लेखक परिचय

संजय द्विवेदी

संजय द्विवेदी

लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विवि, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष हैं। संपर्कः अध्यक्ष, जनसंचार विभाग, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, प्रेस काम्पलेक्स, एमपी नगर, भोपाल (मप्र) मोबाइलः 098935-98888

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अंग्रेजी के भाषाई साम्राज्यवाद के विरूद्ध संघर्ष की जरूरत

भोपाल, 23 जनवरी, 2010। भोपाल के संभागायुक्त और चिंतक मनोज श्रीवास्तव का कहना है कि मातृभाषाओं की कीमत पर कोई भी भाषा स्वीकारी नहीं जानी चाहिए। दुनिया के तमाम देश अपनी भाषाओं के संरक्षण के लिए काम कर रहे हैं और अंग्रेजी के भाषाई साम्राज्यवाद के खिलाफ कानून बनाने जैसे कदम उठा रहे हैं। हमें भी अपनी भाषाओं के सम्मान और संरक्षण के लिए आगे आना होगा।

वे माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय तथा शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित भारतीय भाषाओं में अंतरसंवाद विषय पर आयोजित समारोह को संबोधित कर रहे थे। कार्यक्रम के मुख्यअतिथि की आसंदी से अपने विचार व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा कि भारतीय के भाषाई वैविध्य को एक कौतुक की तरह देखा जा रहा है और उसे एक राष्ट्र के बजाए उपमहाद्वीप की संज्ञा दी जा रही है। क्या भाषाओं की अधिकता से कोई राष्ट्र, राष्ट्र नहीं रह जाता। उन्होंने कहा कि हिंदी सहअस्तित्व की भाषा है, उसके साथ ही भारतीय भाषाओं का भविष्य जुड़ा हुआ है। भारतीय भाषा परिवार की सारी भाषाएं मिलकर इस देश को सम्पन्न करती हैं। कार्यक्रम का शुभारंभ माँ सरस्वती व कवि पत्रकार माखनलालजी की प्रतिमा पर दीप प्रज्जवलन कर किया गया । इस अवसर पर शारदा विहार स्कूल के बच्चों ने आचार्य अवध किशोर के निर्देशन में सरस्वती वंदना व गीत प्रस्तुत किए।

शुभारंभ सत्र की अध्यक्षता कर रहे विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. बृजकिशोर कुठियाला ने कहा कि विदेशी भाषा के माध्यम से हम पर एक सांस्कृतिक आक्रमण हो रहा है। जिसका नकारात्मक असर समाज जीवन के हर क्षेत्र में दिखने लगा है। कोई भी हमला तभी सफल होता है जब हम कमजोर हों। इसलिए हमें अपने अंदर झांकना होगा। देश में अंग्रेजियत का एक उन्माद सा चल रहा है, जिसमें यूं लगने लगा है कि पश्चिम की हर चीज हमसे बेहतर है। सभी भारतीय भाषाएं एक होकर ही इस जंग को जीत सकती हैं। वरना यह संकट हमें कहीं नहीं छोड़ेगा।

शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास के प्रमुख अतुल कोठारी ने कहा कि आजादी के छः दशकों के बाद हमें अपनी भाषाओं के सम्मान के लिए लड़ना पड़ रहा है, यह कितने दुख की बात है। देश में यह वातावरण बनाया जा रहा है कि अंग्रेजी से ही प्रगति हो सकती है, जबकि यह सबसे बड़ा झूठ है। हमें अपनी भाषाओं का सम्मान बचाने के लिए स्वाभिमान जगाने की जरूरत है। इस मौके पर आचार्य दुग्गिराला विश्वेश्वरम द्वारा लिखित पुस्तक हमारी मातृभाषाएं का विमोचन भी किया गया।

