मालवा की माटी में चुनावी सरगर्मी

आम चुनाव के आखिरी चरण में मध्य-प्रदेश के आठ संसदीय क्षेत्रों में वोट डाले जाएंगे। फिलहाल इनमें से सात भाजपा और एक सीट कांग्रेस के पास है। 2014 में सभी सीटों पर भाजपा काबिज थी, लेकिन रतलाम से सांसद दिलीप सिंह भूरिया के निधन के बाद उपचुनाव में कांग्रेस के कांतिलाल भूरिया ने यह सीट कब्जा ली। विधानसभा चुनाव-2018 में बदले राजनीतिक समीकरणों के बूते कांग्रेस चार सीटें जीत लेने की उम्मीद बांधे बैठी है। दूसरी तरफ भाजपा आठों सीटों को जीत लेने की रणनीति पर आगे बढ़ी है। फसलों के लिए मालवा की माटी उर्वरा मानी जाती है। चुनावी फसल काटने के लिए मालवा-निमाड़ क्षेत्र में नरेंद्र मोदी, अमित शाह, राहुल गांधी, प्रियंका गांधी, कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया आमसभाएं लेकर अपने दल की फसल लहलहाने में लगे हैं। अलबत्ता कौन किसकी फसल काटता है, यह 23 मई को ही नतीजे आने पर पता चलेगा।

                किसान आंदोलन और पुलिस गोलीबारी से छह किसानों की हुई हत्या से देशव्यापी चर्चा में आई मंदसौर सीट से कांग्रेस की मीनाक्षी नटराजन और भाजपा से सुधीर गुप्ता उम्मीदवार हैं। मीनाक्षी को कांग्रेस ने दूसरी बार दोहराया है। वे नेता के साथ लेखिका भी हैं। 1857 के स्वतंत्रता संग्राम पर उनकी महत्पूर्ण किताब दो खंडों में छपी है। यहां विडंबना यह है कि शिवराज सिंह चैहान के राज्य में किसानों के मारे जाने के बावजूद इस सीट की आठ में से सात विधानसभाओं पर भाजपा काबिज है। मीनाक्षी के प्रति सहानुभूति महिला होने के नाते दिखाई दे रही है। कांग्रेस कार्यकताओं की नाराजगी के कारण वे अकेली किला फतह करने का जोखिम उठा रही हैं। उनका मुख्य मुद्दा पुलिस फायरिंग में किसानों की हुई मौत और नरेंद्र मोदी का विरोध है। सुधीर गुप्ता संघ के खड़े किए प्रत्याशी हैं। गोलीकांड के बाद संघ की एक तरह से यहां अग्निपरीक्षा होनी है। हालांकि संघ के बूते ही मंदसौर लोकसभा सीट की सात विधानसभाएं जीतने में भाजपा सफल हुई है। अब मोदी का नाम भी काम कर रहा है।

                अनुसूचित जनजाति रतलाम संसदीय क्षेत्र झाबुआ, अलीराजपुर व रतलाम के उस भीलांचल का हिस्सा है, जिसके कल्याण की कल्पना देश के बड़े आदिवासियों नेताओं ने की थी। यहां का ज्यादातर क्षेत्र जंगली, पथरीला और गर्म मिजाज का है। यहां पारा 46 डिग्री से भी ऊपर चढ़ जाता है। बावजूद गांवों में रहने वाले भील आदिवासियों के पैर थमते नहीं है। लिहाजा मतदान भी अच्छा होने की उम्मीद बनी रहती है। इस क्षेत्र में पांच विधानसभा सीटें कांग्रेस और तीन भाजपा के पास हैं। कांग्रेस ने जहां फिर से कांतिलाल भूरिया को टिकट दिया है, वहीं भाजपा ने झाबुआ से मौजूदा विधायक जीएस डामौर को दांव पर लगाया है। भाजपा द्वारा लड़ी जा रही आर-पार की लड़ाई में आदिवासी संगठन जयस का भी उसे भरपुर सहयोग मिल रहा है। 1980 से ही यह सीट कांग्रेस का गढ़ रही है। हालांकि 2014 में भाजपा ने इसलिए बाजी मार ली थी, क्योंकि कांग्रेस से दलबदल करके दिलीप सिंह भूरिया ने भाजपा में शामिल होकर चुनाव लड़ा था। किंतु 2015 में उनकी मृत्यु के बाद कांग्रेस फिर इस सीट पर काबिज हो गई।

