लेखक परिचय

राकेश उपाध्याय

राकेश उपाध्याय

लेखक युवा पत्रकार हैं. विगत ८ वर्षों से पत्रकारिता जगत से जुड़े हुए हैं.

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राकेश उपाध्याय

यूपी के रण में क्या कांग्रेस 22 साल बाद फिर से जिंदा हो सकेगी, ये सवाल जितना राजनीतिक पंडितों के लिए पहेली बना हुआ है उससे कहीं ज्यादा इस सवाल के जवाब में वो तमाम कांग्रेसी जुटे हैं जिनके लिए हालत करो या मरो वाली है। जाहिर तौर पर एन चुनावी वक्त में कांग्रेस ने अल्पसंख्यकों को साढ़े चार फीसदी आरक्षण का तोहफा दिया, जाटों को केंद्रीय ओबीसी कोटे में जगह देने का वादा किया, बुंदेलखंड में पैकेज के ऐलान के बाद बुनकरों के लिए भी बढ़ चढ़कर घोषणाएं कीं तो साफ हो गया कि कांग्रेस सचमुच ‘करो’ के एजेंडे पर बहुत कुछ कर रही है ताकि चुनाव नतीजे यूपी में राहुल गांधी समेत कांग्रेस के रणनीतिकारों के सामने ‘मरो’ वाली हालत पैदा न कर दें।

यूपी में 2007 के चुनाव के मुक़ाबले इस बार मतदान प्रतिशत में रिकॉर्ड इज़ाफा हुआ है। 6 चरणों के मतदान का हिसाब ये है कि 2007 के मुक़ाबले औसतन 15 प्रतिशत वोट ज्यादा पड़ चुका है, अंतिम चरण में भी मतदान 60 प्रतिशत के आस-पास होने की उम्मीद है। मतदान प्रतिशत में हो रहे इस इजाफे पर हर पार्टी खम ठोंक रही है। बीजेपी को उम्मीद है कि जनता उसके हक़ में मतदान कर रही है, ज्यादा वोटिंग इसका सबसे बड़ा उदाहरण है, वहीं बीएसपी, एसपी और कांग्रेस के भी अपने दावे हैं। मुख्यमंत्री मायावती के समर्थक कहते हैं कि वोट प्रतिशत में बढ़ोतरी सत्ता में बहिनजी के पूरे हनक के साथ लौटने का सीधा संकेत है, ठीक उसी तरह जैसे बिहार में नीतीश कुमार ने 2010 में जीत हासिल की थी। वहीं मुलायम के समर्थकों का दावा है कि मुस्लिम और यादव गठजोड़ के साथ अन्य जातियां भी समाजवादी पार्टी के पक्ष में मतदान कर रही हैं। तो सवाल उठता है कि आखिर इस घमासान का नतीजा किसके पक्ष में होगा।

बिहार चुनावों में राहुल के जादू पर विपक्ष ने जो सवाल खड़े किए वो सवाल यूपी में भी उठने लगे हैं कि कहीं युवराज की गति बिहार वाली तो नहीं होने जा रही। लेकिन राहुल समर्थक इस तर्क को ये कहकर खारिज़ करते हैं कि यूपी राहुल और कांग्रेस का घर है, उसी तरह जैसे नीतीश या जेडीयू का घर बिहार है। नीतीश कुमार और शरद यादव यूपी में भी प्रचार पर निकले हैं, नतीजे कितने उनके हक़ में जाएंगे, अंदाजा लगाया जा सकता है। सवाल है कि अगर नीतीश और शरद यादव के प्रचार के बावजूद जेडीयू को यूपी में 10 सीटें भी न मिल सकीं तो क्या ये कहा जा सकता है कि नीतीश का जादू नहीं चला। लिहाज़ा सवाल ज़मीन का है, और कांग्रेस के मुताबिक यूपी की जमीन पर राहुल गांधी के संघर्ष की बुनियाद रखी जा चुकी है। 2009 के लोकसभा चुनाव नतीजों की तर्ज पर विधानसभा चुनाव के नतीजे जल्द इसकी गवाही देंगे। रणनीतिकारों का दावा है कि जिस बदलाव के प्रतीक नीतीश बिहार में बने, उस बदलाव के प्रतीक की खोज यूपी के लोग भी कर रहे हैं और बकौल कांग्रेस जनता राहुल में यूपी का नीतीश खोज चुकी है।

