लेखक परिचय

प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

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rafaelप्रमोद भार्गव

वायु सेना में कम होते लड़ाकू विमानों के कारण देश की हवाई सुरक्षा खतरे में है। अगले कुछ महीनों में इन विमानों के बेड़ों की संख्या घटकर ३२ रह जाएगी। जबकि युद्ध की आशंका से जुड़े हमारे पड़ोसी देश चीन और पाकिस्तान में लड़ाकू विमान लगातार बढ़ रहे हैं। इन दोनों देशों की वायु शक्ति की तुलना में हमारे पास कम से कम ७५६ लड़ाकू विमान होने चाहिए। सेना में विमान,हथियार और रक्षक उपकरणों की कमी की चिंता पिछले साल संसद की रक्षा संबंधी स्थाई समिति भी जता चुकी है। समिति ने फटकार के लहजे में सरकार को अगाह भी किया था कि लड़ाकू जहाजी बेड़ों की तादत में इतनी कमी पहले कभी नहीं देखी गई। यह स्थिति सैनिकों का मनोबल गिराने वाली है। गड़बड़ घोटालो में उलझी रही संप्रग सरकार तो अपने १० साल के कार्यकाल में विमान खरीदने की हिम्मत नहीं जुटा पाई,लेकिन यह अच्छी बात है कि राजग सरकार के वजूद में आते ही फ्रांस से ३६ राफेल लड़ाकू विमान खरीदने का सौदा हो गया है। हालांकि इन विमानों के आने में अभी समय लगना है।

देरी और दलाली से अभिशप्त रहे रक्षा सौदों में राजग सरकार के वजूद में आने के बाद से तेजी आई है। इस स्थिति का निर्माण करना सैनिकों का मनोबल बढ़ाने के लिए जरूरी था। वरना रक्षा उपकरण खरीद के मामले में संप्रग सरकार ने तो लगभग हथियार डाल दिए थे। रक्षा सौदों में भ्रष्टाचार के चलते तत्कालीन रक्षा मंत्री एके एंटनी तो इतने मानसिक अवसाद में आ गए थे कि वे हथियारों की खरीद को टालना ही अपनी उपलब्धि मान रहे थे। नतीजतन,हमारी तीनों सेनाएं शस्त्रों की कमी का अभूतपूर्व संकट झेल रही थीं। नरेंद्र मोदी सरकार ने इस गतिरोध को तोड़ा तो है,लेकिन अभी हथियारों आपूर्ती में समय लगेगा। इस सिलसिले में फ्रांस से हुआ ३६ राफेल लड़ाकू विमानों की खरीद का सौदा अहम् है। यह जानकर हैरानी होती है कि पिछले १७ साल से देश की सरकारों ने कोई लड़ाकू विमान नहीं खरीदा है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने फ्रांस यात्रा के दौरान फ्रांसीसी कंपनी दासौ से जो ३६ राफेल जंगी जहाजों का सौदा किया है,वह अर्से से अधर में लटका था। इस सौदे को अंजाम तक पहुंचाने की पहल वायु सेना को संजीवनी देगी। फ्रांस के राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद और भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से सीधे हुई बातचीत के बाद इस सौदे ने अंतिम रूपrafael लिया था। इस लिहाज से सौदे के दो फायदे देखने में आ रहे हैं। एक हम यह भरोसा कर सकते हैं कि ये युद्धक विमान जल्दी से जल्दी हमारी वायुसेना के जहाजी बेड़े में शामिल हो जांएगे। दूसरे,इस खरीद में कहीं भी दलाली की कोई गुंजाइश दिखाई नहीं दी है,क्योंकि सौदे को दोनों राष्ट्र प्रमुखों ने सीधे संवाद के जरिए अंतिम रूप दिया है।

पूर्व प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह और रक्षा मंत्री एके एंटनी की साख ईमानदार जरूर थी,लेकिन ऐसी ईमानदारी का क्या मतलब,जो जरूरी रक्षा हथियारों को खरीदने की हिम्मत ही न जुटा पाए ? जबकि ईमानदारी तो व्यक्ति को साहसी बनाने का काम करती है। हालांकि रक्षा उपकरणों की खरीदी से अनेक किंतु-परंतु जुड़े होते हैं,सो इस खरीद से भी जुड़ गए हैं। यह सही है कि जंगी जहाजों का जो  सौदा हुआ है वह संप्रग सरकार द्वारा चलाई गई बातचीत की ही अंतिम परिणति है। इस खरीद प्रस्ताव के तहत १८ राफेल विमान फ्रांस से खरीदे जाने थे और फ्रांस के तकनीकी सहयोग से स्वेदेशीकरण को बढ़ावा देने की दृष्टि से १०८ विमान भारत में ही बनाए जाने थे। स्वदेश में इन विमानों को बनाने का काम हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड को करना था,ये शर्तें अब इस समझौते का हिस्सा नहीं हैं। इससे मोदी के ‘मेक इन इंडिया‘ कार्यक्रम को धक्का पहुंचा है। क्योंकि तत्काल युद्धक विमानों के निर्माण की तकनीक भारत को मिलने नहीं जा रही है ? जाहिर है, जब तक एचएएल को यूरोपीय देशों से तकनीक का हस्तांतरण नहीं होगा,तब तक न तो स्वेदेशी विमान निर्माण कंपनियों का आधुनिकीकरण होगा और न ही हम स्वेदेशी तकनीक निर्मित करने में आत्मनिर्भर हो पाएंगे। इसलिए मोदी कुछ विमानों के निर्माण की शर्तें भारत में ही रखते तो सौदे के दीर्घकालिक परिणाम भारत के लिए कहीं बेहतर होते । हालांकि विमान प्रदायक कंपनी दासौ ने भरोसा जताया है कि वह विमानों के निर्माण की संभावनाएं भारत में तलाशेगी। लेकिन निर्माण की यह शर्त समझौते में बाध्यकारी नहीं है।