कार्यक्रम के द्वितीय सत्र में लगभग 20 राज्यों से आने भाषा आंदोलन से जुड़े साथियों ने अपने क्षेत्र में चल रहे कामों की जानकारी दी। इस सत्र के प्रमुख वक्ताओं में सर्वश्री उमाशंकर मिश्र, गोविंद प्रसाद, निर्मला नायक और विधान रेड्डी रहे। तीसरे सत्र में हिंदी और भारतीय भाषाओं के प्रयोग को लेकर एक घोषणा पत्र पारित किया गया। जिसमें हिंदी के प्रयोग को बढ़ाने के लिए तमाम मांगें और सुझाव शामिल हैं। इसके साथ ही जनसंचार को संघ लोकसेवा आयोग और राज्य लोकसेवा आयोगों की परीक्षाओं में एक विषय के रूप में शामिल करने का प्रस्ताव भी पारित किया गया। इस आयोजन में प्रख्यात शिक्षाविद दीनानाथ बत्रा, डा. विजयबहादुर सिंह, डा.अमरनाथ (कोलकाता), वीपी पाण्डेय,हर्षदभाई शाह, केसी रेड्डी, जुगुलकिशोर, डा. महेशचंद्र शर्मा, डा. शाहिद अली, राघवेंद्र सिंह, रेक्टर चैतन्य पुरूषोत्तम अग्रवाल, प्रकाशन अधिकारी सौरभ मालवीय, पाक्षिक पत्रिका ‘कमल संदेश’ के कार्यकारी संपादक डॉ. शिवशक्ति सहित विश्वविद्यालय के शिक्षक एवं छात्र उपस्थित रहे। आभार प्रदर्शन जनसंचार विभाग के अध्यक्ष संजय द्विवेदी ने किया।

