लेखक परिचय

डॉ. मधुसूदन

डॉ. मधुसूदन

मधुसूदनजी तकनीकी (Engineering) में एम.एस. तथा पी.एच.डी. की उपाधियाँ प्राप्त् की है, भारतीय अमेरिकी शोधकर्ता के रूप में मशहूर है, हिन्दी के प्रखर पुरस्कर्ता: संस्कृत, हिन्दी, मराठी, गुजराती के अभ्यासी, अनेक संस्थाओं से जुडे हुए। अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति (अमरिका) आजीवन सदस्य हैं; वर्तमान में अमेरिका की प्रतिष्ठित संस्‍था UNIVERSITY OF MASSACHUSETTS (युनिवर्सीटी ऑफ मॅसाच्युसेटस, निर्माण अभियांत्रिकी), में प्रोफेसर हैं।

Posted On by &filed under लेख.


डॉ. मधुसूदन उवाच

उत्सव-स्वीकृति की कसौटियां

किसी उत्सव-स्वीकृति की (५) पांच कसौटियां सूझती है।

(१) वह उत्सव समाज में समन्वयता, सामंजस्य, सुसंवादिता, या भाईचारा बढाने वाला हो।

(२) ऊंच-नीच या अलगता का भाव प्रोत्साहित करनेवाला ना हो।

(३) समाज के अधिकाधिक सदस्यों का उत्थान करने वाला हो।

(४) समाज के सभी स्तरों को स्पर्श करने की क्षमता रखता हो।

(५) सांस्कृतिक परम्पराओं से जुडने की क्षमता रखता हो ।

व्हॅलंटाईन डे, इनमें से एक भी कसौटी पर मुझे सफल प्रतीत नहीं होता।

परदेशी उत्सव भी यदि समन्वयकारी हो, तो, उपरि कसौटियों पर कसकर ही स्वीकारा जा सकता है।

(६) अत्यावश्यक विशेष कसौटी =सामर्थ्य और उच्च प्रतिष्ठा प्राप्त, स्थिति से ही, ऐसी स्वीकृति भी, परम्परा में पच सकती है। हीन वृत्ति और ग्रन्थि से पीडित, बुद्धि भ्रमित ”ब्रेन वॉश्ड” मानसिकता से उसे स्वीकार करना देश को फिर से दासता में धकेलने का प्रयास माना जाएगा।

व्हॅलंटाईन डे इन में से किसी भी कसौटी पर खरा उतरता नहीं है।

यह एक विशिष्ट ”ब्रैन-वॉश्ड” वर्गका त्यौहार प्रतीत होता है।

(७) वैसे भी भारत के पास संसार भर में सभीसे अधिक पर्व, उत्सव या त्यौहार हैं। जहां द्रौपदी को अर्जुनने स्वयंवर में जीता था, उस गुजरात के, त्रिनेत्रेश्वर (तरणेतर) के मेले में युवतियां अभी भी अपना साथी आप ही परखकर चुनती करती हैं। परम्परागत परिधान और अलंकार सज धजकर इस मेले में जीवन साथी ढूंढने के उद्देश्य से, युवकों की परीक्षा युवतियां करती है। इस मेले का पूरा वर्णन अलग लेख की सामग्री है। यह परम्परा कुछ अलग है, पर इसे भी अन्य प्रदेशों में प्रवर्तित किया जा सकता है।

(८) वैसे ही, और एक, नवरात्रि के नौ दिन चलने वाला, गुजरातका दांडिया-रास-गरबा इत्यादि भी युवक-युवतियों को सीमित ढंग से निकट आने में सहायक है।ऐसे उत्सव और भी होंगे, जो इस लेखक के ध्यानमें नहीं है। ऐसी अपनी ही परम्परा के आधारपर रूढियां, या उत्सव गढना सांस्कृतिक दृष्टिसे मुझे कुछ अधिक जँचता है।

(९) पश्चिम का र्‍हास

पश्चिम कैसे, इस व्हॅलंटाईन डे संदर्भित स्वैराचारी स्त्री-पुरूष शरीर सम्बंधों की पटरी पर बढते बढते गत ५०-६० वर्ष की अवधि में कहां से कहां पहुंच गया है, यह जानकारी हर देश हितैषि को शायद ही, चौंका सकती है। प्रारम्भ में यहां भी नैतिकता का स्तर ऊंचा ही दिखाई देता था। पर मूल आधार स्व (self centered) केन्द्रित और भौतिक ही होने के कारण, उसकी प्रेरणा शक्ति भी सीमित ही थी।