                अनुसूचित जनजाति सीट धार में 51 प्रतिशत मतदाता आदिवासी हैं। इस लोकसभा क्षेत्र की छह विधानसभा सीटें कांग्रेस और दो भाजपा के पास हैं। भाजपा ने यहां से वर्तमान सांसद सवित्री ठाकुर का टिकट काटकर छतर सिंह दरबार को उम्मीदवार बनाया है। सवित्री की नाराजी और भितरघात से भाजपा पषोपेश में है। इसलिए भाजपा मोदी लहर और आदिवासी युवा संगठन जयस के सहारे है। कांग्रेस का हाल भी अच्छा नहीं है। उसने जिला पंचायत सदस्य का चुनाव हार चुके दिनेश गिरेवाल को उम्मीदवार बनाया है। इस कारण कांग्रेसी सवाल कर रहे हैं कि जो व्यक्ति सदस्य का चुनाव भी नहीं जीता वह सांसद का क्या जीतेगा ? दिनेश भील जाति के हैं, जबकि यहां से हमेशा भिलाला जाति का ही उम्मीदवार जीता है। कांग्रेस विरोध का एक कारण यह भी है, इस कारण कांग्रेस सांसत में है।

                अनुसूचित जाति देवास-शाजापुर सीट से भाजपा ने न्यायाधीश के पद से इस्तीफा देकर आए महेंद्र सिंह सोलंकी को प्रत्याशी बनाया है। जबकि कांग्रेस ने कबीरपंथी भजन गायक आौर पदमश्री से सम्मानित प्रहलाद टिपाणिया को उम्मीदवार बनाया है। सोलंकी के समर्थन में संघ है, वहीं टिपाणिया की क्षेत्र के अनेक समाजों में लोकगायक होने के कारण गहरी पहल है। सोलंकी यहां से जहां अपनी गरीबी को आधार बनाकर संवेदना बटोरने की कोशिश में लगे हैं, वहीं टिपाणियां क्षेत्र में उद्योग न होने और रोजगार को मुद्दा बना रहे हैं। लेकिन यहां मोदी का राश्ट्रवाद भी चुनावी हवा का हिस्सा है।

                उज्जैन लोकसभा सीट पर भाजपा से कहीं ज्यादा संघ की साख दांव पर है। भाजपा ने मौजूदा संसद चिंतसामणि मलवीय का टिकट काटकर विधानसभा का चुनाव हारे पूर्व विधायक अनिल फिरोजिया को उम्मीदवार बनाया है। इनकी जीत की रणनीति महाकाल मंदिर के निकट बने संघ के भवन भारत माता मंदिर से चल रही है। फिरोजिया को टिकट देने से क्षेत्रीय नेता और संगठन नाराज हैं। इसलिए संघ ने खुद कमान अपने हाथ में ले ली है। मालवाचंल की इस धार्मिक नगरी से कांग्रेस ने पूर्व विधायक बाबूलाल मालवीय को मैदान में उतारा है। इंदौर-उज्जैन अंचल में आतंकवादी संगठन सिमी ने भी पैर पसारे हुए हैं। इससे मुकाबले के लिए इंदौर-उज्जैन संभाग में संघ ने 1994 से ही काम करना षुरू कर दिया था। नतीजतन अब यह इलाका संघ के गढ़ में बदल गया है। 2009 को छोड़ दे ंतो 1989 से इस सीट पर भाजपा काबिज है। मोदी के राश्ट्रवाद का असर भी यहां दिखाई दे रहा है।