4 Responses to “भारतीय भाषाओं में अंतरसंवाद”

  1. प्रेम सिल्ही

    मुझे यह लेख पढ़ते एक चुटकुला याद हो आया| अँधेरी रात में जब शराबी मयखाने से निकल अपनी कार के दरवाज़े को खोलने लगा तो उसके हाथ से चाबी गिर गई| कुछ देर बाद गश्त करते सिपाही ने उससे पूछा कि बिजली के खम्बे के नीचे आप क्या ढूंड रहे हैं| शराबी ने कहा कि उसके हाथ से कार की चाबी गिर गई है| उसकी सहायता करने को आगे आये सिपाही ने फिर पूछा कि क्या चाबी यहीं गिरी है तो शराबी ने बताया कि चाबी तो कुछ दूर अँधेरे में खडी उसकी कार के पास गिरी है| सिपाही के पूछने पर कि वह बिजली के खम्बे के नीचे चाबी क्यों ढूंड रहा है, शराबी बोला क्योकि यहाँ रौशनी है|
    मैंने प्रवक्ता.कॉम रूपी बिजली के खम्बे के नीचे एकत्रित हिंदी के शुभचिंतकों को हिंदी भाषा के भारतीय स्वरूप को ढूँडते देखा है| लेकिन आज तो हिंदी भाषा केवल एक भाववाचक, एक काल्पनिक तथ्य है जो समय समय पर अद्भुत घटना के स्वरूप घट जाती है| इसे समझने के लिए तथाकथित स्वतंत्रता के बहुत पहले से और विशेषकर उसके तुरंत पश्चात के समय में अंग्रेजों की कार्यवाहक सरकार के कार्यकलाप अंतर्गत उभरते सामाजिक वातावरण को भली भांति देखना होगा| उस वातावरण में शनै: शनै: खोई हमारी चेतना, हमारा भारतीय दर्शन ज्ञान, हमारी संस्कृति, हमारी व्यक्तिगत और सामजिक नैतिकता के ढेर में यहीं कहीं हिंदी और अन्य प्रांतीय भाषाएँ भी मिलेंगी| वर्षों पहले खेती करते हुए संत सूरदास या कबीर के दोहे मेरे होंठों पर आ जाते थे लेकिन वैश्विक स्पर्धा में पूरी तरह सम्मिलित आज थॉमस बैबिंगटन मैकॉले का भारतीय (स्वतन्त्र भारत में अजमेर स्थित मेयो कालेज की वेबसाईट पर ओरिजिन एंड फाऊंडेशन के अंतर्गत इसका सगर्व उल्लेख है) युवा भारत के ख्यातिप्राप्त विद्यालयों में विद्या प्राप्त कर हर प्रकार से सुसज्जित व्यक्तिगत प्रतिष्ठा और धन कमाने हेतु विदेश जाने को लालायित है| भारत में रह गए आधी अधूरी पाश्चात्य प्रतिभा और भोगवाद में रहते विश्वमोहन तिवारी जी के भूरे बन्दर ने भारतीय भूदृश्य को गरीबी अमीरी का मिश्रित परिहास बना छोड़ा है| भ्रष्टाचार और अनैतिकता से लिप्त भारतीय समाज मानो न घर है न घाट का|
    हमें समाज के प्रत्येक स्तर पर जीवन की सभी गतिविधियों, विद्या, धर्म, शिष्टता, परिवार, आजीविका, उद्योग, शासन, नागरिकता व उसके अंतर्गत अधिकार व कर्तव्य, स्वस्थता, मनोरंजन, इत्यादि को उचित रूप से परिभाषित करने हेतु पीछे सरकती संकोची हिंदी को राष्ट्रभाषा अनुरूप प्रयोग में लाना है| हिंदी साहित्य को रुचिकर बना कर हिंदी भाषा को लोकप्रिय बनाना है| केवल वार्तालाप व साहित्य में हिंदी का प्रयोग प्रयाप्त नहीं है, अत: हिंदी भाषा को जीवन के प्रत्येक पहलू में अपनाते इसे सगर्व राष्ट्रभाषा होने की प्रतिष्ठा देनी होगी| मेरा स्वयं का विचार है कि हिंदी भाषा से अधिक हिंदी भाषीयों के सामाजिक व आर्थिक विकास में प्रयाप्त रूप से उपक्रम होने चाहियें| और यह सच है कि समृद्ध हिंदी भाषी अपने व्यवसाय व उद्योग में केवल हिंदी का प्रयोग कर भाषा को उसका उचित स्थान दिलवा सकता है| अन्यथा शंका बनी रहेगी कि हिंदी केवल गरीबी व लाचारी का प्रतीक बन पिछड़ न जाये|

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  2. himwant

    बात घुमा कर कहना मेरी आदत नही है. लोग मेरी बात समझते नही, इसलिए मै अंततः लिखना बंद कर देता हुं. यह मेरी विवशता है.

    सौ बात की एक बात यह है की भारत की वर्तमान सत्ता अंग्रेजी भाषा की दलाल है. यह हिन्दीभाषी क्षेत्रो मे मातृभाषा को हिन्दी भाषा से भिडाने की रणनीति पर काम कर रही है. लेकिन वह सफल नही होंगे.

    क्योकी हिन्दी जो है सो भोजपुरी की बेटी है. मराठी की बेटी है. राजस्थानी की बेटी है. बंगाली की बेटी है. पंजाबी की बेटी है. अवधी की बेटी है. आदि ईत्यादी. इन सब भाषाओ के अंगो से बनी है हमारी हिन्दी. फिर कोई मां अपनी बेटी से क्यो दुराभाव रखेगी भला. और हिन्दी अपनी माँओं का बुरा क्यो चाहेगी.

    जो भी हो हमे समझना होगा हिन्दी के विरुद्ध दुश्मनो के नापाक ईरादो को…..

