लेखक परिचय

विजय कुमार

विजय कुमार

स्वतंत्र वेब लेखक व ब्लॉगर

Posted On by &filed under कहानी, साहित्‍य.


 

शोभा का मन न जाने कैसा हो रहा था। जब से उसे अपनी जेठानी पूर्णिमा की मृत्यु का समाचार मिला था, उसका मन बार-बार चिन्तित और व्याकुल हो उठता था। क्या होगा अब पांच साल के मोहन और नवजात राधिका का ?

 

पूर्णिमा और शोभा क्रमशः पांच साल के अन्तर से इस घर में बहू बन कर आयी थीं। दोनों का व्यवहार आपस में बहुत खराब तो नहीं, पर बहुत अच्छा भी नहीं था। राम-राम और सुख-दुख की चर्चा तो होती थी; पर बहुत औपचारिकता के साथ। विवाह के एक वर्ष बाद ही मोहन का जन्म हुआ। घर भर की आंखों का तारा था वह। कुछ भाग्य कहंे या ईश्वर की योजना, उसके बाद दो बार पूर्णिमा का मां बनने का प्रयास सफल नहीं हुआ; पर इस बार जब पूर्णिमा और शोभा के पांव लगभग एक साथ ही भारी हुए, तो पूरे घर में खुशी की लहर दौड़ गयी।

 

मौहल्ले में एक पुराना खंडहर मकान था, जहां बच्चे दिन भर धमाचौकड़ी मचाते रहते थे। कुछ दिन पूर्व न जाने कहां से एक काली और एक भूरी कुतिया ने वहां आकर डेरा डाल दिया था। बच्चों के शोर से परेशान न होते हुए वे प्रायः एक शान्त कोने में छत के नीचे लेटी रहती थीं। ठंड से उनका बचाव हो सके, इसके लिए बच्चों ने घर से लाकर कुछ पुरानी बोरियां आदि उनके नीचे बिछा दिये थे।

 

एक दिन के अन्तराल पर दोनों कुतियाओं ने क्रमशः चार और पांच पिल्लों को जन्म दिया। कुछ दिन तक तो वे पिल्ले वहीं कूं-कूं करते रहे; पर दस-पन्द्रह दिन में वे इधर-उधर घूमने लगे। बच्चों को मनोरंजन का एक नया साधन मिल गया। सबने अपनी-अपनी बाल बुद्धि के अनुसार उनके कालू-भूरा-शेरा…..आदि नाम भी रख दिये। कोई घर से रोटी लाता, तो कोई दूध। मौहल्ले के बच्चे भी खुश और पिल्ले भी खुश।

 

शोभा और पूर्णिमा भी ठीक-ठाक प्रगति कर रही थीं। पूर्णिमा चंूकि काफी कमजोर थी, इसलिए उसके बारे में डॉक्टर तथा घर वाले सभी चिन्तित रहते थे। ठीक समय पर उसने एक दुबली-पतली कमजोर सी कन्या को बड़े ऑपरेशन के बाद जन्म दिया। घर वालों ने कुछ चैन की सांस ली। यद्यपि डॉक्टर ने दोनों को खतरे से खाली नहीं बताया था। कुछ दिन बाद शोभा भी अस्पताल में भर्ती हुई और उसने भी एक सुन्दर-स्वस्थ कन्या को जन्म दिया। जच्चा-बच्चा दोनों सामान्य थे। उधर पूर्णिमा की बिटिया की स्थिति तो क्रमशः ठीक हो रही थी; पर उसकी अपनी हालत नियन्त्रण में नहीं आ रही थी।

 

मौहल्ले के बच्चे अपनी ही दुनिया में मस्त थे। वे पिल्लों की गतिविधियों के रोचक समाचार अपनी बाल-सुलभ चंचलता के साथ घर वालों को सुनाते थे। आज काली कुतिया जब आयी, तो उसके बच्चे भागकर उससे चिपक गये और दूध पीने लगे। भूरी कुतिया तब तक लौटी नहीं थी; सो उसके दो बच्चे भी काली का दूध पीने लगे; पर काली ने भौं-भौं करके उन्हें वहां से भगा दिया। बेचारे कूं-कूं करते हुए वापिस लौट गये। मोहन अपनी मां, दादी और चाची को ये समाचार आकर बताता रहता था।

 

