लेखक परिचय

चैतन्‍य प्रकाश

चैतन्‍य प्रकाश

लेखक स्‍वतंत्र चिंतक हैं।

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-चैतन्य प्रकाश

बहुत सारे व्यवसायियों, उद्यमियों के दफ्तरों में या निजी बैठकखानों में एक पोस्टर लगा दिख जाता है, जिसमें शेर के चित्र के नीचे अंग्रेजी में लिखा होता है- No Politics Please! बहुत बार मुद्दों के बारे में बात करते हुए लोग कहते हैं कि इसमें राजनीति हो रही है या अमुक मुद्दे का राजनीतिकरण किया जा रहा है। इन दोनों संदर्भों में राजनीति की नकारात्मक छवि का ही बोध होता है। एक अंग्रेजी वाक्य इसे इस तरह स्पष्ट करता है Politics is a dirty game which gentlemen should not play.

प्रसिद्ध लेखक चिंतक मन्मथनाथ गुप्त भारत की राजनीति के संदर्भ में कहा करते थे, ‘आजादी के पहले राजनीति शहादत की थी, बाद में शराफत की और अब शोहदों की हो गई है। एक साधारण धारणा यह बन रही है कि कॉलेज मे पढ़ने वाले मेधावी, प्रतिभाशाली छात्र, नौजवान राजनीति से दूर रहकर अपना भविष्य सुरक्षित करने के अभिलाषी (कैरियरिस्ट) होते हैं और जो झगड़े, झंझट, तोड़-फोड़ इत्यादि में रूचि रखते हैं, चुनाव इत्यादि लड़कर राजनीतिक कार्यकर्ता बनना पसंद करते हैं।

जो लोग राजनीति में हैं वे चालों, कुचालों में अपनी भूमिका को तर्कसंगत सिद्ध करते हुए अक्सर अनौपचारिक तौर पर कहा करते हैं, ‘मैं राजनेता हूं, कोई साधु महात्मा नहीं हूं।’

तो क्या यह मान लिया जाए कि राजनीति सज्जनों का काम नहीं है या फिर पढ़े-लिखे या समझदार लोगों को राजनीति से दूर रहकर राजनीति की आलोचना करने का ही महती कार्य करते रहना चाहिए?

शायद दुनिया भर में और विशेषत: भारत में इस मत के व्यावहारिक अनुयायी काफी है। एक बौद्धिक चर्चा के कार्यक्रम में काफी राजनीति और राजनेताओं को जमकर कोसा जा रहा था, कार्यक्रम के आयोजक राजनीतिशास्त्र के अध्येता और लेखक, विचारक, संपादक थे। कार्यक्रम समाप्ति के बाद एक वरिष्ठ पत्रकार ने आयोजक महोदय से कहा, ‘आपकी उपस्थिति में यहां राजनीति की निंदा की गई, आप जानते हैं कि राजनीति की निंदा करने का परोक्ष अर्थ है तानाशाही का समर्थन करना।’ कार्यक्रम के आयोजक ने सिध्दांतत: इस तर्क को स्वीकार किया।

मूलत: यह माना जाता है कि राजनीति लोकतंत्र की धुरी है। वह व्यापक सामाजिक प्रक्रिया का अनिवार्य हिस्सा है। यूनानी दार्शनिक प्लेटो और अरस्तू संपूर्ण समाज को प्रभावित करने वाले सामान्य मुद्दों के प्रति सरोकार को राजनीति मानते थे। अरस्तू ने तो मनुष्य को राजनीतिक प्राणी की संज्ञा दी थी। साधारणतया प्राचीन ग्रीक राज्य में नागरिकों के सभी व्यवहार एक अर्थ में राजनैतिक ही माने जाते थे। राजनीति का उद्देश्य समाज में मनुष्य को सहजीवन के योग्य बनाना और उसे एक उच्चतर तल पर गुणात्मक और नैतिक जीवन जीने में सहायता करना ही समझा गया है। आत्मानुभव से उपजे नैतिक लक्ष्य की प्राप्ति ही राजनैतिक जीवन की अभीप्सा है। राजनीति एक नैसर्गिक, अनिवार्य और नैतिक संस्थान की भूमिका में अधिष्ठित है। यूनानी धारणा को ठीक से समझा जाये तो राजनीति सारत: ‘’मनुष्य, समाज, राज्य और नीतिशास्त्र का साझा अध्ययन है। इसमें राजसत्ता के लिए दिशादर्शन, नागरिक प्रशिक्षण के लिए पाठयक्रम, एक नैतिक दर्शन, ऐतिहासिक पराभौतिकी और समाजशास्त्र की सम्मिलित उपस्थिति है।‘’

