लेखक परिचय

इक़बाल हिंदुस्तानी

इक़बाल हिंदुस्तानी

लेखक 13 वर्षों से हिंदी पाक्षिक पब्लिक ऑब्ज़र्वर का संपादन और प्रकाशन कर रहे हैं। दैनिक बिजनौर टाइम्स ग्रुप में तीन साल संपादन कर चुके हैं। विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में अब तक 1000 से अधिक रचनाओं का प्रकाशन हो चुका है। आकाशवाणी नजीबाबाद पर एक दशक से अधिक अस्थायी कम्पेयर और एनाउंसर रह चुके हैं। रेडियो जर्मनी की हिंदी सेवा में इराक युद्ध पर भारत के युवा पत्रकार के रूप में 15 मिनट के विशेष कार्यक्रम में शामिल हो चुके हैं। प्रदेश के सर्वश्रेष्ठ लेखक के रूप में जानेमाने हिंदी साहित्यकार जैनेन्द्र कुमार जी द्वारा सम्मानित हो चुके हैं। हिंदी ग़ज़लकार के रूप में दुष्यंत त्यागी एवार्ड से सम्मानित किये जा चुके हैं। स्थानीय नगरपालिका और विधानसभा चुनाव में 1991 से मतगणना पूर्व चुनावी सर्वे और संभावित परिणाम सटीक साबित होते रहे हैं। साम्प्रदायिक सद्भाव और एकता के लिये होली मिलन और ईद मिलन का 1992 से संयोजन और सफल संचालन कर रहे हैं। मोबाइल न. 09412117990

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इक़बाल हिंदुस्तानी

0सेकुलर दलों के घोटाले, अराजकता और महंगाई उनको ले डूबेगी!

Rahul Gandhiकांग्रेस के ना चाहते हुए भी 2014 में होने जा रहे आम चुनाव में पीएम पद का मुकाबला नरेंद्र मोदी बनाम राहुल गांधी हो चुका है। इसके साथ ही सेकुलर कहे जाने वाले अनेक दलों और लोगों की चाहत के खिलाफ मोदी का ग्राफ दिन ब दिन ना केवल राहुल और उनकी कांग्रेस से कहीं ऊंचा जा रहा है बल्कि उनकी विशाल सभाओं और जानी मानी गायिका लता मंगेशकर व रेटिंग एजेंसी गोल्डमैन सैक्श जैसे लोगों व संस्थाओं के उनके पक्ष में आये समर्थन से उत्तर भारत और हिंदी भाषी राज्यों में विशेषरूप से हवा का रूख़ पता लग रहा है। उधर मोदी को फूटी आंख ना देखने वाले अल्पसंख्यक समाज के दो मौलानाओें महमूद मदनी और कल्बे सादिक के बयान सीधे ना सही लेकिन कांग्रेस सहित सेकुलर दलों से नाराज़गी और भाजपा के मुस्लिम विरोधी एजेंडा छोड़कर सबका विकास करने के वादे से हालात यूपीए के खिलाफ और भाजपा के पक्ष में होते नज़र आ रहे हैं।

हालांकि शुरू में जब बिहार के सीएम नीतीश कुमार जैसे राजनेताओं ने मोदी को भाजपा की तरफ से पीएम पद का प्रत्याशी बनाने का जमकर विरोध किया था तो ऐसा लगता था कि खुद भाजपा में इस फैसले के विरोध में इतना बवाल मचेगा कि आडवाणी ही पीएम पद के प्रत्याशी हो सकते हैं लेकिन समय के साथ साथ आरएसएस की यह सोच सही साबित होती नज़र आ रही है कि मोदी ही भाजपा हैं। आज मोदी की वजह से भाजपा का जनाधर दिन ब दिन बढ़ रहा है। उनकी विशाल सभाओं में जो जनसैलाब उमढ़ रहा है वह भाजपा और संघ परिवार का समर्थक हो या ना हो लेकिन वह राहुल और मनमोहन के मुकाबले मोदी से इतनी उम्मीदें बांध चुका है कि मोदी अगर किसी चमत्कार से सत्ता में आ भी जायें तो वर्तमान आर्थिक नीतियांे और बिना व्यवस्था आमूलचूल बदले शायद ही कुछ ठोस बदलाव कर पायें, जिससे जनता की अपेक्षाओं पर खरा उतरा जा सके।

