लेखक परिचय

लिमटी खरे

लिमटी खरे

हमने मध्य प्रदेश के सिवनी जैसे छोटे जिले से निकलकर न जाने कितने शहरो की खाक छानने के बाद दिल्ली जैसे समंदर में गोते लगाने आरंभ किए हैं। हमने पत्रकारिता 1983 से आरंभ की, न जाने कितने पड़ाव देखने के उपरांत आज दिल्ली को अपना बसेरा बनाए हुए हैं। देश भर के न जाने कितने अखबारों, पत्रिकाओं, राजनेताओं की नौकरी करने के बाद अब फ्री लांसर पत्रकार के तौर पर जीवन यापन कर रहे हैं। हमारा अब तक का जीवन यायावर की भांति ही बीता है। पत्रकारिता को हमने पेशा बनाया है, किन्तु वर्तमान समय में पत्रकारिता के हालात पर रोना ही आता है। आज पत्रकारिता सेठ साहूकारों की लौंडी बनकर रह गई है। हमें इसे मुक्त कराना ही होगा, वरना आजाद हिन्दुस्तान में प्रजातंत्र का यह चौथा स्तंभ धराशायी होने में वक्त नहीं लगेगा. . . .

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-लिमटी खरे

नई दिल्ली 16 जून। इतिहास इस बात का साक्षी है कि जब भी किसी सेना की हार होती है, उसकी जवाबदेही उसके सेनापति पर ही आयत होती है। सेनापति से ही हर सैनिक हार की जिम्मेदारी लेने की उम्मीद रखता है। माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी में भी इन दिनों कुछ इसी तरह के समीकरण बनते दिख रहे हैं। बार बार मुंह की खाने के बाद अब माकपा में हार के लिए जवाबदार सेनापति प्रकाश करात के खिलाफ रोष और असंतोष के स्वर मुखर होने लगे हैं। 1964 में अस्तित्व में आई माकपा से छन छन कर बाहर आ रही खबरों पर अगर यकीन किया जाए तो पोलित ब्यूरो के सदस्य सीताराम येचुरी द्वारा करात की जडों में मट्ठा डालने की कवायद की जा रही है।

लोकसभा चुनावों में बुरी तरह मार खाने के बाद माकपा के अंदर असंतोष के बादल घुमडने लगे थे। उसके उपरांत वाम दलों के गढ रहे पश्चिम बंगाल में जिस तरह का चमत्कारिक परफारमेंस त्रणमूल कांग्रेस ने दिखाया है, उसने रही सही कसर पूरी कर दी है। माकपा की हालत देखकर यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि माकपा में इस बारिश में रोष और असंतोष के बादल फट सकते हैं, और उससे आने वाले सैलाब में माकपा के सबसे शक्तिशाली और कट्टरवादी समझे जाने वाले महासचिव प्रकाश करात इसमें बह सकते हैं।

लोकसभा में औंधे मुंह गिरने के उपरांत पश्चिम बंगाल के स्थानीय निकाय चुनावों के नतीजों से माकपा बुरी तरह आहत है। माकपा के एक वरिष्ठ नेता ने नाम गुप्त रखने की शर्त पर बताया कि वैसे तो पश्चिम बंगाल में माकपा का खासा रसूख है, पर प्रकाश करात की हिटलरशाही के कारण पार्टी ने अपना आधार खो दिया है। उन्होंने बताया कि हाल ही में दिल्ली में हुई पार्टी की पोलित ब्यूरो की बैठक में इस बारे में गंभीर विचार विमर्श किया गया। मकपा की नीति निर्धारित करने वाली संस्था ”पार्टी कांग्रेस” ने आरोप लगाया है कि प्रकाश करात ने पार्टी की निर्धारित लाईन से अलग हटकर अपनी मनमानी चलाकर पार्टी को रसातल में आने पर मजबूर कर दिया है। पोलित ब्यूरो ने इस मामले को काफी गंभीरता से लिया है।

जानकारों का कहना है कि प्रकाश करात की खिलाफत को पोलित ब्यूरो के सदस्य सीताराम येचुरी हवा दे रहे हैं। वैसे भी मकपा में 36 साल के इतिहास में यह पहली बार हुआ है कि किसी महासचिव पर इतने संगीन आरोप लगे हों। यही कारण है कि अब तक इस तरह के आरोपों पर विचार के लिए केंद्रीय समिति की बैठक आहूत करने की आवश्यक्ता कभी नहीं पडी। इसमें केंद्रीय समिति के 85 सदस्यों के अलावा अन्य सूबों के 275 सदस्य शामिल होते हैं।

माकपा के सूत्रों का कहना है कि प्रकाश करात की सबसे बडी समस्या यह हो सकती है कि पश्चिम बंगाल की पार्टी की स्थानीय इकाई पहले से ही करात के खिलाफत में झंडा उठाए है। वर्तमान में करात के लिए यह संतोष की बात है कि माकपा की पश्चिम बंगाल इकाई मौन साधे हुए है। कहा जा रहा है कि माकपा की पश्चिम बंगाल इकाई और पोलित ब्यूरो के सदस्य सीताराम येचुरी दोनों ही माकूल वक्त का इंतजार कर रहे हैं।

One Response to “बार-बार मुंह की खाने के बाद माकपा में भूकंप की आहट”

  1. श्रीराम तिवारी

    shriram tiwari

    अपनी स्थापना से लेकर अब तक {१९६४-२०१०}माकपा ने लगातार भारतीय जन मानस के शोषित पीड़ितों की जंग लड़ी है ;अब भी लड़ रही है .भारत ही नहीं विश्व कि लगभग २०० कमुनिस्ट पार्टियाँ एक स्वर से माकपा की नीतियों को सत्यापित कर चुकी हैं .सोवियत पराभव के तत्काल बाद से अब तक देशी विदेशी सरमायेदार बड़ी हसरत भरी निगाहों से माकपा का पतन देखना चाहते हैं .पर उनको निराशा ही हाथ आएगी .क्यूंकि बंगाल केरल तथा त्रिपुरा की तीनो सरकारें भी चली जाएँ तो भी माकपा की सर्व्हारापरस्त नीतियों में कोई खाश अंतर नहीं आने बाला .अलबत्ता संसदीय लोकतंत्रात्मक VYVSHTHA पर ?लग सकता है और तब देश में हिंसा वादियों का कोई बोलबाला होगा .माकपा का पराभव देखने की लालसा बालों को नेक सलाह है की जिस देश में जतिबदियों .नक्सल्बदियों पुन्जीबदियों सम्प्र्दय्बदियों की विचारधारा को कोई खतरा नहीं उस महान लोकतान्त्रिक देश में मेहनतकश मजदूरों गरीबों कमजोर किसानो तथा हक़ के लिए संघर्स्ग शील नवजवानों की पार्टी माकपा का कोई कुछ नहींबिगाड़ सकता .रहा प्रश्न बंगाल में संभावित का तो अव्वल तो हालत नियंत्रण में हैं .फिर भी यदि ३५ साल में एक बार बिपक्ष में बैठना भी पड़े तो क्या यह भूकंप के मानीं उल्लेखित किया जाना उचित होगा ?

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