यूपी में महागठबंधन की राह

संजय सक्सेना,
उत्तर प्रदेश में 2019 के आम चुनाव में बीजेपी यानी मोदी के खिलाफ विपक्ष के महागठबंधन की कोशिशों में अभी कई पेंच नजर आ रहे हैं. सपा ने अपने पत्ते जरूर खोल दिये हैं, लेकिन बीएसपी सुप्रीमों मायावती की तरफ से अभी तक कोई सकारात्मक बयान नहीं आया है. शायद इसी लिये राजनीति के जानकार कह रहे हैं कि उप-चुनाव की और बात है, लेकिन आम चुनाव के लिये कम से कम उत्तर प्रदेश में तो बीजेपी के खिलाफ महागठबंधन को लेकर धुंध छायी नजर आ रही है. स्थिति यह है कि समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव के अलावा अभी तक बसपा या कांग्रेस किसी ने भी महागठबंधन को लेकर ज्यादा उत्साहजनक प्रतिक्रिया नहीं जताई है. विपक्षी दलों के सहयोग से उप-चुनावों में जीत हासिल करके समाजवादी पार्टी ने लोकसभा चुनाव के लिए गठबंधन की बुनियाद भले ही रख दी है, लेकिन आम चुनाव के लिये कांग्रेस के साथ ही बसपा सुप्रीमों मायावती की चुप्पी इस बात का संकेत है कि महागठबंधन को लेकर अभी कई सियासी पेंच कसे जाने बाकी हैं. एक तरफ टिकट बंटवारे का आधार क्या होगा, इस को लेकर कोई ठोस पहल नहीं हो पा रही है तो दूसरी तरफ बसपा को चिंता इस बात की भी है कि कहीं टिकट नहीं मिलने के कारण उसके दल के कुछ नेता बगावत पर न उतर आयें. इसके अलावा गठबंधन की राजनीति में बीएसपी के सामने सबसे बड़ी समस्या यह आती है कि वह तो अपना वोट बैंक दूसरे दलों के पक्ष में ट्रांसर्फर करनाने में सफल हो जाते हैं,लेकिन दूसरे दलों के वोटर बीएसपी के पक्ष में मतदान करने से हिचकिचाते हैं.ऐसा एक बार नहीं कई बार देखा भी जा चुका है कि गठबंधन की सियासत में बसपा को हमेशा नुकसान ही उठाना पड़ता है. बात आगे की कि जाये तो महागठबंधन की सूरत में पीएम पद का कौन दावेदार होगा, इसको लेकर भी कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी से लेकर मायावती और अखिलेश की दिली तमन्ना किसी से छिपी नहीं है.तीनों ही नेता अपने आप को पीएम की रेस से बाहर नहीं बता पा रहे हैं.
इन तमाम किन्तु-परंतुओं के अलावा सच्चाई यह भी है कि विपक्ष मोदी से डरा हुआ तो जरूर है, लेकिन मोदी की हस्ती मिटाने के चक्कर में वह अपना वजूद भी खत्म नहीं कर लेना चाहेगा. पर्दे के सामने आकर कोई कुछ न कहे, लेकिन मोदी विरोधी खेमें के तमाम नेताओं को अपनी सीमाएं, खामियों और खूबियों का अहसास हैं. इसी लिये तो अखिलेश अपने 2017 के विधान सभा चुनाव के समय के सहयोगी राहुल गांधी से हाथ मिलाने में कतरा रहे हैं. वह जानते हैं कि कांग्रेस के ऊपर विवादित ढांचा गिराने का दाग लगा हुआ है, यह बात मुलायम सिंह यादव कई बार सार्वजनिक मंचों से कह भी चुके हैं और इसको लेकर मुस्लिमों में हमेशा से कांग्रेस के प्रति नाराजगी रही है. अखिलेश की तरह ही मायावती को एक और चिंता भी सता रही है कि कहीं महागठबंधन बनाकर मुस्लिम वोट हासिल करने के चक्कर में उनका दलित वोटर उनसे दूर न खिसक जाये. एक सीधा सा सिद्धांत है कि हर क्रिया की प्रतिक्रिया होती है.अगर महागठबंधन के खिलाफ हिन्दू वोटर एकजुट हो गये तो मायावती और अखिलेश की सियासत धरी की धरी रह जायेगी. 2014 में यह हो भी चुका है.
