शब्दों के अध्ययन का प्रयोजन:

डॉ. मधुसूदन
(एक)शब्दों के अध्ययन का प्रयोजन:

’द्वे ब्रह्मणि वेदितव्ये शब्द ब्रह्मपरं च यत्‌॥
शब्दब्रह्मणि निष्णातः परं ब्रह्माधिगच्छति॥
संदर्भ ==> ॥अमृत बिन्दू उपनिषद॥ डॉ. एम. जी. प्रसाद लिखित मूल अंग्रेज़ी में ’गारलॅण्ड’ पुस्तक से.)
Manifestations of Brahman
There  are two manifestations of Brahman to be realized:
Shabda Brahman and Param Brahman. One who has realized
and is well versed in Shabda Brahman will realize Param Brahman.
(दो)ब्रह्म की दो अभिव्यक्तियाँ: दो अभिव्यक्तियाँ है ब्रह्म की, जिनका प्रत्यक्ष (देखा) अनुभव किया जाना चाहिए।
एक अभिव्यक्ति है शब्दब्रह्म, और दूसरी है परब्रह्म।
जिसने शब्द ब्रह्म को भली भाँति जाना हो, वह परम ब्रह्म का साक्षात कर पाएगा।

(तीन)मेरे प्रेरणा स्रोत (१) पू. स्व. श्री. अशोकजी सिंघल के प्रेरक वचन मेरी मौलिक प्रेरणा है| हिमाचल विश्वविद्यालय द्वारा डॉ. राजेश कपूर जी के आमन्त्रण पर जब सोलन (हि.प्र.) सम्मेलन के लिए २०११-१२ में गया था, तब पू. स्व. अशोक जी ने ३ हिन्दी आलेखों को देखकर मुझे प्रोत्साहित किया था। परिषद कार्यालय में, लिया गया छाया-चित्र उसी भेंट का है।

(२)  इस देववाणी के अध्ययन में हृदय झकझोर कर देने वाले प्रसंग भी चिर-प्रेरित कर लेखक का मानस ही आमूल बदल देते हैं। एक प्रबुद्ध, विद्वान श्रोता के देह त्यागते समय उनकी शय्या के सिरहाने इस किंकर ने लिखे हुए आलेख पाए गए। जब भेंट हुयी थी, तब आपने मुझे कर्म से ब्राह्मण मान सम्माना था, और प्रस्तुति की मुक्तकण्ठ प्रशंसा की थी।
अनुरोध कर, आलेखों की प्रतियाँ ले गए थे।आप भारतीय मंच के डॉ. विनोद जी अम्बष्ठजी के पिताश्री. डॉ. गिरीजाशंकर  थे। भारतीय मंच द्वारा आयोजित  खचा-खच भरे व्याख्यान में उपस्थित रहे थे।
जब  डॉ. विनोद जी ने घटना सुनाई तो हृदय कोमल-कृतज्ञता से, आंदोलित होता रहा। और मुझे दृढ प्रतिबद्धता प्रदान कर गया। सोचता हूँ, किस जीवन समर्पित  भाव से पुरखों ने  इस पवित्र ज्ञान निधि की रक्षा करने, इस यज्ञ में अपने जीवन की आहुतियाँ चढाई होंगी?
पाणिनि, पतंजलि, यास्क, भर्तृहरि, अमरसिंह, कात्यायन, इत्यादि और अभी अभी ६०-६५ वर्ष पूर्व डॉ. रघु-वीर। किस किस का नाम लें? इन्हीं के कंधो पर खडे होने से हमारी ऊंचाई बढ जाती है।  
किस नोबेल प्राइस वा भारत-रत्‍न के लिए उन्हॊने जीवन अर्पण किया था? ’न हि ज्ञानेन सदृश्यं पवित्रम्‌ इस विद्यते ’की उच्चतम प्रेरणा से प्रेरित इन देदिप्यमान सितारों ने भाषा को परिपूर्ण बनाए रखा। आज सारे संसार में देववाणी जैसी परिपूर्ण और कोई भाषा नहीं है। एक भी नहीं। (३)
भारतीय विचार मंच ने एक ही सप्ताह में दो व्याख्यान आयोजित किए थे, एक हिन्दी में और दूसरा मराठी में। और तीसरा बौद्धिक एक संघ-शाखा में रखा गया था। साथ एक सत्कार डॉ. अमित देसाई जी के निवास पर रखा था। इतने कंधों पर खडा होता हूँ, ऊंचाई बढ जाती है। जानता हूँ, यह ऊंचाई मेरी नहीं है।
देववाणी के, इस ज्ञानयज्ञ में प्रतिबद्ध योगदान कर चुके अनगिनत आदर्श और निःस्पृह विद्वानों की थाती इस जीवन को कृतकृत्य करने में सहायक हैं।
इस देदिप्यमान थाती के कारण ही इस लेखक को इस ’शब्द भारती’ को लिपिबद्ध करने में,  सहायता हुयी है।
(४)
इस यज्ञ में भी बाधाएँ आयीं। इस लिए देर हुयी। सब से बडा कारण अंग्रेज़ी की दासता अभी भी हमारे अस्थि पंजर में ओत-प्रोत भरी है। इतनी कि, संस्कृत हिन्दी के चाहक तो हैं, पर केवल उन भाषाओं को बचा कर रखने की सीमा तक।  
भारतीय मानस भी दूषित है। न उसे संस्कृत की सामर्थ्य पर विश्वास है, न जानकारी। लज्जा आती है, स्वतंत्र भारत में, संस्कृत और हिन्दी दोनो उपेक्षित हैं। मात्र अंग्रेज़ी जानने वाले भारतीय-अंग्रेज़, बिना संस्कृत जाने, संस्कृत का विरोध करते हैं। और संस्कृत जाननेवाले भारतीय, अंग्रेज़ भारतीयों में स्वीकृत नहीं होते। विरोध करने के लिए जिसका विरोध करना है, उस विषय की जानकारी की आवश्यकता नहीं मानते।
बिना संस्कृत जाने आप हिन्दी का विरोध नहीं कर सकते। जो हो रहा है।बिना अंग्रेज़ी जाने, कोई अंग्रेज़ी का विरोध कर सकता है? यदि विरोध करे,  क्या कहोगे आप?
पर, संस्कृत की सामर्थ्य जाने बिना ही उसका विरोध करते हैं। और, अंग्रेज़ी की त्रुटियाँ नहीं जानते, पर उसकी वकालत करते हैं।
ऐसे अज्ञानियों का विरोध ७० वर्षों से चल रहा है।