भारतीय दर्शन ने भी राजनीति से परहेज का पाठ कभी नहीं पढ़ाया, यहां के अधिकतर ऋषि राजसत्ता के संचालन में सक्रिय भूमिका निबाहते थे और ऐतिहासिक, धार्मिक अवतार, ईश्वर रूप आदर्श प्रजावत्सल राजा के रूप में ही अपना कर्तव्य करते रहे हैं। आदर्श राज्य, नैतिक राज्य को रामराज्य कहा गया। Least governance is good governance की पश्चिमी अवधारणा के पहले भारत में, ”न राजा न च राज्यासीत न च दण्डो न दाण्डिक:, सर्वे प्रजा: धर्मेणैव रक्षन्ति सह परस्परम्” कहकर प्रजा की नागरिक भूमिका का आह्वान हुआ।

मगर सचाई का दूसरा पहलू भी है। यूनान में नगर-राज्यों के पतन और बड़े बहुराष्ट्रीय साम्राज्यों के उदय के साथ राजनीति का अर्थ, महत्त्व और भूमिका संकुचित होते चले गए। नागरिकों के प्रति निष्ठा की दीप ज्योति पर एकाधिकार और वर्चस्व की इच्छा का अंधकार हावी हो गया, इसी तरह भारत मे निरंकुश, अत्याचारी, भोगी और शोषक राजाओं ने जनता को लगभग गुलामों की तरह जीने के लिए मजबूर कर दिया। सारी दुनिया पर साम्राज्यवाद का गहन अंधकार बरसों तक इस तरह छाया रहा कि पिछले पांच हजार वर्षों का मनुष्यता का इतिहास रक्तरंजित दिखाई पड़ता है। इसी इतिहास में मनुष्यता ने विश्व युध्दों की विभीषिका को विष की तरह पिया है। सत्ता संघर्ष ही राजनीति का एकमात्र अर्थ हो गया। सत्ता प्राप्ति ही राजनीति का एकमेव लक्ष्य हो गया। तुलना, प्रतिस्पर्धा, प्रतिशोध और दंभ के पायदानों से गुजरती हुई राजनीति की दिशा अन्याय और अनर्थ की ओर बढ़ गई है।

लगभग समूचे विश्व में राजनीति दिशाहीन है और अपने ही अभिप्राय से जुदा है। इस अनर्थकारी राजनीति को इस लंबे और गहरे भटकाव के बाद वापस खुद के ही भीतर अपने अर्थ को तलाशना है। राजनीति से उत्पन्न समस्याओं का समाधान गैर राजनीतिकरण में से ढूंढ़ना सचमुच लोकशाही के रूप में मनुष्यता को मिले अवसरों के खजाने को खो देने जैसी नादानी है। चाहे वे यूनान के नगर राज्य हों या वैदिक काल की सभा समितियां, बौद्ध धर्म से प्रेरित गणराज्य हों या ग्राम स्वराज्य की गांधी की अवधारणा- ये सब लोकशाही के आइने में राजनीति का असली चेहरा पहचाने जाने की प्रक्रिया के यादगार पड़ाव हैं। इन पड़ावों की याद्दाश्त के बहाने भेड़ों के झुंड में आत्मविस्मृत सिंहशावक को झिंझोड़ने जैसे प्रयत्नों की आवश्यकता है। राजनीति को अपने अधिष्ठान की ओर लौटना होगा। राजनीति व्यक्ति या समूहों की लालसा, लोभ, स्वार्थपरता, वर्चस्वकामिता और मनमानियों का पर्याय बनकर बंधक है। यह परिस्थिति दुर्घटना या दुर्भाग्य ही नहीं बल्कि समूची मनुष्यता की करारी हार है। इन जकड़नों से मुक्ति और अपने अधिष्ठान में राजनीति की वापसी में मनुष्यता का सौभाग्य, विजय निहित है। राजनीति के अधिष्ठान की वापसी का सबसे प्रामाणिक, सशक्त, जीवंत, व्यावहारिक और प्रेरक उदाहरण गांधीजी का जीवन है। उन्होंने अपनी आत्मकथा में राजनीति के अधिष्ठान को अपने संदर्भ से इस तरह अभिव्यक्त किया है-

