वह एक घड़ी भी चुप नहीं बैठ सकता, उसे कुछ न कुछ करने को चाहिए। अब मोबाइल जैसा सर्वसुलभ खिलौना या हथियार उसके पास है जी बहलाने को।

बसों और रेलों में सफर करते समय ऐसे अनगिनत यात्री मिल ही जाएंगे जो खुद तो अशांत हैं ही, दूसरों की शांति भंग करने का ठेका भी लिए हुए होते हैं। ये लोग गाने और भजन आदि सुनने में अपने मोबाइल फुल वोल्यूम में करके जम जाते हैं और पूरे सफर का मजा किरकिरा कर देते हैं।

कौन थका-हारा या बीमार है, किसे पसंद है या नापसंद, इससे इन उन्मादी लोगों को कोई लेना-देना नहीं। शोर पसन्दिया ये लोग खुद को तृप्त करने और शांति पाने के लिए पूरे रास्ते शोरगुल करते रहते हैं। बसों और रेलों में इन्हीं की फितरत वाले दूसरे लोग भी मिल ही जाते हैं, और ऐसे में दूसरे यात्रियों का सफर कितना दुखमय हो जाता है इसकी कल्पना आसानी से की जा सकती है।

दूसरों की शांति भंग करते हुए शांति पाने को आमादा ऐसे लोगों को न पूर्ण या न अर्द्ध विक्षिप्त कहा जा सकता है, न उन्मादी। मगर इतना जरूर है कि इन लोगों को अच्छे इंसान की श्रेणी तो नहीं ही दी जा सकती है।

आजकल ख़ासकर युवाओं में शोरगुल में रमे रहने का क्रेज बढ़ता जा रहा है। ज्यों-ज्यों शोरशराबे से शांति की तलाश की जाती है, त्यों-त्यों अशांति बढ़ती ही चली जाती है और इससे भविष्य बरबाद होने लगता है। यों शोरगुल जिन लोगों को पसंद होता है उनका अध्ययन किया जाए तो ऐसे लोगों मेें से नब्बे फीसदी से ज्यादा लोग जीवन में असफलताओं का मुँह देखते हैं और इनका जीवन दूसरों के मुकाबले काफी सामान्य रहता है।

ऐसे शोरगुल पसन्द लोग जीवन में कोई ऐसा काम नहीं कर पाते हैं जो समाज के लिए उपयोगी हो, बल्कि इन लोगों में से अधिकतर लोग समाज व परिवार पर भार ही हुआ करते हैं। युवाओं के भविष्य का अनुमान पाना हो तो यह तय मानना चाहिए कि इस प्रकार के ध्वनि प्रदूषणों में रुचि रखने वाले लोगों का कोई भविष्य नहीं होता और वे जीवन में हर मोड़ पर फिसड्डी ही साबित होते हैं।

सफर कैसा भी हो, इसमें सभी प्रकार के सहयात्रियों का ख्याल रखना हमारी जिम्मेदारी है और ऐसे में हम सभी का कर्त्तव्य बनता है कि हम शोरगुल से माहौल को प्रदूषित नहीं करें और शांति तथा सुकून बनाए रखें।

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