आध्यात्मिकता की असीम प्रेरणा से अधिकतर (कुछ अपवाद छोडकर) पश्चिम अनजान ही है। पर जब भौतिकता से जुडी विलासिता और उससे जुडे शारीरिक सुखोपभोग एवम वासना पूर्ति में ही सारे पुरूषार्थों का चरम सिद्ध होने लगा तो पश्चिम में, र्‍हास प्रारंभ हो चुका है।

(१०) विवाह-पूर्व शरीर संबंध

जिस पश्चिम से, भारत में, विवाह-पूर्व सम्बंधों का , अंधानुकरण हो रहा है, उस पश्चिम की स्थिति अवलोकन की जानी चाहिए। वहां, विवाह-पूर्व पुरूष-स्त्री, शरीर संबंध, डेटींग कहा जाता है; और व्हॅलंटाईन डे ऐसे डेटींग करने वाले विवाहित और अविवाहित, जोडों का, उत्सव माना जाता है। ऐसे जोडे मोटल में एक कक्ष एक रात्रि के किराए पर रखकर शरीर-भोग-सम्बंध करते हैं। शराब, और डिन्नर इत्यादि भी होता है। वैसे प्रत्येक शुक्रवार रात्रि डेटींग रात्रि होती है। पर व्हॅलंटाईन डे की रात्रि एक त्यौहार की भाँति विशेष मनाई जाती है। मोटल व्यवसाय का एक बडा आधार यह भी है।

स्वाभाविक रूपसे व्यापार-वाणिज्य, होटल-मोटल, शराब विक्रेता, बधाई या अभिनन्दन (Greeting Cards) पत्र विक्रेता, इत्यादि व्यवसायों के स्थापित हितों से, प्रोत्साहित होकर इस दिन को पुरस्कृत किया जाता है। भौतिक विलासिता को ही ”ब्रह्म-सत्त्य” मानने वाले बहुसंख्य समाज के लिए विशेष कोई निर्बंध दिखाई नहीं देता।

(११) भारत के, हितचिन्तक माता पिता अपने बालकों के हित में योग्य निर्णय ले पाए इस लिए पाठकों के सामने निम्न बिन्दुओं को रखने का साहस कर रहा हूँ। हरेक समस्या अलग होती है, इस लिए विवेक से काम लेना आवश्यक ही नहीं अनिवार्य है।स्थूल रूपसे विचार रखे गए है।किसी भी रखे गए विचार को सैद्धान्तिक मानकर चलने की आवश्यकता नहीं है।

किसी भी प्रक्रिया को समग्रता में देखने के लिए, उस प्रक्रिया से बाहर होना पडता है। और जब युवक-

युवति स्वतः ऐसे सम्बंध से लिप्त होते हैं, तो सबसे पहले इस वस्तुनिष्ठता की मृत्यु होती है।

(१२)आदर्श प्रेम

ऊपर ऊपर से, आदर्श प्रेम का द्योतक दिखाई देने वाला यह उत्सव वयक्तिक स्वातंत्र्य का परिचायक भी माना जा सकता है, पर ऐसी वयक्तिक स्वतंत्रता, धीरे धीरे स्वच्छंदता और स्वैराचार में बदल जाती अनुभव होती है। और लेख के अंत में प्रस्तुत सांख्यिकी आंकडे इसी की सच्चाई के प्रमाण है।

कठोर कर्तव्य मानकर कडवी जानकारी दे रहा हूँ। मुझे कुछ भारतीय युवक-युवतियों के, जीवन उजाड देने वाली घटनाएं भी पता है; पर, उन को उजागर किए बिना ही, विषय रखना चाहता हूँ।

(१३)प्रेम और वासना

वास्तवमें प्रेम और वासना-पूर्ति में बहुत अंतर है। यह उत्सव शतकों पहले, विशुद्ध प्रेम पर आधार पर प्रस्थापित हुआ होगा। पर, मैं इसके इतिहास में जाना नहीं चाहता। इस विशुद्ध प्रेम का जो वासना पूर्ति में बहुतेरा रूपान्तर हो चुका है; उस ओर ध्यान आकर्षित करना चाहता हूँ। पश्चिम में प्रेम शब्द से शारीरिक (लैंगिक) वासना युक्त प्रेम समझा जाता है, जब भारतीय परम्परा प्रेम को आदर्श के रूप में देखती है। शब्द एक ही पर अलग अर्थ में प्रयुक्त होता है, इस कारण से भी भ्रांत अर्थ लगाया जाता है।

