लेखक परिचय

राजीव पाठक

राजीव पाठक

वर्तमान में पत्रकारिता में शोध छात्र हैं।

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राजीव पाठक

आपके जीवन में भी एक ऐसा क्षण जरुर आया होगा जब आपके पीठ में बहुत तेज खुजली हो रही हो और उसे खुजाने के लिए आपका अपना हाथ काम न आये, लेकिन भगवन का शुक्र उसी समय कोई दिख जाये और वह आपके पीठ को आपके कहने पर वहीँ-वहीँ खुजा दे | आ..हा.हा…कितना सुखद अनुभव होता है न | सच में वह भी परमानन्द का एक क्षण होता है | वैसा ही परमानन्द हिंदी ब्लागिंग करते हुए आता है | मुझे हिंदी ब्लागिंग के दुनिया में आये बस चार साल हुआ है | लेकिन इस चार साल का जो अनुभव है वो गजब का है | भई, इतना आनंद सायद ही कहीं मिले | इसीलिए ये ब्लागिंग अपने लिए परमानन्द की बात हो गई है | यदि गूगल टॉक पर आप आनलाइन दिख गए तो आपकी खैरियत नहीं, आपके स्क्रीन पर नीचे दाहिनी तरफ एक लिंक लिया हुआ बाक्स हाजिर हो जायेगा | ये बाक्स किसी को खुजली होने का संकेत है | अब आप अपना काम-धाम छोड़िए और और उन्हें खुजाने के लिए उस लिंक पर अपने माउस को क्लीक करिए | यदि आपने अनसुना किया तो भी खैरियत नहीं है | अगले कुछ मिनटों में आपसे एक सवाल करता हुआ वह बाक्स फिर हाजिर है ” भई साहब देखा क्या कैसा लिखा मैंने ? माँ-बहन कर दी मैंने तो ………सब कह दिया, बिना गाली दिए हुए ही ! आपका कमेन्ट नहीं मिला ? इंतज़ार कर रहा हूँ |” अब आप भी सोचने लगे, ये मुसीबत हते कैसे ? चलो चल कर खुजा ही देता हूँ | न जाने कब अपने को भी खुजली हो | और फिर सामाजिकता भी तो कोई चीज है | चलकर बिना पढ़े एक लाइक,और एक छोटा सा कमेन्ट कर दिया आपने और आ गए वापस अपने काम पर | आप माँ ही माँ सोच रहे थे कि थैंक्यू-वैंक्यू जैसा शब्द उसी बाक्स के माध्यम से मिलने ही वाला होगा | लेकिन मुसीबत और बढ़ गई | बाक्स संदेसा तो लाया लेकिन थैंक्यू-वैंक्यू कुछ नहीं, ऊपर से एक श़क वाला सवाल लेकर हाजिर हुआ ” भई साहब ! आपने तो पढ़ा होगा, वो फलाने के माँ-बहन कि जो मै लिखा उसमें आपको कितनी सच्चाई लगती है, मतलब लोग तो इसे सच मानेंगे न ! क्यों कि हकीकत में कोई माँ-बहन करने वाली बात थी नहीं, मैंने तो इसलिए कर दिया कि अपने लोगों को अच्छा लगे और फिर मुझे भी तो अपनी पहचान बनानी है, सो बिना गलियाए तो ये सब होता नहीं, ऐसा आप पुराने लिख्खाड भी कहते है |” मैंने कुछ गलत तो नहीं लिखा न भई साहब ? आप भी सोच में पड़ गए ! इतना सही खुजाया था फिर इसकी खुजली गई क्यूँ नहीं ! लेकिन फिर आपको ध्यान आया कि जब ये भाई आपके कहने पर आपको खुजाने आया था तो उसने सब जगह खुजाया, जहां-जहां आपने खुजाने को कहा | फिर आपका भी फर्ज बनता है कि आप भी उनके संतुष्टि तक खुजाते रहिये | ये बिरादरी धर्म है सो निभाना ही हितकर है | नहीं तो यही जाकर दस जगह कह देगा कि फलां को बहुत खुजली होती है और फलां मुझे बुला-बुला कर खुजवाता है | आप भी उनके दिए सभी लिंक पर अच्छे से खुजा दिया | ब्लाग,फेसबुक,फलाना डाट कोम, धिम्काना डाट कोम सब पर लाइक, सेयर कमेन्ट | अब जिस भाई को आपने खुजाया उसने भी सभी जगह आपके खुजाने से ज्यादा वहाँ आपके प्रशंसा में तेल लगाया | आनंद आ गया | भई, परमानन्द कि प्राप्ति हो गई |