विमानों की इस खरीद में मुख्य खामी यह है कि भारत को प्रदाय किए जाने वाले सभी विमान पुराने होंगे। विमानों को पहले से ही फ्रांस की वायुसेना इस्तेमाल कर रही है। हालांकि १९७८ में जब जागुआर विमानों का बेड़ा ब्रिटेन से खरीदा गया था,तब ब्रिटिश ने भी हमें वही जंगी जहाज बेचे थे,जिनका प्रयोग ब्रिटिश वायुसेना पहले से ही कर रही थी। लेकिन हरेक सरकार परावलंबन के चलते ऐसी ही लाचारियों के बीच रक्षा सौदे करती रही हैं। इस लिहाज से जब तक हम विमान निर्माण के क्षेत्र में स्वावलंबी नहीं होंगे,लाचारी के समझौतों की मजबूरी झेलनी ही होगी। सौदे की एक अच्छी खूबी यह थी कि सौदे की आधी धनराशि भारत  में फ्रांसीसी कंपनी को निवेश करना अनिवार्य होगा।

इस खरीद को रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने बड़ा और ऐतिहासिक फैसला बताया था। क्योंकि लड़ाकू विमानों की आश्चर्यजनक कमी से जूझ रही वायुसेना को ये विमान मिलने के बाद  ऑक्सीजन साबित होंगे। यही नहीं भाजपा के ही वरिष्ठ नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने तो इस खरीद को विवादों की उड़ान की संज्ञा देते हुए,इसकी खामियों की पूरी एक फेहरिष्त ही जारी कर दी थी। स्वामी का दावा था कि लीबिया और मिस्त्र में राफेल जंगी जहाजों का प्रदर्शन अपेक्षा के अनुरूप नहीं रहा। दूसरे,राफेल विमानों में ईंधन की खपत ज्यादा होती है और कोई दूसरा देश इन्हें खरीदने के लिए तैयार नहीं है। तीसरे,कई देशों ने राफेल खरीदने के लिए इसकी मूल कंपनी दोसौ से एमओयू किए,लेकिन बाद में रद्द कर दिए। इन तथ्यात्मक आपत्तियों के अलावा स्वामी ने सौदे को आड़े हाथ लेते हुए कहा था कि यदि फ्रांस की मदद ही करनी थी तो विमानों को खरीदने की बजाय,दिवालिया हो रही दोसौ कंपनी को ही भारत सरकार खरीद लेता ?

इन सब तोहमतों के बावजूद ये विमान खरीदना इसलिए जरूरी था,क्योंकि हमारे लड़ाकू बेड़े में शामिल ज्यादातर विमान पुराने होने के कारण जर्जर हालत में हैं। अनेक विमानों की उड़ान अवधि समाप्त होने को है और पिछले १७ साल से कोई नया विमान नहीं खरीदा गया है। कुछ ही महीनों में सोवियत रूस से १९६० और ७० के दशक में खरीदे गए मिग-२१ और मिग-२७ विमानों के तीन बेड़े उम्र पूरी हो जाने के कारण सेवा से बाहर कर दिए जाएंगे। ज्यादातर विमान उड़ान भरने की अवधि के करीब होने के कारण आए दिन दुर्घटनाग्रस्त होने की घटनाएं सामने आ रही हैं। इन दुर्घटनाओं में वायु सैनिकों के बिना लड़े ही शहीद होने का सिलसिला बना हुआ है।

हकीकत तो यह है कि मोदी सरकार को अब लाचारियों से भरी ऐसी खरीदों के स्थायी समाधान तलाषने की जरूरत है,जो पारदर्शी नीतियों का पालन करने वाली हों। साथ ही एचएएल एवं डीआरडीओ जैसी संस्थाओं का आधुनीकिकरण और स्वेदेशीकरण किया जाना नितांत जरूरी है। फिलहाल हमारे यहां हल्के युद्धक विमान और आधुनिकतम हल्के किस्म के हेलीकॉप्टर बनाए जा रहे हैं। टाटा कंपनी सी-१३० मॉडल के विमानों के पुर्जे भारत में बनाकर दूसरे देशों में निर्यात कर रही है।  जब ऐसा संभव है तो हम अपने ही देश के लिए शाक्तिशाली युद्धक विमानों का निर्माण क्यों नहीं कर सकते ? एचएएल भारतीय कंपनियों को उपकरण व पुर्जे बनाने का लाइंसेंस देकर इस दिशा में उल्लेखनीय पहल कर सकती है। यदि ऐसा भविष्य में होता है तो हमारी उत्पादन क्षमता बढ़ेगी और मोदी ‘मेक इन इंडिया‘ के स्वेदेशीकरण का जो स्वप्न को दिखा रहे हैं, उसके साकार होने की उम्मीद बढ़ जाएगी।

 

 

 

 

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