”व्यापक सत्य-नारायण के प्रत्यक्ष दर्शन के लिए जीव मात्र के प्रति आत्मवत् प्रेम की परम आवश्यकता है और जो मनुष्य ऐसा करना चाहता है, वह जीवन के किसी भी क्षेत्र से बाहर नहीं रह सकता। यही कारण है कि सत्य की मेरी पूजा मुझे राजनीति में खींच लाई है। जो मनुष्य यह कहता है कि धर्म का राजनीति से कोई संबंध नहीं है वह धर्म को नहीं जानता, ऐसा कहने में मुझे संकोच नहीं होता और न ऐसा कहने में मैं अविनय करता हूं।”

षडयंत्र, पाखंड, द्वेष, दुर्भावना, भ्रष्टाचार, पदलिप्सा और हिंसा राजनीति के पतन की वीभत्स वास्तविकताएं हैं। पतन के सारे रास्ते मानों आधुनिक राजनीति ने देख लिए हैं। और इसलिए जाने-अनजाने नागरिको को कभी-कभार तानाशाही में व्यवस्था के दुरूस्त हो जाने की उम्मीद नजर आती है। यह निराशा, कुंठा और अवसाद में उठने वाला अस्वस्थ विचार है। लगभग इन पंक्तियों की तरह-

जिंदगी कैद है रेखाओं में सीता की तरह

राम क्यों नहीं आते ?

काश कोई रावण ही आ जाता।

असल में तानाशाही की कटु स्मृतियां इतिहास के पन्नों पर इस तरह दर्ज है कि उसको स्वीकारने की कोई गुंजाइश शेष नहीं है। लोकशाही इस युग का सच है। इसलिए राजनीति मनुष्यता की जरूरत है। राजनीति, जो सत्ता प्राप्ति की घुड़-दौड़ नहीं बल्कि व्यक्ति-व्यक्ति के साथ मिलकर सामूहिक जीवन, सहजीवन, सहकार और परस्पर स्वीकार की अभिनव प्रयोगशीलता है, जो व्यक्तिगत अहं और स्वार्थ की घुटन भरी कोठरी से बाहर खुले आकाश का न्यौता है। जो ‘पराएपन’ के झूठ से इनकार और ‘अपनेपन’ के सच का आलिंगन है। जो विरोधियों को परास्त करने की रणनीति नहीं, यशलिप्सा की युक्ति नहीं, भौतिक सुविधाओं के लिए की जानेवाली लालच भरी कवायद नहीं, बल्कि बूंद के सागर में समाने जैसी मुक्ति है, इसमें अलौकिक आनंद भी है और परम समृध्दि का अहसास भी है।

वह जो छूटा है, पिछड़ा है वह साथ आए, जो साथ है उसके कदमों के साथ ताल मिले और जो आगे चल रहे हैं, उनके पंथान्वेषण के प्रति अनुग्रह उमगता रहे- यह शक्ति राजनीति में सहज उपलब्ध होती है। स्वयं को योग्य, समर्थ, सजग, सशक्त, धैर्यवान, संयमी और विनयी होने के लिए राजनीति एक खुली प्रशिक्षणशाला है। यह मनुष्यता के उत्थान की चुनौती भरी राह है। सहज ही इस राह में बाधाएं भी है, पर बाधाएं तो मंजिल के महत्त्व की सूचना देती है।