परामर्श देते हैं। कि अंग्रेज़ी द्वारा संस्कृत और हिन्दी को प्रोत्साहित करो। ये उन लोगों की बात है, जिनसे मुझे प्रोत्साहन की अपेक्षा थी। और मेरे पास संस्कृत वा हिन्दी का विश्वविद्यालयीन प्रमाण पत्र भी नहीं था। मैं भारत भक्तों  को भी इस अभियान का महत्त्व समझा नहीं पाया। इसी लिए देरी , बडी देरी हो गयी।

भौतिकता का बोलबाला है। प्रमाण पत्रों की और उपाधियों की अनिवार्य माँग भी है।
किस विरोधक का नाम लें? ……….सभी विरोधक ही हैं, जिनमें कुछ अपने अंतरंग मित्र भी हैं।

पर हमारा ’न हि ज्ञानेन सदृश्यं पवित्रं इह विद्यते’ का और ’सा विद्या या विमुक्तये’ का आदर्श ही  मुझे बार बार प्रोत्साहित रखते आया है। जब से भारतीय धन को ही सर्वस्व मान कर उसके पीछे दौड रहा है; भारत अपनी अक्षुण्ण परम्परा खो रहा है। और खोता ही जाएगा।  जब भारतीय दैहिक सुखों के पीछे, वासनाओं की तृप्ति के पीछे, दौडेगा, और छीछरी प्रसिद्धिके पीछे दौडेगा, यही अपेक्षित है। ………….