यूपीए और कांग्रेस को यह समझ में नहीं आ रहा कि वह गुजरात के मुख्यमंत्राी की राज्य में जीत की हैट्रिक, गुजरात का कथित विकास मॉडल और बोलने का इतना प्रभावशाली लहजा कहां से लायें? मोदी ने अपने भाषणों में राममंदिर हिंदुत्व और मुस्लिम विरोधी बातों से पूरी तरह किनारा करके हिंदुओं के उस बहुत बड़े वर्ग को विकास का सपना दिखाकर जोड़ने में कामयाबी हासिल करने का प्रयास किया है जो अब तक भाजपा की दंगों साम्प्रदायिक और हिंदू मुस्लिम अलगाव की राजनीति से दूरी रखता था। मोदी ने विकास सबका तुष्टिकरण किसी का नहीं नारा देकर गुजरात के मुसलमानों की सम्पन्नता का हज जाने के लिये राज्य के 6000 कोटे की जगह 40 हज़ार दरख़्वास्तें आने का उदाहरण देकर बिहार में 7500 के कोटे के बदले मात्र 6500 आवेदन आने का सटीक तर्क इस्तेमाल किया है।

ऐसे ही उन्होंने गुजरात पुलिस में मुसलमानों को उनकी आबादी 9 प्रतिशत होने के बाद भी लगभग 10 फीसदी कोटा दिये जाने का अकाट्य आंकड़ा प्रस्तुत कर कांग्रेस, सपा और जनतादल यूनाइटेड के मुस्लिम मसीहा होने के दावे को चुनौती दी है। हालांकि राहुल कांग्रेस के नीतिकारों और रणनीतिज्ञों द्वारा लिखकर दिये गये भाषणों और अपने गुस्से वाले हावभाव से कभी कभी मोदी को उनकी ही शैली में जवाब देने का असफल प्रयास करते हैं लेकिन मीडिया से लेकर जनता में कांग्रेस के वंशवाद, भ्रष्टाचार और महंगाई के प्रति आक्रोश और घृणा इतनी अधिक बढ़ चुकी है कि वे समर्थन हासिल करने की बजाये हंसी और उपेक्षा का पात्र बनकर रह जाते हैं।

संयोग देखिये कि मनमोहन सरकार अपने दूसरे कार्यकाल में अपने कारनामों से इतनी बदनाम, अलोकप्रिय और बेलगाम हो चुकी है कि उसको राहुल के नेतृत्व में भी जनता तीसरा अवसर देने के लिये किसी कीमत पर तैयार नहीं है जबकि राहुल के पास किसी राज्य का या केंद्र का शासन चलाने का कोई अनुभव या सराहनीय रिकॉर्ड भी नहीं है। अन्ना हज़ारे के आंदोलन के दौरान अगर राहुल पहल करके आगे आते और दागियों की सदस्यता वाले विधेयक की तरह बगावती तेवर दिखाकर जनलोकपाल पास कराने की अपनी सरकार को हिदायत देते तो उनकी छवि कुछ अलग और उम्मीद जगाने वाले युवा की बन सकती थी लेकिन आज राहुल की छवि यूपीए कांग्रेस और अयोग्य वंशवादी से अलग कुछ भी नहीं है।

जानकारों का यह सवाल भी सही है कि राहुल और सोनिया गांधी मनमोहन सरकार में किंगमेकर की स्थिति में रहे हैं लिहाज़ा वह जो चाहते हैं सरकार वही करती है तो इससे अलग वह पीएम बनकर और क्या कर सकते हैं? राहुल को कांग्रेस और यूपीए की वर्तमान किसी नीति से कोई नाराज़गी या विरोध नहीं है, ऐसे में लोग उनकी कांग्रेस को एक बार फिर मनमानी, भ्रष्टाचार और महंगाई बढ़ाने का लाइसेंस पांच साल के लिये देकर अपने हाथों अपने पैरों पर कुल्हाड़ी क्यों मारना चाहेगी? जहां तक मोदी का सवाल है वह सेकुलर दलों के नेताओं द्वारा खुद को चाय बेचने वाला बताये जाने पर भी नहीं चिढ़ते और पलट वार करते हुए कहते हैं कि देश बेचने वालों से चाय बेचने वाला पीएम बनेगा तो बेहतर ही साबित होगा।