अपने अन्दर नेता बनने की इक्षा समुद्र में उठाने वाले ज्वार-भांटा के तरह हर पूर्णिमा-अमावस की तरंगों से कम नहीं होती होंगी, यदि हम हिंदी ब्लागिंग में सक्रिय हैं | हिंदी ब्लागिंग जगत का पूर्णिमा और अमावस कभी भी हो सकता है , जब दुबे जी और चौबे जी की इक्षा हो | पिछले दिनों चौबे जी का समर्थन किया हुआ एक पत्र दुबे जी ने मेल से भेजा | बड़ी प्रशन्नता हुई | वही ज्वार-भांटा जैसा उमंग | दुबे जी ने लिखा ” प्रिय पाठक जी, सादर …………| वैसे तो हम सब दिन में कई बार लाइक कमेन्ट और सेयर करने हेतु एक दुसरे से बात कर ही लेते हैं, लेकिन कुछ बात ओफिसियल जैसा दिखना चाहिए इसीलिए यह मेल आपको भेजा है | चौबे जी,शर्मा जी,वर्मा जी,गुप्ता जी और झा जी के बहुत कहने पर हमने एक सम्मलेन करने का निर्णय लिया है | हम सभी ब्लागर एकमत होकर किसी विषय पर लिखें और सामाजिक-राजनीतिक मुद्दे पर एकमत रहें, यही अपना उद्येश्य है | अपने को बड़ी प्रसन्नता हुई कि कहीं तो मंच,माला और माइक का साथ मिलेगा | विचारों के ज्वार-भांटा में एक विचार ऐसा आया कि दुबे जी से पहले ही पूछ लूँ कि मुझे कोई भाषण-वाषण तैयार करके आना है क्या ? यह विचार इसलिए, क्यों कि मेरे लिए भी कोई बड़ा पद दुबे जी ने रखा होगा और उसकी जब घोषणा होगी तो मेरा मान-सम्मान होगा और उसके बाद दो शब्द तो बोलना पड़ेगा न ! पूछना कुछ ठीक नहीं लगा, सो दुबे जी के आदेश मात्र को सम्मान मानकर निश्चित-समय और स्थान पर पहुँच गया | मन गदगद हो गया | सबका दर्शन हुआ | तिवारी जी को तो अभी तक ब्लॉग के फोटो में ही देखा था और उनकी लेखनी पढ़ी थी, लेकिन सम्मलेन में पहुंचकर पता चला कि तिवारी जी खुद काम लिखते हैं, कट-कापी-पेस्ट ज्यादा करते हैं | तिवारी जी के इस सच्चाई का पता कई लोगों को चला | रायपुर,भोपाल,पटना,दिल्ली,लखनऊ सब जगह से लिख्खाड़ बंधू पहुंचे | इसीलिए इसका नाम अखिल भारतीय कुशाग्र बुद्धि ब्लागर सम्मलेन रखा गया | एक सवाल समझ से बाहर हो रहा था कि इनका अखिल भारत इन्ही पाँचों राज्यों को मिलकर है तो भारत के अन्य क्षेत्रों के हिंदी ब्लागरों का प्रतिनिधित्व कैसे होगा ! अपने दिमाग में भी कुछ ज्यादा सवाल आता है | छोड़ो इन सब बातों को अपना पद मिल जाय मंच-माला-माइक और दो शब्द रखने का समय | बिना मतलब की बातों में कौन पड़े | कोई शुल्क नहीं, आने-जाने का टिकट पहले से दिया जा चुका था और व्यवस्था टॉप | सम्मलेन का श्री गणेश और इतिश्री भी हो गया | आखिर दुबे जी ने हमें बुलाया क्यूँ था ? जब अपना कोई स्थान ही नहीं है यहाँ ! मन शांत किया और वहीँ प्रण किया भई अब अपने प्रयाश से एक सम्मलेन करना है | अगली बार अपन भी वैसा ही किया जैसा बाकियों ने अपने साथ किया था | स्थानीय पार्टी ने अपने को बड़ा प्रभावी व्यक्ति माना | सम्मलेन का सारा खर्च मिल गया | अब अपना ब्लाग भी छपता है | लेकिन बिरादरी के इस व्यवस्था को आगे बढ़ाने में बड़ा मजा आता है | अपने तरह का यही एक ऐसा चाकरी है जिसमें परमानन्द मिलता है | ऐसा बर्मा जी और कई कुमार जी भी कहते हैं | जो नहीं कहते वो भी मन ही मन इसकी पुष्टि करते हैं | हिंदी ब्लागिंग अमर रहे

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