लेखक परिचय

विजय कुमार

विजय कुमार

शिक्षा : एम.ए. राजनीति शास्त्र, मेरठ विश्वविद्यालय जीवन यात्रा : जन्म 1956, संघ प्रवेश 1965, आपातकाल में चार माह मेरठ कारावास में, 1980 से संघ का प्रचारक। 2000-09 तक सहायक सम्पादक, राष्ट्रधर्म (मासिक)। सम्प्रति : विश्व हिन्दू परिषद में प्रकाशन विभाग से सम्बद्ध एवं स्वतन्त्र लेखन पता : संकटमोचन आश्रम, रामकृष्णपुरम्, सेक्टर - 6, नई दिल्ली - 110022

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विजय कुमार

controlशर्मा जी खाली बैठे-बैठे अब ऊबने लगे थे। उनकी पत्नी भी चाहती थी कि वे किसी धंधे से लगकर दिन भर बाहर रहें, जिससे वे अपने पड़ोस की महिलाओं के साथ बैठकर बात कर सकें। दो-चार दिन ऐसा न होने पर उनके पेट में दर्द होने लगता था।

इधर सेठ चंदूलाल चमचाकर एक नया अखबार निकालना चाहते थे। उनके पास कई तरह से कमाया हुआ बेहिसाब पैसा था। वे जानते थे कि मीडिया वालों पर कोई आसानी से हाथ नहीं डालता। इसलिए वे अखबार की आड़ में अपने काले धंधों को छिपाना चाहते थे। एक स्थानीय राजनेता भी इसमें रुचि ले रहे थे।

उन्हीं नेता जी के माध्यम से शर्मा जी और सेठ चंदूलाल चमचाकर की भेंट हुई और इस जुगलबंदी से ‘संवाद टाइम्स’ नामक अखबार छपने लगा। सेठ जी इसके प्रकाशक बने और शर्मा जी सम्पादक।

सम्पादक बनने से शर्मा जी की व्यस्तता बढ़ गयी। वे सुबह नाश्ता कर निकलते, तो रात को ही लौटते थे। वेतन भी ठीकठाक मिल रहा था। इससे शर्मा जी और उनकी पत्नी के दिन अच्छे बीतने लगे।

कुछ दिन बाद शर्मा जी घर पर आये, तो अखबार के विषय में ही बात होने लगी।

– शर्मा जी, आप ‘संवाद टाइम्स’ के सम्पादक कैसे बन गये ?

– अपनी योग्यता के कारण।

– पर आपने तो 40 साल की सरकारी नौकरी में पूरा समय गपशप, लेनदेन और चायबाजी में ही लगाया है ?

– वर्मा जी, आपकी समझदानी छोटी है, इसलिए आप विषय की गहराई तक नहीं पहुंच सकते। गपशप, लेनदेन और चायबाजी द्वारा बात को अपने मनचाहे लक्ष्य तक पहुंचाने का नाम ही तो संवाद है। इसलिए सेठ जी को मुझसे अच्छा सम्पादक नहीं मिल सकता था।

– अच्छा ?

– और क्या। देखो, संवाद तो मुलायम मिट्टी की तरह होता है, जिसे कुम्हार अपने कुशल हाथों से मनचाहा आकार दे देता है। ऐसे ही हम समाचार में विचार मिलाकर उसे अपने अखबार की नीति और पाठकों की रुचि के अनुरूप मनचाही दिशा में मोड़ देते हैं।

उस दिन मुझे कहीं जाना था, इसलिए बात टालते हुए मैंने उन्हें चाय पिलाकर टरका दिया।

कुछ दिन बाद मैं किसी काम से ‘संवाद टाइम्स’ के कार्यालय के सामने से निकला, तो शर्मा जी से मिलने चला गया। वहां शर्मा जी के साथ कुछ अन्य संवाददाताओं की बैठक हो रही थी। शर्मा जी ने मुझे भी अंदर ही बुला लिया।

शर्मा जी – बहुत दिनों से हमारे अखबार में कोई चटपटी खबर नहीं छपी है। इस उदासी को हमें जल्दी ही तोड़ना होगा।

