लेखक परिचय

सिद्धार्थ मिश्र “स्वतंत्र”

सिद्धार्थ मिश्र “स्वतंत्र”

विगत २ वर्षो से पत्रकारिता में सक्रिय,वाराणसी के मूल निवासी तथा महात्मा गाँधी कशी विद्यापीठ से एमजे एमसी तक शिक्षा प्राप्त की है.विभिन्न समसामयिक विषयों पे लेखन के आलावा कविता लेखन में रूचि.

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 सिद्धाथ मिश्र‘स्वतंत्र’

मुंबई हमले के दोषी कसाब की फांसी ने जाहिर तौर पर देशवासियों को सुकून दिया है । इस विषय में सबसे महत्पूर्ण बात यह है कि भारत सरकार द्वारा यह निर्णय मुंबई में हुये इस हमले की चैथी बरसी के ठीक पांच दिन पूर्व लिया गया । गौर करने वाली बात है कि सियासत और आमजनमास के विचारों में प्रायः विरोधभास पाये जाते हैं । इस मुद्दे पर भी यह विरोधाभास स्पष्ट रूप से सामने आ ही गया । इस ऐतिहसिक हमले के खल पात्र कसाब की फांसी पर जहां एक ओर जनमानस ने संतोष व्यक्त किया तो दूसरी ओर राजनेताओं ने इस मुद्दे की आंच पर राजनीतिक रोटियां सेंकने से गुरेज नहीं किया । बहरहाल जो भी हो इस निर्णय से निकले संदेश निश्चित तौर पर स्वागत योग्य हैं । हांलाकि इस फैसले से एक ओर जहां आमजन में हर्ष है तो दूसरी ओर कई प्रश्न भी उठ खड़े हुये हैं ।

इस विषय मे सबसे बड़ा प्रश्न है कि क्या ये फैसला इस कतार में शामिल बाकियों के लिये चेतावनी है? अथवा कसाब से शुरू हुआ ये सफर कुख्यात आतंकी अफजल तक कब पहुंचेगा ? सबसे बड़ी बात ये है कि इस बड़े फैसले के बावजूद पाकिस्तान के दोगले रवैये में कोई अंतर आता नहीं दिखता । ये बात आवश्यक इसलिये भी है िक इस हमले का मास्टर माइंड आज भी सरहद के उस पार सुरक्षित बैठा है । ज्ञात हो कि मुंबई पर हुये इस विभत्स हमले में कसाब की भूमिका मात्र एक मोहरे की ही थी । इस मोहरे को उसके अंजाम तक पहुंचाने में यदि चार साल लगे तो आकाओं का नंबर आने में कितने वर्ष और लगेंगे ? कसाब और निश्चित तौर पर मौत के खौफ से बेखौफ होकर ही भारत आए थे । बाकी नौ तो मौके पर ही मारे गये और जीवित कसाब को सजा देने में हमें नाकों चने चबाने पड़े । सबसे बड़ी बात ये है कि अगर उसकी फांसी को इतने गोपनीय ढ़ंग से अंजाम न दिया गया होता तो आज हालात कुछ दूसरे होते । देश में दंगे की आंशंका से इनकार नहीं किया जा सकता है । ऐसे में ये बात बिल्कुल स्पष्ट हो जाती है कि कसाब जैसे लोगों को संरक्षण देने का दोष कहीं न कहीं सेक्यूलर लोगों का भी है । हां इस पूरे मामले जो एक बात संतोषजनक है वो है कसाब की मौत और भारतीय न्याय प्रक्रिया के विपरीत इस मामले का शीघ्रता से निपाटारा ।

यहां एक और बात विचारणीय है हमने भले ही कसाब को फांसी दे दी लेकिन कुटनीति की बिसात पर उसका अस्तित्व एक प्यादे से ज्यादा कुछ नहीं था । एक ऐसा प्यादा जिसके जीने या मरने से खिलाड़ी पर ज्यादा फर्क नहीं पड़ता है । अगर हमने भारत की सरजमी पर रक्तपात मचाने वालों को सबक सिखाने की ठान ली है तो शीघ्र ही कुछ और कठोर निर्णय लेने होंगे । जहां तक भारतीय राजनीति के इतिहास का प्रश्न का ये सर्वथा इसके विपरीत रहा है । अर्थात भारत के राजनेताओं ने हमेशा ही वोटबैंक की राजनीति के चक्कर में निर्वीय समझौते किये हैं । ऐसे समझौते जिनसे निश्चित तौर पर भारत की वैश्विक छवि भी धूमिल हुई है । यथा चीन द्वारा कब्जा किये गये 20 हजार वर्ग किमी भूमि की वापसी के लिये कोई पहल नहीं करना अथवा संसद पर हमले के मास्टर माइंड अफजाल गुरू पर निर्णय न ले पाना । इसके विपरीत भारत के पड़ोसी पाकिस्तान की नीति इसके सर्वथा उलट है । भारत के लापरवाह रवैये के कारण ही हाफिज सईद जैसे कुख्यात आतंकी पाकिस्तान मे खुलेआम आग उगल रहे हैं । इन परिस्थितियों में पाकिस्तान से मदद की उम्मीद करना शेखचिल्ली के दिवास्वप्न से ज्यादा कुछ नहीं है ।

अतः अब वक्त है हमें अपनी रक्षा नीति की पुनः समीक्ष करने का । कसाब के मामले को ही ले लीजिये निचली अदालत समेत सर्वोच्च न्यायालय से कसाब की सजा की पुष्टि के बावजूद भी प्रतिभा पाटिल द्वारा मामले को लटकाये रखना क्या देश की भावनाओं के साथ मजाक नहीं था ? अगर था तो ये अंधेर कब तक चलेगा कि शहीदों के परिवार अपने मेडल लौटाते रहें और संविधान के सर्वोच्च पद पर आसीन व्यक्ति कान में तेल डालकर सोते रहें । सबसे महत्वपूर्ण बात है कि कसाब की कड़ी में अभी भी लगभग सोलह लोगों के नाम और भी हैं । इन नामों में अफजल गुरू,और बलवंत सिंह राजनौरा जैसे कुख्यात लोगों के नाम भी हैं । जानकारों के अनुसार कसाब की फांसी इसलिये हो पायी क्योंकि केंद्र सरकार को कहीं से प्रतिकूल प्रतिक्रिया की आशंका नहीं थी । जबकि अन्य अभियुक्तों के मामले स्थिति बिल्कुल उलट है । इस बात को हम एक केंद्रिय मंत्री के बयान से भी समझ सकते हैं । अपने बयान में मंत्री महोदय ने कहा था कि अफजल गुरू को फांसी देने से सुलग उठेगी कश्मीर घाटी । सोचने वाली बात है कि घाटी के लोगों की भावनाओं को ध्यान में रखकर हम देशद्रोहियों को पालते रहेंगे ? यदि किसी की भावनाएं देशहित के विरूद्ध हो तो भाड़ में जाए ऐसी भावनाएं । हम यदि आतंकवाद पर लगाम लगाने की इच्छा रखते हैं तो हमें वोटबैंक की राजनीति को दरकिनार करना होगा । अतः इस फैसले पर इतराने से पूर्व हमें एक बार ये जरूर सोच लेना चाहिये कि क्या बाकी आतंकियों के लिये फंदे तैयार हैं ?

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