वजूद में शामिल है पंजाबियत

अनिल अनूप 
अपने अस्तित्व के 47 सालों बाद भी हिमाचल अपने वजूद से पंजाबियत को अलग नहीं कर पाया है। माना कि पहले हिमाचल पंजाब का ही हिस्सा था, पर आज यह अलग राज्य है। इसका अपना अस्तित्व है, पर लगता है जैसे यह सिर्फ नाम का ही है। जरा हिमाचल के किसी नेशनल हाई-वे या स्टेट-हाई वे पर घूमने निकलें, तो आपको सड़क किनारे बने 90 फीसदी ढाबों के नाम पंजाब से जुड़े मिलेंगे। जैसे ढलियारा के पास ‘गुरुकृपा पंजाबी वैष्णो ढाबा, शुद्ध पंजाबी वैष्णो ढाबा, ‘पंजाबी ढाबा’ और रानीताल के पास कृष पंजाबी ढाबा यानी हम अपने ढाबों के नाम के साथ पंजाबी शब्द जोड़ने पर फख्र महसूस करते हैं। मैंने अब तक कहीं नहीं पढ़ा ‘शुद्ध हिमाचली ढाबा’, ‘हिमाचली वैष्णों ढाबा’। अपने ढाबे का नाम हिमाचल के साथ जोड़ते हुए शायद ढाबा मालिक यह सोचते होंगे कि हिमाचल का नाम रखने पर ढाबा चलेगा नहीं। यानी हमारी सोच ही हिमाचली नहीं, तो पंजाबियत से पीछा कैसे छूटेगा। यह तो हुई ढाबों की बात और अब जरा संस्कृति की ओर मुड़ते हैं। शादियों पर 10 फीसदी गाने ही हिमाचली बजते होंगे, बाकी 90 फीसदी गाने पंजाबी ही होते हैं। जब हिमाचल में मेलों का दौर चलता है, तो सांस्कृतिक संध्याओं पर पंजाबी गायकों या मुंबई के कलाकारों को बुलाकर प्रशासन अपनी पीठ थपथपाता है और हिमाचली कलाकार किसी कोने में खड़े अपनी बारी का इंतजार करते हैं।
जहां पंजाबी गायक लाखों रुपए ले जाते हैं, तो हिमाचली गायक चार हजार हासिल कर खुद को खुशनसीब मानते हैं कि चलो स्टेज पर जाने का मौका तो मिला। यही नहीं, स्कूलों में जब पारितोषिक वितरण समारोह होते हैं, तब भी पंजाबी गानों पर धमाल मचती है। मुख्य अतिथि भाषण तो हिमाचली संस्कृति को सहेजने के देता है, पर सुनता पंजाबी गाने ही है। वैसे प्रदेश में भाषा एवं संस्कृति विभाग तो है जो महज विभाग तक ही सीमित है, उससे आगे वह बढ़ा ही नहीं। अब बात पे-कमीशन की करें, तो वह भी पंजाब की ही तर्ज पर होता है। हिमाचल का अपना पे- कमीशन आज तक नहीं बना।
यानी जब पंजाब का वेतन आयोग होगा, हिमाचल उसी का अनुसरण करेगा। और तो और हिमाचल में अपराध भी पंजाबी ही हैं। कहीं शिमला में पंजाब के लोग आकर गोलियां चला देते हैं, तो कहीं एटीएम ही लूट ले जाते हैं। उन्हीं की देखादेखी में फिर हिमाचल में भी वही हथकंडे अपनाए जाते हैं। नशे का सारा कारोबार हिमाचल के पंजाब से सटे क्षेत्रों से ही फैलता है, यानी हिमाचल में नशा भी पंजाबी ही है। मौजूदा जानकारी तो नहीं, पर पहले कभी जब कोई वीआईपी हिमाचल आता था, तो उसके लिए बुलेट प्रूफ गाड़ी भी पंजाब से ही मंगवाई जाती थी। अब जरा बात करें व्यवसाय या काम धंधे की। जरा चामुंडा रोड पर बने बड़े-बड़े व्यापारिक संस्थानों या फिर धर्मशाला या मकलोडगंज में बड़े-बड़े व्यापारिक संस्थानों को देखें, तो साफ गणित समझ में आ जाएगा कि पंजाब में हिमाचल कैसे माइनस होता है। जमीन किसी हिमाचली के नाम पर और उस पर बिल्डिंग और व्यवसाय किसी पंजाबी कारोबारी के नाम पर। पंजाब के कारोबारी कुछ रुपयों का लालच देकर हिमाचलियों को फांस लेते हैं और फिर कुछ ही सालों में लाखों-करोड़ों कमाते हैं और हिमाचली वहीं खड़ा उनके बढ़ते बैंक बैलेंस को देखता रहता है। हिमाचल तो 47 साल बाद भी अपना वजूद अख्तियार नहीं कर पाया। मैंने तो किसी भी स्कूल में पहाड़ी भाषा (हिमाचली भाषा) को पढ़ाते नहीं देखा न सुना। या तो हिंदी या फिर इंग्लिश ने अपना डाका डाल दिया है, तो फिर हिमाचली भाषा कहां चलेगी। कैसी विडंबना है पंजाब का कारोबारी करोड़ों के वारे-न्यारे करने के लिए हिमाचल का रुख करता है और हिमाचल का युवा दिल्ली या चंडीगढ़ में छोटा-मोटा काम ढूंढने के लिए मारा-मारा फिरता है। ऐसा नहीं है कि हिमाचल के पास अपना कुछ नहीं है। हिमाचल में भी बहुत कुछ है, पर कोई पहचान नहीं पा रहा। हिमाचली शाल, हिमाचली शहद और हिमाचली टोपी अगर ट्रंप तक पहुंच सकती है, तो यह छोटी बात नहीं है। हम अपनी नजर बदलेंगे, तो नजरिया खुद-ब-खुद बदल जाएगा।
हम चाहें तो पंजाब को हिमाचल के रंग में रंग सकते हैं, पर उसके लिए योजना चाहिए। जज्बा चाहिए और जुनून चाहिए। जैसे आजकल सावन के मेलों में पंजाब से श्रद्धालु हजारों की भीड़ में आ रहे हैं, उन्हें हिमाचली खाने (धाम) से रू-ब-रू करवाया जा सकता है। हिमाचली संस्कृति से पहचान करवाई जा सकती है। पर ऐसा संभव ही नहीं है, क्योंकि पंजाब की भीड़ तो पुलिस के हाथ खडे़ करवा देती है, ट्रैफिक ही नहीं संभलता, तो हिमाचली रंग उन पर कैसे चढ़ाएंगे। अकेली सरकार भी कुछ नहीं कर सकती है। जनसहयोग बहुत जरूरी है। अगर यही ढर्रा रहा, तो पंजाब की यह छाप एक दिन हिमाचल को छिपा लेगी और हम समझ ही नहीं पाएंगे कि खुद को हिमाचली कहें या फिर उधार के पंजाबी।

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