एक – हां, दिल्ली दुष्कर्म की खबर भी पुरानी हो गयी। उसके धरने और प्रदर्शन पर अब पाठक ध्यान नहीं देते।

दूसरा – सीमा पर हुई मुठभेड़ की स्टोरी को कुछ आगे बढ़ा सकते हैं।

शर्मा जी – अब वहां भी शान्ति हो गयी है। सेनाध्यक्ष भी बलिदानी सैनिकों के घर हो आये। इसलिए अब उस खबर में दम नहीं रहा।

तीसरा – अभी एक नयी फिल्म लगी है, उसमें से कोई खबर निकाली जा सकती है।

शर्मा जी – अच्छा… ?

तीसरा – जी हां, उसके एक गाने में कुछ ऐसे शब्द हैं, जिस पर स्टोरी की जा सकती है।

शर्मा जी – ठीक है, तुम इस पर काम करो।

पहला – सर, मुझे भी कुछ काम बताइये।

शर्मा जी – तुमने पिछले दिनों कुछ लोगों के वक्तव्यों को तोड़ मरोड़ कर जो स्टोरी की थी, उससे सारे देश में हलचल मच गयी। ऐसी ही कोई धांसू चीज फिर खोज कर लाओ।

पहला – जयपुर में कांग्रेस का चिन्तन शिविर हो रहा है, वहां से कुछ चीज निकल सकती है।

शर्मा जी – बहुत कठिन है। क्योंकि गांधी जी के नाम की रोटी खा रहे कांग्रेस के तीनों बंदर कभी प्रेस से बात नहीं करते। वे प्रायः चुप रहते हैं या फिर अपने लेखकों द्वारा लिखे गये वक्तव्यों को पढ़ देते हैं। फिर भी तुम प्रयास करो।

चौथा – और सर मैं क्या करूं ..?

शर्मा जी – आप कुम्भ में चले जाइये। वहां से कुछ ऐसे चित्र या समाचार भेजें, जिनसे धर्म का मजाक उड़े और माहौल में गरमी आये। ऐसी चीजें लोग बहुत चाव से पढ़ते हैं। इनकी क्रिया और प्रतिक्रिया में आठ-दस दिन तक अखबार चलता रहता है।

बैठक समाप्त होने पर शर्मा जी ने ‘संवाद टाइम्स’ के बारे में मेरे विचार जानने चाहे। मैंने कहा कि देश और दुनिया में इतने अच्छे काम हो रहे हैं, आप कुछ खबर उनके बारे में भी दिया करें।

इस पर वे हंसे – वर्मा जी, आप पुरानी सोच के आदमी हैं। इन चीजों से आजकल अखबार नहीं चलते। जब तक कोई चटपटी बात न हो, तब तक लोग अखबार नहीं खरीदते। इसलिए हम तो बाल की खाल से जूता बनाकर भीड़ में फेंक देते हैं। तिल का ताड़ और बिना फूस का झाड़ बनाना हमारे बायें हाथ का खेल है। इससे खूब विवाद होता है और हमारा अखबार खूब बिकता है। यही हमारी नीति है और यही सफलता का रहस्य।

– तो फिर आप अखबार का नाम भी संवाद टाइम्स के बदले ‘विवाद टाइम्स’ रख लें, तो अच्छा रहेगा।

शर्मा जी मेरा मुंह देखते रह गये।

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2 Comments on "विवाद टाइम्स"

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आर. सिंह
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समाचार और समाचार पत्र के बारे में एक पुराना कथन याद आ रहा है कि कुत्ता अगर आदमी को काटे तो समाचार नहीं बनता ,पर अगर आदमी कुत्ते को काट ले तो समाचार बनता है. व्यंग्य अच्छा और सामयिक है.

Binu Bhatnagar
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बहुत ख़ूब,अच्छा लगा आपका व्यंग,अखबार और इलैक्ट्रौनिक मीडिया भी यही कर रहे हैं। समाचार नहीं वहाँ ‘स्टोरी’ होती है आजकल।

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