सत्यार्थप्रकाश का आर्य हिन्दू धर्म की रक्षा में महत्व व योगदान


मनमोहन कुमार आर्य, देहरादून।

               सनातन वैदिक धर्म का अज्ञान, अन्धविश्वासों, अनेक सामाजिक विकृतियों सहित वेद विरुद्ध मान्यताओं को अंगीकृत कर लेने से बना परवर्तित रूप ही हिन्दू धर्म है। महाभारत काल तक न केवल आर्यावर्त-भारत में अपितु समस्त विश्व में सनातन वैदिक धर्म ही सभी मनुष्यों का अविद्या व अन्धविश्वासों से सर्वथा रहित एकमात्र धर्म था। यह भी जान लेना आवश्यक है कि वेद सृष्टिकर्ता ईश्वर प्रदत्त ज्ञान है जिसे परमात्मा ने सृष्टि के आरम्भ में चार ऋषियों के माध्यम से सभी मनुष्यों के ज्ञान व उनके कर्तव्य बोध के लिये दिया था। वेद की सभी मान्यतायें ज्ञान-विज्ञान युक्त एवं सभी मनुष्यों का कल्याण करने वाली हैं। वेदों का अध्ययन व उसकी शिक्षाओं का आचरण करके ही मनुष्य ज्ञानी होकर धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष को प्राप्त होता है। धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष को प्राप्त करने का वेदाचरण के अतिरिक्त अन्य कोई उपाय, मत, पन्थ आदि साधन नहीं है। महाभारत काल में विद्वानों की भारी क्षति होने के कारण देश की शिक्षा व धर्म व्यवस्था कुप्रभावित हुई जिसके परिणाम से आर्यावर्त देश सहित पूरे विश्व में अज्ञान व अन्धकार फैल गया। समय के साथ इसमें विस्तार होता गया। स्वार्थी लोगों ने इस अवसर का लाभ उठा कर सत्य धर्म वेद में अपने हित को सिद्ध करने के लिये मिथ्या मान्यतायें व परम्परायें जोड़ दी जिसका हिन्दू समाज अब तक वहन करता चला आ रहा है। वेदज्ञान के अभाव से मनुष्य अपने कर्तव्य को भूला हुआ है जिसके परिणाम से वह धर्म को न जानकर धर्म के स्थान पर मिथ्या मान्यताओं व परम्पराओं मे ंजकड़ा हुआ है। इसी का परिणाम बौद्ध व जैन काल में नास्तिकता का प्रचार होना हुआ और बाद में देश छोटे-छोटे राज्यों में विभक्त होकर अरब देशों की ओर से आये लुटरों का शिकार होकर पराधीनता को प्राप्त हुआ जिसमें इसका जन, धन, जीवन स्वतन्त्रता लुटती रही। आज यदि देश में कुछ जागृति व भौतिक उन्नति हुई है तो इसका श्रेय महर्षि दयानन्द के वेद ज्ञान व वेदों के प्रचार को दिया जा सकता है जिसमें वेदों के सिद्धान्तों पर आधारित उनके ग्रन्थ सत्यार्थप्रकाश” का महत्वपूर्ण योगदान है।

