लेखक परिचय

संजय सक्‍सेना

संजय सक्‍सेना

मूल रूप से उत्तर प्रदेश के लखनऊ निवासी संजय कुमार सक्सेना ने पत्रकारिता में परास्नातक की डिग्री हासिल करने के बाद मिशन के रूप में पत्रकारिता की शुरूआत 1990 में लखनऊ से ही प्रकाशित हिन्दी समाचार पत्र 'नवजीवन' से की।यह सफर आगे बढ़ा तो 'दैनिक जागरण' बरेली और मुरादाबाद में बतौर उप-संपादक/रिपोर्टर अगले पड़ाव पर पहुंचा। इसके पश्चात एक बार फिर लेखक को अपनी जन्मस्थली लखनऊ से प्रकाशित समाचार पत्र 'स्वतंत्र चेतना' और 'राष्ट्रीय स्वरूप' में काम करने का मौका मिला। इस दौरान विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं जैसे दैनिक 'आज' 'पंजाब केसरी' 'मिलाप' 'सहारा समय' ' इंडिया न्यूज''नई सदी' 'प्रवक्ता' आदि में समय-समय पर राजनीतिक लेखों के अलावा क्राइम रिपोर्ट पर आधारित पत्रिकाओं 'सत्यकथा ' 'मनोहर कहानियां' 'महानगर कहानियां' में भी स्वतंत्र लेखन का कार्य करता रहा तो ई न्यूज पोर्टल 'प्रभासाक्षी' से जुड़ने का अवसर भी मिला।

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दंगे,हिन्दुओं का पलायन,दादरी और मथुरा कांड की गंूज