वह देवालय बाद में शौचालय पहले जैसा बयान देकर भी एक संकेत दे चुके हैं कि अब बड़ी ज़िम्मेदारी सामने आने पर उनकी सोच में बड़ा बदलाव भी आ सकता है। मोदी ने यूपी के उन्नाव में एक संत के सपने के आधार पर 1000 टन सोने की खुदाई के लिये यूपीए सरकार की एएसआई द्वारा बिना किसी ठोस आधार के खुदाई शुरू कराने पर सरकार की देश दुनिया में जगहंसाई का बयान देने का साहस दिखाया था यह अलग बात है कि संतों की नाराज़गी से बचने के लिये उनको सोने का सपना देखने वाले संत को प्रणाम करना पड़ा लेकिन आज मोदी की बात सही साबित होती नज़र आ रही है। 2002 के बाद गुजरात में कोई बड़ा दंगा नहीं हुआ और ना ही मुस्लिमों का कोई फर्जी एनकाउंटर पुलिस ने किया है, अगर मोदी निष्पक्ष सुशासन का भरोसा दिला सकें तो राहुल के मुकाबले मोदी के लिये तो यही कहा जा सकता है-

0सिर्फ़ एक क़दम उठा था ग़लत राहे शौक़ में,

मंज़िल तमाम उम्र मुझे बस ढूंढती रही।।

4 Responses to “कांग्रेस के ना चाहते हुए भी राहुल पर भारी पड़ रहे हैं मोदी?”

  1. डॉ. मधुसूदन

    डॉ.मधुसूदन

    इकबाल भाई आप ने धारा प्रवाह शैली में बहुत कुछ सच्चाई लिख दी।
    जो, एक लेखक की “व्यावसायिक प्रामाणिकता”(प्रोफेशनल इंटिग्रिटी) का परिचय है।
    ==>हर घन(क्यूब) को छः दिशाएं होती है|
    इसी लिये षट्‍दर्शन बताया जाता है।
    ==>प्रत्येक कोण का अपना अपना योगदान होता है।
    और कोई भी एक कोण सच्चाई नहीं बता सकता।
    सभी का जोड, शायद सम्यक दृष्टि प्रदान कर पायें।
    ===>आप के लिए पहले भी आदर ही था, जो आज भी अबाधित है|
    अपना स्वतंत्र अलग/विरोधी मत (दर्शन)भी, रखते रहिए|
    इसीसे हमारी सफल हो सकने की संभावनाएं बढ जाती है।
    प्रवक्ता का भी यही उदेश्य मैं, मानता हूँ।

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  2. mahendra gupta

    कुछ तो मोदी भरी थे ही, कुछ कांग्रेस ने बना दिया. असल में राहुल अभी इतने परिपक्व राजनीतिज्ञ नहीं है जो पी ऍम पद का बोझ संभल सके. राहुल ने कभी यह नहीं बताया कि राजनितिक जीवन में नेहरू खान दान के वारिस होने के अलावा उनकी क्या उपलब्धि है.न ही अपना कोई विजन वे प्रस्तुत कर सके हैं. वे आज भी खाद्य सुरक्षा के फ़ैल हुए कारतूस को चला रहें हैं. हालाँकि मोदी भी अभी कोई बड़ा व स्पष्ट विजन नहीं दे सके हैं पर गुजरात का विकास उनके लिए एक आधार तो है ही. और यह भी बताता है कि उनकी क्या क्षमताएं है.शायद राहुल के भाषण लिखने वाले भी इस बात का अंदाज नहीं लगा सके हैं या राहुल उस लिखे को बोलते नहीं है, वास्तव में यु पी ऐ कि दुसरे कार्य कल की नकारात्मक उपलब्धियों ने उसे कहीं का नहीं छोड़ा है, और पहले कार्य काल को भो धुन्धला कर दिया है.और इसलिए मोदी हावी हैं, जो उनकी सभाओं में आ रही भीड़ से दिख रहा है और राहुल की डेल्ही वाली सभा से कांग्रेस का खोखला पैन भी लगता है कांग्रेस अभी से बेक फुट पर जाने लगी है.

