लेखक परिचय

श्रीराम तिवारी

श्रीराम तिवारी

लेखक जनवादी साहित्यकार, ट्रेड यूनियन संगठक एवं वामपंथी कार्यकर्ता हैं। पता: १४- डी /एस-४, स्कीम -७८, {अरण्य} विजयनगर, इंदौर, एम. पी.

Posted On by &filed under लेख.


श्रीराम तिवारी

एक ध्रुवीय गतिज उर्जा के नकारात्मक परिणाम उसके सृजनहार द्वारा छुपाये नहीं छुप रहे हैं.सोवियत समाजवादी व्यवस्था की जड़ों में मठ्ठा डालने वालों को अब दुनिया भर में अपनी फजीहत कराने में भी शर्म नहीं आ रही है.पेंटागन आधारित और बहुराष्ट्रीय एकाधिकारवादी कम्पनियों द्वारा निर्धारित वैश्वीकरण की पूंजीवादी आर्थिक नीतियों के दुष्परिणाम अब अमेरिका तक सीमित नहीं रहे.श्री ओबामा जी लाख चाहें कि अमेरिका अपने संकट को शेष विश्व के कन्धों पर लादकर अपने परंपरागत पूंजीवादी-साम्राज्यवादी निजाम को बरकरार रख ने में बार -बार कामयाब होता रहे,किन्तु नियति को या यों कहें कि आधुनिक विश्व चेतना को ये मंजूर नहीं.अमेरिकी प्रशासन को ज्ञात हो कि ’रहिमन हांडी काठ कि ,चढ़े न बारम्बार..’या ’ये इश्क नहीं आशां इतना समझ लीजे,इक आग का दरिया है;डूब के जाना है.’ उधर आर्थिक संकट से जूझ रहे ग्रीस {यूनान}को राहत देने के लिए’ यूरोप संघ ’ने प्रस्ताव का प्रारूप तैयार ही किया , कि इधर इटली ,फ़्रांस की आर्थिक बदहाली के अफ़साने भी मीडिया की जुबान पर आ ही गए.यूरोपीय यूनियन अर्थात यूरोजों के वित्त मंत्रियों की जनरल बॉडी मीटिंग के बाद सभी सम्बंधित देशों और उनके बैंकों को चेतावनी दी गई की वे अपने-अपने घाटे कम करें.ग्रीस के आर्थिक संकट ने न केवल यूरोपीय संघ ,न केवल उस के हमराह एवं घोर पूंजीवाद परस्त -सरपरस्त अमेरिका,बल्कि सारी वैश्विक वित्त मण्डली को बैचेन कर डाला है.पूरी दुनिया के पूंजीवादी अलमबरदार बड़ी -बड़ी बैंकों और पूँजी संचलन केन्द्रों पर दवाव बना रहे हैं कि इस अधोगति और बदनामी से बचाने के पूंजीवादी उपचारों को खंगालिए. ,हमारी ठेठ हिंदी में इसे यों कहा जाता है कि ’मस्के पाद महा पापी-उत्तम्पाद धड़कानाम’ अर्थात अपान वायु को विसर्जत करने का अधम तरीका तो हुआ ’मसकैं-पाद’ और उत्तम तरीका हुआ धड़कानाम !!!

चूँकि वर्तमान दौर के यूनानी आर्थिक संकट की धुरी विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष के मार्फ़त सम्पूर्ण यूरोप और उसके सहयात्री अमेरिका के मर्मस्थल में धसी हुई है,अतएव यूरोपीय यूनियन पर दुनिया भर के सभ्रांत लुटेरों का बेजा दवाव है की इस मौजूदा आग की लपटों को फ़ौरन शांत किया जाए.यही वजह है कि लगभग दिवालिया हो चुकी इटली की अर्थ व्यवस्था और अधःपतन को प्राप्त हो चुकी फ़्रांस की अर्थ व्यवस्था के वावजूद यूरोपीय संघ द्वारा विगत सितम्बर में रोकी गई सहायता लगभग आठ अरब यूरो के रूप में ग्रीस को तत्काल दिए जाने का ऐलान किया जा रहा है.५.८ अरब यूरो की रुकी हुई मदद राशी भी शीघ्र जारी किये जाने की सम्भावना है.