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  3. डॉ. मधुसूदन

    डॉ.मधुसूदन उवाच

    हिंदी की अंग्रेज़ी के साथ तुलना कर के दिखाना होगा, कि हिंदी कैसे अधिक सक्षम है।कुछ आकलन आप मेरा हिंदी पर लिखा “हिंदी का भाषा वैभव” पढने पर कर सकते हैं। और इस लेखक के विचारमें यह पूर्णतः संभव ही नहीं, बहुत ही अधिक लाभकारक है।।(१) देवनागरी लिपि संसारमें सर्व श्रेष्ठ(हां भाइयो) है।(२) हिंदी के पास संस्कृत शब्द रचना शास्त्र है।( लॅटीन, ग्रीक से भी कई गुना श्रॆष्ठ) (३) स्पेलिंग रटने की आवश्यकता नहीं। (४) अंग्रेज़ी की अपेक्षा हिंदी २/३ पन्नो में विचार व्यक्त कर सकती है। (५) व्याख्याएं अर्थ वाही होनेसे याद करना सरल। क्या क्या लिखूं, छोटी टिप्पणी में?—–ऐसे अनेकानेक बिंदु इस टिप्पणीकारको दिखाई देते हैं। जिसपर मेरे माह भरके प्रवास पश्चात प्रवक्ता में लिखनेका प्रयास करूंगा। एक नम्र सेवकके नाते। अमरिकाकी, अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति के अप्रैल में होनेवाले सम्मेलनमें भी इसीको रखूंगा।
    घटा हुआ उदाहरण:=>मुख्तार सिंग जी ने १९४६ में मिडल हिंदी पास छात्रॊंको लेकर ६-७ वर्षमें हिंदी माध्यमसे M Sc करवाई थी। उनका स्वर्गवास हुआ, और हम गुलाम लोग अंग्रेज़ी में बिक गए।
    मैं हिंदी मातृभाषी नहीं हूं। अंग्रेज़ी माध्यममे पढाता रहा हूं।दीर्घ चिंतन, मनन, तर्क, विचार से मैं ने जाना है, कि जितनी जलदी हम इस सत्यको जानेंगे और उसको कार्यान्वित करेंगे, सफल होंगे।
    इस अंग्रेज़ी की बैसाखी पर सारे देशको दौडाने वालों की बुद्धि पर धिक्कार है।चंद लोगों की उन्नति के लिए सारी रेलगाडी कैलाश पर ले जाने वाले की बुद्धि पर ? ? ?।उसे क्षमा करना भी कठिन लगता है। जो वस्तु आपको ३०० रुपयों में मिलती हो, उसके लिए कोई १०,००० खर्च करे तो आपको कैसा लगेगा?
    सारा तर्क देकर प्रमाणित किया जा सकता है।

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    • dr dhanakar thakur

      हिन्दी को अंगरेजी का स्थान लेना है तो उसे किसी की मातृभाषा के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए. मैथिली तो बँगला, असमी , ओरिया के सामान आदि प्रुर्वी भारत की अलग भाषाएँ हैं
      मैंने स्तेसनों पर लिखा देखा है यह आपकी मातृभाषा भी है जो गलत है
      कोई भोजपुरी, कोई अवधी, कोई ब्रज व छ्हत्तिस्गढ़ी बोलता है जो हिन्दी की बोली जरूर मानी जा सकती है पर वह भी वह हिन्दी नहीं है जिसे अंगरेजी का स्थान लेना है हिन्दी को सरलीकृत संस्कृत के रूप में तो स्वीकार किया जा सकता है पर उर्दू के खिचडी हिन्दुस्तानी के रूप में नहीं जिसकी वकालत नेहरु और गांधी ने की थी – राजर्षि टंडन डॉ अमरनाथ झा अदि ने उसका विरोध किया था आपके मनोरंजन के लिए मई अपनी हिन्दी कविता संग्रह हिन्दी तुम बोलते हो तुम मुसलमान हो से यही गीत जो इस सत्य कथन पर आधारित है जोड़ता हूँ (क्षमा करें समयाभाव से इसे अभी देवनागरी में नाहे एकर पाउँगा )
      birthday poem

      (A poem dedicated to little Adnana, Rahil and Ayman(born 5th .))
      Hindi tum bolte ho, Ho tum Muslim

      Kya Ho tum?
      Kaise Main Janu
      Ho Hindu
      Ya Muslim?
      Hindi tum bolte ho
      Ho tum Muslim
      Hindu Hindi nahee
      Bolte yanha
      Is Klarnatak me.

