उपनिषदों में प्राप्त जीवात्मा की मुक्ति विषयक कुछ सूक्तियां

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मनमोहन कुमार आर्य-

upanishad

संसार से सबसे प्राचीन ग्रन्थ वेद हैं। वेद सभी सत्य विद्याओं की पुस्तकें हैं। वेदों में तृण से लेकर ईश्वर सहित सभी विषयों का सत्य ज्ञान व विज्ञान निहित है। यह वेदेां का ज्ञान इस संसार के सृष्टिकत्र्ता ईश्वर से आदि चार ऋषियों को मिला था। वेदों के आधार पर ही प्राचीन काल में वेदों के ज्ञानी ऋषियों ने अध्यात्म विद्या का वेदों से दोहन कर उपनिषदों का निर्माण किया। सौभाग्य से आज भी आध्यात्मिक ज्ञान के यह महत्वपूर्ण ग्रन्थ हमें उपलब्ध है। कू्रर शासक औरंगजेब के भाई दाराशिकोह ने भी उपनिषदों का अध्ययन किया था और इनकी मुक्त कण्ठ से प्रशंसा की थी। अनेक विदेश दार्शनिक एंव अन्य विद्वानों ने भी उपनिषदों की दिल खोल कर प्रशंसा की है। एक विदेशी दार्शनिक विद्वान शोपनहार ने लिखा है कि उपनिषदों के अध्ययन से मुझे अपने जीवन में सुख व शान्ति मिली है। मैं यह भी अनुभव करता हूं कि इस अध्ययन से मुझे मृत्यु के बाद भी शान्ति मिलेगी। संसार में सत्य ज्ञान से बढ़कर किसी पदार्थ या वस्तु का महत्व नहीं है। इस कारण उपनिषदों का महत्व निर्विवाद है। हम स्वयं भी उपनिषदों के अध्ययन से लाभान्वित हुए हैं और अनुभव करते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति को इनका अध्ययन करना चाहिये।

 

मनुष्य सृष्टि नियम के अनुसार जन्म व मरण के चक्र में फंसा हुआ है। सत्कर्मों, ज्ञान व उपासना अर्थात् ईश्वर के साक्षात्कार से मनुष्य का जीवात्मा जन्म व मृत्यु के चक्र से छूट कर मुक्ति की अवस्था में चला जाता है। मुक्ति की अवधि एक परान्तरकाल जो 31 नील 10 खरब 40 अरब वर्षों की होती है। इस लम्बी अवधि में मुक्त जीवात्मा जन्म मरण के चक्र से छूटा हुआ ईश्वर के सान्निध्य वा मुक्ति में आनन्द के साथ रहता है। मुक्ति से सम्बन्धित कुछ उपनिषदों की सूक्तियां स्वाध्याय हेतु हम प्रस्तुत कर रहें। आशा है कि पाठक इन्हें पसन्द करेंगे।

 

उपनिषदों की मोक्ष विषयक कुछ सूक्तियां इस प्रकार हैं।

 

(1)  तमीशानं वरदं देवमीड्यम्, निचाय्येमां शान्तिमत्यन्तमेति। (श्वेता. 4/11)

अर्थः उस सर्वोपरि, मनोवांछित वरो के प्रदाता, ज्योतिस्वरूप, उपास्यदेव ईश्वर को निश्चय पूर्वक जान कर ही उपासक मनुष्य वा योगी इस अत्यन्त शान्ति से पूर्ण मुक्त अवस्था को प्राप्त करता है।

 

(2)  विद्ययाऽमृतमश्नुते। (ईशोपनिषद 11)

अर्थः जीव, विद्या (ज्ञान) से अमृत (मोक्ष) को प्राप्त करता है।

 

(3) अमृतस्य देवधारणो भूयासम्। (तै. शि. 4/1)

अर्थः मैं मुक्ति रूपी सुख का विद्वानों के तुल्य धारण करनेवाला होऊं।

 

(4)  ब्रह्मस्थोऽमृतत्वमेति। (छान्दोग्य उपनिषद 2/23/1)

अर्थः ब्रह्म में लीन भक्त अमृत (मुक्ति) को पा लेता है।

 

(5) अमृतत्वस्य तु नाशाऽस्ति वित्तेनेति। (बृहदारण्यक उपनिषद 2/4/2)

अर्थः अमृतत्व-परम शान्ति (मोक्ष) की आशा धन से नहीं करनी चाहिए।

 

(6)  स्वर्गलोका अमृतत्वं भजन्ते। (कठोपनिषद 1/3)

अर्थः स्वर्ग लोक वाले (मुक्ति को प्राप्त जीव) अमृतपन (आनन्द) का सेवन करते हैं।

 

(7)  साम्परायः प्रतिभाति बालम्। (कठोपनिषद 2/6)

अर्थः अज्ञ (अज्ञानी), अबोध मनुष्य को मोक्ष अच्छा नहीं लगता।

 

(8) धीराः अमृतत्वं विदित्वा ध्रुवमध्रुवेष्विह प्रार्थयन्ते। (कठोपनिषद 4/2)

अर्थः ध्यानी जन अमृतत्व को जान कर इन अनित्य (सांसारिक) पदार्थों में नित्य (परमात्मा) को नहीं चाहते।

 

(9)  तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरास्तेषां सुखं शाश्वतं नेतेरषाम्। (कठोपनिषद 5/12)

अर्थः जो धीर पुरूष उसे आत्मस्थ देखते हैं, उन्हें ही स्थिर सुख (मोक्ष) प्राप्त होता है, दूसरों को नहीं।

 

(10) पृथगात्मानं प्रेरितारं मत्वा, जुष्टस्ततस्तेनामृतत्वमेति। (श्वेता. उपनिषद 1/7)

अर्थः अपने आपको (अपनी जीवात्मा को) और इस सृष्टि के प्रेरक परमात्मा को पृथक्-पृथक् जानकर, उस परमेश्वर की स्तुति करने-वाला, प्रभु का प्रेमी उपासक, उसकी कृपा से मोक्ष को प्राप्त करता है।

 

मुक्ति विषय को विस्तार से जानने के लिए महर्षि दयानन्द के ग्रन्थों सत्यार्थप्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, ऋग्वेद व यजुर्वेद भाष्य आदि ग्रन्थों सहित योग व सांख्य दर्शन का अध्ययन आवश्यक है। यह जानने योग्य है कि जब तक हमारी मुक्ति नहीं होगी हम कर्मानुसार बार बार भिन्न-भिन्न योनियों में जन्म लेते रहेंगे और यह अनन्त यात्रा कभी समाप्त नहीं होगी। क्या समस्त दुःखों से निवृत्ति व समस्त सुखों व आनन्द की प्राप्ति के लिए दैनन्दिन ईश्वरापासना करना सस्ता सौदा नहीं है? दुखों से लम्बी अवधि 31 नील 10 खरब 40 अरब वर्षों तक मुक्त होने का इसके अतिरिक्त अन्य कोई उपाय संसार में किसी के पास नहीं है। यह स्वयं ईश्वर प्रेरित सत्य व एकमात्र मार्ग है जिससे दुःखों से मुक्त होकर जीवात्मा वास्तविक व चरम उन्नति को प्राप्त होता है। इस लेख की सामग्री का आधार श्री ज्ञानचन्द शास्त्री की पुस्तक उपनिषद् सूक्तिसुधा है। इसके लिए लेखक व प्रकाशक विजयकुमार गोविन्दराम हासानन्द, दिल्ली-6’ के हम आभारी हैं।

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