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  3. Anil Gupta

    आज़ादी के बाद पिछले छियासठ वर्षों में सेकुलरवादियों ने अंग्रेज़ों की ‘फूट डालो और राज़ करो’ या ‘भारतीयों की फूट का लाभ उठाकर राज़ करो’ नीति को अपना कर कभी भी देश के लोगों को केवल भारतीय या हिंदुस्तानी नहीं बनने दिया.और वोट बैंक की राजनीती के चलते विभिन्न समुदायों में झगडे कराकर और फूट डाल कर येन केन प्रकारेण सत्ता कब्जाए रखने का षड्यंत्र किया गया.आज़ादी के बाद जो मुसलमान खंडित हिंदुस्तान में रह गए थे उन्हें इन सेकुलरवादियों की वोट बैंक राजनीती के कारण और प्रगतिशील नेतृत्व की कमी के चलते विकास का उतना अवसर नहीं मिला जितना मिल सकता था.इसके साथ ही वोट बैंक प्रतिस्पर्धा के चलते समाज को हिन्दू और मुस्लिम के खेमों में बाँट दिया गया.वो कभी भी केवल भारतीय या हिंदुस्तानी नहीं बन पाये.अयोध्या के ढांचे गिरने को छोड़ दें तो २००२ को छोड़कर आज तक जहाँ भी भाजपा की सरकारें बनी वहाँ कोई हिन्दू मुस्लिम दंगे नहीं हुए.२००२ में भी अगर गोधरा में ५९ कारसेवकों से भरी रेल की बोगी न जलायी गयी होती तो प्रतिक्रिया में दंगे न होते.फिर भी उन दंगों में ग्यारह सौ में से चार सौ से अधिक हिन्दू मारे गए जिनमे से अधिकांश पुलिस और सुरक्षा बलों की गोलियों से मरे.जबकि १९६९ में महात्मा गांधी जन्म शताब्दी वर्ष में कांग्रेस के शासन में हुए दंगों में पंद्रह हज़ार से ज्यादा लोग मारे गए और किसी के विरुद्ध कोई कार्यवाही नहीं हुई.आज़ादी के बाद देश के विभिन्न क्षेत्रों में २०००० दंगे हुए हैं. जिनमे से भाजपा के शासन में गुजरात में केवल एक दंगा हुआ है.शेष सभी दंगे इन सेकुलरवादियों के शासन में ही हुए हैं.
    इस देश में हिन्दू मुस्लिम भाईचारे और शांति की गारंटी हिन्दू मुस्लिमों के बीच आपसी समझ ही हो सकती है.अतः हिन्दू और मुस्लिम नेताओं को आपस में समझ विकसित करने के लिए अपने अपने पूर्वाग्रहों को एक तरफ रखकर खुले दिल से साफ़ साफ़ बात करनी चाहिए. और देश को मजबूत बनाने और सब के विकास के लिए मिलकर साथ चलने का मन बनायें.एक दुसरे की कमियों को दोहराते रहने से कोई लाभ नहीं होगा.सत्तर के दशक में एम् एस सथ्यू की फ़िल्म ‘गर्म हवा’ में एक शेयर था जो दोहराना चाहूंगा:
    साहिल से जो करते हैं मौज़ों का नज़ारा,उनके लिए तूफ़ान यहाँ भी हैं वहाँ भी हैं.
    मिल जाओगे धारा में तो बन जाओगे धारा, ये वक़्त का ऐलान है जो यहाँ भी वहाँ भी है.

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  4. DR.S.H.SHARMA

    The congress is anti India and is in deep mud because of scams and scandals, nepotism, protecting the anti national elements, tainted MPS, MLAS and officers, weakness to deal with infiltrators from Pakistan, Bangladesh, Nepal, Burma, Sri Lanka, Afghanistan and many illegal travellers living in India from Europe and all over the world, poor record on law and order and sacrificing the 125 Karore Indians for good for nothing SHAHZADA. This shahzada would not get a job of a peon and for him Sonia is sacrificing the fate of the whole nation. Time has come for congress to go , go and go to hell.

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