लेखक परिचय

देवेन्‍द्र स्‍वरूप

देवेन्‍द्र स्‍वरूप

राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ से जुड़े देवेन्‍द्र जी दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय में इतिहास के प्राध्‍यापक एवं पांचजन्‍य साप्‍ताहिक पत्र के संपादक रहे हैं।

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गांधी की कांग्रेस कैसी थी?

देवेन्द्र स्वरूप

सूचना क्रांति और उपभोग प्रधान बाजार संस्कृति में से उपजी औद्योगिक सभ्यता ने जहां एक ओर विश्व को एक गांव जितना छोटा बना दिया है वहीं राष्ट्रीय स्पर्धा और राष्ट्र राज्य की भावना को और अधिक गहरा व सुदृढ़ कर दिया है। विश्व राजनीति के अपने अध्ययन व समझ के कारण हम उन चिंतकों से सहमत नहीं हो पा रहे हैं जो मानते हैं कि वैश्वीकरण के इस दौर में राष्ट्र राज्य की अट्ठारहवीं शताब्दी में जन्मी अवधारणा अब अप्रासंगिक हो गयी है और मानव जाति व्वसुधैव कुटुम्बकम्व् के आदर्श के बहुत निकट पहुंच गयी है। इस उपभोग प्रधान सभ्यता में मनुष्य अर्थ और काम की प्रवृत्तियों का अधिकाधिक दास होता जा रहा है। सूचना क्रांति और जानकारी विस्फोट के कारण उसके मानसिक क्षितिज का तो विस्तार हुआ है किंतु शरीर सुख और यौन कामना उसके हृदय को अधिकाधिक संकुचित व स्वार्थी बनाती जा रही है। राष्ट्र की सीमाओं को वह अपने अहं और स्वार्थ के विस्तार के रूप में और राष्ट्र राज्य को अपने लिए सुख के साधनों को जुटाने के माध्यम के रूप में देखता है। इस कारण सार्वजनिक जीवन में राज्य और राजनीति का महत्व अधिकाधिक बढ़ता जा रहा है। अपने व्यक्तिगत जीवन में कोई राजनीतिक आकांक्षा न रखते हुए भी हम अपने समाज और राष्ट्र के हित में राज्य और राजनीति की दिशा, दशा पर अपना ध्यान केन्द्रित करने के लिए विवश हैं।

