लेखक परिचय

पवन कुमार अरविन्द

पवन कुमार अरविन्द

देवरिया, उत्तर प्रदेश में जन्म। बी.एस-सी.(गणित), पी.जी.जे.एम.सी., एम.जे. की शिक्षा हासिल की। सन् १९९३ से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संपर्क में। पाँच वर्षों तक संघ का प्रचारक। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रान्तीय मीडिया सेण्टर "विश्व संवाद केंद्र" गोरखपुर का प्रमुख रहते हुए "पूर्वा-संवाद" मासिक पत्रिका का संपादन। सम्प्रतिः संवाददाता, ‘एक्सप्रेस मीडिया सर्विस’ न्यूज एजेंसी, ऩई दिल्ली।

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पवन कुमार अरविंद

किसी व्यक्ति में संगठन के तत्व समाहित हो सकते हैं और संगठन कार्यों में तल्लीन होकर व्यक्ति स्वयं को विलीन कर सकता है, लेकिन व्यक्ति ही संगठन नहीं होता, व्यक्तियों से संगठन बनता है। किसी एक आदमी को ही पूरा संगठन कैसे मानलिया जाए ? यह ठीक उसी प्रकार अनुचित है जैसे यह कहा जाए कि अमुक व्यक्ति के नहीं रहने पर संगठन का अस्तित्व ही शून्य हो जाएगा।

नितिन गडकरी को भाजपा नहीं कहा जा सकता और न ही भाजपा को नितिन गडकरी। भाजपा संगठन को चलाने के लिए एक व्यवस्था के तहत गडकरी को अध्यक्ष पद पर बैठाया गया है। अध्यक्ष का पद स्थायी है और उस पर बैठने वाला अस्थायी। कभी अटल बिहारी वाजपेई, लालकृष्ण आडवाणी, डॉ. मुरली मनोहर जोशी, कुशाभाऊ ठाकरे, के. जनाकृष्ण मूर्ति, एम. वेंकैया नायडू, राजनाथ सिंह अध्यक्ष हुए, तो आज गडकरी इस पद पर विराजमान हैं। यह परिवर्तन का क्रम चलता रहेगा।

गडकरी पर भ्रष्टाचार के कथित आरोप लग रहे हैं। इन आरोपों के लिए पूरी भाजपा को उत्तरदायी कैसे कहा जा सकता है ? मानलीजिए आरएसएस प्रमुख डॉ. मोहनराव मधुकर भागवत ने विशेष रूचि लेते हुए गडकरी को भाजपा का अध्यक्ष बनवा ही दिया तो इस कारण से समूचे संघ पर प्रश्नवाचक कैसे लगाया जा सकता है ? लेकिन इसके बावजूद नेतृत्व की सोच, आचार-विचार और कार्य व्यवहार कहीं न कहीं संगठन के कार्यकर्ताओं के मन-मस्तिष्क को प्रभावित करते हैं, जिससे पूरा संगठन प्रभावित होता है। एक-एक कार्यकर्ता के आचरण से ही संगठन की छवि निर्मित होती है। इस छवि को संरक्षित रखते हुए उत्तरोत्तर निखारने का प्रयास करना नेतृत्व का काम है। लेकिन इसके लिए नेतृत्व को अनुभवी, समझशील और विवेकशील होना चाहिए। साथ ही उसमें स्वयं को सुधारते हुए संगठन कार्यों को गति देने की क्षमता भी होनी चाहिए।

समाज सेवा और राजनीति में किसान जैसा धैर्य चाहिए, तो लोहा गर्म रहते उस पर चोट करने का स्वभाव भी जरूरी है। “बंदर स्वभाव” का किसान अपने ही बोए आम के फल का स्वाद कभी नहीं चख सकता। सार्वजनिक जीवन में कभी-कभी ऐसी स्थितियां भी आती हैं जब केवल पद से चिपके रहने भर से ही व्यक्ति की महत्ता नहीं बढ़ती बल्कि पद छोड़ने के बाद भी व्यक्ति की महत्ता बढ़ जाया करती है। यदि गडकरी अपने ऊपर लग रहे कथित आरोपों के तत्काल बाद भाजपा अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिए होते तो सार्वजनिक जीवन में वह और बड़ा नेता बनकर उभरते। ऐसी स्थिति में उनके समक्ष पार्टी के द्वितीय पंक्ति के सारे नेतागण कहीं नहीं ठहरते। लेकिन उन्होंने अपनी “व्यवसायी बुद्धि” लगाकर पद का मोह किया और स्वयं को छोटा बनाए रखा। हालांकि गडकरी को पद छोड़ने के लिए नैतिकता की प्रेरणा लेने के लिए बहुत दूर जाने की आवश्यकता नहीं थी। संघ और भाजपा में अगणित ऐसे लोग हैं जो “नैतिकता के धुरंधर” कहे जा सकते हैं।

