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-चन्द्रकांत सारास्वत

केन्द्र में जब वाजपेयी की सरकार थी तब उन्होंने ‘भारत उदय’ की बात की थी। उसके बाद आई कांग्रेस सरकार के मंत्री भी बार-बार ये दोहराते रहते हैं कि भारत विकास कर रहा है। सरकार आम आदमी का विकास कर रही है। सरकारों के इस राग में मीडिया भी ताल दे रहा है। लेकिन सवाल यह है कि भारत और भारत के भी जिस आम आदमी के विकास की बात चारों तरफ फैली है क्या उस आम आदमी को भी इस विकास की अनुभूति हो रही है। या विकास के नाम पर एक अफवाह है।

निष्पक्ष संस्थाओं के आकड़े और आम आदमी का अनुभव तो यही बताता है कि विकास की बात एक अफवाह से ज्यादा कुछ नहीं जिसे संपादकीय पृष्ठ और सरकारी आंकड़े हवा दे रहे हैं। अगर वाकई में देश का विकास हो रहा होता तो आज भी भारतीय कृषि मानसून पर निर्भर नहीं होती। किसानों की पहुंच आज भी बाजारों तक नहीं हो पाई है। आजादी के 60 वर्षों बाद भी देश में लाखों टन अनाज उचित भंडारण के अभाव में खराब हो जाता है। देश के किसान प्रतिवर्ष हजारों की संख्या में आत्महत्या करने के लिए मजबूर हैं। अकेले महाराष्ट्र में ही अब तक 4 हजार से ज्यादा किसान आत्महत्या कर चुके हैं। बुंदेलखंड में पिछले 5 सालों में कर्जदारी से दुखी 700 से ज्यादा किसानों ने आत्महत्याएं की हैं। यदि हम वर्ष 2009-10 में विदर्भ के वागधा गांव की बात करें तो अब तक यहां 170 से ज्यादा किसानों ने आत्महत्या की है जबकि 2007 में यह आंकडा मात्रा 52 था। देश में एक ओर नरेगा, नेहरू रोजगार योजना, प्रधानमंत्राी रोजगार योजना तथा राष्ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक्रम जैसी योजनाएं चल रही हैं लेकिन इसके बावजदू किसान दिन-ब-दिन कर्ज में डूबते जा रहे हैं। इंसान के लिए सबसे जरूरी चीज का उत्पादन करने वाला किसान सुबह से शाम तक मेहनत करने के बावजूद वो आत्मनिर्भर नहीं हो पाया है। देश के 84 प्रतिशत छोटे किसानों को कृषि के लिए )ण पर ही निर्भर रहना पड़ता है। लेकिन यहां भी किसान की बदकिस्मती देखिए कि लगभग 20 वर्षो में किसानों को प्राप्त होने वाला )ण 75 पफीसदी तक गिर चुका है। 1990 तक 25 हजार रुपये तक का )ण 58 प्रतिशत छोटे किसानों को लाभ पहुंचा रहा था, किन्तु 1995 के आते-आते यह गिरकर 52 प्रतिशत तथा 2000 में यह 23 प्रतिशत गरीब किसानों को ही प्राप्त हो पाया। यह गिरावट अभी भी जारी है। इसके अतिरिक्त एक कड़वा सच यह भी है कि आज बडे अधिकारियों के वेतन में हर वर्ष लगभग 200 प्रतिशत तक की बढ़ोत्तरी हो रही है। वहीं दूसरी तरफ किसानों की औसतन मासिक आय मात्रा 1578 रुपये ही है।

कृषि की यह दशा को यही साबित करती है कि देश कृषि विकास में अभी काफी पिछड़ा है। लेकिन सियासत के भूखे लोग अपनी वाह वाही में कुछ भी प्रचारित करते रहते हैं। कृषि के अलावा अगर गरीबी में कमी की बात करें तो भी स्थिति दयनीय ही नजर आती है। सरकारी आंकड़े ही बताते हैं कि देश की आज भी 43 प्रतिशत आबादी गरीब है। गैर सरकारी आंकड़े तो इससे कहीं अधिक बताते हैं। देश के 43 प्रतिशत बच्चे कुपोषण से पीड़ित हैं। एनसीईयूएस की रिसर्च के अनुसार 77 प्रतिशत लोग रोजाना 20 रुपये से भी कम पर गुजर बसर करते हैं। भारत में अंतिम तीन सालों में लगभग 60 से 70 हजार बच्चों की मृत्यु बाल अवस्था में ही हो गई।

देश में इतनी गरीबी है लेकिन इसके कारणों को पहचान कर उसका निवारण करने की कोशिश कहीं भी नहीं हो रही है। आय का असमान वितरण, जनसंख्या वृध्दि, निरक्षरता, जाति व्यवस्था, भ्रष्टाचार को खत्म करने का ईमानदार प्रयास सरकार नहीं करती। उल्टे गरीबी के आंकड़ों से खिलवाड़ कर झूठी प्रशंसा प्राप्त करने की जुगाड़ में रहती है।