धर्म का अंकुश

वर्तमान काल को लोकतंत्र का युग कहा जा रहा है। सूचना क्रांति और जानकारी विस्फोट (नालेज एक्सप्लोजन) के कारण वंशवादी राजतंत्र का युग समाप्त हो गया है और लगभग सभी देशों में यहां तक कि राजशाही को लम्बे समय से ढो रहे अरब देशों में भी लोकतंत्र की बयार बहती दिख रही है। पर भारत में उल्टा हो रहा है। जिस भारत में लोकतांत्रिक संस्थाओं का विकास सबसे पहले हुआ, जहां समयाचारिक धर्म को समाज जीवन का अधिष्ठान माना गया। ‘समय’ उन नियमों को कहा जाता था जिन्हें समाज जीवन के विभिन्न क्षेत्रों और स्तर पर कार्यरत प्रतिनिधि संस्थाओं जैसे ग्राम, जनपद, श्रेणी, पूग, निगम, सार्थ आदि की पंचायतें सब सदस्यों के साथ सामूहिक विचार विमर्श के पश्चात् अपने वर्ग के लिए स्वीकार करती थीं। जिनका पालन करने के लिए उस वर्ग का प्रत्येक सदस्य अपना नैतिक और कानूनी कर्तव्य समझता था। विभिन्न पंचायतों द्वारा बनाये गये इन नियमों या समयों में हस्तक्षेप करने का कोई अधिकार राजा या राज्य को नहीं होता था। इन पंचायतों का कुछ धुंधला या विकृत रूप आज की विवादास्पद खाप पंचायतों में देखा जा सकता है। धर्म का दूसरा आधार था ‘आचार’। आचार किनका? उन्हें धर्मसूत्रों में शिष्ट कहा गया है और महाभारत में व्महाजनो येन गता: स पन्थाव् में उन्हें ‘महाजन’ कहा है। शिष्ट या महाजन कहलाने के अधिकारी केवल अपने लिए नहीं, दूसरों के लिए जीते हैं, जो परदुखकातर हैं, जो सत्य, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह और अहिंसा जैसे सद्गुणों की साधना में रत हैं। सहस्राब्दियों तक इस व्समयाचारिक धर्मव् के संस्कारों ने भारतीय मन में लोकतांत्रिक चेतना को अधिकाधिक गहरा कर दिया। भारत की यह लोकतांत्रिक चेतना अपनी अभिव्यक्ति के लिए युग की आवश्यकता के अनुरूप रचनाएं खोजती रही है। यूनानी सम्राट के राजदूत मेगास्थनीज ने भारत के बारे में अपने अनुभवों पर आधारित रचना ‘इंडिका’ में, जिसके कुछ अंश ही परवर्ती रोमन लेखकों के माध्यम से हम तक पहुंच पाये हैं, लिखा है कि उसने पाटलिपुत्र में एक वंशावली देखी जिसमें 6051 वर्ष तक राज करने वाली 151 पीढ़ियों के नाम थे। लेकिन इस लम्बे कालखंड में तीन बार गणतंत्र का प्रयोग भी किया गया। भारत की इस लोकतांत्रिक चेतना ने राजतंत्र को भी निरंकुश नहीं होने दिया, उस पर व्समयाचारिक धर्मव् का अंकुश लगाया और इस अंकुश को आचार धर्म के प्रतिनिधि ब्राह्मणों के हाथ में थमा दिया इसलिए राज्याभिषेक के समय एक ओर राजा प्रतिज्ञा लेता था कि यदि मेरे किसी भी कृत्य से प्रजा की, कृषि की या समाज की हानि हो तो मेरे सब पुण्य नष्ट हो जाएं, तो दूसरी ओर राज्याभिषेक की विधि में राजगुरु बाह्मण राज पद पर अभिषिक्त व्यक्ति की प्रदक्षिणा करते हुए उसकी पीठ पर चाबुक मार कर कहता था कि तू निरंकुश नहीं है, यह धर्म का अंकुश तुझसे ऊपर है। और इसीलिए वह राज्याभिषेक के समय उपस्थित जन प्रतिनिधियों को सम्बोधित करते हुए घोषणा करता था कि वह तुम लोगों का राजा है, हम ब्राह्मणों का राजा सोम है अर्थात् हम इस राजा के अधिकार क्षेत्र से बाहर हैं। यह थी भारतीय लोकतंत्र की अंतरात्मा। आज के बाह्मण-विरोधी वातावरण में इन प्राचीन परंपराओं का स्मरण दिलाना शायद कुछ लोगों को रुचिकर नहीं लगेगा।

