लेखक परिचय

जावेद उस्मानी

जावेद उस्मानी

कवि, गज़लकार, स्वतंत्र लेखक, टिप्पणीकार संपर्क : 9406085959

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जावेद उस्मानी

राजनैतिक दुनिया में ज्यादातर लोगो की नजर में, अपने अलावा कोर्इ शाह नही है। सियासी दुनिया में ऐसी तकदीर वाले बिरले है जिन्हे बिगड़़ा हुआ नही माना जाता है। यहां, राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की अहिंसक आस्था के आलोचक उतने ही है, जितने हिंसा के विरोधी है। भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम चला रहे अन्ना हजारे को गांधीवादी माना जाता है। लेकिन वे वक्त जरुरत, दलो के चाल चलन के खिलाफ टीका करते रहते है। प्राय: सभी प्रमुख नेताओ मे कुछ दोष निकालना उनकी टीम का पंसदीदा शगल है। दिल्ली में चल रहे अनशन के दौरान 15 मंत्री, के विरुद्ध जांच की मांग भी है। इसमें प्रधानमंत्री व राष्ट्रपति का नाम शामिल है। मनमोहन सिंह पर कोयला मंत्रालय का कामकाज देखते समय,कोल ब्लाक के आवंटन में गड़बड़ी और प्रणव मुखर्जी के रक्षा मंत्रित्व के कार्यकाल में पनडूबी खरीद हुए भ्रष्टाचार का आरोप है। वैसे तो देश के शीर्ष पदो पर बैठे लोगो के खिलाफ आरोप लगना ही अपने आप मे बहुत गंभीर मामला है। लेकिन मजे की बात है कि जिनके विरुद्ध शिकायत है। निष्पक्ष जांच की मांग उन्ही से की जा रही है। सरकारी नजरिया भी भिन्न नही है। उनकी दृषिट में, सब राजनैतिक खेल है। इसलिए टीम अन्ना बखिया उधेड़ने में लगी है। लोकपाल विधेयक मुद्दे पर संसदीय कार्यप्रणाली में इंडिया अगेनस्ट करप्शन की दखलअंदाजी अधिकांश विपक्षी पार्टियो को भी नागवार गुजरी है। इन दलो की इच्छा इस गर्मागर्म मुद्दे से होने वाले लाभ को, बिना किसी नुकसान के, हथियाने की है। गैर राजनीति भी विकल्पहीन डोर है अत: जनविश्वास को बांधने मे विफल है। यहां एकता में अनेकता है, संगठन श्रेष्ठता का अंहकार व टकराहट कम नही है। अनैतिक राजनैतिक परंपराओ का निर्वाह भी खूब होता है। कबीर ने कहा है कि ‘बुरा जो देखन मै चला बुरा न मिलिया कोर्इ ,जो दिल देखा आपना मुझसे बुरा न कोय’। लेकिन लोग दूसरो के गिरेबां में झांकने में इतने मशगुल है कि अपनी ओर देखने की फुर्सत ही नही है। इसलिए स्वदोष दिखता ही नही है। यह प्रचलन समस्याओ की जनक है। जो व्यवस्था को कटघरे में खड़ी तो करती है समाधान नही होती है। सच्चे विकल्प के अभाव में वह सब यथावत है जिससे मुक्त होने की सबकी कामना है। इस देश में आरोप लगाना सरल है। देशभकित और देशद्रोही शब्दो की कसौटी अपना तराजू है समयानुसार जिसे जब चाहे जैसा तौले। विदेशी जासूस और विदेशी दलाल की तोहमत लगाकर अपमान करने वालो के द्वारा ही इन्ही लोगो को महान देश भक्त बताया जाना किस लोकतांत्रिक सिद्वांत या मर्यादा का पालन है समझ से परे है ।

