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    दूध की सूखती धार

    डॉ. शंकर सुवन सिंह

    दूध पौष्टिकता का प्रतीक है। दूध देवताओं को प्रिय है। दूध अमृत है। दूध शाकाहारियों के लिए प्राथमिक प्रोटीन का स्रोत है। दूध विटामिन डी का एक दुर्लभ खाद्य स्रोत भी है। पुराणों में दूध की तुलना अमृत से की गई हैं, जो शरीर को स्वस्थ और मजबूत बनाने के साथ-साथ कई सारी बीमारियों से बचाता है। अथर्ववेद में लिखा है कि दूध एक सम्पूर्ण भोज्य पदार्थ है। इसमें मनुष्य शरीर के लिए आवश्यक वे सभी तत्व हैं जिनकी हमारे शरीर को आवश्यकता होती है। दूध की शुद्धता अच्छे स्वास्थ्य की निशानी है। विश्व में भारत दुग्ध उत्पादन में अग्रणी देश है। भारत को सदियों से दूध दही का देश कहा जाता रहा है। पंजाब और हरियाणा दुग्ध उत्पादन में हमेशा आगे रहे हैं। एक प्रचलित कहावत है कि जहां दूध दही का खाना वो है हमारा हरियाणा। अब खपत को पूरा करने के लिए इसी दूध में जहर को घोला जा रहा है। मिलावटी दूध हमारे स्वास्थ्य और जीवन को नरक में धकेल रहा है। दूध में मिलावट का सबसे बड़ा कारण देश में दूध की धार का सूखना है। देश में सबसे ज्यादा डेयरियां हैं फिर भी अब दूध की कमी है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार वित्तीय वर्ष 2020-21 में उत्तर प्रदेश के प्रयागराज जनपद में कुल 671.919 टन दुग्ध का उत्पादन हुआ था। उत्तर प्रदेश के प्रयागराज शहर में वर्ष 2022 में दूध का अनुमानित उत्पादन 800 टन ( 7 लाख 76 हज़ार 699 लीटर) के आस पास है। वर्ष 2022 में प्रयागराज की अनुमानित जनसँख्या लगभग 69 लाख है। जबकि दूध की प्रतिव्यक्ति खपत लगभग 500 मिलीलीटर है। कहने का तात्पर्य 7 लाख लीटर दूध 14 लाख की जनसंख्या की खपत को ही पूरा कर सकता है न की 69 लाख की जनसँख्या की खपत को पूरा करेगा। प्रयागराज शहर में दुग्ध उत्पादन से खपत 5 गुना ज्यादा है। ये खपत कैसे पूरी हो रही है इसकी जांच होनी चाहिए। जाहिर है कि ये खपत दूध की धार में सफ़ेद जहर मिलाकर पूरी की जा रही है। भारत में दूध का उत्पादन 20 करोड़ लीटर लेकिन खपत 70 करोड़ लीटर है। इससे साबित होता है की दूध में मिलावट बड़े पैमाने पर हो रही है। देश में मिलावटी दूध से खपत को पूरा किया जा रहा है। दक्षिणी राज्यों के मुकाबले उत्तरी राज्यों में दूध में मिलावट के ज्यादा मामले सामने आए हैं। हद तो तब हो गई जब भारतीय खाद्य संरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफ एस एस ए आई) ने दुग्ध उद्योगों को मेलामाइन मिलाने की अनुमति दे दी।  जिसके अनुसार सूखे दूध का इन्फेंट फार्मूला (शिशु दूध) बनाने वाली कोई भी कंपनी 1 किलोग्राम सूखे दूध में 1 मिली ग्राम मेलामाइन मिला सकती है। लिक्विड इन्फेंट फार्मूला जैसे कि लिक्विड मिल्क (तरल दूध) में यह 0.15 मिली ग्राम/ लीटर और अन्य खाद्य पदार्थो में 2.5 मिली ग्राम/किलोग्राम के हिसाब से मेलामाइन नाम का जहर मिलाने की खुली छूट है। मेलामाइन एक कार्बन आधारित रसायन होता है, जिसे दूध और डेयरी उत्पादों में मिलावट करने के लिये प्रयोग किया जाता है। उल्लेखनीय है कि दूध और डेयरी उत्पादों में मेलामाइन की मिलावट करने से गुर्दे संबंधी बीमारियाँ हो सकती हैं और गुर्दा पूर्णतः खराब भी हो सकता है। कई बार दूध के व्यापारी दूध की मात्रा को बढ़ाने के उद्देश्य से उसमें पानी मिला देते हैं, जिससे दूध में