               सत्यार्थप्रकाश एक ऐसा ग्रन्थ है जिसे देश के धार्मिक सामाजिक पतन के सभी कारणों का विचार कर उसके समाधानों को अति सरल लोक भाषा हिन्दी में प्रस्तुत किया गया है। मनुष्य के पतन अवनति का कारण अज्ञान अन्धविश्वास ही मुख्यतः होते हैं। चारित्रिक न्यूनतायें भी मनुष्य को दुर्बल समाज को विकृतियों से युक्त बनाते हैं। इन सबकी औषधि उपचार सत्य ज्ञान से ही हो सकता है। महर्षि दयानन्द ने देश के पतन के कारणों में ईश्वर की योग विधि के स्थान पर मूर्तिपूजा, अवतारवाद की कल्पना सिद्धान्त, फलित ज्योतिष, मृतक श्राद्ध, जन्मना जातिवाद, सामाजिक भेदभाव, ऊंच-नीच, छुआ-छूत सहित मुख्यतः वेदों के अध्ययन-अध्यापन में प्रमाद तथा कुछ पात्रता विहिन आचार्यों के वेदों के विद्या से रहित अर्थ करने को माना है। ऋषि दयानन्द ने सत्यार्थप्रकाश में वेदों के सत्य अर्थों के आधार पर मूर्तिपूजा, अवतारवाद, फलित ज्योतिष, मृतक श्राद्ध, सामाजिक असमानता आदि का खण्डन कर ईश्वर उपासना की वैदिक विधि तथा सभी स्त्री-पुरुषों व अन्त्यजों का वेदों में समान अधिकार आदि अनेक विषयों का प्रचार किया। सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ में स्वामी दयानन्द जी की प्रायः सभी मान्यतायें हैं। मनुष्य के हृदय में धर्म, सामाजिक व्यवस्था, भारत के अतीत के इतिहास से सम्बन्धित जितने भी प्रश्न व शंकायें उठती हैं, उन सबका समाधान सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ के पाठकों को मिलता है। इससे पूर्व इसप्रकार का कोई ग्रन्थ न केवल भारत में अपितु संसार में कहीं नहीं था। इस ग्रन्थ में वेद विषयक सभी प्रकार के प्रश्नों व शंकाओं का उत्तर तर्क व युक्ति व प्रमाणों के आधार पर दिया गया है। यह भी बताया गया है कि संसार में ईश्वर एक है और जितने भी देवता विषयक नाम वैदिक साहित्य में आते हैं? वह सब ईश्वर के किसी न किसी गुण व विशेषताओं का बोध कराते हैं।

सत्यार्थप्रकाश में 14 समुल्लास हैं जिसमें प्रथम दस समुल्लासों में वैदिक मान्यताओं को प्रस्तुत कर उनका मण्डन किया गया है और उत्तरार्ध के चार समुल्लासों में प्रथम में आर्यावर्तीय मत-मतान्तरों तथा इतर तीन समुल्लासों में चारवाक-बौद्ध-जैन आदि नास्तिक मतों सहित ईसाई व इस्लाम मत की मान्यताओं का तर्क, युक्ति आदि प्रमाणों के साथ समीक्षा कर लोगों को सत्यासत्य विदित कराया गया है। इसके पीछे ऋषि दयानन्द की अपेक्षा यह है कि मनुष्य सत्य का ग्रहण और असत्य का त्याग करें। आश्चर्य इस बात का है कि सत्यार्थप्रकाश मनुष्य के ज्ञान व सामाजिक उन्नति में सर्वाधिक सहायक है परन्तु मत-मतान्तरों की अविद्या व पक्षपातयुक्त विचारधारा के कारण लोगों ने इसका अध्ययन कर स्वयं को सत्य ज्ञान से संयुक्त व परिचित नहीं किया। बिना सत्य ज्ञान के मनुष्य की उन्नति कदापि नहीं हो सकती। संसार में जितने भी मत-मतान्तरों का अस्तित्व है, वह तभी तक है जब तक कि संसार में धर्म व समाज विषयक सत्य ज्ञान का सर्वत्र प्रचार नहीं होता। कभी न कभी वह समय भी आयेगा जब लोग मत-मतान्तरों से होने वाली हानियों को समझेंगे और मत-मतान्तरों में से असत्य मान्यताओं को दूर कर सत्य मत वेद और सत्यार्थप्रकाश को स्वीकार करेंगे जिससे सर्वत्र सुख व कल्याण का वास होगा। इसके लिये कितनी प्रतीक्षा करनी होगी, कहा नहीं जा सकता। यह कार्य जब भी होगा इसका आधार वेद और सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ ही होगा, विचार करने पर यह निष्कर्ष निकलता है।

