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    Homeसाहित्‍यकवितामैं कौन हूं? अथ अहं ब्रह्मास्मि (नौ)

    मैं कौन हूं? अथ अहं ब्रह्मास्मि (नौ)

    —विनय कुमार विनायक
    मैं ‘यदु’ अधिकार वंचित
    ब्राह्मण का दौहित्र,
    ओजस्वी क्षत्रिय का प्रथम रक्त बूंद
    ज्येष्ठांशभागी युवराज था!
    किन्तु ब्राह्मणत्व अहं
    और क्षत्रियत्व दंभ के द्वन्द ने
    मुझको किया सत्ताविहीन भिखारी!
    मैं बना वणिक-वैश्य,
    मेरा भ्राता तुरु तुर्क
    द्रहयु द्रविड़/अनु भोज-म्लेच्छ आनव
    और लघु अनुज पुरु पौरवराज बना!
    चन्द्रवंश का गौरव,
    कौरव-पाण्डव का पुरखा,
    चक्रवर्ती पद का अधिकारी!
    देखा मैंने इन आंखों से
    पितृजन की गद्दारी
    मैं छलित हुआ/मैं दलित हुआ
    मैं शोषित हूं/तुम पोषित हो
    मैं स्वयंभूव हूं/तुम घोषित हो
    मैं हैहय यादव हूं/तुम पौरव हो
    अधिकार नहीं छोड़ूंगा!
    कल लड़ा था/आज लड़ रहा,
    कल भी लड़ूंगा तुमसे,
    ब्राह्मणत्व से/देवत्व से
    आर्यत्व से/क्षत्रियत्व से!
    मैं लड़ा था ज्येष्ठ यदुपुत्र
    ‘सहस्त्रजित’ बनके,
    ‘शतजित’ बनके/‘हैहय’ बनके/
    ‘धर्मनेत्र’ बनके
    ‘कार्त’-‘साहंजय’-‘महिष्मान’-
    ‘भद्रश्रेण्य’-‘दुर्दम-भौम-कनक’-
    ‘कृतवीर्य’ बनके,
    कृतवीर्यपुत्र कार्तवीर्य अर्जुन बनके!
    (10)
    मैं अर्जुन सहस्त्रबाहु!
    तुमसे लोहा लेनेवाला
    दुर्जय कृतवीर्य तनय
    राम पूर्व दशानन का विजेता,
    सहस्त्र बाहुओं से समर्थित
    आर्य ‘सहस्त्राजुर्न’ था!
    अर्जुनस्य प्रतिज्ञै द्वय
    न दैन्यं न पलायनम्!
    मैं नहीं दस्यु
    मैं नहीं राक्षस/मैं नहीं नरभक्षी,
    पीढ़ियों से प्रवंचित जातियों का
    मैं स्वत्वाधिकार रक्षी!
    मनु स्मृतिकार भृगुवंशी
    ब्राह्मणों की अवसरवादी नीति पर
    प्रथमत:प्रहार किया था मैंने!
    मानव को देव या दानव बनाने की
    फतवाई रीति का शिकार
    शोषित-शापित पीढ़ी का
    मैंने शुद्धि संस्कार/सम्भार किया था!
    अधिकार विहीन यादव-हैहय जन,
    गोधन वंचित रहता कबतक?
    ब्रह्मणाश्रम की बंधक बनी गौ को,
    स्वबथान वापसी अधिकार दिया था!
    पर देखा बंधु मैंने
    तुम्हारी अतिस्वार्थ लिप्सा
    और सत्तापक्षधर पुरोहिती माया,
    फूट डालकर मेरे गुट मंडल में
    छलनी कराई मेरी काया!
    एक नहीं इक्कीसबार
    कराया मेरी मंडली के वीरों का संहार
    मम साली पुत्र भार्गव
    जमदग्नि कुमार परशुराम के हाथों;
    उन रक्तरंजित हाथों से,
    जो मातृ हत्यारा घोषित था,
    ब्राह्मणी अहंकार से पोषित था!
    उन रक्तरंजित हाथों को,
    दक्षिणाजीवी पुरोहितों ने
    जाने किस धर्मपोथी के बूते
    वैष्णवी अवतार परशुराम कहा!
    और मुझे ब्राह्मण द्रोही
    मदोन्मत्त शौण्डीर्य कहकर
    इतिहास में दर्ज किया!
    (11)
    मैं जयध्वज!
    सहस्त्रार्जुन का ज्येष्ठ पुत्र हूं!
    वाणी और सत्ता की मिलीभगत ने
    अधिकार वंचित हैहय/यादव जन का
    किया बार-बार सफाया!
    जो भी बचा जंगल में जाकर
    या पृथ्वी की शरण में
    उन्हें सहेजकर
    मैं आर्जुनेय ‘जयध्वज’
    अधिकार तिरंगा लेकर
    तुम्हारे समक्ष आया था
    अधिकार मांगने,पर क्या पाया?
    पुत्र ‘तालजंघ’ की लाश,
    पौत्र ‘वीतिहोत्र’, ‘सुजात’,
    ‘भोज’, ‘अवन्ती ‘ और ‘शौण्डिकेय’ के