सुविधानुसार आचरण सियासी फितरत है।नेहरु से लेकर मनमोहन तक भारतीय लोकतंत्र का इतिहास सच्चे झूठे, आरोप प्रत्यारोप के किस्से कहानियो से भरा हुआ है। जो प्रत्यक्ष दोषी है उनकी खिचार्इ का सबब समझ में आती है। लेकिन उल्लू सीधा करने के लिए, स्याह को सफेद और सफेद को स्याह बताये जाने की फितरत, गिरा हुआ खेल है। कौन क्या दिखता है और है क्या ? इसकी पहचान मुशिकल होती जा रही है। ये लोग कब किसकी तारीफ और कब उसी की निन्दा करेगे, इसका अनुमान लगाना कठिन है। सर माथे पर बिठाते है तो फूल झड़ते है और जब उससे असंतुष्ट होते है तो अंगार बरसते है। इनके पास फूल और आग दोनो के लिए रेडीमेड तर्क है। जब जो भाया वह मुखौटा पहन लिया। कर्इ बार बड़ा दुहराव देखने में आया है। कुछ मामले बहुत खास है। एक मामला पूर्व प्रधानमंत्री स्व0 मोरारजी देसार्इ का है। वे आरोपो से घिरे रहे है। उन पर सबसे संगीन इल्जाम था कि उन्होने बंबर्इ राज्य के गृहमंत्री रहते हुए लापरवाही नही की होती तो राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के हत्यारो की मंशा कामयाब नही होती। इसके दस्तावेजी सबूत होने की बात कही जाती है कि राज्य गृह विभाग के पास षंडयंत्र और षंडयंत्रकारियो के बारे में सूचना थी। इन्ही मोरारजी भार्इ को नेहरु मंत्री मंडल लिया गया वे केन्द्रीय मंत्री के रुप में वे अक्सर विरोधी दल के तेज तर्रार नेताओ के निशाने पर रहे और कांग्रेस के इंडीकेट- सींडिंकेट बटवारे के बाद जब वे तत्कालीन सत्ता के विरोध में थे तो उन पर सी.आर्इ.ए. का एजेंट होने का आरोप लगा। लेकिन स्व0 मोरारजी भाग्य के धनी रहे आपातकाल के बाद उन्हे उसी जमात ने प्रधानमंत्री बनाया जो सन 1974 के पहले अक्सर उन्हे कोसता था और 1991 में उन्हे भारत रत्न का सम्मान ऐसे लोगो के कार्यकाल में मिला जिनकी नजरो मे वे किसी समय सी.आर्इ. के एजेंट रहे है। इस सम्मान के पहले 1983 में अमेरिकी लेखक सैमूर हर्ष की विवदास्पद पुस्तक पर काफी कोहराम मचा था। इसमें एक केन्द्रीय मंत्री का सी.आर्इ ए. का एजेण्ट हाने का जिक्र था उस मंत्री पर अमेरिकी गुप्तचर संस्था से 20000 डालर भुगतान पाये जाने का जिक्र है। यह धन 1971 के युद्ध के दौरान दी गयी उन सूचनाओ के लिये दिया गया था जिसके आधार पर भारत की सैन्य योजनाओ को खासा झटका लगा था। तब शक कि, उगली स्व0 मोरारजी भार्इ की ओर उठी थी। यह मामला इतना तुल पकड़ गया था कि उन्होने लांस एजिल्स की अदालत में 50 लाख डालर का मानहानि का मुकदमा ठोक दिया। 19 मर्इ 1990 में पाकिस्तान ने उन्हे अपने देश के सर्वोच्च सम्मान निशान-ए- पाकिस्तान से सम्मानित किया। इस मान को दिये जाने के कारणो में 1971 के युद्ध में पाकिस्तान को संघर्ष से बचाने की भूमिका का भी उल्लेख है। उस समय दो जमा दो जोड़कर उनकी खिचार्इ करने वालो में वे लोग भी शामिल थे जिनकी भूमिका उन्हे प्रधानमंत्री बनाने में रही है। ऐसे लोग भी थे जो मोरार जी के प्रधानमंत्रित्व के काल में उनके स्वमूत्रपान की विधा के प्रशंसक थे। पूर्व प्रधानमंत्री रव0 राजीव गांधी पर बोफोर्स मामले में शामिल होने और उसके दोषियो को संरक्षण का आरोप था। 