पार्टी के वयोवृद्ध नेता लालकृष्ण आडवाणी ने जैन हवाला मामले में अपना नाम आने के तत्काल बाद संसद की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया था, और दोषमुक्त होने तक चुनाव न लड़ने की घोषणा की थी। खैर, गडकरी यदि अब इस्तीफा देते भी हैं तो उसका लाभ न तो संगठन को मिलेगा और न ही उनको। बीएस येदियुरप्पा के मसले पर ‘कानून’ और ‘नैतिकता’ की चर्चा करके उनका बचाव करने वाले गडकरी खुद नैतिकता के मसले पर पिछड़ गये हैं। समय की गाड़ी छूट चुकी है।

गडकरी ने एक और बड़ी गलती दिसंबर 2009 में भाजपा अध्यक्ष पद संभालने के तत्काल बाद की थी। अध्यक्ष पद संभालते ही वह स्वयं की बजाए दूसरों को ही ठीक करने के काम में जुट गए। स्पष्ट है कि जब आप ऐसा कहने लगते हैं कि मैं सबको ठीक कर दूंगा, तो आपके इस बयान पर अन्य लोग क्या सोचेंगे। परिणामत: वे लोग दबी जुबान में आपके विरोधी हो जाएंगे। पार्टी संगठन को ठीक करने का कार्य स्वयं में परिवर्तन लाते हुए मौन रहकर भी किया जा सकता है। लेकिन गडकरी यहीं विफल हो गये। वह अपने को ठीक करने की बजाए दूसरों को ही ठीक करने के काम में जुट गये। व्यक्ति के इस प्रकार के आचरण को “सद्गुण विकृति” कह सकते हैं, साथ ही “ईमानदारी का अहंकार” भी। शायद डॉ. भागवत चयन में यहीं चूक गये। चूकें भी क्यों न, जब कोई निर्णय आमसहमति और आपसी विश्वास को बनाए रखते हुए होता हो तो वह दूरगामी प्रभाव छोड़ता है, लेकिन दिन-प्रतिदिन कमजोर हो रहे संघ के नये नेतृत्व ने भाजपा पर अपना प्रभाव जमाने के मद्देनजर यह निर्णय किया, इसलिए चूक होना अवश्यंभावी ही था। यह चूक इसलिए भी हुई क्योंकि संघ स्वयं को न ठीक करते हुए भाजपा को ही ठीक करने के काम में जुट गया।

 

संघ का मूल कार्य व्यक्ति निर्माण है। इसके लिए दैनंदिनी लगने वाली शाखाओं को माध्यम माना गया है। किसी क्षेत्र में लगने वाली शाखाओं की संख्या जितनी बढ़ती है तो कहा जाता है कि उस क्षेत्र में संघ मजबूत हो रहा है। लेकिन आज किसी क्षेत्र विशेष में ही नहीं बल्कि देश भर में शाखाएं कहीं नहीं लग रही हैं और यदि लग भी रही हैं तो उसका प्रभाव नगण्य है। आज शाखाएं युवाओं को आकर्षित नहीं करतीं, उलटे अरूचि ही उत्पन्न करती हैं। इस कारण संघ समाज को प्रभावित नहीं कर रहा बल्कि स्वयं प्रभावित होता जा रहा है। देश भर में शाखा कार्य के लिए संघ के करीब 2355 प्रचारक हैं। इन प्रचारकों के पूर्णकालिक प्रयास के बाद भी शाखाओं में संख्या नहीं होती। संघ को अपनी शाखाएं बढ़ाने और उसको प्रभावी बनाने की ज्यादा चिंता करनी चाहिए। तभी संघ मजबूत होगा और मजबूत संघ के आगे भाजपा सदैव नतमस्तक रहेगी, उसको नियंत्रण में रखने के लिए कोई अन्य प्रयास की आवश्यकता नहीं रह जाएगी। लेकिन यह न करके शार्ट कट का रास्ता अपनाया जा रहा है। (जारी…)

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1 Comment on "पतन की ओर अग्रसर संघ (भाग 2)"

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अभिषेक पुरोहित
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अभिषेक पुरोहित

जब भी संघ का स्व्यंसेवक पत्रकारिता मेन जाता है तब वह स्वयंसेवक कम उपदेशक ज्यादा रहता है व उसका संघ कार्यालया आना प्रचारको से मिलना कार्यक्रम मे आना एक नयी खबर की तलाश मे ही होता है इस लेख को पढ़ कर बहुत निराशा हुयी ,ये जन कर भी बहुत दुख हुया प्रचारक रह कर भी आप संघ को समझ नहीं पाय

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