यूनान की आंतरिक राजनीती का ज्वार भी उफान पर है.उपरोक्त ऋण राहत पैकेज पर जनमत संग्रह के ऐलान से बाज़ार हक्के-बक्के हैं.इससे यूरोप के नेता बेहद नाराज हैं.हलाकि फ़्रांस ने राहत पैकेज को अंतिम विकल्प बताया किन्तु स्वयम फ़्रांस की स्थिति ये है की निकोलस सरकोजी को स्वयम वेतन नहीं लेने की घोषणा करनी पड़ रही है.इटली की जर्जर आर्थिक दुरावस्था को स्थिरता प्रदान करने केलिए बर्लुस्कोनी शी र्षासनलगा रहे है.चौतरफा संकट की स्थिति में इटालियन बांड्स भारी दवाव में आ चुके हैं.यूरो क्षेत्र का संकट लगातार फैलता जा रहा है.डालर के मुकाबले यूरो की विनिमय दर घटकर १.३६०९ यूरो रह गई है.इस ताज़ा उठापटक से यूरोपीय बाज़ारों में ५%से ज्यादा गिरावट रेखांकित की गई है.इटली के लिए स्थिति असहज हो चुकी है.आम जनता सड़कों पर निकल चुकी है,फ़्रांस में हड़तालों का दौर जारी है.

उधर अमेरिका में २००८ की आर्थिक मंदी की मार के घाव भरे भी न थे कि अचानक चार-चार विशालकाय बैंक धराशाई होते चले गए.इनके सहित मौजूदा आर्थिक सत्र में भूलुंठित बेंकों कि संख्या ८४ हो चुकी है .अमेरिका में आभासी वित्त पूँजी की अनुपलब्धता की वजह से बेंकों का कारोबारी संकट आम हो चला है.इससे पहले २०१० में १५७ अमेरिकी बैंकें अपना बोरिया बिस्तर बाँध चुकी हैं.अपने असीमित अंतर्राष्ट्रीय हितों के बहाने ,आतंकवाद से लड़ाई के बहाने ,दुनिया भर में थानेदारी का रौब बरकरार रखने के फेर में अमेरिका पूंजीवादी साम्राज्यवाद का सूर्यास्त निकट है.वाल स्ट्रीट कब्ज़ा करो ’आन्दोलन इस दिशा में क्रांति की भोर का तारासावित हो सकता है.

Leave a Reply

4 Comments on "विश्व पूंजीवाद के स्वर्णिम दिन लदने को हैं"

Notify of
avatar
Sort by:   newest | oldest | most voted
dildar
Guest

एक अच लिख hai

इक़बाल हिंदुस्तानी
Guest
1930 से अब तक सात बार पूंजीवाद मंदी का शिकार हुआ लेकिन उसकी गति पर हर बार थोड़ा सा ब्रेक लगा और वह संभल गया। इस बार सबप्राइम संकट से अभी वह पूरी तरह से बाहर आया भी नहीं था कि कर्ज और साख संकट की मुसीबत में फंस गया है। इससे निकलने का रास्ता अमेरिका उत्पादन बढ़ाकर इसकी गति तेज करना मान रहा है। उधर अमेरिका में हाल ही में वालस्ट्रीट पर कब्ज़ा करने का जो आंदोलन शुरू हुआ है उसकी मांग बेतहाशा कारपोेरेट मुनाफे पर रोक लगाकर समय रहते समान अवसर की व्यवस्था लाने के प्रयास करना है।… Read more »
Anil Gupta
Guest
भारत के पुराने लोगों का कहना था की “तेते पाँव पसारिये, जेती लम्बी सौढ़”.अर्थात उतना ही खर्चा करो जितना जेब सह सके. लेकिन पश्चिमी देशों का ऋण पर आधारित ढांचा भारत को भी अपने लपेटे में लेने के लिए जोर लगा रहा था और अभी भी सक्रीय है.लेकिन भारत के आम आदमी के स्वाभाव में आज भी पुराने लोगों की सीख काम कर रही है. मई स्वयम अपना क्रेडिट कार्ड विरले ही इस्तेमाल करता हूँ. अनेक बार बेंक का फोन आता है की आप अपना कार्ड प्रयोग नहीं करते हैं तो मैं उन्हें यही कहता हूँ की मैंने इमरजेंसी के… Read more »
श्रीराम तिवारी
Guest

thanks for a auspicious and aknowladgable comments.

wpDiscuz