1991 में उन्हे भारत रत्न से सम्मानित किया गया। बोफोर्स का भूत आज भी जिन्दा है। वक्त जरुरत या जज्बात की रौ में लोग कब क्या बोलते है और क्या करते है इसका कोर्इ ठिकाना नही है। भारत रत्न स्व0 इंदिरा गांधी ऐसे दौरो से गुजरी है। सन 1971 के भारत-पाक युद्ध में मिली जीत के बाद, तत्कालीन विपक्ष ने उन्हे रणचंडी तक का खिताब दिया और इसके, सिर्फ छ: महीने पश्चात, जून 1972 में हुए शिमला समझौते के बाद, उन पर पराजित देश के आगे आत्म समर्पण करने का आरोप लगा। लेकिन 1974 के परमाणू विस्फोट के बाद वे आलोचको की नजरो में फिर महान हो गयी। इसके एक साल बाद 1975 में आपातकाल लगाने से नाराज लोगो की नजरो में उनका सम्मान घट गया, सन 1977 के आम चुनाव में जब मतदाताओ उन्हे नकार दिया व तत्कालीन सरकार ने उनके विरुद्ध शाह आयोग बैठा दिया। 31 अक्टूबर 1984 में उनकी हत्या के बाद, विरोधियो ने उनके प्रति जो सम्मान भावना व्यक्त की उसे सुनकर यकीन नही होता था कि यह वही लोग है जिन्होने उनकी आलोचनाए थी। दलो व राजनेताओ की श्रद्वाजलियां भी इतिहास के पन्नो मे में कैद है। यह एक तरह से राजनैतिक आचरण का दस्तावेज है कि हमारे पथपदर्शक लोगो को बताते क्या है? और करते क्या है? इसी काल से जुड़ा एक और बड़ा मामला हैं। सत्तर के दशक में लोकनायक जयप्रकाश पर सी आर्इ एजेंट की तोहमत तत्कालीन सत्तारुढ़ दल के नेताओ ने जड़ा था। 1999 में उन्हे भारत रत्न से सम्मनित किया गया। औरो की छोड़े, आधुनिक भारत के निर्माता स्व0 पंडित जवाहरलाल भी इस काजल की कोठरी में बेदाग नही रहे। पंचशील और गुटरिपेक्षता के लिए विश्व प्रशंसित इस व्यकित पर भी 1962 के भारत चीन युद्ध के बाद कर्इ तरह के आरोप लगे थे। जिनमें निस्त्रीकरण नीति के तहत सैन्य कटौती से सुरक्षा पर आया संकट भी था। बाद में इन्ही वजहो के हवाले, इस शांतिदूत के नाम अंतर्राष्ट्रीय स्तर के शांति पुरुस्कार स्थापित किया गया। मामले और भी है, मिसाल बतौर स्व0 लक्खू भार्इ पाठक ने पूर्व प्रधानमंत्री नरसिंहराव के खिलाफ ठगी का मामला दर्ज कराया था यह मामला अदालत में भी गया, हथियार के सौदागर अदनान खगोशी, मामा के.के.अग्रवाल और तांत्रिक चन्द्रास्वामी के साथ संबधो की कटु आलोचना हुर्इ।झारखंड मुकित मोर्चा रिश्वतकांड, सेट किटस जालसाजी में भी उनका नाम उछलने के बाद काफी शोर गुल और हंगामा हुआ लेकिन जब उनका अवसान हुआ तो अधिकांश आलोचक उन्हे महान देश भक्त बताने से नही चूके। अपने सच में व औरो के कहे गये सच में भारी अंतर है। बुजुर्ग नेता एन.डी. तिवारी का अपना सच है वे पकी उम्र में झंझावट में घिरे हुए है। रोहित या उज्जवला शर्मा का सच उनके खिलाफ है। इस हकीकत से लंबी आनाकानी के बाद नतीजा सबके सामने हैं। राजनैतिक गलियारो में दोरंगी सत्यबोध का दस्तूर है। न जाने कितने सबरजीत इसके शिकार हो चुके है। जिन्हे बिना कसूर जिल्लत छेलनी पड़ी है। कर्इ का पीछा मरने के बाद भी नही छूटा है। खासतौर से उन लोगो का जिनके पारिवारिक सदस्य आज भी राजनिति में दखल रखते हैं। कर्इ ऐसे भी है जिनके दोष जग जाहिर है पर वे, आम कानून से परे ,बेखौफ राजनीति में जमे हुए है। स्व0 फूलन देवी तो एक नमूना है वहां तो उनसे बड़ी हसितया बिना आत्म समर्पण या सजा के सर उठाये जमी हुर्इ है। सच झूठ के बीच चल रही आंख मिचौली से पूरा सियासी माहौल विद्रुप है। लगभग सभी इस रंग में रंगे नजर आते है। यह र्निविवाद सच है कि आज ऊची आंसदी पर बैठे अधिकांश जन कटघरे में है। बकौल दुष्यंत,