बहरहाल, जहां तक बात सीटों के बंटवारे की है तो इसको लेकर भी राजनीतिक दलों में जबर्दस्त खींचतान देखने को मिल सकती है. सीटों को लेकर बसपा और सपा में अभी से रस्साकशी देखने को मिल रही है. चुनाव आते-आते इसमें और तेजी आएगी. अभी माया और राहुल गांधी की तरफ से तो कोई बयान नहीं आया है, परंतु अखिलेश यादव जरूर कहते दिख रहे हैं कि महागठबंधन के लिये दो-चार सीटों की कुर्बानी देनी पड़ेगी तो वह पीछे नहीं हटेंगे,मगर ऐसा कहते समय वह यह नहीं बताते हैं की सपा कितनी सीटों पर चुनाव लड़ने का सपना पाले हुए है. इलाहाबाद और गोरखपुर में लोकसभा के उप-चुनाव में कांगे्रस प्रत्याशी जमानत भी नहीं बचा पाये थे, इसके बाद से अखिलेश 2017 के विधान चुनाव के ‘यूपी को यह साथ पसंद है’ के चेहरे राहुल गांधी से दूरी बनाए हैं.अखिलेश, 2019 के लिये कांगे्रस को महागठबंधन का हिस्सा बनाने के मूड में नजर नहीं आ रहे है, गौरतलब हो 2017 में राहुल-अखिलेश की दोस्ती के समय सपा के संस्थापक सदस्य और पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने भी कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कांगे्रस को 100 विधान सभा सीटें देने पर ऐतराज जताया था, सपा प्रमुख अखिलेश कांग्रेस को अमेठी और रायबरेली में ही रियायत देना चाहती है,जहां से क्रमशः राहुल गांधी और सोनिया गांधी चुनाव लड़ती हैं.फिर भी कांग्रेस ने अपने विकल्प खुले रखे हैं और कैराना व नूरपुर के उपचुनाव में अपने प्रत्याशी न उतारकर संभावनाएं बनाए रखी है, जबकि इससे पहले गोरखपुर और फूलपुर के उपचुनाव में कांग्रेस ने प्रत्याशी उतारे थे. कांग्रेस और सपा में दरार की खबरें उस समय सामने आईं, जब राहुल गांधी की इफ्तार पार्टी में न अखिलेश यादव पहुंचे और न ही उनकी पार्टी का कोई नुमाइंदा, हालांकि अखिलेश यादव ने इफ्तार पार्टी में हिस्सा लेने के लिए जोर-शोर से ऐलान भी किया था. इसके बाद से लगातार सवाल उठ रहे हैं कि क्या कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के बीच सब कुछ ठीक-ठाक नहीं चल रहा है? सवाल ये भी उठ रहे हैं कि क्या सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव को माया और कांग्रेस के बीच पनप रही सियासी दोस्ती रास नहीं आ रही है ? यह और बात है कि लोकसभा के उप-चुनावों में बसपा के साथ के बाद मिली जीत के बाद से अखिलेश किसी भी सूरत में बसपा का साथ नहीं छोड़ना चाहते हैं. इसी लिये अखिलेश यादव को यहां तक ऐलान कर दिया कि वो बसपा के साथ गठबंधन के लिए जूनियर पार्टनर बनने और कुछ सीटें छोड़ने तक को तैयार हैं.इतना ही नहीं अखिलेश बसपा सुप्रीमों को सीनियर राजनीतिज्ञ भी मानने लगे हैं.
उधर, बसपा की तरफ से कांगे्रस को लेकर कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है. 2019 में होने वाले आम चुनाव के लिए यूपी में महागठबंधन की कमान सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने संभाल रखी है. उनकी तरफ से भले ही बार-बार यह घोषणा की जा रही हो कि महागठबंधन के लिए वह समझौते कर सकती है, लेकिन इसकी हद क्या होगी, यह आगे चलकर ही तय होगा. फिलहाल सपा प्रमुख अखिलेश यादव एक तरफ महागठबंधन की बात कर रहे हैं तो दूसरी ओर आम चुनाव को देखते हुए उनकी पार्टी की चुनावी सक्रियता अभी उन्हीं क्षेत्रों में बढ़ी हुई है, जहां वह पिछला लोकसभा चुनाव जीती थी.
बात महागठबंधन होने की दशा में टिकट बंटवारे के र्फामूले की कि जाये तो अभी तक जो खबरें सियासी गलियारों से छन-छन के आर रही हैं, उसके अनुसार 2014 के आम चुनाव में भाजपा के खिलाफ जहां जो पार्टी दूसरे स्थान पर रही है, वह सीट महागठबंधन के सहयोगी के हिस्से में चली जाये. इस आधार पर आकलन किया जाये तो 2014 में बसपा एक भी लोकसभा सीट नहीं जीत पाई थी और 34 सीटों पर दूसरे स्थान पर रही थी.इस लिये बसपा शायद ही इस फार्मूले को स्वीकारे, क्योंकि इस फार्मूले से बसपा नुकसान और सपा फायदे में रहेगी. 2014 के आम चुनाव में सपा के पांच उम्मीदवार जीते थे, जबकि 31 सीटों पर वह दूसरे स्थान पर रही थी.अगर कांगे्रस गठबंधन का हिस्सा होती है तो कांग्रेस को भी शायद ही यह फार्मूला रास आए क्योंकि इससे सबसे अधिक नुकसान उसे होगा.कांग्रेस को 2014 में सिर्फ दो सीटें मिली थीं जबकि सिर्फ छह सीटों पर उसके उम्मीदवार दूसरे स्थान पर रहे थे. 2019 के आम चुनाव में कांग्रेस यूपी में कितनी सीटों पर चुनाव लड़ना चाहेगी, यह एक बड़ा सवाल होगा,उससे भी बड़ी बात यह है कि क्या राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा प्राप्त कांग्रेस क्षेत्रीय सियासी शक्तियों के आगे नतमस्तक हो जायेगी. कमोबेश ऐसी ही स्थिति रालोद के साथ भी है. 2014 में वह एक भी सीटे नहीं जीत पाई थी, लेकिन, हाल ही में गठबंधन के बाद कैराना लोकसभा सीट जीतने में सफल रही रालोद की उड़ान को पंख लग गये हैं. वह पश्चिमी उत्तर प्रदेश की कुछ सीटों पर अपनी दावेदारी मजबूत समझ रही है.

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