पर प्रवक्ता के प्रबुद्ध पाठकों का प्रोत्साहन मेरी ज्योति जलाए रख रहा था।



(चार)प्रोत्साहक पाठक:  पाठकों की अनगिनत टिप्पणियाँ ही, मेरे आलेखों को प्रोत्साहित रखते आई हैं। अतः लेखक सभी प्रोत्साहक पाठकों को, हृदयतल से, कृतज्ञता व्यक्त कर धन्यवाद देता है। यूरोपीय प्राच्यविद भी हिन्दी-संस्कृत की ऐसी सूक्ष्मताएं नहीं समझ पाए होंगे। परदेशियों को उनके सीमित उच्चारण एवं भिन्न सांस्कृतिक पृष्ठभूमि के कारण ऐसी सूक्ष्मताएँ, परखना कठिन गया होगा। साथ उस समय हमारे देशवासी भी, हीन-ग्रंथि, एवं “मूढः पर प्रत्ययनेय बुद्धि:” की वृत्ति से ग्रस्त थे। ’भाषा विज्ञान की भूमिका’ के लेखक श्री. देवेंद्रनाथ शर्मा भी इसी अर्थका विधान पुस्तक में करते हैं।
आलेखों पर बार बार पाठकों की प्रेरक टिप्पणियाँ आती थीं। उनमें से कुछ ही टिप्पणियाँ जानकारी के लिए, प्रस्तुत हैं।
कुल १९९ आलेख डाले गए हैं। प्रवक्ता पर शेष टिप्पणियाँ देखी जा सकती हैं.

(पाँच)कुछ चुनी हुयी विविध आलेखों पर आई टिप्पणियाँ  (१) बी एन गोयल (निवृत्त, आकाशवाणी के वरिष्ठ अधिकारी) ===> प्रो० मधुसूदन जी का साधुवाद – संस्कृत और हिंदी भाषा की अतुल शब्द सम्पदा और उन के बीज, वृक्ष के रूप में प्रस्फुटन, शाखाओं के रूप में विस्तार, उपसर्गों और प्रत्ययों से शब्द समृद्धि और इन सब का सरल भाषा में प्रस्तुतीकरण आप जैसा एक विद्वान ही कर सकता था | यह आप के गहन अध्ययन का प्रतीक है | आप अमेरिका में रहते हैं, इंजीनियरिंग के अध्यापक हैं. जिस के बारे में कहा जाता है की यह हिंदी वालों का विषय नहीं है – इस के लिए आप को हार्दिक बधाई |
खेद की बात यह है की भारत के नेता, नौकरशाह और अब सामान्य जनता को भी यह भ्रम हो गया है की देश के लिए हिंदी नहीं वरन अंग्रेजी आवश्यक है | इस सम्बन्ध में मैं तीन विदेशी नाम देना चाहूँगा जो अँगरेज़ (विदेशी) होते हुए भी हिंदी और भारतीय संस्कृति के प्रति समर्पित रहे हैं – ये हैं – रुपर्ट स्नेल, डेविड फ्रावले और कामिल बुल्के – अनेक भारतीयों की तुलना में ये तीनो अधिक भारी पड़ते हैं | वैसे और भी कुछ लोग हैं जो भारतीय इतर होते हुए भी भारतीय भाषा और संस्कृति के पोषक रहे हैं लेकिन डाक्टर मधुसूदन इन सब पर भारी हैं | धन्यवाद |—-बी एन गोयल (निवृत्त, आकाशवाणी के अधिकारी)

(२) जयंत चौधरी  (सत्र संचालक, अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति, अधिवेशन, डैलस टेक्सास यु.एस.ए. २०१७) ===> आदरणीय झवेरी जी, यह हमारा सौभाग्य था की आप जैसे विद्वान् का साथ और ज्ञान मिला। डॉ. नन्दलाल जी ने जैसा कहा था, उससे भी उत्तम पाया आपके सत्र को. यह हम जीवन भर नहीं भूलेंगे। जो अद्भुत ज्ञान और नया आयाम मिला, उससे मानव को मानव बना दिया आपने। आपने और आदरणीया पल्लवी जी ने एक उच्चतम उदाहरण प्रस्तुत किया है, जो हमारे लिए एक आदर्श है। इस ज्वलंत उदाहरण से आपने और दीप प्रज्वलित किये हैं।भविष्य में भी, यह ज्ञान-गंगा प्रवाहित रहे, आप और पल्लवी जी यूँ ही प्रकाश फैलाते रहें… इन्ही शुभकामनाओं  के साथ, आपका कृतज्ञ, जयंत चौधरी (सत्र संचालक, अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति, अधिवेशन, डैलस टेक्सास २०१७)   