‘ इस सड़क पर इस कदर कीचड़ बिछी है।

हर किसी का पांव घूटनो तक सना है।ं।

एक जमाने में अमर शहीद भगतसिंह, चन्द्रशेखर आजाद, विसिमल, नेताजी सुभाषचन्द्र बोस,वीर सावरकर, लोहिया, जयप्रकाश, खान अब्दुल गफ्फार खान और प्राय: सभी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी अंग्रेजो की नजरो में अराजक तत्व रहे है। लेकिन इन लोगो का सम्मान हमेशा बना रहा। इनके बारे में जनता के मन में कभी शक नही रहा है। लेकिन आजादी के बाद सत्ता केन्द्रीत राजनीति के कारण वैचारिक मूल्यो मे आयी गिरावट से हर वह आदमी कही न कही सवालो के घेरे में है जो मतदाता को प्रभावित करता है। यहां तक कि नीहित राजनैतिक स्वार्थो के चलते स्वाधीनता संग्राम के सबसे अ्रग्रणी सेनानी भी आरोपो से घिरे हुए है। जिनकी सत्ता की राह में गांधी विचार बाधा बने उन लोगो ने महात्मा को नमन करते हुए भी उन पर तरह तरह के आरोप जड़े। उनके बáचर्य प्रयोग और दूसरा गाल भी सामने कर दो जैसे अहिंसक कर्म की पगड़ी कम नही उछली गयी है। महात्मा गांधी, कमजोर चरित्र वालो के निशाने पर हमेशा रहे है और रहेगे भी, क्योकि गांधी मार्ग दुर्बल चरित्र वालो के लिये चुनौती है। गांधी विचार की जड़े गहरी है असत्य का सामना करने की हिम्मत देती है। शार्टकट की राजनीति पसंद करने वालो को यह शैली रास नही आती है। इसलिए वे अपने कामो से इसे मारने की कोशिश करते रहते है। इससे इतर भी संदेहो व विवादो की लंबी सूची है। इसमे वह लोग है जिनके विचार आज भी प्रसंगिक होने के कारण देश की राजनीति और वोट को प्रभावित करते है। राजनैतिक गलियारो मे नेताजी सुभाष चंद्र बोस की विमान दुर्घटना में हुर्इ मृत्यु, पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादूर शा़स्त्री की ताशकंद में निधन जैसे अनगिनत रहस्य ऐसे है। जिनको लेकर बंबडर उठते रहे है। लेकिन पर्दा कभी नही उठा। शक और सुब्हेे की गुजाइश राजनीति में हमेशा बनी रहने की वजह राजनेताओ का आचरण भी है। जन विश्वास को खो चुके लोग अपने बचाव में हमेशा दूसरो की दलील देते है। पहले अपने गिरेबां में झाकने की बात उन्ही के जैसे लोगो का मुह बंद करा देती है। लेकिन इससे मूल दोष का शमन नही होता है बल्की उसका पोषण होता है। राजनैतिक करनी के कीचड़ ने इतना ध्ुधंलका कर दिया है कि कोर्इ चीज साफ नही बची हैं। राष्ट्रपति का चुनाव इसकी जिन्दा तस्वीर है इस गरिमामय पद के उम्मीदवारो के बारे में तरह तरह की बाते है। टीम अन्ना को प्रणव मुखर्जी में खोट दिखायी दे रही है। सच्चार्इ यह है कि अगर मुखर्जी की जगह संगमा भी सरकारी पार्टी के उम्मीदवार होते तो इस टीम को उनमें भी कमी दिखार्इ देती। सत्ता की तरह संगठनो के अन्दुरुनी कलह नित्य नये रुप में सामने आना फिर पलट जाना राजनेताओ की अदा है। यहां बातो से पलटना, गिरावट नही चतुरार्इ की निशानी है। एक समय प्रणव मुखर्जी को कांगेस से निकाले जाने और इस बुजुर्ग नेता द्वारा प्रणव कांग्रेस बनाये जाने के कारण भिन्न थे और अब कांग्रेस द्वारा उन्हे राष्ट्रपति पद के लिए उम्मीदवार बनाये जाने की वजह भिन्न है। इसी तरह से नरेन्द्र मोदी के लिए पार्टी द्वारा अपनाये गये विशेष तरीके से नाराज बुजुर्ग नेता लालकृष्ष आडवानी का मुबंर्इ राष्ट्रीय कार्यकारणी की बैठक का बायकाट करने की वजह अलग थी अब उन्ही मोदी के समर्थन में ब्लाग लिखने का कारण अलग है। बुजुर्ग नेता जसवंत सिंह का पार्टी से निष्कासन और वापसी लोग भूले नही है। जब लोकपाल विधेयक के दायरे में एन.जी.ओ. को लाये जाने का सुझाव आया था तो इस टीम के सदस्य अरविद केजरीवाल ने सरकारी सहायता से वंचित गैर सरकारी संगठनो को लोकपाल से बाहर रखे जाने की दलील दी थी लोगो को याद है कि उस समय इस टीम को विदेशो से आर्थिक सहयोग मिलने की बात काफी जोरो पर थी। इस तरह की रहनुमार्इयो के खजाने ने हमारा लोकतंत्र मालामाल है। हर एक के अपने किस्से है हर एक के पास सुनाने के लिये अलग कहानी है। नेता गण देश के हालात की तस्वीर खिचते हुए,अपने को अलग रखकर, अक्सर एक शेर पढ़ा करते है-