    कल्पित मौत का अहसास!
    हमनें हक की लड़ाई छोड़ दी,
    क्षत्रियत्व को त्याग दिया
    लोहा डालकर अन्यत्र प्रयाण किया!
    पहाड़ों की कंदराओं में,
    जंगली झुरमुटों के बीच,
    अन्त्यजों के गांव में
    अस्तित्व रक्षा किया
    अपनी जातीय पहचान छुपाकर!
    (चूंकि परशुराम ने गोत्रपिता
    कश्यप द्वारा हैहयों को क्षत्रिय वर्ण से
    च्युत करने के शर्त पर युद्ध बंद किया था)
    फिर हमनें कभी नहीं कहा
    कि हम वही जो तुम हो
    तुमने हमें वह घृणित संज्ञा दी,
    जो दुर्दिन में हमने अपनाई थी!
    हैहयवंशी कलचुरी क्षत्रिय से
    कलसुरी वैश्य बना,
    महुआ पुष्प से सुरा बनाया,
    सुरी साह कहलाया!
    तम्बाकू-सुंघनी का दुकान सजाया,
    सुंघनी साहू कहलाया!
    अर्क-इत्र-गंध बनाकर बेचा,
    गंध वणिक गांधी कहलाया!
    ठेठ कलाली या मदिरालय वाला,
    कलाल-कलवार-जायसवाल-
    शौण्डिक-सोढ़ी-कलचुरी,
    हैहयवंशी क्षत्रिय
    शुर,शौंडिकेर अंशी कहलाए!
    सभी वणिक वैश्य,
    अग्रहरि-कसौंधन-हलवाई-कस्रवानी
    सब कहलाते रक्त सहस्त्रार्जुनी,
    असभ्य-उपेक्षित शौण्डीर-अभिमानी,
    वार्ष्णेय-ब्याहुत-कलार-अहिर-ग्वार—
    इक्कीस पुश्त बलिभष्मी से उद्भूत
    ये गालियों की बौछार,
    झेलने को अभिशप्त मनु के बेटे
    जन्म-जन्मांतर से आज भी
    पवित्र शतरुपा/श्रद्धा/हौआ की कोख जन्मा
    अपवित्र जाति बताई जाती रही!
    ये पौराणिक पदवियां,
    जन्मजात अलंकार नहीं पितृत्व मनु का!
    सिर्फ शब्दकोश का जंजाल,
    कमंडल से शापित मंडल का
    फिर से एक सवाल!
    मैं कौन हूं?
    अधिकार कब मिलेगा?
    (12)
    मैं कौन हूं?
    मन्वन्तर-दर-मन्वन्तर
    मनु के बेटों का मनु की व्यवस्था से
    पूछा गया सवाल पूछता है फिर-फिर
    मनु का बेटा/यह जानकर भी
    कि जबाव नहीं देगा व्यवस्थाकार
    मानक बनाने वाला
    मैं का/मैन का/मन का/मानव का
    अधिकार नहीं मिलेगा!
    लो हक मांगने फिर खड़े,सभी दलित-पिछडे़
    कबतक चुप्पी साधोगे तुम सवर्ण अगड़े?
    देवासुर संग्राम सा फिर द्वन्द है एक,
    आर्य-अनार्य सी खाई फिर बनी है एक!
    अगड़ों-पिछड़ों की लड़ाई,
    सवर्ण-असवर्ण की हाथापाई,
    हमनें विरासत में पाई!
    जब भी हमनें तुमसे चाहा,
    प्यार! सहकार! अधिकार!
    मिला हमें दुत्कार,कहा हमें बदकार
    तुम्हारी घृणा की मार ने हमें दूर ढकेला-
    अपनत्व के मान से,ममत्व के भान से,
    ब्राह्मणत्व के ज्ञान से,देवत्व की आन से,
    क्षत्रियत्व के शान से परे
    बहुत दूर वर्णान्तर में ठेला!
    तुम सवर्ण रहे, हम असवर्ण हुए
    तुम कौन्तेय हुए, हम कर्ण रहे!
    तुम कुलीन कुल, हम मलीन धूल!
    तुम सृष्टि फूल, हम दृष्टि भूल!
    तुम गंगाजल, हम पंक दलदल!
    तुम महापेय हम हलाहल!
    कैसे होगा मेल?
    अगड़ों और पिछड़ों में,
    भटके और बिछड़ों में,
    अगवाई कौन करेगा?
    क्या?
    राम! कृष्ण! गौतम!
    ईसा,नानक, गोविंद—!
    —विनय कुमार विनायक

    विनय कुमार'विनायक'
    विनय कुमार'विनायक'
    बी. एस्सी. (जीव विज्ञान),एम.ए.(हिन्दी), केन्द्रीय अनुवाद ब्युरो से प्रशिक्षित अनुवादक, हिन्दी में व्याख्याता पात्रता प्रमाण पत्र प्राप्त, पत्र-पत्रिकाओं में कविता लेखन, मिथकीय सांस्कृतिक साहित्य में विशेष रुचि।

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