अब सत्यार्थप्रकाश में वर्णित विषयों पर एक दृष्टि डाल लेते हैं। प्रथम दश समुल्लास में ईश्वर के नामों की व्याख्या, मंगलाचरण समीक्षा, बाल शिक्षा, भूत-प्रेतादि निषेध, जन्म पत्र सूर्य ग्रह आदि की समीक्षा, अध्ययन-अध्यापन, गायत्री वा गुरु मन्त्र की व्याख्या, प्राणायाम, सन्ध्या-अग्निहोत्र, उपनयन, ब्रह्मचर्य, पठन-पाठन विधि, स्त्री व शूद्रों के अध्ययन का विषय, युवक-युवती का विवाह, गुण-कर्म-स्वभावानुसार वर्ण व्यवस्था, स्त्री-पुरुष व्यवहार, पंच-महायज्ञ, पाखण्ड-खण्डन, पाखण्डियों के लक्षण, पण्डितों के लक्षण, मूर्खों के लक्षण, गृहस्थ धर्म, पुनर्विवाह, नियोग विषय, वानप्रस्थ-संन्यास आश्रम की विधि, राज-धर्म, देश के संचालन के लिए तीन सभाओं, धर्मार्य-विद्यार्य-राजार्य सभाओं, का वर्णन, दण्ड व्यवस्था, राजा व राज्याधिकारियों के कर्तव्य, युद्ध के प्रकार, देश रक्षा, कर ग्रहण, चोर आदि के लिये दण्ड व्यवस्था, ईश्वर विषय, स्तुति-प्रार्थना व उपासना विषय, ईश्वर के ज्ञान के प्रकार, ईश्वर का अस्तित्व, ईश्वर के अवतार का निषेध, शरीरस्थ जीवात्मा की स्वतन्त्रता का उल्लेख, ईश्वर व जीवात्मा की भिन्नता का वर्णन, ईश्वर की सगुण व निर्गुण स्वरूप व उसकी उपासना का वर्णन, वेदों के विषय में विचार व अनेक शंकाओं का समाधान, सृष्टि की उत्पत्ति, पालन व प्रलय का विवरण, सृष्टि की उत्पत्ति का उपादान कारण प्रकृति का उल्लेख, मनुष्यों की आदि सृष्टि के स्थान आदि का निर्णय, ईश्वर का जगत को धारण करना, विद्या-अविद्या, बन्धन-मोक्ष, आचार-अनाचार, भक्ष्य व अभक्ष्य आदि अनेक विषयों को पूर्वार्द्ध के दस समुल्लास में सम्मिलित किया गया है। उत्तरार्ध के चार समुल्लास में मुख्यतः आर्यावर्तीय मतमतान्तरों का खण्डन, नास्तिक-चारवाक-बौद्ध-जैन मत समीक्षा, कृश्चनमत समीक्षा तथा यवन मत समीक्षा को सम्मिलित किया गया है। पुस्तक के अन्त में स्वामी दयानन्द जी ने सभी विषयों पर अपने मन्तव्यों को प्रकाशित किया हैं जो सभी वेदानुकूल हैं। इस ग्रन्थ का अध्ययन कर मनुष्य की सभी शंकायें एवं भ्रम दूर हो जाते हैं और वह इस निष्कर्ष पर पहुंचता है कि मनुष्य का धर्म आर्ष ग्रन्थों के अध्ययन द्वारा सत्य को जानना व उसका आचरण करना है जिसमें वेद, वैदिक साहित्य सहित सत्यार्थप्रकाश का प्रमुख स्थान है।