(३) विनायक शर्मा Vinayak Sharma, Editor Amar Jwala weekly, Himachal ===> हिंदी भाषा और व्याकरण का इतना गहन अध्ययन और उसका आंग्ल भाषा के शब्दों का तुलनात्मक विश्लेषण केवल हिंदी भाषा के प्रकांड पंडित ही कर सकते हैं। अचरज है की अमेरिका में रहने वाले भारतीय मूल के इंजीनियरिंग के प्रोफ़ेसर द्वारा यह सब अध्ययन कर लिपिबद्ध करना……हम, तो केवल नत-मस्तक हो सकते हैं. प्रवक्ता को भी साधुवाद की उसने ऐसे ज्ञानवर्धक आलेख को स्थान दिया है….! —–विनायक शर्मा    Vinayak Sharma, Editor Amar Jwala weekly, Himachal—–


(४) डॉ. राजेश कपूर (पंचनद शोध संस्थान) ==> अति उत्तम। सचमुच प्रो. मधुसूदन जी का यह आलेख आंग्ल विद्वानों पर भारी पड़ रहा है। कमाल तो यह है की ये भाषा विज्ञान के विद्वान न होने पर भी इतने गहन ज्ञाता हैं? साधुवाद ! डॉ. राजेश कपूर (पंचनद शोध संस्थान)  


(५) डॉ. शशि शर्मा ===> अद्भुत रचना, आपने बिलकुल सही कहा की इसको धीरे-धीरे पढना। आपके गहन अध्ययन से ऐसे सारबद्ध लेख पढने को मिलते हैं, यह कुछ कम नहीं है| —-डॉ. शशि शर्मा

(६) इन्जिनियर दिवस दिनेश गौड.    ===> आदरणीय मधुसूदन जी, कुछ ही उदाहरणों से आपने एक बेहतरीन लेख दिया है। तकनीकी से जुड़े होने के बाद भी आपका हिन्दी भाषा व्याकरण का इतना ज्ञान व अध्ययन सच में सुख दे गया। इस लघु लेख द्वारा, एक झलक दिखाने का ही उद्देश्य कुछ मात्रा में नहीं अपितु आप पूर्णत: सफल रहे। मुझे भी गर्व है भारतीय होने पर, हिन्दी भाषी होने पर। साधुवाद —-इन्जिनियर दिवस दिनेश गौड.    

(७)  अनुनाद सिंह (भाषा विद्वान) –===> झवेरी जी, सदा की भांति यह लेख भी विचारोत्तेजक, सारगर्भित और ज्ञानवर्धक है। भारत की शिक्षा-व्यवस्था में ऐसे लेख बताए ही नहीं जाते, जिससे अपने ही बारे में हमे पता ही नहीं होता। हमारे प्राचीन ऋषि-मुनियों और गणितज्ञों/खगोलशास्त्रियों/वैज्ञानिकों/दार्शनिकों ने कठिन से कठिन संकल्पनाओं (कांसेप्ट्स) के लिये इतने सार्थक नाम दिये हैं, जिनकी शोभा देखते ही बनती है।— अनुनाद सिंह —

(८) डॉ. प्रतिभा सक्सेना (निवृत्त प्रोफ़ेसर) ===> बहुत सुविचारित विवेचन का खाका तैयार किया है डॉ. झवेरी ने। योनिश भाषा के परिपूर्ण भाषा की कसौटी यद्यपि यूरोपीय भाषाओँ के लिये बनाई गई थी, पर हिन्दी और संस्कृत को परखने का यह आयोजन इन भाषाओँ की सुसमृद्ध परंपरा ,सामर्थ्य और विषम स्थितियों में भी जमे रह कर चिर-जीविता पाने के कारणों को सामने ला सकता है। कथ्य कितना भी अमूर्त अथवा सूक्ष्म हो उसे यथावत् संप्रेषित कर देना किसी भाषा की सबसे बड़ी सफलता है। इसके लिये उसमें (क) सम्पन्नता,(ख) ऊर्जा, (ग) स्पष्टता (घ) सुश्राव्यता का होना बताया गया है।
इस क्रम में हमारी भाषाओं में जो अतिरिक्त विशेषताएँ हैं वे भी सामने आकर अपनी शक्तिमत्ता और सामर्थ्य को प्रमाणित कर सकती हैं। सराहनीय प्रयास हेतु लेखक को साधुवाद ! –– डॉ. प्रतिभा सक्सेना (निवृत्त प्रोफ़ेसर)