आधुनिक काल तक राजनीति मनुष्य के प्रति सरोकार का स्वप्न देखती थी। मगर उत्तर आधुनिक राजनीति की दृष्टि महत्तर है। अब निसर्ग के कण-कण के प्रति सरोकार आवश्यक है। यह पर्यावरणीय मैत्री (Eco-friendship) का युग है। पहाड़, पत्थर, बादल, आकाश, पानी, मिट्टी और वनस्पति के साथ सब जीव जंतुओं के सरोकार से युगीन राजनीति का उदय आज की आवश्यकता है। राजतंत्रात्मक और उपनिवेशवादी राजनीति एकांतिकता की, एकलवाद की थी, लोकशाही की राजनीति धन बल, बुध्दि और कौशल की मांग करती रही है और वह भी थोड़े बड़े समूह या दलवाद के दायरे में डोलती, सिमटती रही है। नए दौर की राजनीति की अभीप्सा बहुलता की है, सर्वसमावेशिकता की है। किसी को छोड़ने की नहीं बल्कि सबको जोड़ने की है। अस्तित्व के सभी अंशों की इयत्ता के एक साथ स्वीकार की है। कहना होगा कि बाधाओं के बावजूद राजनीति की यह परम अभीप्सा ही इसका सार्वत्रिक ध्येय है। मनुष्य (प्रवृत्ति) हो या प्रकृति दोनों ही, प्रकटीकरण, पल्लवन, उन्नयन, विलयन के रास्‍ते उसे एकात्मता की ओर बढ़ते हैं। एकात्मता अस्तित्व मात्र की मंजिल है। शायद राजनीति की राह भी मनुष्य को समाज, सृष्टि और प्रकृति के साथ एकात्म होने के आनंद की ओर ले जाने को तत्पर है। राजनीति के संकुचित, संकीर्ण अर्थ से प्रतिकर्षित होकर परहेज रखने के बजाय नए दौर की राजनीति के व्यापक, सार्वत्रिक, सर्वसमावेशी, सहज और एकात्मतालक्षी स्वरूप की साधना का यह उपयुक्त समय है। राजनीतिक सहभाग ही इस साधना की सरलतम विधि है। बशर्ते कि पांवों की फिसलन और थकन को जीता जाए। आखिर साधना है तो साधक का जीवन जीने की आवश्यकता तो होगी ही………।

(लेखक स्वतंत्र चिंतक हैं)

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3 Comments on "राजनीति किस लिए?"

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श्रीराम तिवारी
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श्रीराम तिवारी

shri chetanya prakash ji ne bahut nishpakshta or sookshm gahraai men
jakar aadhunik vimrsh men sabse tyaajy vishay ko janabhimukh saavit
kar saarthak bahs ka aagaaj kiya hai .

श्रीराम तिवारी
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श्रीराम तिवारी

shri chetany prakash ko behtreen aalekh hetu tatha pravakta.comko use
prakashit krne ki badhaai..

Krishna Kumar Soni (RAMBABU)
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Krishna Kumar Soni (RAMBABU)

धन्यवाद्, बहुत अच्छा लेख लिखा है आपने. वास्तव में आज सम्पूर्ण विश्व की राजनीती ही दिशाहीन है. राजनीती का अधोपतन ही श्रेष्ठ व्यक्तियों को राजनीती से दूर रहने को मजबूर कर रहा है. यह कटु सत्य है कि सभी राजनैतिक दलों के नेता स्वच्छ ,ईमानदार व चरित्रवान कार्यकर्ताओं की घोर उपेक्षा करते हुए चापलूस व आज की राजनीति के योग्य ( भ्रष्ट , बाहुबली , व व्यभिचारि ) कार्यकर्ताओं को बढावा दे रहें है.

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