      Maine Kaha
      Main Hindustani
      Mera desh
      Hindustan Hai
      Dubai Me registan hai.

      Adnan banega Engineer
      Rahil bhee jayega
      Seedhi Rah par
      Apne nam ke saman
      Bataya Usne

      Par Ayaman
      Gudiya see
      Pariyon see Ayman
      Jayegi Hyderabad
      Khelgee Sania Mirza
      Ke sath Tennis
      Harayegee Usko
      Sania kee shan
      Par feregee panee
      Mysore kee meri Rani
      Ayman jise malum hai
      Razia Begum kee kahanee.

      Par maine kaha oosase
      Ban jao tum doctor
      Hoga tera nam
      Par abhee to de do
      Mujhe apne dant
      Jo sundar hain
      Par ho jayenge kharb
      Tofee chock let
      Mummy ke khilane se.
      Fal khaogee
      Amrud aaur apple
      Naspati aaur seetaphal
      Jo banayenge tere dant
      Auur bhee Sundar
      Aishwayra Ray kee tarah.

      Vah hanstee rahee
      Ve hanste rahe.
      Maine kaha Ayman
      Tumhare birthday tak
      Sab thek thak tha
      December panch tak
      Fir kya hua
      Vo hua jo nahee hona tha
      Tutee nahee Meenaren
      Bant gaye man
      Tum ho Hindu ya
      Muslaman?
      Kisi ne kabhee toda hee tha
      Us mandir ko kyon
      Jise pujte the Wo.

      Kya nahee rah sakta
      Prem vaise jaise
      Tumne dikhaya mujhse
      Tum to nahee daree
      Na hee tumharee Mummy daree
      Kee kanhi yah koi
      Bacchachor to nahee hai?

      Kanhee yah apaharan kar
      Ransom Mangnewala to nahee hai?

      Are main to ek sedha sada
      Insan hun
      Tumhe delkkar to koi
      Haivan bhee paseez jayega
      Patthar se tel nikal ayega.

      Kya sanjog hai
      Kar raha hun aaj mai puree
      Apane jeevn ke 51 saal
      Kal hoga mera birthday,.

      Mera bhee hota hai birthday
      Par ab mery mummy
      Is jahan me nahee hain
      Jo yad kara detee thee kee
      Isee Savanee trayodahi ko
      Main aya tha is dunia me
      Ek barsati savan ke
      Sanjh me.

      Kal main rahunga
      Ghumta kanhee
      Andhra Pradesh me
      Shiv Mallikarjuna ke Ghar
      Shrishilam me.

      Tum to hoge apanee nanee ke ghar
      Khate-peete mauz udaatee

      Par main
      Chalata apanee
      Apanee yatra par
      Kyonki mera ghar koi nahee
      Mai sota hun is dharti par
      Bataya tha tumhe kee
      Meri chadar hai sitaron
      See bharee aakash

      Chahe to Ayman Pahunch
      Sakti hai vanha
      Bataya tha maine use
      Suneeta William kee Tarah.

      Par vah to chalegee
      Seedhi rah par
      Rahil kee tarah
      Mummy Papa ke god me
      Nanee- naana ke gaon me
      Par mujhe to pyaree hai
      Vah Isswar ka
      Vah Khuda ka
      Vah God ka Gaon
      Jiska koi
      Ant nahee hai
      Jiska koi prarambh nahee hai
      Vah hai Meri Manjil
      Tum kabhee mil gaye
      Rah par
      Fir kabhee mil jao
      Kaun Janata
      Kise kab kanha Milna hai
      Kewal Useeko maloom hai
      Jisne Tumko, Usko, Mujko
      Unko,sabko banaya hai!