पूर्णिमा की हालत जब ज्यादा बिगड़ गयी, तो उसे फिर अस्पताल में भरती कराना पड़ा। डॉक्टर की दवा और ऊपर वाले की दुआ भी कुछ काम नहीं कर पायी। बेचारी अपनी एक माह की बिटिया को सीने से लगाये इस संसार से विदा हो गयी। सारे परिवार में शोक छा गया। सबको उस बिना मां वाली एक माह की बच्ची की चिन्ता थी। अब उसका क्या होगा ? एक बार जब वह भूख से बिलबिला रही थी, तो सास ने उसे भी शोभा के सीने से लगाने का प्रयत्न किया; पर शोभा ने मुंह फेर लिया।

 

इधर पिल्ले भी कुछ बड़े हो गये। अब वे दौड़-भाग करने लगे थे। अचानक एक दिन जब भूरी कुतिया खाद्य सामग्री की तलाश में बाजार में घूम रही थी, तो एक कार उसे बेदर्दी से कुचलती हुई निकल गयी। थोड़ी देर तक तो भूरी छटपटाती रही, फिर उसने दम तोड़ दिया। सब बच्चे चिन्तित हो उठे, अब उसके पिल्लों का क्या होगा ? सोनू का विचार था कि भूरी के चारों पिल्लों को एक-एक बच्चा अपने घर ले जाकर पाल ले; पर उनके घर वाले गली के इन आवारा पिल्लों को घर में रखने को तैयार नहीं हुए। बेचारे बच्चे अपना सा मुंह लेकर रह गये।

 

पूर्णिमा की बिटिया राधिका को बोतल से दूध पिलाया जाने लगा; पर वह उसे ठीक से हजम नही कर पा रही थी। ज्यादातर तो वह उलट ही देती थी। सब लोग उसके भविष्य को लेकर बड़े चिन्तित थे। कभी-कभी शोभा का मन होता था कि वह राधिका को अपना ले; पर अपनी कोख की सन्तान को देखकर उसका मन बदल जाता था।

 

बच्चे घर आकर बता रहे थे कि भूरी कुतिया के चार में से दो पिल्ले तो रात में भूख के मारे तड़प-तड़प कर मर गये। बाकी दो ने सुबह फिर काली का दूध पीना चाहा; पर उसने गुर्रा कर उन्हें भगा दिया। कई बच्चे घर से दूध ले आये; पर वे दोनों पिल्ले उसकी तरफ देख भी नहीं रहे थे। यद्यपि पहले तो वे बच्चों के हाथ से सब कुछ खा-पी लेते थे। शायद मां की मृत्यु का दर्द उन्हें भी सता रहा था।

 

मोहन बार-बार ये घटनाक्रम बाल सुलभ उत्सुकता से घर आकर सबको बताता था। यद्यपि वह भी मां की मृत्यु से बहुत दुखी था; पर कुछ दिन बाद उसने गली और उस खंडहर मकान में खेलना शुरू कर दिया था। शोभा के मन में भारी उलझन थी। उसकी बुद्धि कहती थी कि राधिका का क्या अपराध है, उसे अपना लो; पर उसका मन तैयार नहीं हो पा रहा था। मन और बुद्धि के बीच एक अजब सा संग्राम छिड़ा था।

 

मौहल्ले के बच्चे आज जब खेलने गये, तो उन्होंने देखा कि भूरी कुतिया के शेष दो पिल्लों में से एक और रात में चल बसा; लेकिन दूसरा भी दिखायी नहीं दे रहा था। बच्चे उसके लिए चिन्तित हो उठे। कहीं कोई दूसरे मौहल्ले का बच्चा उसे उठा तो नहीं ले गया ? उधर काली अपने बच्चों को दूध पिलाने में व्यस्त थी। अचानक पिंकी की नजर वहां गयी, तो उसने आवाज देकर सबको बुला लिया। सबने देखा कि काली चार के बजाय पांच पिल्लों को दूध पिला रही है। अर्थात उसने भूरी के अन्तिम पिल्ले को अन्ततः स्वीकार कर ही लिया।

 

सब बच्चे खुशी का यह समाचार अपने माता-पिता को बताने घर दौड़ पड़े। शोभा की आंखें खुल गयीं, उसके मन की उलझन समाप्त हो गयी। जब काली कुतिया पशु होते हुए भी एक मातृविहीन पिल्ले को अपना सकती है, तो फिर वह तो मनुष्य है। मनुष्य नहीं नारी है, और सिर्फ नारी नहीं एक मां भी है। उसने मोहन से कहकर दादी मां के पास लेटी राधिका को मंगवाया और अपने सीने से लगा लिया।

 

विजय कुमार

Leave a Reply

Be the First to Comment!

Notify of
avatar
wpDiscuz