विकेन्द्रित राज्य प्रणाली 

आठवीं शताब्दी में इस्लाम के प्रवेश के साथ भारत लगभग एक हजार वर्ष तक अपनी अस्मिता की रक्षा के लिए एक विकट संघर्ष में उलझा रहा। एक के बाद एक करके देश भर में बिखरे राजा गिरते गये किंतु समाज जिंदा रहा। उसने अपनी अस्मिता को बचाये रखा और इसका श्रेय जाता है उसकी लोकतांत्रिक चेतना को और उस चेतना को अभिव्यक्त करने वाली गणतंत्रात्मक संस्थाओं को। उन्नीसवीं शताब्दी में संयोग से भारत में ब्रिटिश सत्ता की स्थापना और यूरोप में वैज्ञानिक प्रौद्योगिक क्रांति और उसके गर्भ में से जन्मी औद्योगिक सभ्यता का नया अध्याय प्रारंभ हुआ। उस समय के मेटकाफ जैसे अनेक शासकों ने इन संस्थाओं के प्रथम साक्षात्कार के बाद उनकी जीवंतता और प्राणशक्ति का वर्णन किया है। उन्होंने पाया कि भारत जैसे विशाल देश में किसी एक केन्द्र से केन्द्रित शासन सूत्रों का संचालन संभव ही नहीं है। इसीलिए भारत ने विकेन्द्रित राज्य प्रणाली का आविष्कार किया था। किंतु इस विकेन्द्रित प्रणाली के भारत ने सांस्कृतिक एकता के अनेक विध सूत्र विकसित किये थे। जाति, ग्राम, गण, श्रेणी, पूग, निगम और सार्थ आदि की पंचायतों द्वारा निर्मित ‘समयों’ का रूप क्षेत्रीय विविधता को प्रतिबिम्बित करते हुए एक ही जीवन दर्शन पर आधारित था। संस्कृत भाषा के माध्यम से पूरे देश में शिक्षा का पाठयक्रम लगभग एक ही था और इस शिक्षा प्रणाली के माध्यम से समस्त जनपदीय विविधताओं का एक ही जीवन दर्शन और संस्कृति निष्ठा से अनुप्राणित प्रबुद्ध वर्ग राष्ट्रीय एकता का सूत्र बनकर उभरा था। उन्नीसवीं शताब्दी में विभिन्न जनपदीय राज्यों में प्रयुक्त प्रशासकीय एवं राजस्व संबंधी शब्दावली की एच.एच.विल्सन द्वारा संग्रहित सूची (ग्लोसरी) को देखने पर विदित होता है कि प्रत्येक राज्य की शब्दावली क्षेत्रीय भाषा में होने के बाद भी शासन के सिद्धांत सब जगह समान थे और वे प्राचीन स्मृतियों में वर्णित राजधर्म का क्रियान्वयन मात्र थे।

अंग्रेजीदां अभिजात्य वर्ग 

भापशक्ति चालित नयी मशीनों और टेक्नालाजी प्रदत्त औद्योगिक सभ्यता के घोड़े पर सवार होकर ब्रिटिश शासकों ने स्टीमर, रेलवे और टेलीग्राफ आदि नये संचार साधनों की सहायता से एक ओर तो केन्द्रित शासन तंत्र को खड़ा किया, अंग्रेजी को राजकीय भाषा बनाकर अंग्रेजी शिक्षा के माध्यम से संस्कृत और मुस्लिम शासकों द्वारा आरोपित फारसी भाषा को अपदस्थ कर अंग्रेजी शिक्षित, अभिजात्य वर्ग देश भर में खड़ा किया। अपनी फैक्टरियों में उत्पन्न माल को भारत में खपाने के लिए भारत के कुटीर उद्योग-धंधों को योजनापूर्वक नष्ट किया और सबसे बड़ा अपराध उन्होंने यह किया कि भारत की लोकतांत्रिक चेतना को अभिव्यक्त करने वाली और परंपरागत विधि निषेधों का आग्रहपूर्वक पालन करने वाली पंचायत संस्थाओं को चुन-चुन कर खत्म किया और एक ऐसा अंग्रेजी शिक्षित अभिजात्य वर्ग खड़ा किया जो ब्रिटिश जीवन शैली, शिष्टाचार और जीवन आदर्शों को अनुकरणीय मान बैठा, जो ब्रिटेन को लोकतंत्र की जननी और ब्रिटिश संवैधानिक रचना को ही भारत में लाने के लिए सचेष्ट हो गया। 1885 में जन्मी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस इसी अंग्रेजीदां अभिजात्य वर्ग का मंच था। उसे अंग्रेजों की न्यायनिष्ठा पर अंधविश्वास था। वह अंग्रेजों की इस न्यायनिष्ठा की गुहार लगाकर ब्रिटिश संस्थाओं को भारत में भी आरोपित कराना चाहता था ताकि भारत भी अपने को व्सभ्यव् कहने का दावा कर सके। इस अंग्रेजीदां अभिजात्य वर्ग को ब्रिटिश शासक अपने साम्राज्य की दीर्घ-जीविता के लिए आवश्यक मानते थे और उसे अपने पाले में बनाये रखने के लिए तथाकथित संवैधानिक सुधारों के नाम पर कुछ टुकड़े उसके सामने फेंकते रहते थे। 1857 की महाक्रांति की विफलता के बाद 1858 की विक्टोरिया घोषणा से लेकर 1861, 1882, 1892, 1909 और 1919 तक की संवैधानिक सुधार प्रक्रिया को इसी आलोक में देखा जाना चाहिए। इन तथाकथित संवैधानिक सुधारों का उद्देश्य भारत की लोकतांत्रिक चेतना को उसकी प्रकृति-स्थिति के अनुरूप अभिव्यक्ति देना न होकर व्फूट डालो और राज करोव् की साम्राज्यवादी रणनीति को क्रियान्वित करना था, भारतीय राष्ट्रवाद के उभार को रोकने के लिए जाति, भाषा और क्षेत्र की संकीर्ण निष्ठाओं को पुष्ट करके उन्हें परस्पर प्रतिस्पर्धी और शत्रु बनाना था। साथ ही, अल्पसंख्यकों विशेषकर मुसलमानों को संगठित कर भारतीय राष्ट्रवाद के विरुद्ध अपने साथ खड़ा करना था। 1909 के एक्ट में उन्होंने मुसलमानों को पृथक निर्वाचन का अधिकार दिया, 1919 के एक्ट में सिखों को और 1935 के एक्ट में हिन्दू समाज के दलित वर्गों को पृथक निर्वाचन का अधिकार देकर भारतीय राष्ट्रवाद की रीढ़ को तोड़ देने पर उतारू थे।