एक विशेष बात बल पूर्वक कहना चाहता हूँ, कि, युवक-युवति के शरीर सम्बंध में युवति ही अधिक घाटे में होती है।वही, अधिक हानि भी सहती है। युवक एक मुक्त पंछी की भाँति उड जा सकता है।

(१४)

ऐसी परम्परा का आरम्भ कर पश्चिम आज ऐसे सांस्कृतिक पडाव पर पहुंचा है, जिसके फल स्वरूप समाज नष्ट हो चुका है। जहां से परिवर्तन कर फिर से विशुद्ध सामाजिक व्यवस्था निर्माण करना समुंदर को उलीच कर शुद्ध करने जैसा ही कठिन ही नहीं पर असंभव अग्निदिव्य प्रमाणित हो चुका है। खाई में कूदा तो जा सकता है, बाहर निकला नहीं जा सकता। पश्चिम खाई में कूद चुका है।

भारत को इससे बचाया जा सकता है।

(१५)

भारतीय व्हॅलंटाईन डे

मानता हूँ, कि इस व्हॅलंटाईन डे के, भारतीय पुरस्कर्ता शुद्ध प्रेम से प्रेरित हो सकते हैं; उन्हें इस परम्परा की परिणती किस अंत में हो सकती है, इस की जानकारी शायद नहीं है। इस लेख के माध्यम से, विशेष में युवतियों को और उनके माता-पिताओं को, भी, गम्भीर चेतावनी देना चाहता हूं। किन्तु मेरे कहने पर नहीं, सांख्यिकी आंकडों के आधारपर। जो सर्व स्वीकृत होने में कठिनाइ कम होगी। जिस अमरिका में यह दिन बिना-हिचक खुल्लम खुल्ला मनाया जाता है, वहां का सामाजिक ढांचा कहां पहुंच चुका है, यह देखना लाभप्रद होगा।

वैसे पश्चिम के पास भारत जैसी विवाह को संस्कार मानने की परम्परा नहीं है। यहां विवाह अधिकांश में, भोग आधारित संविदा (contract) माने जाते हैं। इसलिए यहां अन्ततोगत्वा जब किसी वयक्तिक स्वार्थ की पूर्ति नहीं होती, तो उसका परिणाम विवाह विच्छेद में हो जाता है।

(१६)आज यहां विवाह करने वालों की संख्याभी घट रही है। कारण जो विवाह के बाद प्राप्त होता है, वह बिना विवाह ही प्राप्त होने लगे, तो कौन युवा विवाहित जीवन के झंझट मोल लेगा? युवतियां विवाहोत्सुक होती है, पर युवा उत्तर दायित्व लेने में हिचकिचाता है। और विवाह हो भी जाता है, तो शारीरिक वासना पर ही आधारित होने से ऐसा विवाह अधिक दिन चल नहीं सकता। दूसरा, माता-पिता के और अन्य परिचितों के घटित अनुभवों से, मनुष्य सीख लेकर बडा होता है, जाने अनजाने वही उस का जीवन जीनेका प्रतिमान बन जाता है।इसके कारण विवाह विच्छेद यहां एक संभावना ही नहीं, पर जीवन की सच्चाई के रूपमें स्वीकार्य हो गया है। ऐसे विवाह विच्छेद से प्रभावित बालकों के जीवन देखना शिक्षाप्रद होगा:

(१७)विवाह विच्छेद से प्रभावित बालकों के जीवन : एक सांख्यिकीय समीक्षा।

(क) लगभग आधे अमरिकी बालक माता पिता के विवाह विच्छेद के साक्षी होंगे। इनमें से आधे (कुल विवाह संख्याके चौथा भाग, २५%) पालकों के दूसरे विवाह के विच्छेद के भी साक्षी होंगे।( Furstenberg, Peterson, Nord, and Zill, “Life Course”)

(ख) करोडों बालकोमें से जिन्हों ने अपने माता पिता का विवाह विच्छेद देखा है, हर दस बालकों में से १ बालक ३ या ३ से अधिक विवाह विच्छेद के अनुभव से प्रभावित होकर निकलेगा।(The Abolition of Marriage, Gallagher)

(ग) आज (१९९७ में) ,४० % प्रतिशत बडे हो रहे अमरिकी बालक, अपने पिता की (छत्र छाया ) बिना ही बडे हो रहे हैं। (Wade, Horn and Busy, “Fathers, Marriage and Welfare Reform” Hudson Institute Executive Briefing, 1997)