संजय सक्सेना

उत्तर प्रदेश में 11 फरवरी को पश्चिमी उत्तर प्रदेश के 15 जिलों की 73 सीटों पर प्रथम चरण में मतदान होना है। कहने को तो 15 जिलों में मतदान होना है, परतु तमाम दलों द्वारा पूरी व्यूह रचान 2014 के लोकसभा चुनाव की तरह ही मुजफ्फरनगर के इर्दगिर्द रची जा रही है। वैसे तो सितंबर 2013 का मुजफ्फरनगर दंगा इतिहास के पन्नोें में सिमट गया है,लेकिन किसी भी चुनाव के समय इसका ‘जिन्ना’ पन्नों से बाहर आ जाता है। नेतागण चुनावी बढ़त के लिये भाषा की मर्यादा बार-बार भूल जाते हैं। 2013 के दंगों के बाद यहां का सियासी मिजाज काफी बदल गया है। अब जाट और मुसलमान एकजुट होकर वोटिंग नहीं करते हैं। यहां प्रत्याशी के तौर पर दागी भी हैं और दंगों के आरोपी भी। दादरी कांड और कैराना से हिन्दुओं का पलायन भी यहां मुद्दा बनता दिख रहा है्। मथुरा के जवाहर बाग में पिछले वर्ष हुई आगजनी और पुलिस के एक बड़े अधिकारी सहित कुछ अन्य पुलिस वालों की मौत का मामला भी सत्तारूढ़ सपा के खिलाफ गरमाया हुआ है। इन वजहों सें जात-पांत को छोड़कर सभी मुद्दे पीछे छूट गये हैं। वर्ष भर खेती के लिये पानी, खाद-बीज और बिजली की समस्या से जुझने वाले किसानों को इस समय यह सब समस्याएं दिखाई नहीं पड़ रही हैं।
11 फरवरी को जिन 73 सीटों पर मतदान होना है, 2012 में उसमें से 25 सीटों पर सपा, 24 पर बसपा, 11-11 सीटों पर कांगे्रस़ गठबंधन और भाजपा का कब्जा रहा था। प्रथम चरण में जिन सीटों पर मुकाबला होना हैं,उसमें सपा-बसपा ने मुस्लिम नेताओं को टिकट देने में खूब दरियादिली दिखाई हैं करीब पचास मुस्लिम प्रत्याशियों को सपा-बसपा ने टिकट दिया है।
प्रथम चरण में उतरे कई उम्मीदवार करोड़पति हैं तो कई के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज है। प्रथम चरण में 302 उम्मीदवार करोड़पति हैं जबकि 168 ने घोषित किया है कि उनके खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज हैं।
एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक 836 उम्मीदवारों में 302 करोड़पति हैं। बीएसपी के 73 में से 66, बीजेपी के 73 में से 61, एसपी के 51 में 40, कांग्रेस के 24 में 18, आरएलडी के 57 में 41 और 293 निर्दलीय उम्मीदवारों में 43 ने एक करोड़ रुपये से ज्यादा की संपत्ति घोषित की है।
यूपी चुनाव के पहले चरण में चुनाव लड़ रहे उम्मीदवारों की औसत संपत्ति 2.81 करोड़ रुपये है। एडीआर की रिपोर्ट के मुताबिक, विश्लेषण किए गए 839 उम्मीदवारों में 168 ने अपने खिलाफ दर्ज आपराधिक मामले घोषित किए हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि 143 उम्मीदवारों पर हत्या, हत्या की कोशिश, अपहरण, महिलाओं के खिलाफ अपराध सहित गंभीर आपराधिक मामले दर्ज हैं। कुल 186 उम्मीदवारों ने अपना पैन कार्ड से संबंधित विवरण घोषित नहीं किया है। यूपी इलेक्शन वॉच और एडीआर ने पहले चरण का चुनाव लड़ रहे 98 राजनीतिक दलों के 839 उम्मीदवारों में 836 द्वारा दिए गए हलफनामे का आकलन किया है ।
बड़ों की प्रतिष्ठा पर लगा है दांव
प्रथम चरण में परिजनों की मैदान में मौजूदगी से केन्द्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह और राजस्थान के राज्यपाल कल्याण सिंह समेत कई दिग्गजों की प्रतिष्ठा दांव पर लगी हुई है। राजनाथ सिंह के पुत्र पंकज सिंह नोएडा सीट से तथा कल्याण सिंह की पारम्परिक सीट रही अलीगढ़ के अतरौली से इस बार उनका पोता संदीप कुमार सिंह चुनाव मैदान में है। पंकज की वजह से राजनाथ की प्रतिष्ठा चुनाव में जुड़ गई है। नोएडा की मौजूदा विधायक विमला बाथम का टिकट काटकर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने पंकज सिंह को चुनाव मैदान में उतारा है।
प्रथम चरण में सबसे दिलचस्प मुकाबला मथुरा सीट पर माना जा रहा है, क्योंकि वहां से कांग्रेस विधान मंडल दल के नेता और तीन बार विधायक रह चुके प्रदीप माथुर का मुकाबला भाजपा के दिग्गज पार्टी सचिव तथा प्रवक्ता श्रीकान्त शर्मा से है। दोनों ही मथुरा में पकड रखने का दावा करते है। स्थानीय नागरिकों के अनुसार माथुर को क्षेत्र में बने रहने का फायदा मिल सकता है। शर्मा तो मूलरुप से मथुरा के ही रहने वाले हैं, लेकिन उनका ज्यादातर समय दिल्ली में ही बीतता है। चुनाव दिलचस्प है। कडे मुकाबले में चंद वोटो से हार जीत की उम्मीद की जा रही है।