इस पृष्ठभूमि में 1915 में गांधी जी की भारत वापसी को देखना होगा। उन्होंने विदेशी वेशभूषा, विदेशी भाषा, विदेशी वस्तुओं, विदेशी संस्थाओं और औद्योगिक सभ्यता के भोग प्रधान जीवन मूल्यों को पूर्णतया अस्वीकार किया। सत्य, अहिंसा, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह के भारतीय जीवन आदर्शों के अनुसार अपने व्यक्तिगत जीवन को ढालने का प्रयास किया, आचरण का उदाहरण समाज के सामने प्रस्तुत किया। राष्ट्रीय आकांक्षाओं को विदेशी शब्दावली से हटाकर पुन: भारत की परंपरागत शब्दावली से जोड़ा। 1916 में उन्होंने मद्रास की एक सभा में स्वदेशी का मंत्रोच्चार करते हुए स्वदेशी के चार आयाम स्पष्ट किये। 1-स्वदेशी भाषा और वेशभूषा 2-स्वदेशी उपासना पद्धति 3-स्वदेशी उत्पादन और 4-समाज जीवन को चालित करने वाली स्वदेशी संस्थाएं।

कांग्रेस नामक तम्बू

1915 से 1920 तक पांच वर्ष उन्हें भारत में अपनी सर्व मान्यता स्थापित करने में लगे। 1920 की नागपुर कांग्रेस में देश ने विशेषकर 1885 में स्थापित कांग्रेस ने उनके नेतृत्व को स्वीकार कर लिया और वहीं उन्होंने इंडियन नेशनल कांग्रेस नामक यंत्र को ब्रिटिश-भक्त अभिजात्य वर्ग से छीनकर अपने आदर्शों के प्रति समर्पित नेतृत्व के हाथों में सौंप दिया। ग्राम स्वराज कांग्रेस का लक्ष्य घोषित हुआ, चरखा कुटीर उद्योगों का प्रतीक बन गया, देशी भाषाओं के आधार पर कांग्रेस की संगठनात्मक इकाइयां बनीं, गांव-गांव में कांग्रेस समितियां बनाने का संकल्प लिया गया, चरखा कातना, अहिंसाव्रत का पालन, कांग्रेस की सदस्यता के लिए अनिवार्य बन गया। कांग्रेस ने लोकतंत्रात्मक रचना अपनायी। कांग्रेस कार्य समिति, अ.भा.कांग्रेस कमेटी और वार्षिक अधिवेशन जैसी प्रतिनिधि लोकतांत्रिक सीढ़ियां बनायीं गयीं। विदेशों में पढ़े, अंग्रेजी सभ्यता के वातावरण में पला पनपा नेतृत्व राष्ट्रभक्ति से अनुप्राणित होकर खादी के कुर्ते धोती में ग्रामीण समाज के साथ आ खड़ा हुआ। शहरों का ग्राम्य जीवन में विलीनीकरण का द्वार खुल गया। यह कांग्रेस का कायाकल्प था और यह कायाकल्प भारत की लोकातांत्रिक चेतना को अभिव्यक्त करने की दिशा में था।