‘ एक ही उल्लू काफी है बर्बाद गुलिस्तां करने को

हर साख पे उल्लू बैठे हो तो अंजामे गुलिस्ता क्या होगा।।’

एक दूसरे के बारे में यह आंकलन हमारे उन मार्गदर्शको का है जो तय करते है कि हमें कब ? किस रास्ते? पर चलना है। अगर उनके बुलंद ख्यालात सच है तो क्या इस पहचान के साथ कोर्इ लोकतंत्र या समाज सर उठा कर चल सकता है? इससे और कुछ हो या न हो एक बात तो स्थापित हो जाती है कि हम क्या है ?

राजनीति या राजनेताओ के कथित व्यवहारिक सबक ‘जस बहे बयार पीठ तेते किजिए’ से आम लोग भी ‘जिधर बम,उधर हम’ सीख चुके है। रोज रंग बदलती हरकते देखकर यह तय कर पाना कठिन हो गया है कि किसकी सुने और किस पर एतबार करे क्योकि इसका कोर्इ टिकाना नही है कि आज हम जो कह या कर रहे है उस पर कल भी कायम रहेगे। हाल मे कांग्रेस सांसद विजय दर्डा का ‘राष्ट्रीय संत से राष्ट्रीय कंलक’ तक का सफर अनहोनी नही है। एक कार्यक्रम में गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी की दिली प्रशंसा करने के चंद घंटो के बाद उन्होने शेर को भक्षी बता दिया, कहना था कि उनका आशय मोदी के द्वारा प्रदेश को खाये जाने से था। गैर राजनीति का झंडा बुलंद करने वाली टीम अन्ना अब सियासी घोड़े की सवारी करने को उतावली है। सियासत की रंगीनिया जनतंत्र को खोखला कर रही है। सच और झूठ के बीच फासला ना के बराबर है। यहां कथित अधिकांश सत्य, विवादो के दायरे में हैं। बाते तरक्की की होती है लेकिन हर बदलाव के नक्शे में प्रगति का पहला द्वार, योजनाकारो का अपना घर है। राजनैतिक श्रृगार दिखावटी हैं। ताजातरीन राजनैतिक हलचले और लटके झटके पुरानी बोतल नयी शराब का किस्सा है। आम लोग के लिए इस सब्जबाग की हकीकत सूखी रोटी को निगलने के लिए काल्पनिक चटनी सी है।

‘हमको मालूम है जन्नत की हकीकत लेकिन।

दिल को बहलाने के लिए गालिब ये ख्याल अच्छा है।।’

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2 Comments on "किसकी सुने किस पर ऐतबार करें"

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श्रीराम तिवारी
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आपका आकलन सही है. लेकिन पूंजीवादी व्यवस्था में ये बीमारियाँ अपरिहार्य हैं. जब तक सामाजिक,आर्थिक, राजनैतिक और बौद्धिक असमानता विद्यमान है दमित शोषित वर्गों में आपसी द्वन्द के चलते क्रन्तिकारी परिवर्तन की अभिलाषा का अभाव है तब तक प्रकारांतर से यही तस्वीर दिखाई देती रहेगी.
लास एंजलिस की adalat में मोरारजी देसाई हार गए थे और उन par लगे आरोप झुट्लाये नहीं जा सके की वे ‘सी आई ऐ ‘ के एजेंट नहीं थे.

श्रीराम तिवारी
Guest

Yes you are very correct , Of course ! these things are the unavoidable facters of the Capitalist system.

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