                इंदौर लोकसभा सीट की पहचान लंबे समय तक सुमित्रा महाजन से रही है। 2014 का चुनाव 4.66 लाख मतों से जीतने के बावजूद 75 की उम्र पार कर जाने के कारण उनका टिकट काट दिया गया है। अब उन्हीं की सिफारिश पर षंकर लालवनी भाजपा के प्रत्याशी हैं। मध्य-प्रदेश की व्यापारिक राजधानी कहा जाने वाला इंदौर प्रदेश का सबसे बड़ा शहर है। स्वच्छता के क्षेत्र में भी देश के अग्रणी नगरों में आता है। दिग्विजय सिंह की सिफारिश पर कांग्रेस ने पंकज संघवी को उम्मीदवार बनाया है। लेकिन वे सुमित्रा महाजन की विरासत पर आधिपत्य कर पाते हैं या नहीं यह चुनाव परिणाम से ही तय होगा।

                खंडवा और खरगौन लोकसभा सीटें निमाड़ क्षेत्र का हिस्सा हैं। खंडवा सामान्य सीट है, किंतु खरगौन अनुसूचिज जनजाति का हिस्सा है। खरगौन की पहचान लंगे समय तक सहकारिता के नेता सुभाश यादव के नाम से भी जानी जाती रही है। फिलहाल यहां की छह विधानसभा कांग्रेस, एक भाजपा और एक निर्दलीय के पास है। 2014 में मोदी लहर के चलते भाजपा के सुभाश पटेल 2.57 लाख मतों से जीते थे। लेकिन अब विधानसभा सीटों पर जीत के अंतर के आकलन में भाजपा 10,000 मतों से पीछे है। भाजपा ने सुभाश पटेल का टिकट काटकर गजेंद्र पटेल को उम्मीदवार बनाया है। इस कारण सुभाश और उनकी टीम गजेंद्र को नुकसान पहुंचाने की कवायद में लगे हैं। कांग्रेस ने यहां से डाॅ. गोविंद मुजाल्दा पर दांव खेला है। यहां दोनों के बीच कड़ी टक्कर मानी जा रही है।

                खंडवा लोकसभा सीट की चार विधानसभाओं पर कांग्रेस और चार पर भाजपा काबिज है। 2014 में यहां से भाजपा के नंदकुमार सिंह चैहान 3.28 लाख मतों से चुनाव जीते थे। भाजपा ने फिर चैहान को दोहराया है। चैहान प्रदेश भाजपा के पूर्व अध्यक्ष भी रहे हैं। उनका मुकाबला कांग्रेस के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष और सुभाश यादव के बेटे अरुण यादव से है। उन्हें यह अवसर दूसरी बार मिला है। फिल्मी गायक किषोर कुमार की जन्मस्थली रहे खंडवा में आतंकी संगठन सिमी की जड़ें भी गहरी हैं। जो आठ आतंकी भोपाल की जेल की सलाखें तोड़कर भागने के बाद पुलिस द्वारा मुठभेड़ में मारे गए थे, उनकी कब्रगाहें खंडवा में ही है। पूरे मालवा-निवाड़ की जंग में संघ की ताकत लग रही हैं। साफ है, सिमी का विस्तार न होने पाए, इस हेतु संघ लाठी लिए पहरेदारी में लगा है। ऐसे में राश्ट्रवाद और मोदी की लहर भी काम कर रही है।

प्रमोद भार्गव

लेखक/पत्रकार

शब्दार्थ 49,श्रीराम काॅलोनी

शिवपुरी म.प्र.

मो. 09425488224, 09981061100

लेखक, साहित्यकार एवं वरिष्ठ पत्रकार हैं।

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