लेखक परिचय

जगदीश्‍वर चतुर्वेदी

जगदीश्‍वर चतुर्वेदी

वामपंथी चिंतक। कलकत्‍ता वि‍श्‍ववि‍द्यालय के हि‍न्‍दी वि‍भाग में प्रोफेसर। मीडि‍या और साहि‍त्‍यालोचना का वि‍शेष अध्‍ययन।

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प्रेत कभी अकेले नहीं आते हमेशा अनेक के साथ आते हैं। यह वर्णशंकर प्रेत है। यह आधा भारतीय है और आधा विलायती है। इसका राजनीतिक शरीर भी वर्णशंकर है। आधा ”हमारा” और आधा ”तुम्हारा”। यह अद्भुत मिश्रित क्लोन है। ग्लोबल कल्चर की उपज है। इसके कपड़े और मुखौटे जरूर राजनीतिक दलों के हैं किंतु इसकी आत्मा ठेठ अमरीकी है। ग्लोबल है।

कहने को इसका शरीर भारतीय है किंतु मन-मिजाज, स्वभाव, भाव-भंगिमा, बयान, चाल- ढाल, संगठनशैली सब अमरीकी हैं। यह नयी विश्वव्यापी जनतंत्र स्थापना की अमरीकी मुहिम के सभी लक्षणों से युक्त है। नया अमरीकी जनतंत्र जबरिया थोपा जनतंत्र है, लाठी का जनतंत्र है। इसमें सत्ता जैसा चाहेगी वैसा ही विपक्ष भी होगा। पश्चिम बंगाल या भारत के लिए यह पराया जनतंत्र है।

प्रेतों के वचनों में हमेशा मानवीय भाषा होती है जैसे झगड़े का समाधान बातचीत से होना चाहिए, हमें झगड़ा पसंद नहीं है। हम चाहते हैं कि सब लोग शांति से रहें, प्रेम से रहें, भाईचारे के साथ रहें। हमारे प्रशासन का काम है लोगों को सुरक्षा देना। मानवीय मंगलवचनों का इनके मुख से निरंतर पाठ चलता रहता है। यह वैसे ही है जैसे अमरीकी विदेश विभाग सारी दुनिया में अपने नेताओं के मुँह से मंगलवचनों को उगलवाता रहता है।

मंगलवचन की राजनीति नए अमरीकी जनतंत्र की राजनीति है,यह ‘तेरे’ ,‘मेरे’ के प्रेतों की निजी खूबी है। प्रेतों ने यह भाषा अमरीकी तंत्र से सीखी है। यह लोकल भाषा नहीं है। ग्लोबलाईज जनतंत्र की ग्लोबल भाषा है। ग्लोबल प्रेतों का दादागुरू नव्य-उदारतावाद है। यह अचानक नहीं हैं कि नव्य-उदारतावादी प्रेतों के साथ हैं, प्रेतों के ताण्डव के साथ हैं।

ग्लोबल प्रेत सिर्फ अंधविश्वासी, पुनर्जन्म विश्वासी नहीं है, वह यदि संघियों के शरीर में प्रवेश कर सकता है तो वैज्ञानिक नजरिए के कायल कम्युनिस्टों के अंदर भी प्रवेश कर सकता है।

ग्लोबल प्रेत की कोई विचारधारा नहीं होती। वह कहीं भी और कभी भी किसी के अंदर प्रवेश कर सकता है और उसके अंदर स्थायी और अस्थायी डेरा जमा सकता है। प्रेत की कोई जाति नहीं होती, धर्म नहीं होता, राजनीति नहीं होती, चेहरा नहीं होता, प्रेत तो प्रेत है उसे मनुष्य समझने की भूल नहीं करनी चाहिए।

प्रेत का धर्म ही अलग होता है। प्रेत वर्चुअल होता है। अनुपस्थिति होता है। प्राणरहित होता है। प्रेत में मानवता की खोज संभव नहीं है। प्रेत कोई व्यक्ति नहीं है। प्रेत ग्लोबल बहुराष्ट्रीय निगम व्यवस्था का प्रतीक है। इस प्रेत को साक्षात किसी ने देखा नहीं है। सिर्फ इसके उत्पात देखे हैं,प्रेत के ताण्डव देखे हैं, प्रेत की हिंसा और प्रतिहिंसा देखी है। इलाका दखल देखा है।

