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    शिक्षक-शिक्षा और छात्र बने मूल्यवान 

                         प्रभुनाथ शुक्ल

    गुरु ज्ञान और प्रकाश का प्रवाह पुंज है। अपने शिष्य के प्रति गुरूतर दायित्व निभाते हुए एक कुम्हार की भांति उसके जीवन को रचता और संवारता है। गुरु हमें शिक्षा के साथ-साथ संस्कार, संस्कृति,नैतिकता और अनुशासन की शिक्षा देता है। जीवन के बहुयामी विकास में गुरु का योगदान अतुलनीय है। गुरु सिर्फ हमें शिक्षा ही नहीं देता बल्कि हमारे सर्वांगीण विकास का सहभागी होता है। ‘गुरु’ का अर्थ व्यापक है। सिर्फ दो शब्दों में ही उसकी व्यापकता समाहित नहीं है। धर्म शास्त्रों से लेकर साधु-संत, रागी और बैरागियों ने भी गुरु को सर्वोपरि बताया है। हमारे संस्कार की शुरुआत ही गुरुकुल से होती है। हमारे आराध्य प्रभु श्रीराम और श्रीकृष्ण जी भी गुरु आश्रम में जाकर शिक्षा ग्रहण की थी। रामचरितमानस में इसका उल्लेख भी है कि ‘गुरु गृह पढ़न गए रघुराई, अल्प काल सब विद्या पाई। भगवान कृष्ण और उनके मित्र सुदामा गुरु संदीपन के यहां शिक्षा ग्रहण किए थे। हमारी गुरुकुल परम्परा बेहद शानदार रहीं है।

    हिंदूधर्म संस्कृत में गुरु महिमा को विशेष स्थान मिला है। गुरु के लिए हमारे यहां विशेष दिन ‘गुरु पूर्णिमा’ भी मनाई जाती है। हमारे धर्मशास्त्रों में कहा गया है ‘गुरूर्ब्रह्मा गुरूर्विष्णु र्गुरूदेवो महेश्वरः। गुरुः साक्षात परं ब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नम: अर्थात भारतीय संस्कृति और समाज में गुरुकुल की परंपरा बेहद प्राचीन रही है। गुरु को ब्रह्मा, विष्णु और महेश माना गया है। रामायण और महाभारत काल के पूर्व में भी हमारे यहां गुरुकुल जैसी व्यवस्था कायम थी। हमारे यहां गुरु का स्थान ईश्वर से भी पवित्र और बड़ा है। क्योंकि हमारे आराध्य देव श्रीराम के गुरु भी वशिष्ठ जी रहे। गुरु हमारा मार्गदर्शक और चरित्र निर्माता होता है।

    हमें गुरु के गुणों को ग्रहण करना चाहिए। ठीक उसी तरह जिस तरह कबीर ने कहा है ‘सार-सार को गहि रहै थोथा देहि उड़ाय’ गुरु का सम्मान हमारे लिए सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। गुरु का कभी अपमान नहीं करना चाहिए। शास्त्रों ने गुरु निंदा भी वर्जित है। महाभारत काल में गुरु द्रोणाचार्य ने धनुर्धर एकलव्य का अंगूठा दान में मांग लिया था। एकलव्य ने गुरु की वाणी का सम्मान करते हुए अपना अंगूठा सहर्ष दान कर दिया। क्योंकि उसने सीधे गुरुदेव द्रोणाचार्य के आश्रम में जाकर धनुर्विद्या नहीं सीखी थी। उनकी मूर्ति स्थापित कर उन्हें अपना गुरु मानकर एकलव्य धनुर्विद्या में पारंगत हुआ था। अंगूठा दान के बाद भी वह सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर हुआ।

    गुरु शब्द का निर्माण दो शब्दों से हुआ है। ‘गु’ का अर्थ ‘अंधकार’ होता है जबकि ‘रू’ का अर्थ ‘प्रकाश’ होता है। गुरु शब्द का अभिप्राय है कि अंधकार से प्रकाश यानी ज्ञान की तरफ ले जाने वाला ही हमारा गुरु है। गुरु चाहे जिस क्षेत्र का हो वह हमारे लिए सम्माननीय है। आप चाहे शिक्षा ग्रहण कर रहे हों या गुरुकुल, स्कूल, कॉलेज,तकनीकी शिक्षा व कौशल विकास या कंप्यूटर शिक्षा के क्षेत्र में हों बगैर गुरु के आपको मार्गदर्शन नहीं मिलेगा। किसी भी कर्म क्षेत्र में हमें गुरु की आवश्यकता होती है। बगैर गुरु के शिक्षा, कौशल और तकनीकी ज्ञान की प्राप्ति नहीं होती है। जीवन के क्षेत्र में अगर हमें आगे बढ़ना है तो एक कुशल गुरु की आवश्यकता होती है। हमें गुरु के गुणों को ग्रहण करना चाहिए उसकी बुराइयों पर गौर नहीं करना चाहिए।