(९) पूज्य स्वामी जी Yogatmananda -Vedanta Society से आया संदेश:====> It was a joy to read this, Madhu Ji. Dhanyavaad. The analogy of one instrument, when played, makes many other properly tuned ones to resonate, was very apt to describe the relation of Sanskrit & Prakrit.
Loving Namaskar – SY
‘Arise, awake and stop not till the goal is reached’ – Swami Vivekananda
For Information on Vedanta Society of Providence or on Swami Yogatmananda, please visit http://www.vedantaprov.org

(१०) Rekha Singh: विदुषी ( डार्टमथ, यु. एस. ए.) ====> अपनी भाषा मे शिक्षा प्राप्त करने से जीवन जीने के तरीके भी बच्चों मे स्वतः विकसित होते हैं । हां, अन्य भाषाओं का ज्ञान भी बहुत आवश्यक है , बच्चो के बहुमुखी विकास के लिए , जैसा की लेख मे समाहित है । मेरा अपना अनुभव है की जब बालक – बालिका अपनी भाषा में पाठशाला मे नहीं पढ़ते तब उनमें अव्यावहारिक संस्कार जन्म लेते हैं, और कभी कभी अपने माता -पिता , सगे सम्बंन्धी , दादा दादी , नाना -नानी , अपना खान -पान , अपनी वेश -भूषा , अपने देश और संस्कृति को नीचा समझने लगते हैं । आगे चलकर यही लोग बड़े होकर स्वयं , अपने परिवार , समाज , देश के लिए उचित कार्य नहीं करते । प्रत्येक भाषा अपने संस्कार और संस्कृति को लिए हुए होती है, अतः प्रथम हमें अपनी भाषा में शिक्षा प्राप्त करना चाहिए । बाद में एक विषय के रूप में अन्य भाषाओं का ज्ञान प्राप्त करना उचित होगा । शिक्षा का माध्यम अपनी भाषा ही होनी चाहिए । —Rekha Singh, विदुषी  (डार्टमथ यु. एस. ए.) :    

(११) मुकुल शुक्ल (शासकीय़ अधिकारी, मुम्बई )===> आदरणीय डा॰ साहब ज्ञान के इस भंडार को इतनी सहजता से बताने और समझाने के लिए आपका कोटी कोटी धन्यवाद | काश आप भारत में होते और हमारी ब्यूरोक्रेसी और शिक्षण संस्थाओं को समझा पाते कि अंग्रेज़ी का मोह त्याग कर संस्कृत की ओर बढ़ो | मेरी बड़ी तीव्र इच्छा है की आप अपनी इन बातों को विडियो बना कर यू ट्यूब के जरिये भी समझाएँ, ताकि लोगों को आपके इस ज्ञान का महत्व पता चले और सभी स्कूलों और कॉलेजो में इन बातों का प्रचार किया जा सके। भारतीय भाषाओं के संरक्षण के लिए बुद्धिजीवी वर्ग द्वारा एक बृहत आंदोलन चलाया जाये, तभी हम अपने ज्ञान और अपनी धरोहर की रक्षा कर सकेंगे।  ——-मुकुल शुक्ल 
(शासकीय़ अधिकारी, मुम्बई )

(१२ ) Jeet Bhargava (विद्वान) ===>  मधुसूदन जी, सब पाठकों को धन्यवाद देने से काम नहीं चलेगा।  हमें आपसे संस्कृत के बारे में और लेखो की आशा है। क्योंकि इस विषय में आपकी पकड़, वैज्ञानिक सोच और सरल प्रस्तुति के हम कायल हैं।—Jeet Bhargava (विद्वान) 
(१३) शब्दचर्चा समूह के, श्री. विनोद शर्मा ==>आपकी प्रतिभा के दर्शन तो गूगल के शब्दचर्चा, हिंदी अनुवादक आदि समूहों पर होते रहे हैं। यह आलेख निश्चय ही सारगर्भित और ज्ञानवर्धक है। हिंदी दुनिया की एक मात्र संपूर्ण भाषा है। अन्य भाषाओं की कुछ न कुछ सीमाएँ हैं। संस्कृत और लैटिन के बाद हिंदी ही एक मात्र भाषा है जिसका वैज्ञानिक आधार और तार्किक शब्दोत्पत्ति प्रणाली है। साधुवाद।—–शब्दचर्चा समूह –विनोद शर्मा