पर सवाल कांग्रेस को संजीवनी मिलने पर है। 2009 लोकसभा चुनाव के नतीजे के नजरिए बात करें तो कांग्रेस को यूपी में इस बार न्यूनतम 70 से 80 विधानसभा सीटों पर जीत मिलनी चाहिए, लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को 23 सीटें हासिल हुई थीं…करीब 100 विधानसभा सीटों पर उसे बढ़त भी मिली…लेकिन दिल्ली और लखनऊ की सियासत में फर्क बहुत है। दिल्ली के लिए वोट देने वाला मतदाता लखनऊ के लिए बटन दबाते वक्त थोड़ा रुक जाता है…कांग्रेस के विरोधी मानते हैं कि यूपी ने 2009 में भले ही कांग्रेस के हक़ में वोट दिया..2012 में वो ऐसा नहीं करने वाला।

कांग्रेस खेमे में सवाल यहीं उठता है कि आखिर क्यों नहीं करेगा? कांग्रेस के रणनीतिकारों के मुताबिक, ‘यूपी की सियासत के सभी किरदार मुलायम सिंह यादव, मायावती, राहुल गांधी और राजनाथ सिंह-कलराज मिश्र-उमा भारती के इर्द-गिर्द घूम रहे हैं। सबको देखा बार-बार, हमको देखो एक बार के भाजपाई जुमले के जरिए मतदाताओं का मन टटोलें तो राहुल का दावा लखनऊ पर बनता है।’

कांग्रेस को सबसे ज्यादा उम्मीद मुस्लिम मतों से है, सवाल है कि क्या मुस्लिम मत कांग्रेस की और लौट रहे हैं? यूपी में 18 फीसदी मुस्लिम मतदाताओं का 60 प्रतिशत हिस्सा 2007 के चुनाव में मुलायम सिंह यादव के पक्ष में गया तो बाकी के हिस्से में ज्यादातर मायावती के खाते में गया। इस मुस्लिम मत में 12 प्रतिशत जाटवों समेत 22 प्रतिशत दलित तबके का बड़ा हिस्सा जुड़ा और इसमें 10 प्रतिशत ब्राह्मण मतों में से ज्यादातर का समर्थन हासिल होते ही लखनऊ के किले पर पूर्ण बहुमत के साथ मायावती का कब्जा तय हो गया।

बीएसपी के विरोधियों का तर्क है कि ब्राह्मण और मुस्लिम अब मायावती का साथ नहीं देने वाले, माया के भ्रष्ट मंत्रियों और सर्वजन के नाम पर ख़ास तबके के लिए उमड़े प्रेम से ब्राह्मण और मुस्लिम समेत कई समुदायों में कुछ निराशा की भावना है। लेकिन माया समर्थकों के इस दावे में भी दम है कि बहिन जी ने 88 मुस्लिम और 76 ब्राह्मण उम्मीदवार चुनाव मैदान में उतारकर चुनावी समीकरण दुबारा अपने पक्ष में कर लिया है। यूपी के पुराने चुनाव नतीजे बताते हैं कि करीब 300 सीटों पर कुल मतदान के 20 से 30 प्रतिशत वोट पाने वाला उम्मीदवार की जीतने की गारंटी रही है, इस लिहाज़ से 22 प्रतिशत दलित मतदाताओं में बड़ा तबका अगर मायावती के साथ एकजुट खड़ा रहा और उसने 88 मुस्लिमों और 76 ब्राह्मणों के पक्ष में वोट डाले तो 164 सीटों पर बीएसपी मुक़ाबले में नंबर एक और दो की लड़ाई में सीधे दिख रही है। सीधा सूत्र ये है कि अगर 12 से 15 फीसदी दलित भी हर सीट पर मायावती के साथ खड़े रहे और 88 मुस्लिम उम्मीदवारों को उनके तबके यानी 18 प्रतिशत मुस्लिम वोट में से 8-10 प्रतिशत वोट भी मिला तो आंकडा 22-25 प्रतिशत तक पहुंचता है, इस लिहाज़ से बीएसपी के रणनीतिकार मानकर चल रहे हैं कि उसके 88 में 40-45 मुस्लिम उम्मीदवारों की जीत तयशुदा है। बीएसपी यही सूत्र ब्राह्मण उम्मीदवारों पर भी लागू होता देख रही है, जिनके 10 प्रतिशत वोट 20 प्रतिशत दलितों से मिलें तो बीएसपी को 76 ब्राह्मण उम्मीदवारों में 35 से 45 उम्मीदवारों के विधानसभा तक पहुंचने की राह बहुत आसान दिखती है। बाकी यूपी की 85 सुरक्षित विधानसभा सीटों पर भी बीएसपी को बढ़त मिलने की पूरी संभावना है, यानी दलित कोटे में भी उसे 50 तक सीटें हासिल हो सकती हैं। जानकारों के मुताबिक, बीएसपी का आंकड़ा 140-160 सीटों तक पहुंचता दिख रहा है। हालांकि बीएसपी सूत्रों का दावा है कि बढ़े मतदान प्रतिशत में सबसे ज्यादा योगदान दलित मतों ने दिया है जो बीएसपी का वोट प्रतिशत किसी भी हालत में 2007 के नीचे आते नहीं देखना चाहते, यानी बीएसपी समर्थकों के मुताबिक, मायावती को 200 सीटें हर हालत में मिलेंगी। लिहाज़ा यूपी में बहिनजी की सत्ता दोबारा लौटने में बीएसपी नेताओं को कोई किंतु-परंतु मंजूर नहीं है।