    हम प्रगतिवादी और प्रयोगवादी युग में जी रहे हैं। बदलते समय के साथ गुरु और शिष्य के संबंध भी बदल गए हैं। दोनों के बीच लक्ष्मण रेखाएं खत्म हो गई। शिक्षक दिवस के पूर्व झारखंड के दुमका से एक वीडियो वायरल हुआ है। जिसमें स्कूली बच्चों ने शिक्षकों को पेड़ से बांधकर स्कूल में फेल होने की नायाब सजा दी है। छात्रों का आरोप है कि शिक्षकों ने उन्हें प्रैक्टिकल में कम मार्क दिए जिसकी वजह से उन्हें डी ग्रेड मिला। जिसका मतलब फेल होना बताया जाता है। राजस्थान से भी एक घटना सुर्खियों में थी जब कथित तौर पर एक दलित छात्र ने शिक्षक के लिए घड़े में रखे पानी को निकाल कर पी लिया था। शिक्षक पर आरोप है कि दलित होने के कारण छात्र की खूब पिटाई की जिसकी वजह से उसकी मौत हो गई।

    दोनों घटनाओं के तथ्य पर हम बहुत दावा नहीं कर सकते हैं। यह जांच का विषय है। लेकिन गुरुतर दायित्व और शिष्यों के संबंध को लेकर ऐसी घटनाएं हमारी चिंता बढ़ाती हैं। ऐसी स्थिति से छात्रों और गुरुओं को बचना चाहिए। दोनों को एक दूसरे का सम्मान करना चाहिए। गुरु के लिए शिक्षा ग्रहण करने वाले सभी छात्रएक समान होते हैं। ईर्ष्या, द्वेष और जातीय विद्वेष से बचाना चाहिए। गुरु के अंत:हृदय में ऐसी दूषित भावना नहीं होनी चाहिए जिसका असर गुरु के सम्मान और सामाजिक संस्कार एवं प्रतिष्ठा पर पड़े। आधुनिक परिवेश में गुरु और शिष्य के संबंधों पर भी मीडिया में सुर्खियां बनती है। गुरु और शिष्य के बीच अनैतिक संबंध बनते हैं। इस तरह की स्थितियां हमारे चरित्र और नैतिकता को गिराती हैं। गुरु और शिष्य के पारदर्शी एवं पवित्र संबंध पर ग्रहण लगाती हैं। इस तरह के अनैतिक व्यवहार से हमें बचना चाहिए।

    गुरु या शिक्षक के अनादर से जहाँ हमारी सामाजिक प्रतिष्ठा गिरती है वही मान्य परंपराओं की परिभाषाएं भी बदलती है। तमाम ऐसी खबरें आती हैं जहां निर्ममता से शिक्षक छात्रों की पिटाई करते हैं। नाराज छात्र भी शिक्षक की गोली मार या दूसरे प्रकार से हत्या कर देते हैं। यह स्थित सिर्फ भारत में ही नहीं पूरी दुनिया में पाई जाती है। इस तरह के हालातों से बचना चाहिए। हमें अपने भीतर ऐसे गुरु, शिक्षक और मार्गदर्शक की छवि विकसित करनी चाहिए जिसकी तस्वीर छात्र के जीवन में हमेशा बनी रहे। वह आने वाली पीढ़ियों को भी अपने गुरु के बारे में बताएं।

    गुरु ज्ञान का ऐसा भंडार है जो लोहे को भी कंचन बना देता है जैसे ‘गुरु पारस को अन्तरो, जानत हैं सब सन्त। वह लोहा कंचन करे, ये करि लये महन्त’ हमारे यहां गुरु को भगवान से भी बड़ा माना गया है। कहा गया है गुरु गोविंद दोऊ खड़े काके लांगू पांय,बलिहारी गुरु आपने गोविंद दियो बताए। ईश्वर से भी अधिक श्रद्धा गुरु के प्रति पाई जाती है। रामचरितमानस में गोस्वामी तुलसीदास ने लिखा है ‘तुम तें अधिक गुरहिं जिय जानी’। शिक्षक यानी गुरुओं को सम्मान देने के लिए पूरी दुनिया में ‘शिक्षक दिवस’ मनाया जाता है। लेकिन सबका अपना निर्धारित कैलेंडर है।

    विश्व के तकरीबन 100 देशों में शिक्षक दिवस मनाया जाता है। भारत में पूर्व राष्ट्रपति सर्वपल्ली डॉ राधाकृष्णन का जन्मदिन 5 सितंबर शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है। उन्होंने अपने छात्रों से जन्मदिन को शिक्षक दिवस में मनाने की इच्छा जाहिर की थी। डॉ राधाकृष्णन का जन्म 5 सितंबर 1888 को तमिलनाडु के तिरूमानी गांव में ब्राह्मण परिवार में हुआ था। फिर आइए शिक्षक दिवस पर हम गुरुओं के सम्मान का संकल्प लें और एक बेहतर देश, समाज निर्माण के निर्माण में आगे कदम बढ़ाएं।

    प्रभुनाथ शुक्ल
    प्रभुनाथ शुक्ल
    लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं

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