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    छलावा 

    शुभ्रा और नीलेश एक ही कॉलेज में साथ पढ़ते थे। दोनों के बीच गहरी दोस्ती थी। लेकिन यह दोस्ती कब मन-मंदिर में प्रेम-पुष्प खिला गए, खुद शुभ्रा को भी पता न चला। वह नीलेश को दिल ही दिल चाहने लगी। पर अपने प्यार का इजहार करने से डरती थी। उसे डर था कि यदि नीलेश की तरफ से ऐसा कुछ नहीं हुआ तो शायद उनकी दोस्ती भी खत्म हो जाएगी। एक दोस्त के रूप में ही सही, पर नीलेश साथ तो है। किसी भी कीमत पर वह उसकी दोस्ती नहीं खोना चाहती थी। पर दूसरी तरफ सोचती कि यदि नीलेश भी उसे चाहता होगा तो उसकी मन-मुराद पूरी हो जाएगी। हमारी दोस्ती जीवन भर के साथ में बदल जाएगी। शुभ्रा खुद को नीलेश की भावी संगिनी के रूप में देखकर भविष्य के सुनहरे सपने सजाने लगती। नीलेश से अपने दिल की बात कहे या नहीं इसी उधेड़बुन में काफी समय निकल गया। 

    एक दिन खुद नीलेश ने पहल की। शुभ्रा का हाथ अपने हाथों में थामकर उसने अपने प्यार का इजहार किया। शुभ्रा जबसे तुम्हें पहली बार देखा था तबसे तुम्हें अपना दिल दे बैठा था, तुममें मैं अपने जीवनसाथी को देखता हूँ। पर डरता था कि कहीं मेरे प्रेम-प्रस्ताव से तुम नाराज न हो जाओ। मुझे तुम्हें खोना न पड़े, बस इसी डर की वजह से आज तक खामोश रहा। पर आज मेरे प्यार और डर के बीच मेरा प्यार जीत गया और मैं तुमसे यह सब कहने की हिम्मत जुटा पाया। अब मेरा प्रेम-प्रस्ताव स्वीकार करो या ठुकराओ यह मैं तुम पर छोड़ता हूँ। अगर तुम्हें मुझसे प्रेम नहीं है तो भी बेझिझक बता दो, मैं आगे से ऐसी बातें नहीं करूँगा। पर हम जीवन भर अच्छे मित्र तो बने रह सकते हैं। नीलेश की बातें सुनकर शुभ्रा गदगद हो गई, वह ख़ुशी से फूली न समा रही थी। ओ नीलेश ! तुमने तो मेरे दिल का हाल अपने शब्दों में बयां कर दिया। मैं भी काफी समय से इसी मनःस्थिति का सामना कर रही थी पर कभी अपने डर से जीत नहीं पाई। आज तुम्हारे मुहँ से यह सब सुनकर मुझे तो जैसे ज़माने भर की खुशियाँ मिल गईं। तुम्हारे सिवा मैं किसी और के साथ तो अपने जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकती। मेरे मन-मंदिर में तो बस तुम्हारी छवि ही अंकित है। 