जिन गांधी ने कांग्रेस का कायाकल्प किया उन्होंने 1924 के बेलगांव अधिवेशन के अलावा कभी कांग्रेस का अध्यक्ष पद नहीं लिया। नये नेतृत्व को उभरने का अवसर दिया। साधारण सदस्यों के द्वारा निर्वाचित प्रांतीय कांग्रेस कमेटियां प्रतिवर्ष अध्यक्ष पद के लिए नाम सुझाती थीं और बहुमत के आधार पर अध्यक्ष चुना जाता था। लगभग प्रतिवर्ष नया अध्यक्ष बनता था। अकेले मौलाना आजाद हैं जो 1939 से 1946 तक कांग्रेस अध्यक्ष बने रहे। गांधी युग के पूर्व 1885 से 1920 तक भी कांग्रेस का चरित्र पूर्णत: लोकतांत्रिक था। प्रतिवर्ष नए अध्यक्ष का निर्वाचन होता था और कोई भी व्यक्ति दो बार अध्यक्ष नहीं चुना गया। वंशवाद उसे छू तक नहीं गया था।

1934 में कांग्रेस में समाजवाद और साम्यवाद जैसे विदेशी विचारधाराओं का प्रवेश हुआ तो गांधी जी ने उसकी प्राथमिक सदस्यता त्याग दी, यद्यपि कांग्रेस उन्हें अपना मार्गदर्शक मानती रही। लेकिन गांधी जी समझ गये थे कि जिस विचारधारा के आधार पर उन्होंने 1920 में कांग्रेस का कायाकल्प किया था, वह कांग्रेस अब नहीं है। अब वह भारत की स्वतंत्रता के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए अनेक विचारधाराओं और प्रवृत्तियों का साझा मंच मात्र है। इसलिए 15 अगस्त 1947 को विभाजन से रक्तरंजित भारत को स्वतंत्रता मिलते ही उन्होंने कांग्रेस नेतृत्व को लिखित निर्देश दिया कि अब कांग्रेस नामक साझा मंच का काम पूरा हो चुका है अत: कांग्रेस को विघटित कर राष्ट्र निर्माण हेतु विचारधारा निष्ठ दलों के उदय का रास्ता खोल देना चाहिए। गांधी जी के इस निर्देश का पालन नहीं हुआ। सत्ताधारी कांग्रेसी नेताओं ने इतने विशाल और उपयोगी यंत्र को खोना मंजूर नहीं किया। उनके इस हठवाद से कांग्रेस नाम तो जिंदा रह गया पर उस उपकरण के भीतर वैचारिक संघर्ष चलता रहा और इस संघर्ष के प्रतीक बन गए जवाहरलाल नेहरू और सरदार पटेल। यह संघर्ष गांधी जी के जीवन काल में ही प्रारंभ हो गया। फरवरी 1948 की मेरठ कांग्रेस के बाद नरेन्द्र देव, जयप्रकाश और लोहिया के नेतृत्व में समाजवादियों के कांग्रेस त्याग के बाद कांग्रेस नामक तम्बू के भीतर वैचारिक संघर्ष के दो ध्रुव बने नेहरू और पटेल। यहां हम दोनों नेताओं के वैचारिक पक्ष के विवेचन में नहीं उलझना चाहेंगे। केवल इतना कहकर रुक जाएंगे कि हमें संघर्ष की तह में पहुंचने के लिए दोनों नेताओं के व्यक्तित्व को समझना आवश्यक है।(क्रमश:) 

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