भौतिकवाद से परे मानवतावाद की राह ही दिलाएंगी सच्ची प्रसन्नता

   प्रतिवर्ष 20 मार्च अंतरराष्ट्रीय प्रसन्नता दिवस के रूप में मनाया जाता है। जिसका उद्देश्य लोगो को खुशहाल जिंदगी जीने के लिए जागरूक करना है। इसकी शुरुआत 20 मार्च 2013 को हुई थी। तब से प्रतिवर्ष संयुक्त राष्ट्र सतत विकास समाधान नेटवर्क वर्ल्ड हैप्पीनेस रिपोर्ट जारी करते आ रहा है। जिसमें भारत प्रसन्न देशों की सूची में अपने निम्नतम स्तर पर है। पिछले वर्ष 2020 में जारी 156 देशों की सूची में भारत 144 वें स्थान पर था। जिससे अंदाजा लगाया जा सकता है, कि भारत के लोग प्रसन्नता के मामले में कितना पिछड़ते जा रहे है। जिसकी सबसे बड़ी वजह है आज के समय मे बदलती जीवनशैली। वर्तमान दौर में इंसान इतना स्वार्थी हो गया है, कि वह केवल अपने बारे में ही सोचता है। अपने स्वार्थ को सिद्ध करने के लिए वह दूसरों को होने वाली परेशानी तक की परवाह नही करता है। “जाके पाँव न फ़टी बिवाई, वो क्या जाने पीर पराई” तुलसीदास जी की ये पंक्तियां मौजूदा दौर को चरितार्थ कर रही है।
              वर्तमान दौर में ज़िन्दगी के तौर तरीके जिस हिसाब से बदल रहे है। उनसे यह सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि भले आज हम तरक्की के नित नए आयाम गढ़ रहे है। चांद पर घर बनाने के सपने को साकार कर रहे है। लेकिन हमारे अंदर की इंसानियत कही पीछे छूटती जा रही है। आज छोटी छोटी बातों पर इंसान मरने मारने को तैयार हो जाता है। हम इतने निराशावादी क्यो हो रहे है? क्या वजह है जो हम अपनी ही वर्षों पुरानी संस्कृति को बिसार रहे है। हम तो “सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः, सर्वे भद्राणि पृश्यन्तु, मां कश्चित् दुख भाग भवः।” की संस्कृति को मानने वाले लोग है जहां हम यही कामना करते है कि सभी सुखी हो, सभी निरोगी हों, सभी के साथ अच्छा हो किसी को दुःख न मिले। फिर ऐसी क्या वजह आ गई जो हम अपनो के ही दर्द की वजह बनते जा रहे है। क्या वजह है जो वर्तमान दौर में रिश्तों की डोर इतनी नाज़ुक हो गई है? आज भले ही हम बुलंदियों के आसमान छू रहे है लेकिन मन को दो पल का सुकून तक नसीब नही हो रहा है। यह एक कड़वी सच्चाई है।

          आज भले ही देश तरक्की के नित नए आयाम गढ़ रहा है। आर्थिक विकास के बड़े बड़े वादे हो रहे हो।देश मे अरबपतियों की संख्या लगातार बढ़ रही हो। लेकिन खुशहाली के पैमाने में हम क्यों पिछड़ते जा रहे? क्यों आएं दिन लोग आत्महत्या करने को मजबूर हो रहें यह शोध का विषय बनता जा रहा, क्योंकि आत्मिक सबलता व्यक्ति को कमज़ोर तो नहीं बनाती न! इसका मतलब स्पष्ट है कि हमारा समाज मानसिक रूप से कमजोर बनता जा रहा। हमारी भारतीय संस्कृति ने दुनिया को शांति का पाठ पढ़ाया है। विश्व को योग, ध्यान और अध्यात्म सीखाया है। फिर देश किस राह पर चल पड़ा है। हमारी खुशी का स्तर क्यों निम्नतम होता जा रहा है। क्यों भोग विलास ही सुखी जीवन का पैमाना बन गया है? इस पर आज विचार करने की जरूरत है। आज आधुनिकता की चकाचौंध में इंसान अंधा हो गया है। वह अपने सामाजिक मूल्यों का पतन करने से भी पीछे नही हटता है। बाजारवाद की प्रवृत्ति में इंसान की इंसानियत गुम हो रही है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट की माने तो भारत दुनिया मे सबसे अवसादग्रस्त लोगो का देश बन गया है। एक तरफ तो हम विश्व गुरु बनने का दम्भ भरते नही थकते। “वसुधैव कुटुम्बकम” की बात करते है। लेकिन अपने ही परिवार में बूढें- बुजुर्ग अकेले हो गए है। हमने घर तो मजबूत बना लिए पर रिश्ते की डोर बहुत ही कमजोर कर ली। जहां कभी एक छत के नीचे पूरा परिवार ख़ुशी मनाता था आज अपने ही कमरे में कैद होकर रह गए है हम! आज दुनिया “ग्लोबल विलेज” बनती जा रही है। चंद पलो में हम मीलों का सफर तय करने में सक्षम हो गए हो, सूचना के बड़े बड़े माध्यम बनाने में सफलता हासिल कर ली है, लेकिन दिलो में दूरियों की गहरी खाई बना बैठे है। आज हमें जरूरत है कि हम अपनी खुशी के लिए किसी और पर निर्भर न रहे। अपनी ज़िंदगी के निर्माता स्वयं बने। जिस दिन हम सही गलत का निर्णय करने में सक्षम हो जाएंगे। भौतिकवाद से परे मानवता की राह पकड़ लेंगे तो उससे अच्छी प्रसन्नता कोई ओर नहीं होगी।

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