      -Dr. Dhanakar Thakur 24.8.07

      dhanakarthakur@rediffmail.com

      (Background: After my food, mosuru-avalakki(dahi-chura) on 23rd Aug.’07 night, two little boys and a girl talked with me in lovely tone- they were Adnan born 29th sept.), Rahil(b.10th June) and their angelic sister Ayman (born 5th dec.) who were going to with their mother(a burqua clad fair and beautiful women) to her mother’s home at Mysore. The boys were studying at the Cambridge School of Mysore and were smart enough to talk an unknown person like me. I had been standing for some time among other passengers who were Muslims and had changed to other bay there know that they all were Mysore bound.
      Many persons(including me) me do not like to remain with Muslims(as mostly not only they are living dirty due to poverty but also there is a psychological barrier as Muslim hordes were coming to loot India and enslaved large part of it for many centuries, doing immense atrocities on Hindus) but what attracted me to those boys with lovely overtures their smartness, beauty and some unknown instinct.

      Boy Adnan asked me where I live? Where is my house? What I do? Where I sleep? Where I write/ In office? OK you sleep in office? Have you gone to Dubai? –
      “No. Mera ghar Hindustan hai, Dubai me registan hai..,”
      I made a couplet for them.. and so many things.
      They wanted to be engineers- little Ayman was not speaking what she would be then I said you would be a doctor or will go to Hyderabad and play with Sania Mirza to defeat her.
      Boys were knowing Mahendra Singh Dhauni,the cricketer when I said that he was my neighbour. To check him I asked about the hair cut of Dhauni and he shown me correctly long hairs by gesture of hands.

      I told him that I lived in trains, my house was nowhere or everywhere and I write and I would write for him and on him also.

      “What you will write and how I can have?”
      “I will write a story and a poem for you and will send you by post as you do not have e-mail id.”
      They told me their address.. Parangipalya door no.1004, HSR layout. Their father was Imran Seth, an engineer and doing building business as Ayman Builders. I told boys that Ayman will be the owner- director of the company and you will be chided by her for reaching late in office and she may deduct your pay also.
      Adnan asked me whether I was a Hindu or Muslim.
      I asked him what does he think.
      He said ,”A Muslim.”
      I asked,”Why?”
      “Because you speak Hindi.”
      What a fantastic and genuine analysis. Yes, Kannadiga Hindus speak Kannada only.
      True, Hindi is not the mother tongue of any Hindu in the country and a slogan of Hindu, Hindu, Hindustan is wrong.
      I have witnessed in train in Karnataka that Muslims speak among themselves Hindi while Kannadigas Kannada only. I also found a change. Even a Muslim speaks in Kannada with a Hindu. Muslims know Kannada as well and they learn it in schools too.

      Little Adnana talked with me swalpa,swalpa Kannada and when I asked what to say in Kannada for ‘I am sleeping’,” he said, ”Nanu malaktayitteddene.”
      In Mithila, Hindus when meet a Muslim start talking in Hindi just opposite of Karnataka. And whole Hindu card core of RSS group are misunderstood the concept of Maithili, Magahi, Bhojpuri,Awadhi, Braj, etc. in which Hinduism is far deep-seated than in Hindi which the little boy Adnan summarized so innocently.
      Boys consistently asked me to send their poetry (half I made, half now I will before doing anything else and will write it on a postcard and post this evening.
      Rahil said that though he had computer no printer was in house.
      It seems in between her mother was listening something and when Mysore came she said me that children would wait for me and so come sometime. I said that I would try.

      I recalled sometimes back in a bus (from Yelhanka to Shivajeenagar), how one Muslim with beards in his 30s had chided me as to why I had asked from a Muslim child his father’s name and house address (I had asked in Kannada just to talk ,”what is your name, your father’s name and your house etc. Nimma Hosuru, Nimma Tande Hosuru? Nimma Maneli?). The community is so much divided and suspicious for other.(yet in another occasion, just few days before this again a Muslim in 40s, looking like a Maulvi seeing a Kannada Anklipi book in my hands had said to me that here Kannadiga respects others who want to learn Kannada. He had told me that Ramnagara was a better place to live(than Bangalore which was so much crowded.
      ).

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