मेरठ सदर सीट से विधायक और भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष डा0 लक्ष्मीकांत बाजपेई की साख भी दांव पर लगी हुई है, क्योंकि इस बार वह त्रिकोणात्मक मुकाबले में फंसे हुए हैं। मेरठ की ही किठोर, मेरठ दक्षिणी और मेरठ कैंट के चुनाव नतीजो पर भी नजर रहेगी क्योंकि किठोर से मंत्री शाहिद मंजूर, मेरठ दक्षिणी से बहुचर्चित पूर्व मंत्री हाजी मोहम्मद याकूब और मेरठ कैंट से भाजपा के वरिष्ठ नेता सत्य प्रकाश अग्रवाल चुनाव लड़ रहे हैं। मेरठ की ही सरधना सीट पर भी लोगो की नजर है, क्योंकि वहां से मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के निकटस्थ अतुल प्रधान चुनाव मैदान में हैं। प्रधान का दो बार टिकट काटा गया लेकिन सपा को अपने नियंत्रण में लेते ही अखिलेश यादव ने उन्हें फिर से उम्मीदवार बना दिया। मुजफ्फरनगर सदर सीट से गौरव स्वरुप बंसल चुनाव मैदान में हैं। वह पूर्व मंत्री दिवंगत चितरंजन स्वरुप के पुत्र हैं। पूर्व मंत्री की क्षेत्र में अच्छी साख थी। गौरव का चुनाव कई मायनों में महत्वपूर्ण है। मुजफ्फरनगर दंगो की वजह से गौरव उप-चुनाव में पराजित हो गये थे। इस सीट का परिणाम 2013 में हुए दंगो से जोड़कर भी देखा जायेगा। मुजफ्फरनगर के खतौली सीट से राष्ट्रीय लोकदल के शाहनवाज राणा चुनाव मैदान में है। वह पत्रकार भी हैं। खतौली सीट पर राणा की स्वयं की साख दांव पर है। दंगो से प्रभावित रहे शामली की दो सीटे कैराना और थानाभवन पर भी लोगों की नजरे हैं क्योंकि कैराना से भाजपा सांसद हुकुम सिंह की बेटी मृगांका सिंह चुनाव लड रही हैं जबकि थानाभवन से दंगो के आरोपी सुरेश राणा चुनाव मैदान में हैं।
पक्षलिका सिंह आगरा के बाह सीट से चुनाव मैदान में हैं। सिंह का आगरा और उसके आस पास के क्षेत्रों में खासा प्रभाव है।
राष्ट्रीय लोकदल (रालोद) विधानमंडल दल के नेता रहे ठाकुर दलवीर सिंह इस बार भारतीय जनता पार्टी के टिकट पर अपनी पारम्परिक सीट अलीगढ के बरौली से चुनाव मैदान में हैं। उनकी साख दांव पर लगी हुई है क्योंकि वह दल बदलकर भाजपा में शामिल हुए हैं। काफी शालीन स्वभाव के ठाकुर धर्मपाल सिंह बसपा के टिकट से आगरा के एत्मादपुर सीट से चुनाव लड रहे हैं।वह सुश्री मायावती के नजदीकियों में हैं। तीन बार से लगातार विधायक चुने जा रहे ठाकुर धर्मपाल सिंह की चैथी बार प्रतिष्ठा दांव पर लगी हुई है, क्योंकि उन्हे भाजपा के सजातीय और आरपीआई के जाटव उम्मीदवारों से खतरा पैदा हो गया है।
जाटव आमतौर पर बसपा के वोट बैंक माने जाते हैं। बुलन्दशहर से पूर्व मंत्री वीरेन्द्र सिंह सिरोही और श्रीभगवान शर्मा उर्फ गुड्डू पंडित चुनाव लड़ रहे हैं। सिरोही भाजपा के वरिष्ठ नेता हैं। भाजपा सरकारो में मंत्री रहे हैं। उनकी हार या जीत बुलन्दशहर में पार्टी के लिए काफी महत्वपूर्ण है। गुड्डू पंडित 2012 में सपा से विधायक बने थे, लेकिन विधान परिषद चुनाव में सपा से बगावत कर उन्होंने अपने भाई के साथ भाजपा उम्मीदवारो के पक्ष में मतदान किया था। चुनाव के ऐन मौके पर भाजपा ने दोनों भाइयों को टिकट देने से इन्कार कर दिया। अब वे राष्ट्रीय लोकदल के टिकट पर चुनाव लड़ रहे हैं। उनका राजनीतिक भविष्य दांव पर लगा हुआ है।
बुलन्दशहर के ही शिकारपुर क्षेत्र से मुकुल उपाध्याय बसपा के टिकट से अपनी किस्मत आजमा रहे हैं। वह बसपा के वरिष्ठ नेता रामवीर उपाध्याय के भाई हैं। उनका चुनाव उनके बड़े भाई रामवीर उपाध्याय के नाक का सवाल बन गया है। रामवीर उपाध्याय स्वयं हाथरस की सादाबाद सीट से बसपा के टिकट पर चुनाव मैदान में हैं। एटा सदर सीट से आशीष कुमार यादव लोकदल से चुनाव लड़ रहे हैं। इन्हें सपा की पहली सूची में उम्मीदवार घोषित किया गया था, लेकिन अखिलेश यादव ने अपनी सूची में जगह नहीं दी और वह पार्टी से बगावत कर लोकदल के उम्मीदवार हो गये। अब उनकी उम्मीदवारी उनके लिए ही इज्जत की बात हो गयी है क्योंकि उनकी हार उन्हें राजनीति में काफी पीछे धकेल सकती है।
गाजियाबाद के लोनी से बहुचर्चित मदन भैया राष्ट्रीय लोकदल से चुनाव लड रहे हैं। बसपा छोड कांग्रेस का दामन थामने वाले के के शर्मा भी गाजियाबाद से चुनाव मैदान में हैं। दोनों के लिए यह चुनाव राजनीतिक जीवन मरण का प्रश्न बन गया है। मथुरा के बलदेव क्षेत्र से पूरन प्रकाश भारतीय जनता पार्टी से चुनाव मैदान में हैं। वह राष्ट्रीय लोकदल छोड़कर भाजपा में शामिल हुए हैं।

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