समाजवादी पार्टी के खाते में भी 12 प्रतिशत यादव वोट प्रतिबद्ध है जिसमें 18 प्रतिशत मुस्लिम मतों में से कितना प्रतिशत इस बार जुड़ेगा, इस पर कोई भी दावा कांग्रेस के उभार ने मुश्किल कर दिया है। दरअसल 1995 के बाद हर चुनाव में कमोबेश मुस्लिम मतदाताओं के बीच एसपी के जनाधार में कमी आई है, हालांकि आंकड़ों के मुताबिक, आधे से ज्यादा मुस्लिम मतदाताओं पर उसकी पकड़ 2007 तक बनी हुई थी लेकिन 2009 के लोकसभा चुनाव में सपा के मुस्लिम जनाधार को तगड़ा झटका लगा, कांग्रेस ने इसमें सीधी सेंधमारी की..या यूं कहें कि मुस्लिमों ने अरसे बाद यूपी में कांग्रेस को ऑक्सीजन दी। बीते तीन सालों में सच्चर कमेटी, रंगनाथ मिश्र आयोग की रिपोर्ट, प्रधानमंत्री का अल्पसंख्यकों के लिए विशेष कार्यक्रम, बुनकर पैकेज, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय का अल्पसंख्यक दर्जा बरकरार रखने, केरल और बंगाल में उसकी शाखाएं खोलने समेत तमाम मुद्दे है जिन पर कांग्रेस ने मुसलमानों के ‘ओपिनियन मेकर’ तबके समेत आम मुसलमान को रिझाने की ठोस पहल की है। कैबिनेट मंत्री बनाकर सलमान खुर्शीद का कद ऊंचा किया तो राशिद अल्वी और रशीद मसूद जैसे दिग्गज मुस्लिम नेताओं को ख़ासी तवज्जो देकर मुस्लिम मतदाताओं को सीधा घर वापस लौटने का संदेश भी भेजा। रही सही कसर कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने पूरी की जिनके सुर बटला हाउस कांड से लेकर तमाम सवालों पर अक्सर केंद्र सरकार के लिए ही मुसीबत का सबब बने। यूपी के जिस पश्चिम इलाके में मुस्लिम मतदाता बहुत ज्यादा निर्णायक हैं, वहां आरएलडी के साथ गठबंधन कर जाट-मुस्लिम गठजोड़ की पुख्ता नींव भी कांग्रेस ने रखने की कोशिश की है। जाहिर तौर पर मुसलमान 2012 के चुनाव में पूरे तौर पर कांग्रेस की अनदेखी कर एसपी के पाले में खड़े होंगे, शायद ही इस तर्क को कोई मानेगा।

यूपी के महाभारत में जहां बीएसपी ने उम्मीदवारों के जरिए दांव खेला है, बीएसपी ने करीब आधे से ज्यादा उम्मीदवार बदल दिए हैं…106 प्रत्याशियों के टिकट काटे हैं वहीं कांग्रेस के लिए बड़ी कमज़ोरी ये है कि उसका कॉडर ज़मीन तक नहीं है, उसे उम्मीदवार दूसरी पार्टियों से उधार लेने पड़े हैं। जाहिर तौर पर इसका नुक़सान कांग्रेस को कहीं ना कहीं होता दिख रहा है। बावजूद इसके कांग्रेस यूपी में आरएलडी गठबंधन के साथ 60 से 80 सीटों पर खम ठोंककर खड़ी है, क्योंकि 18 फीसदी मुस्लिम मतों में 6 प्रतिशत मुस्लिम, कुल मत प्रतिशत में 4 प्रतिशत जाट, 3 प्रतिशत कुर्मी, 5 प्रतिशत गैर जाटव दलित, कुछ हद तक नया युवा वोटर, 3 से 5 प्रतिशत ब्राह्मण और 3 प्रतिशत के करीब ठाकुर मत भी मिलने की आस कांग्रेस नेताओं को है। पश्चिम यूपी में जाट वोट हटा दें तो यूपी में करीब 18 से 20 प्रतिशत मतों पर कांग्रेस ने पकड़ बना ली है जो 2009 के मुकाबले 4-5 प्रतिशत, 2007 के मुकाबले 12 प्रतिशत ज्यादा है। संभव है कि कांग्रेस की सीटें अकेले दम पर ही 60 सीटों से ऊपर पहुंच जाएं।