(घ) इस वर्ष विवाहित माता पिता के घर जन्मे, बालकों में से ५० % बालक अपनी १८ वर्ष की आयु तक पहुंचने के, पहले ही, अपने माता पिता के विवाह विच्छेद का अनुभव करेंगे।(Fagan, Fitzgerald, Rector, “The Effects of Divorce On America)

मानसिक संवेदना पर पडता विवाह विच्छेद का दुष्परिणाम।

(च) १९८० के दशकमें हुए अध्ययनों ने दर्शाया था, कि पुनः पुनः विवाह विच्छेद के अनुभवों से प्रभावित बालक शालाओं में निम्न श्रेणी प्राप्त करते हैं। उनके सहपाठी भी, उनका संग कम आनन्द देने वाला अनुभव करते हैं।(Andrew J. Cherlin, Marriage, Divorce, Remarriage –Harvard University Press 1981)

(छ) एक ही पालक वाले कुटुम्ब में, या मिश्र-कुटुम्ब में बडे होते किशोरों एवं नव युवकों को मानसिक परामर्ष की आवश्यकता किसी एक वर्ष में , तीन गुना होती है। (Peter Hill “Recent Advances in Selected Aspects of Adolescent Development” Journal of Child Psychology and Psychiatry 1993)

(ज) मृत्यु से दुष्प्रभावित घरों के बालकों की अपेक्षा विच्छेदित घरों के बालक अधिक मनोवैज्ञानिक समस्या ओं से पीडित पाए गए हैं।. (Robert E. Emery, Marriage, Divorce and Children’s Adjustment” Sage Publications, 1988)

अन्य अध्ययनों से संकलित जानकारी

बालकों पर विवाह विच्छेद के दुष्परिणामों के निम्न सांख्यिकी आंकडे आपको धक्का देने वाले प्रतीत होंगे।

(ट)पिता या माता की मृत्यु भी, बालकों पर, विवाह विच्छेद के जीवन उजाड देने वाले परिणामों से कम विनाशकारी होती है। ( बिना सांख्यिकी आंकडे देखे, इस पर, मैं भी विश्वास ना करता, )

इसके अतिरिक्त चेतावनी रूप है शारीरिक पीडाकी सांख्यिकी।

(ठ)दमा, शारीरिक क्षति, शिरोवेदना, और तुतलाने की, समस्याएं विवाह विच्छेदित कुटुम्ब के बालकों में पायी जाती है।

(ड) उनकी आरोग्य विषयक समस्याओं की संभावना भी ५०% अधिक होती है।

(ढ) अकेली माँ की देखभाल वाले कुटुम्ब में , बडे होते बालक की हत्या की संभावना १० गुना होती है।

दूरगामी परिणाम।

(ण) अकेलापन, दुखी, असुरक्षा अनुभव करने वाले, और चिन्तित बच्चे।

(त)७० % लम्बी सजा भुगतने वाले, जैल वासी खण्डित कुटुम्बों से पाए गए हैं।

(थ) खण्डित कुटुम्बों के लडके अधिक आक्रामक पाए गए हैं।

(द) आत्म हत्त्याका प्रमाण भी अधिक पाया गया है।

(ध) शाला की पढाइ बीचमें छोडने वाले बच्चे भी विच्छेदित परिवारों से ही बहुत ज्यादा होते हैं।

अंत: खाई में कूदा तो जा सकता है, बाहर नहीं निकला जाता।

इस व्हॅलंटाईन डेथ से बचना ही चाहिए।

Leave a Reply

12 Comments on "व्हॅलंटाइन डे विकृति"

Notify of
avatar
Sort by:   newest | oldest | most voted
डॉ. प्रतिभा सक्‍सेना
Guest
समय के साथ परिवर्तन आते हैं और विभिन्न संस्कृतियाँ एक दूसरी से प्रभावित होती है. आज विकास की गति तीव्र हो गई है, भौतिक सुख-सुविधा ,उसका प्रधान लक्ष्य है. हमारा युवा-वर्ग इस चमक-दमक में ऐसा चौंधियाया है कि उसे उसे यह भान नहीं कि किस ओर जा रहा है .बचपन से नैतिक शिक्षा के प्रति उदासीनता ,और अपनी संस्कृति से कटाव (बल्कि उसकेलिए उपेक्षा भाव),और उसकी खिल्ली उड़ाना आदत बन गई है. गुलामी के संस्कार ऐसे रस-बस गये हैं कि जब बाहरी लोग हमारी उपलब्धियों की चर्चा करते हैं तो मरे मन से स्वीकार तो करते है ,लेकिन अपने आप… Read more »
डॉ. मधुसूदन
Guest