(१४) डॉ. नन्दलाल सिंह (अंतर्राष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन आयोजक)    ===>आदरणीय झवेरी जी, जिस दिन हम लोगों ने डैलस में अधिवेशन करने का संकल्प लिया उसी दिन हमने सोच लिया था कि शब्द रचना के ऊपर आप द्वारा प्रस्तुत सत्र लोगों को बहुत ही पसंद आएगा। आपकी विद्वत्ता से मैं व्यक्तिगत रूप से चिर परिचित था पर अपने मित्र गणों को वह अनुभूति प्रदान करने की बड़ी चाह थी। स्वास्थ्य के इतर आप पल्लवी जी के साथ इतनी लम्बी यात्रा कर अधिवेशन में सम्मिलित होकर आपने हमारे सत्रों को जो जीवन प्रदान की वह अविस्मरणीय रहेगा। आपकी भावयुक्त, विद्वतापूर्ण प्रस्तुति लोगों के मस्तक पटल पर अमिट छाप अंकित कर गयी है।  हम आपके सर्वदा आभारी रहेंगे। पल्लवी जी को हमारा नमन।  सादर – डॉ. नन्दलाल सिंह (डैलस अ.हि. समिति सम्मेलन आयोजक)

एवं पण्डित स्व. श्री गिरीजाशंकरजी अंबस्थ जी का , एवं डॉ. महेश एवं रागिनी मेहता का सक्रिय प्रोत्साहन मेरे लिए बहुत महत्व रखता है।

दुर्लभ पुस्तकों की मुक्त हस्त सहायता के लिए, स्व. श्री. अरुण अग्रवाल जी की, मेरे मित्र श्री. ईश्वर भाई पटेल जी का, उनके विशाल पुस्तक संग्रह के उपयोग के लिए, एवं मित्र श्री. ब्रिज भूषण गर्ग की, डॉ. रघुवीर लिखित ग्रंथों की भेंट के लिए, हृदयतल से कृतज्ञता व्यक्त करता हूँ।साथ वेदांत से प्रभावित और वेदांत सोसायटी (प्रॉवीडन्स) के स्व. सदस्य स्व. प्रोफ़ेसर, श्री. युजिन विलियम्स ने अपनी वेदांत की सारी  संगहित पुस्तकें मुझे भेंट करने का आदेश अपने परिवार को दिया था। ऐसे भारतीय संस्कृति का प्रभाव, केवल भारतीयों तक सीमित नहीं है। उनकी इस उदार कृति को भी कृतज्ञता सहित आज स्मरण करता  हूँ।
आलेखों पर अनगिनत टिप्पणियाँ आई थी। सभी के नाम भी नहीं समा सकता। क्षमा कीजिए। निम्न पाठकों  के नाम स्मरण मॆं रहे हैं। अनेक अन्य पाठकों ने भी प्रोत्साहन प्रदान किया था।लेखक  सभी का ऋण व्यक्त करता है।
डॉ. अभय अस्थाना, डॉ. विनोद अंबस्थ, श्री राकेश कुमार आर्य, श्री.  करमरकर, श्री. भोलानाथ गोयलव्हाइस एयर मार्शल: श्री  विश्व मोहन तिवारी, अभियांत्रिक श्री विपिन किशोर सिन्हा,  श्री. मोहन गुप्ता,डॉ. राजेश कपूर, श्रीमती रेखा सिंह, प्रोफ़ेसर शकुंतला बहादुर,डॉ. प्रतिभा सक्सेना, डॉ. मोना खेतान, डॉ. चौधरी बलवान सिंह पटेल, श्री. अनिल गुप्ता, श्री. विनायक शर्मा, श्री. शिवेंद्र मोहन सिंह, श्री. राम तिवारी, डॉ. त्रिदिव कुमार राय, डॉ. शशि शर्मा, ’सत्यार्थी’ श्री. जय शर्मा, श्री. अवनीश सिंह, श्री. संजय मेहता, डॉ. महेश मेहता,श्रीमती रागिनी मेहता, श्रीमती अंजली पंड्या, डॉ. शंकर तत्ववादी, डॉ. प्रभाकर जोशी, प्रोफ़ेसर सविता जोशी, डॉ. आशा चाँद, श्री. अतुल पण्ड्या, श्रीमती मीनल पण्ड्या, श्रीमती सुशीला मोहनका, डॉ. सुभाष काक, डॉ. नंदलाल सिंह, श्री. जयंत चौधरी, श्री. सुरेंद्रनाथ तिवारी, श्री. दिवस दिनेश गौड, श्री. अभिषेक पुरोहित, श्री.अभिषेक उपाध्याय,श्री. हिमवंत, डॉ. धनाकर ठाकुर, श्री. कुंदन पाण्डेय, श्री. प्रेम सिल्ही, श्री.शिशिर चंद्रा, श्री.गिरीश पंकज, डॉ. राजीव कुमार रावत,श्री. इंसान, डॉ. धर्मेंद्र कुमार गुप्त,श्री. विमलेश, श्री.अजित भोसले, श्री. सुनील पटेल, श्रीमती मंजु बंसल, श्री.नेम सिंग, श्री मुकुल शुक्ल,श्री. अग्यानी, डॉ. उमेश्वर श्रीवास्तव,श्री जित भार्गव, डॉ. अनिल भाटे, श्री. गौरांग वैष्णव, श्री. राजा बर्वे, डॉ. मनोहर शिन्दे,स्व. श्री.अरुण अग्रवाल,डॉ. राम गुप्ता,श्री. महेश गोयल, श्री. ईश्वर भाई पटेल, पू. स्वामी  योगात्मानंद जी (वेदांत सोसायटी, प्रॉविडंस),डॉ. सुकल्याण सेनगुप्ता, श्रीमती रेणु राजवंशी गुप्ता, डॉ. पंकज कुमार, डॉ. गिरीश नाथ झा, डॉ. बलराम सिंह, डॉ. भास्कर घाटे, श्री. बिकाश वर्मा और श्री. रक्षपाल सूद, 