रही बात समाजवादी पार्टी और बीजेपी की, तो जहां समाजवादी पार्टी के सामने 2002 में मिली 147 सीटों के आंकड़ें तक पहुंचने की बड़ी चुनौती है वहीं बीजेपी को सवर्ण मतदाताओं से उम्मीद जगी है कि वो इस बार उसकी तरफ लौटेगा। गैर यादव ओबीसी जातियां और गैर जाटव दलित जातियों के बीच भी पार्टी का जनाधार रहा है, जिसमें उसे कुछ मात्रा में सफलता हासिल होती दिख रही है। लेकिन क्या बीजेपी की सीटों का आंकड़ा 60 के पार जाएगा, इस पर खुद बीजेपी में ही सवाल है, कॉडर होने के बावजूद बीजेपी में वो जोश नहीं दिख रहा जिसने 90 के दशक में पार्टी को ज़मीन से आसमान पर पहुंचा दिया। सबसे बड़ा सवाल आंतरिक कलह को लेकर खड़ा है जिसमें सूबे में नेतृत्व को लेकर अनिश्चितता पूरे तौर पर बरकरार है। सबसे बड़ा सवाल उस कुशवाहा को लेकर खड़ा है जिसे बीजेपी ने एन चुनावी वक्त में पार्टी में शामिल कर लिया। बीजेपी नेता फिलहाल निजी बातचीत में पूरा दावा कर रहे हैं कि कुशवाहा फैक्टर पर मीडिया ने चाहे जितनी आलोचना की हो, कुशवाहा की सदस्यता पार्टी को स्थगित करनी पड़ी हो लेकिन इसकी चुनावी भरपाई भरपूर हो रही है। समूचा कुशवाहा समाज बीजेपी के साथ उठ खड़ा हुआ है। लेकिन क्या बीजेपी के दावे सच साबित होंगे। इस पर सवाल अंदरखाने बीजेपी में ही उठ रहे हैं। सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब पार्टी को 2007 में कल्याण सिंह जैसे कद्दावर नेता की वापसी से फायदा नहीं मिल सका तो बीएसपी के दगे कारतूस दागी कुशवाहा के बूते बीजेपी कितने वक्त तक यूपी की सियासी जंग में टिक पाएगी, जबकि कुशवाहा जैसे दर्जन भर मौर्य जाति के नेता अभी भी प्रदेश अध्यक्ष स्वामी प्रसाद मौर्य के साथ बीएसपी के पक्ष में जातीय किलेबंदी कर चुके हैं।

अंतिम निष्कर्ष के तौर पर कहा जा सकता है कि बीएसपी 140 से 160 सीटें, कांग्रेस आरएलडी के साथ मिलकर 70 से 80 सीटें और बीजेपी 50-60 सीटों के साथ विधानसभा की दहलीज़ पर दस्तक देती दिख रही है। समाजवादी पार्टी को कितनी सीटें हासिल होंगी, इसका नतीजा इस बात पर तय होगा कि पीस पार्टी, उलेमा काउंसिल, कौमी एकता दल, अपना दल समेत तमाम छोटी पार्टियां कितनी सीटें हासिल करती हैं। छोटी पार्टियों को जितनी कम सीटें हासिल होंगी, समाजवादी पार्टी को उतनी ही ज्यादा सीटें मिलेंगी यानी साफ तौर पर समाजवादी पार्टी 100 से 110 सीटों के साथ यूपी में नंबर दो की जगह पर ठहरी नज़र आ रही है। मुस्लिम वोटरों का रुझान अगर कांग्रेस की ओर ज्यादा हुआ तो कांग्रेस और समाजवादी पार्टी की सीटों में बड़ा हेर-फेर भी हो सकता है। कांग्रेस यूपी में समाजवादी पार्टी की जगह नंबर दो की जगह भी ले सकती है।

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