प्रोटीन की मात्रा काफी कम हो जाती है। इस प्रोटीन की मात्रा को संतुलित करने के लिये दूध व्यापारियों द्वारा दूध में मेलामाइन मिलाया जाता है। व्यापक तौर पर मेलामाइन का प्रयोग प्लास्टिक, गोंद, काउंटरटॉप्स और व्हाइटबोर्ड आदि बनाने के लिये किया किया जाता है। अभी हाल की घटना है एक व्यक्ति ने अमूल के पैकेट वाले दूध को उबालने के बाद प्लास्टिक के रूप में मलाई को पाया। ये मेलामाइन ही है। केंद्र सरकार को मेलामाइन पर पूर्णतः प्रतिबन्ध लगा देना चाहिए। अतएव हम कह सकते हैं कि दूध अब जहर बनता जा रहा है। लोग भौतिकता में इतना बह गए हैं कि अमृत को भी जहर बना डाला है। दूध में मिलावट को लेकर कुछ साल पहले देश में एक सर्वे हुआ था। इसमें पाया गया कि दूध को पैक करते वक्त सफाई और स्वच्छता दोनों से खिलवाड़ किया जाता है। दूध में डिटर्जेंट की सीधे तौर पर मिलावट पाई गई। यह मिलावट सीधे तौर पर लोगों की सेहत के लिए खतरा साबित हुई। इसके चलते उपभोक्ताओं के शारीरिक अंग काम करना बंद कर सकते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने दूध में मिलावट के खिलाफ भारत सरकार के लिए एडवायजरी जारी की थी और कहा था कि अगर दूध और दूध से बने प्रोडक्ट में मिलावट पर लगाम नहीं लगाई गई तो देश की करीब 87 फीसदी आबादी 2025 तक कैंसर जैसी खतरनाक और जानलेवा बीमारी का शिकार हो सकती है। हमे यह नहीं भूलना चाहिए कि राष्ट्र के समुदाय का स्वास्थ्य ही उसकी संपत्ति है। अतएव राष्ट्रीय दुग्ध दिवस पर भारत को दूध में होने वाले मिलावट के बारे में सोचना होगा और इससे उबरने के लिए भारत सरकार को ठोस रणनीति बनाने की जरुरत है। अब वो दिन दूर नहीं जब लोगो को वेगन मिल्क पर ही निर्भर होना पड़ेगा। पशुओं से प्राप्त होने वाले दूध के अलावा हर प्रकार का दूध वेगन मिल्क की श्रेणी मे आता है। पश्चिमी देशों में इसका चलन जोरों पर है। अब भारत मे भी इसका प्रचलन बढ़ता जा रहा है। वेगन दूध को पारंपरिक डेयरी प्रोडक्ट के विकल्प के तौर पर देखा जाने लगा है। सामान्यतः दूध की आपूर्ति गाय और अन्य पशुओं से की जाती है पर वेगन मिल्क को पौधों और अन्य वस्तुओं से तैयार किया जाता है। जैसे सोया मिल्क (सोया का दूध), ओट मिल्क (जई का दूध), बादाम मिल्क (बादाम का दूध), काजू मिल्क (काजू का दूध), राइस मिल्क (चावल का दूध), कोकोनट मिल्क (गरी का दूध) इत्यादि। यदि अमृत में जहर घोला जाता रहेगा तो अमृत रूपी पारम्परिक दूध के विलुप्त होने में समय नहीं लगेगा। एक पुरानी कहावत है कि हम जीने के लिए खाते हैं न कि खाने के लिए जीते हैं। आप खाने के लिए जीवित मत रहिये। जीवित रहने के लिए खाइये। जीवित रहने के लिए आपको शुद्ध भोजन पर निर्भर रहना पड़ेगा न की जहर पर। कहने का तात्पर्य है कि जब हम जीने के लिए खाते हैं तो अच्छा और कम खाते हैं और जब हम खाने के लिए जीवित रहते हैं तो ख़राब और ज्यादा खाते हैं। कहा भी गया है अति सर्वत्र वर्जते। किसी भी चीज की अधिकता बुरी होती है। अतएव थोड़ा खाएं पर अच्छा खाएं। दूध थोड़ा ही पीयें पर अच्छा पीयें। ज्यादा के चक्कर में जहर न पीयें।

    डॉ शंकर सुवन सिंह
    डॉ शंकर सुवन सिंह
    वरिष्ठ स्तम्भकार एवं विचारक , असिस्टेंट प्रोफेसर , सैम हिग्गिनबॉटम यूनिवर्सिटी ऑफ़ एग्रीकल्चर टेक्नोलॉजी एंड साइंसेज (शुएट्स) ,नैनी , प्रयागराज ,उत्तर प्रदेश

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