ग्लोबल प्रेत को किसी के घर में आग लगाते,बलात्कार करते, बंदूक से गोलियां बरसाते देखा गया है, उसकी बंदूकों की आवाजें सुनी हैं, दनदनाती मोटर साईकिलों पर हथियारबंद जुलूसों की दहशत महसूस की है, प्रेतों के द्वारा किए गए अत्याचारों के आख्यान सुने हैं। बलात्कार की शिकार औरतों के आख्यान सुने हैं। किंतु किसी ने प्रेतों को देखा नहीं है। आश्चर्य की बात है कि इन प्रेतों को कोई पंडित, कोई ओछा, कोई तांत्रिक बोतल में कैद नहीं कर पाया। कोई पुलिस वाला, सेना वाला,टीवी वाला पकड़ नहीं पाया, प्रेतों को हम देख नहीं पाए किंतु उनके आख्यान और महाख्यान को लगातार सुनते रहे हैं।

काश प्रेतों के चेहरे होते। प्रेतों के पैर होते। शरीर होता तो कितना अच्छा होता हम साक्षात् प्रेतों को देख पाते, हमारे पास टीवी द्वारा पेश किया गया प्रेतों का आख्यान है किंतु रियलिटी शो नहीं है। प्रेतों की रियलिटी नहीं है। प्रेतों के द्वारा सताए लोगों के यथार्थ बाइट्स हैं, यथार्थ आख्यान नहीं हैं। हम यथार्थ बाइट्स से ही काम चला रहे हैं। अधूरे यथार्थ से ही काम चला रहे हैं। काश प्रेतों का रियलिटी शो कोई अपने कैमरे में कैद कर पाता !

सवाल यह है कि जब प्रेतों के ताण्डव के आख्यान हम जानते हैं तो प्रेतों को खोजने का काम क्यों नहीं करते, प्रेतों को दण्डित कराकर उन्हें प्रेत योनि से मुक्ति क्यों नहीं दिलाते? क्या हमें ‘ हमारे’ और ‘तुम्हारे’ सभी प्रेतों को दण्डित कराने का प्रयास नहीं करना चाहिए? क्या लोकतंत्र की वैज्ञानिकचेतना यही कहती है कि प्रेतों को आराम से रहने दो?

हमारे देश में जिस प्रेत ने कब्जा जमाया है वह वर्णशंकर प्रेत है, हाइपररीयल प्रेत है। इच्छाधारी प्रेत है। जब इच्छा होती है तो किसी शरीर में प्रवेश कर जाता है और जब इच्छा होती है गायब हो जाता है। यह ऐसा प्रेत है जिसे इच्छामृत्यु वर प्राप्त है। यह सत्ताधारी प्रेत है। इसी अर्थ में इच्छाधारी है। इच्छाधारी प्रेत बड़ा खतरनाक होता है। वह कभी भी किसी के भी अंदर प्रवेश कर जाता है और अभीप्सित लक्ष्य को प्राप्त करके गायब हो जाता है। हमने गली, मुहल्लों से लेकर गांवों-शहरों में ऐसे असंख्य प्रेत पाले हुए हैं। ये जनतंत्र के नए संरक्षक और भक्षक हैं।

इच्छाधारी प्रेत के पास वैचारिक हिमायती भी हैं,ये ज्ञान-विज्ञान और समाजविज्ञान के धुरंधर हैं। इन लोगों ने अनेक प्रेताख्यान लिखे हैं। असल में ये विद्वान ही हैं जो इसे मंत्रोच्चारण करके प्रेतों को जिंदा रखे हुए हैं। यह विलक्षण संयोग है कि प्रेत मंत्रों से मरते नहीं है,प्रेत में क्लोनकल्चर होती है। यह भी कह सकते हैं प्रेत हमेशा क्लोन कल्चर के जरिए ही निर्मित किए जाते हैं, प्रेत एक जैसे होते हैं। प्रेतों की हरकतें एक जैसी होती हैं, भाषा एक जैसी होती है, संस्कृति एक जैसी होती, विचारधारा एक जैसी होती है। प्रेत के आख्यान लेखक भी एक जैसे होते हैं। काश हम प्रेत को देख पाते।

-जगदीश्‍वर चतुर्वेदी

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