उलट बंसी : केंद्र की उपेक्षा करती राज्यों की सरकारें!

लिमटी खरे

केंद्र और राज्यों में अगर अलग अलग दलों की सरकारें होंगी तो आपसी टकराहट बहुत ही सामान्य बात है। इसका कारण यह है कि संघात्मक शासन व्यवस्था में राज्य और केंद्र की सरकारों में शामिल दलों की अपनी अपनी प्रतिबद्धताएं, सियासी नफा नुकसान, आपसी समन्वय का अभाव आदि के कारण इस तरह की परिस्थितियों से दो चार होना आम बात है। केंद्र में भारतीय जनता पार्टी के गठबंधन दलों की सरकार है और जिन सूबों में गैर भाजपाई गठबंधनों की सरकारें जिन जिन सूबों में हैं, उनमें से अनेक सूबो ंने केंद्र के इस तरह के नियमों, निर्देशों का पानल न करने की बात कहकर ठहरे हुए पानी में कंकर मार दिया है। जब देश के संविधान का निर्माण हो रहा था, उस समय इस तरह की परिस्थितियों की कल्पना भी की गई थी और इससे निपटने के उपाय भी संविधान में मौजूद हैं।

एक समय था जब देश और प्रदेशों में कांग्रेस की सरकारों का बोलबाला था। सत्तर के दशक में ही गैर कांग्रेसी सरकारों का उदय होना आरंभ हो गया था। राज्यों और केंद्र में अलग अगल दलों की सरकारों के होने से अनेक मामलों में सहमतियां न बन पाना बहुत साधारण और आम बात है। इसके लिए संविधान में व्यवस्थाएं भी हैं, पर इक्कीसवीं सदी के आरंभ के उपरांत केंद्र और राज्य सरकारों के बीच समन्वय का अभाव जिस तरह से उपजा है वह चिंता का विषय माना जा सकता है। परिवहन विभाग द्वारा नियम तोड़ने पर जुर्माने की राशि बढ़ाने, नागरिकता संशोधन कानून के बाद अब राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर पर कुछ राज्यों का रूख इसका हालिया उदहारण माने जा सकते हैं।

नागरिकता कानून के बारे में फैले भ्रम के बाद यह बात भी उभरकर सामने आई है कि लोगों का मानना है कि राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर दरअसल नागरिक रजिस्टर का ही होमवर्क है। इस बारे में केंद्र सरकार को भ्रम दूर करना चाहिए। पश्चिम बंगाल सरकार के द्वारा दो टूक शब्दों में कह दिया गया है कि वह जनसंख्या रजिस्टर की प्रक्रिया में शामिल नहीं होगी। अगर ममता बनर्जी ने इस पर अमल किया और अन्य राज्य भी ममता बनर्जी के साथ हो लिए तो केंद्र सरकार इसके लिए क्या कर पाएगी! यह बात भी सियासी फिजा में घूमती ही दिख रही है।

संविधान विशेषज्ञों के अनुसार संविधान के निर्माण के वक्त इस तरह की दुश्वारियों के बारे में भी विचार किया गया था। इसके लिए अनेक कंडिकाओं, अुनच्छेदों में इससे निपटने के उपाय सुझाए गए हैं। इसके तहत केंद्र के द्वारा बनाए गए कानूनों का पालन सुनिश्चित करने के लिए निर्देश जारी कर सकती है। संविधान बनाते समय संविधान निर्माताओं को केंद्र और राज्यों के बीच संबंधों की प्रगाढ़ता, जटिलता, दुश्वारियों आदि का भान भलिभांति ही रहा है।

संविधान के अनुच्छेद 365 में इस बात को विस्तार से बताया गया है। इसके अनुसार केंद्र के द्वारा दिए गए निर्देशों का पालन, अनुपालन अगर राज्य सरकार करने में असफल रहती है तो वह इसे लागू करवाने के लिए प्रदेश को बाध्य कर सकती है और अंतिम विकल्प के रूप में राज्य में राष्ट्रपति शासन भी लगाया जा सकता है।

इस अनुच्छेद में कहा गया है कि यदि संविधान में वर्णित किसी अधिकार के अंतर्गत केंद्र सरकार द्वारा दिए गए निर्देश का अनुपालन करने में कोई राज्य असफल रहता है, तो इस आधार पर अंतिम विकल्प के रूप में उस राज्य में राष्ट्रपति शासन भी लगाया जा सकता है। इसके साथ ही यह भी कहा गया है कि राजनैतिक विवेक से राजनीति में इस तरह की कठोर कार्यवाही से यथा संभव परहेज ही किया जाए। इस तरह के कदम विवादों को सुलझाने के बजाए उलझा ही देते हैं।