ऋषि दयानन्दकृत सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ की आर्य वैदिक हिन्दू धर्म’ की रक्षा में प्रमुख भूमिका रही है। ऋषि दयानन्द द्वारा आर्यवर्तीय व अन्य मतों की समीक्षा करने से विधर्मियों द्वारा हिन्दुओं के भय, प्रलोभन, मिथ्या प्रचार आदि छलयुक्त व्यवहार द्वारा किये जाने वाले धर्मान्तरण पर अंकुश लगा। पहले वह आक्रामक होते थे परन्तु सत्यार्थप्रकाश ने उन्हें आत्मरक्षा की स्थिति में लाकर खड़ा किया। आजादी के अजेय क्रान्तिवीर वीर विनायक दामोदर सावरकर जी द्वारा सत्यार्थप्रकाश के महत्व को रेखांकित करते हुए ठीक ही कहा गया है कि सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ की उपस्थिति में कोई मत व उसका आचार्य अपने धर्म व मत की शेखी नहीं बघार सकता। यह स्थिति सर्वथा सत्य है। सत्यार्थप्रकाश के कारण आर्यसमाज ने देश भर में स्कूल, गुरुकुल तथा कन्या पाठशालायें खोलीं जिससे अज्ञान दूर होकर युवक व युवती शिक्षित हुए। अन्धविश्वासों की समीक्षा खण्डन से सभी लोगों को मत-मतान्तरों की निर्बलताओं का ज्ञान होने के साथ सबको वेदों की महत्ता का ज्ञान हुआ। सत्यार्थप्रकाश ने ही सन् 1875 में देश को आजाद कराने की प्रेरणा की थी। जन्मना जातिवाद पर भी आर्यसमाज ने प्रहार किये जिससे इस सामाजिक रोग में कमी आई है। पहले हिन्दू समाज में बाल विवाह होते थे, उस पर अंकुश लगा। सती प्रथा की निरर्थकता का भी आर्यसमाज की विचारधारा से निराकरण हुआ। गुण-कर्म-स्वभाव के अनुसार युवावस्था में विवाह का विचार सत्यार्थव्रकाश ऋषि दयानन्द ने ही प्रस्तुत किया जिसे आज पूरे देश ने प्रायः स्वीकार कर लिया है।

आज जिन्हें अन्तर्जातीय विवाह कहा जाता है उन गुण-कर्म-स्वभाव पर आधारित विवाहों का आरम्भ भी ऋषि दयानन्द, सत्यार्थप्रकाश और आर्यसमाज की विचारधारा से ही हुआ है। कम आयु की विधवाओं के विवाह को प्रचलित करने में भी आर्यसमाज की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। विवाहित स्त्री से सन्तान न होने पर नियोग प्रथा का उल्लेख भी आर्यसमाज ने किया जो अनेक सामाजिक समस्याओं का समाधान करती हैं। स्वामी दयानन्द जी ने सत्यार्थप्रकाश के छठे समुल्लास में राजा व राज्याधिकारियों के गुणों का वर्णन किया था। यह गुण हमारे राजनेताओं व अधिकारियों में किन्हीं कारणों से नहीं आ सके। सत्यार्थप्रकाश की शिक्षाओं का देश की आजादी में महत्वपूर्ण योगदान है। आज अनेक ज्ञान-विज्ञान व व्यवसायिक क्षेत्रों में देश की जो सुदृण स्थिति है उसके पीछे हमें ऋषि दयानन्द की वैदिक विचारधारा व उसके प्रचार का ही परिणाम दृष्टिगोचर होता है। देश ने ऋषि दयानन्द के शुद्धि आन्दोलन विषयक मन्त्र को नहीं अपनाया। इसका दुष्परिणाम भी हम समाज में देख रहे हैं। यदि इस विचार को आजादी से पूर्व अपना लिया गया होता तो देश का विभाजन न होता और आज जो साम्प्रदायिकता सिर उठाती है, वह समस्या भी न होती। पाकिस्तान बनने से वहां हिन्दुओं का जो कत्लेआम हुआ वह भी न होता। सत्यार्थप्रकाश एवं आर्यसमाज की महिमा अपरम्पार है। इसका मूल्यांकन हम जैसे सामान्य व्यक्ति द्वारा करना सम्भव नहीं है। इतना अवश्य कह सकते हैं कि सन् 1863 के बाद से देश में धार्मिक व सामाजिक जगत में जो सुधार कार्य हुए हैं उसका परिणाम ऋषि दयानन्द की वैदिक विचारधारा के प्रचार व उनके लेखन कार्यों को ही है। यदि सत्यार्थप्रकाश होता और ऋषि दयानन्द ने वेद प्रचार को अपने जीवन का लक्ष्य बनाया होता तो देश आज जिस उन्नत अवस्था में है वह कदापि होता। हम ऋषि दयानन्द को सादर श्रद्धान्वत होकर नमन करते हैं। ओ३म् शम्।

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