१०० प्रतिशत, सहमति।
टिप्पणी के लिए, धन्यवाद।

डॉ. मधुसूदन
Guest

अब प्रवक्ता पर ही, देवनागरी टंकण की सुविधा, उपलब्ध है।
टिप्पणी कर्ताओं से अनुरोध:
हिंदी में प्रवक्ता पर ही टिप्पणी करें।
मुझे इ मैल भेजने पर प्रत्येक टिप्पणी का उत्तर विलम्ब से ही दिया जा सकेगा।
आप सभी टिप्पणीकारों का आभार प्रकट करता हूँ।

डॉ. मधुसूदन
Guest
(१) विवेकानन्द जी कहते हैं कि “भारत एकमेव (अकेला ही)–अर्थात दूसरा कोई नहीं, परम आध्यात्मिक देश है।” (२) इस विशेषता को खोनेमें भारत का अन्त निश्चित है। (३) युवा पीढी अध्ययन-केन्द्रित होनी चाहिए। अध्ययन के लिए एकाग्रता आदर्श ब्रह्मचर्य के बिना नहीं आ सकती। युवा यदि काम ज्वर (क्षमा करें) से पीडित होता है, तो वह आगे बढ नहीं सकता। (४) पांचो इन्द्रियों से जो ग्रहण किया जाता है, मस्तिष्क में जाकर स्मृति (संस्कार) बन जाता है। बार बार ऐसी प्रक्रिया “आदत” में परिवर्तित होती है। (५) चौबिसो घंटे; पांचो इन्द्रियों से यदि महत्वाकांक्षा, सकारात्मकता, उत्साह, शुचिता, पवित्रता,ध्येयवादिता, अंतर्बाह्य ऊर्जा,… Read more »
डॉ. मधुसूदन
Guest

Kaushalendra Kukkoo
कौशलेन्द्र जी —तबाही के बाद गलती ध्यान में आने से कुछ लाभ नहीं है। यहां भी ऐसा कुछ लोग मानते हैं, पर परम्परा एक बहाव है, नदी का प्रवाह है; उसकी दिशा समझ में आने पर बदली नहीं जा सकती।
भाग्य है हमारा. कि पूरखों ने ऐसी शुद्ध परम्पराएं रूढ कर दी है।

जैसे नदी का प्रवाह दिशा बदल नहीं सकता, मैं भारत में दाहिनी ओर वाहन चला नहीं सकता। सारी यातायात उलटी जब जा रही है, आप किसे किसे रोक कर समझाएंगे।
सोचता हूं, कि आप समझ गए होंगे।
धन्यवाद।

kaushalendra
Guest
मधुसूदन जी ! नमस्कार! फेस बुक पर आज की किशोर/युवा पीढी को जिस तरह की पोस्ट करते और फिर उन पर टिप्पणियाँ करते हुए देखता हूँ उससे दुःख होता है. पहले मैं ऐसे लोगों को दो चेतावनी के बाद अनफोलो कर देता था…अब नहीं करता ……बहुत सावधानी से समझाइश देता हूँ…..इस आशा में कि शायद नदी के प्रवाह में कोई मोड़ आये ….युवा पीढी सुनना-समझना नहीं भिड़ना जानती है …वे आक्रामक हो गए हैं …..दुःख तब और होता है जब मैं ब्राह्मण लड़कियों को भी इस मामले में लड़कों के साथ कदम ताल चलते हुए देखता हूँ. आखिर ये सब… Read more »
डॉ. मधुसूदन
Guest
नमस्कार डॉ. राजेश कपूर जी, प्रवास पर था, कल रात्रि ही वापस आया हूँ। और आज सबेरे आपकी टिप्पणी देख पाया। भारत में भी वही लोग जो पश्चिम की भोगवादी विकृति (संस्कृति नहीं)से अनजान है, जो पश्चिम की भौतिकता से ही, प्रभावित हैं, वे गलत समीकरण कर देते हैं, ==> भौतिक समृद्धि है, तो सांस्कृतिक समृद्धि भी साथ होगी ही। और फिर श्री. विनायक शर्मा जी ने भी कुछ तुलना का आग्रह किया था। एवम्‌ अन्य पाठक भी सही समझ सके, इस उद्देश्य से; और १४ फ़रवरी का विकृति दिन भी तो था। *भारत का सामान्य नागरिक भोतिक प्रगति को… Read more »
wpDiscuz