    नीलेश के दिल में अपने लिए प्यार पाकर शुभ्रा बहुत खुश रहने लगी। हर वक्त वह उसी के ख्यालों में खोई रहती थी। नीलेश के बुलाने पर एक दिन वह उसके दोस्त के घर पर उससे मिलने गई। शुभ्रा का हाथ अपने हाथ में लेकर नीलेश उसे भावी जीवन के सुनहरे सपने दिखाने लगा। एक-दूसरे के आलिंगन में खोए दोनों कब अपनी सीमा लाँघ गए, पता ही नहीं चला। या यों कहें कि नीलेश द्वारा रचा प्रेम का प्रपंच आज सफल हो गया। शुभ्रा ने अपने सच्चे प्यार में सब कुछ समर्पित कर दिया, उसके इस समर्पण के बदले उसे छलावा मिलेगा, इसकी उसने कल्पना भी न की थी। वह तो नीलेश का प्यार पाकर जैसे दूसरी ही दुनिया में खो गई थी। शरमाते हुए उसने कहा नीलेश हमें अब जल्द ही शादी कर लेनी चाहिए। क्या तुम्हारा दिमाग तो ख़राब नहीं है ? तुमने सपने में भी कैसे सोच लिया कि मैं तुम जैसी चरित्रहीन लड़की से शादी करूँगा। जिसने विवाह से पूर्व ही खुद को किसी को समर्पित कर दिया हो वो एक आदर्श संगिनी कैसे बन पाएगी ? क्या पता तुमने मेरे अलावा भी और कितनों का दिल खुश किया हो। स्त्री जब तक अपनी मर्यादा में रहती है, तब तक ही स्त्री है। अपनी मर्यादा लांघते ही वह चरित्रहीन हो जाती है। किसी चरित्रहीन के साथ जीवनयापन की मैं कल्पना भी नहीं कर सकता। माना तुम मुझसे प्यार करती हो, पर तुम अपनी सीमाएं लांघकर खुद अपने चरित्र पर प्रश्नचिह्न लगाया है। नीलेश के मुहँ से यह सब सुनकर शुभ्रा स्तब्ध थी। उसे अचम्भा हो रहा था कि क्या यह वही नीलेश है, जिसे मैंने इतना चाहा था। जो मेरी तारीफें करते नहीं थकता था, आज वही मुझे चरित्रहीन कह रहा है। क्या इसका प्यार मात्र छलावा या प्रपंच था वो भी सिर्फ मेरे शरीर को भोगने के लिए। शुभ्रा कुछ पल रुकी और खुद को सँभालते हुए बोली तुम क्या मुझसे शादी नहीं करोगे मैं खुद तुम जैसे दोगले और चरित्रहीन पुरुष की साथी नहीं बनना चाहती। सही सुना तुमने नीलेश ! चरित्रहीन मैं नहीं तुम हो, मैंने तो जो कुछ किया प्यार में खोकर किया। प्यार के लिए सब कुछ खो दिया। पर तुम तो मुझसे प्यार भी नहीं करते थे तो तुमने क्यों खुद को मुझे समर्पित कर दिया। बिना प्यार के इतना सब करने वाला तो दोयम दर्जे का ही हो सकता है। सिर्फ शरीर भोगने के लिए तुमने न जाने कितनी लड़कियों की जिंदगी बर्बाद की होगी। तुम्हें क्या लगता है मैंने अपना सब कुछ तुम पर न्योछावर कर दिया तो मैं अपने शील व सम्मान की खातिर तुमसे अपने प्यार की भीख माँगूँगी। अब अगर तुम खुद भी मुझसे शादी करना चाहो तो मैं ऐसा नहीं कर पाऊँगी। क्योंकि तुम्हारा सच जानने के बाद भी तुम्हारे जीवन में बने रहना न केवल मेरे स्वाभिमान को बल्कि उन सभी लड़कियों के आत्मसम्मान को ठेस पहुँचाएगी जो तुम जैसे लोगों से प्यार करने की गलती कर बैठती हैं। आज जो कुछ भी हुआ वो मेरा मेरे प्रेम के प्रति समर्पण था जिसका मुझे कोई अफ़सोस नहीं। हाँ, पछतावा है तो केवल इस बात का कि मैंने तुमसे प्यार किया। तुम मेरे तो क्या किसी के भी प्यार के लायक नहीं हो। 

    शुभ्रा की बातें सुनकर नीलेश को अपनी गलती का एहसास हुआ। आँखों में आँसूं लिए हाथ जोड़कर वह जैसे ही शुभ्रा की तरफ मुड़ा, शुभ्रा तब तक वहां से जा चुकी थी नीलेश की जिंदगी में कभी न लौटकर आने के लिए। आज नीलेश अकेला खड़ा था पछतावे के आँसूं लिए, सच्चे प्यार को खोने का जैसे उसे पहली बार एह्सास हुआ। जानता था कि शुभ्रा जैसी स्वाभिमानी लड़की उसके जीवन में कभी लौटकर नहीं आने वाली। शायद शुभ्रा की बातें सबक थीं उन चरित्रहीन पुरुषों के लिए जो अपनी काम वासना के लिए झूठे प्यार का मोहजाल रचते हैं और शरीर भोगने के बाद उसके निश्छल प्रेम को कलंक का नाम दे देते हैं। 

    लक्ष्मी अग्रवाल
    लक्ष्मी अग्रवाल
    दिल्ली विश्वविद्यालय से राजनीति विज्ञान में स्नातक, हिंदी पत्रकारिता में स्नातकोत्तर डिप्लोमा तथा एम.ए. हिंदी करने के बाद महामेधा, आज समाज जैसे समाचार पत्रों व डायमंड मैगज़ीन्स की पत्रिका 'साधना पथ' तथा प्रभात प्रकाशन में कुछ समय कार्य किया। वर्तमान में स्वतंत्र लेखिका एवं कवयित्री के रूप में सामाजिक मुद्दों विशेषकर स्त्री संबंधी विषयों के लेखन में समर्पित।

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