संविधान के अनुच्छेद 73 को दो भागों में विभक्त किया गया है। इस अनुच्छेद में केंद्र सरकार के क्षेत्राधिकार को वर्णित किया गया है। इसके पहले भाग के अनुसार केंद्र सरकार के अधिकार का विस्तार जिन मामलों में कानून बनाने का अधिकार केंद्र को हैै, तक किया गया है। इसके अलावा अगर अंतर्राष्ट्रीय संधि के क्रियान्वयन के लिए केंद्र सरकार को जयरी कदम उठाने हों तो वह उठा सकती है।

इतना ही नहीं संविधान के अनुच्देद 256 में यह उल्लेखित है कि केंद्र सरकार के द्वारा बनाए गए कानूनों का पालन राज्य सरकारों को सुनिश्चित करना होगा एवं केंद्र को यह अधिकार दिया गया है कि वह राज्य सरकारों को इस तरह के बनाए गए कानूनों का पालन सुनिश्चित करने के लिए निर्देश जारी करे। संविधान के अनुच्छेद 257 (1) में यह व्यवस्था दी गई है कि राज्य सरकार के द्वारा केंद्र के नियमों का पालन इस तरह सुनिश्चित किया जाएगा कि इस तरह के कानून का पालन करने में किसी को बाधा उतपन्न न हो।

जिन देशों में संघीय ढांचे हैं वहां इस तरह के गतिरोध जब चाहे तब सामने आते रहे हैं। केंद्रीय नियमों के पालन की अनदेखी के कारण दुनिया के चौधरी अमरीका और कनाड़ा में अनेक बार विषम परिस्थितयां निर्मित हो चुकी हैं। भारत में इस तरह के मामलो की संख्या बहुत ही कम है। देश में इस तरह के मामले उंगलियों में गिने जा सकते हैं। पश्चिम बंगाल में ज्योति बसु सरकार और केरल में एक बार केंद्रीय बलों की तैनाती के बाद कोई बड़ा उदहारण देश में शायद ही मिल पाए।

एनआरसी, एनपीआर और नागरिकता संशोधन अधिनियम को लेकर केंद्र और कुछ राज्यों में जिस तरह की रार चल रही है उसके पीछे संवादहीनता ही प्रमुख रूप से जिम्मेदार मानी जा सकती है। इस तरह की स्थितियों को बातचीत के रास्ते से आसानी से आपसी सहमति बनाते हुए हल किया जा सकता है। अड़ियल रवैए से घर, किसी संस्थान को नहीं चलाया जा सकता है तो देश या प्रदेश चलाने की बात तो बहुत ही दूर है।

पश्चिम बंगाल में राज्यपाल और छात्रों के बीच हुए कथित विवाद किसी भी दृष्टिकोण से उचित नहीं माना जा सकता है। हर राज्य का अपना खुफिया तंत्र होता है। अगर विश्वविद्यालय में असंतोष का लावा खौल रहा था तो खुफिया तंत्र ने इसकी जानकारी सरकार को देकर पर्याप्त संख्या में पुलिस बल की व्यवस्था क्यों नहीं की! देखा जाए तो राज्यपाल देश के राष्ट्रपति के प्रतिनिधि के रूप मे काम करता है। इस तरह की स्थिति से क्या संदेश गया होगा!इस तरह की परिस्थितियों को बातचीत के सहारे हल करने के प्रयास होते नहीं दिख रहे हैं, जो गंभीर व विचारणीय माना जा सकता है। केंद्र सरकार को चाहिए कि इस तरह की स्थिति के शांतिपूर्ण एवं सभी की सहमति के जरिए समाधान निकाला जाए। इसके लिए केंद्र सरकार को देश भर के मुख्यमंत्रियों को बुलाकर जिन विषयों पर गतिरोध है उन तमाम विषयों पर खुलकर चर्चा कर इसका स्थायी समाधान निकालने का प्रयास किया जाए, वरना इस तरह के गतिरोधों से उपजे रोष, असंतोष, आक्रोश को आसानी से थामना शायद ही संभव हो!

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