6 thoughts on “शब्दों के अध्ययन का प्रयोजन:

  1. मधूभाई,
    अच्छी अभिव्यक्ति है आपके विचारों की।
    आपके भाग ३ के चौथे विंदु के विचारों से मिलते जुलते भाव निम्न रचित कविता में कुछ स्तर तक झलकता है।

    हिन्दू पुनर्जागरण

    बलराम सिंह, दिसम्बर ८, २०१९

    हिन्दू का हिंदुत्व खो गया,
    बाक़ी सबका भाग्य खुल गया।
    इस परिवर्तनशील जगत में,
    थमा जो बस, पीछे ही खो गया।।

    हिन्दू को ये भान नहीं है,
    अपना कोई ज्ञान नहीं है।
    प्रगतिहीन संस्कृतियों का,
    अपना कोई मान नहीं है। ।

    ऐसा होता आया है,
    और आगे ऐसा ही होगा
    भारतीय संस्कृति का अब तो,
    स्वापमान अधिक होगा।।

    कारण इसका सरल है लेकिन,
    युक्ती करना सरल नहीं।
    भस्म किए बिन शुद्ध करे जो,
    ऐसी कोई गरल नहीं।।

    भस्म करे जो भस्मासुर को,
    उस शक्ति का धरण धरें
    कारण जगत के मालिक वाली,
    विधियों का अनुकरण करें।।

  2. From
    Shakuntala Bahadur
    =====================

    आदरणीय मधु भाई,
    चोटी के विद्वानों द्वारा प्रशंसित आपके ज्ञान-सिन्धु
    की थाह लगाना अत्यन्त कठिन है। आपके अन्य
    लेखों की भाँति ये आलेख भी अत्यन्त ज्ञानवर्धक
    है। आपकी लेखनी यों ही निरन्तर चलती रहे- यही
    कामना है।
    सादर,
    शकुन बहिन

    1. By Grace of Divine Sanskrit ( from Laghu Siddhant Kaumudi) I try to learn.
      And present in my words.
      The treasure of Sanskrit belongs to all of Bharatiyas.
      .Sincere Dhanyavads Shakun Bahin. .
      I feel very Grateful.
      THIS ARTICLE WAS PARTLY A RESULT OF ENCOUNTERS WITH FEW FRIENDS.

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