आम आदमी का विकास हो रहा है, यह दावा इससे भी प्रमाणित होता है कि क्या आम आदमी के सिर पर अपनी छत है। इस आधार पर भी सरकार के तथाकथित विकास को तौले तो निराशा ही मिलती है। आंकड़े यह दर्शाते हैं कि भारत में वर्तमान में 49 प्रतिशत परिवारों को न्यूनतम स्तर की छत भी उपलब्ध नहीं हो पा रही है। 69 प्रतिशत भारतीयों को शौच के लिए शौचालय की सुविधा नहीं प्राप्त है। इसी रिपोर्ट में यह भी दिखाया गया था कि देश में कुल 22 करोड़ घर हैं जिनमें से 56 लाख घरों में ही आरामदायक सुविधाएं हैं तथा 8 करोड़ मकान ही पक्के हैं। देश में आज भी 4 से 5 करोड़ झुग्गी बस्तियां हैं। देश के लगभग 50 प्रतिशत घरों में बिजली के तार अभी नहीं पहुंच पाए हैं। करीब 35 प्रतिशत घरों में स्वच्छ पानी उपलब्ध नहीं है।

भारत के सामाजिक विकास की चर्चा करें तो भी तस्वीर काली ही नजर आती है। भारत में लगभग 45 फीसदी बच्चियों की शादी कम उम्र में ही हो जाती है, जिनमें से करीब 17 फीसदी विधवा हो जाती हैं तथा 40 फीसदी की मौत प्रसव के दौरान होती है। हमारे देश में प्रति 1600 लोगों के लिए मात्रा 1 डाक्टर है जबकि अमेरिका, इग्लैंड जैसे देशों में 600 लोगों के लिए एक डाक्टर मौजूद है।

भारत का हर राज्य आज कर्ज में डूबा हुआ है। बिहार जैसे पिछड़े राज्य पर भी 53 हजार करोड़ रुपये का कर्ज है। केरल पर 64 हजार 801 करोड़ रुपये, आंधप्रदेश पर 1 लाख 3 हजार 674 करोड़ रुपये, महाराष्ट्र पर 1 लाख 88 हजार 197 करोड़, तमिलनाडु पर 84 हजार 825 करोड़, झारखंड पर 26 हजार 407 करोड़ रुपये का कर्ज है। अन्य राज्यों की स्थिति भी लगभग ऐसी ही है।

देश की राजनीतिक व्यवस्था तो धवस्त होने के कगार पर है। लोकसभा, राज्यसभा और विधानसभाओं में ऐसे लोग पहुंच रहे हैं जो हत्या, चोरी, डकैती, बलात्कार जैसे मामलों में लिप्त हैं। 15 वीं लोकसभा में चुने गये 150 सांसद ऐसे हैं जिन पर अदालत में आरोपों का दौर जारी है। इनमें से 75 सांसद संगीन मामलों के आरोपों में लिप्त हैं। 15 वीं लोकसभा में यह आंकड़ा 17 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी के साथ आया है।

देश के विकास की वास्तविक स्थिति क्या यह आम आदमी जानता है, उसे बरगलाया नहीं जा सकता। सरकार को जरूरत है कि वो भारत विकास की अफवाह फैलाने में अपना वक्त न गवाये बल्कि सही मायने में विकास करे जिसे हर आम आदमी अपने जीवन में अनुभव करें। किसी ने खूब कहा है ‘कि मंजिलों पर जो पहुंच गए, उनको नहीं है नाज ए सफर, जो दो कदम चले नहीं, वो रफ्तार की बातें करते हैं।’

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7 Comments on "कहां और कैसा विकास"

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Pardafash.Com
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पूंजीवादी व्यवस्था में इसी को विकास कहते हैं.

sunil patel
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बिलकुल यही सच्चाई है.
* जहाँ के नियम देश के बेहद उच्च शिक्षित और उच्च वर्ग के लोग बनाते हो और उनमे से बहुतो को यह नहीं पता होता है की गुड और तेल बोतल में आता है की पन्नी में, वहाँ ऐसे ही हालात होंगे.
* सारी दुर्दशा का कारण भरष्टाचार है – जहाँ के नियम दुसरे देशो की कार्यप्रणाली के आधार पर बनाय गए हो वहाँ यही हालत होंगे.
* जहाँ रोटी चोरी करने वाले को सजा मिलती है किन्तु करोडो, अरबो का घपला करना वाला पकड़ा ही नहीं जाता हो, या बाइज्जत छूट जाता हो वहाँ ऐसा ही होगा.

श्रीराम तिवारी
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बिलकुल सही लिखा है

Anil Sehgal
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वाजपायी सरकार + मन मोहन सिंह सरकार = १२ साल = 0 विकास
वाजपायी सरकार में भारत उदय + मन मोहन सिंह सरकार में भारत विकास = 0
क्या हिसाब ठीक है जी ? – जवाब = बिल कुल ठीक

bhaarat
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achcha hai article

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