ऋषि दयानन्द और आर्यसमाज ने विश्व के करोड़ों लोगों को वैदिक धर्म द्वारा सच्चे आध्यात्मिक एवं सांसारिक जीवन जीने का मार्गदर्शन दिया

-मनमोहन कुमार आर्य

मनुष्य सभी प्राणियों में सबसे श्रेष्ठ प्राणी व योनि है। मनुष्य के पास जो मन है वह अन्य प्राणियों की तुलना में विशिष्ट गुणों व शक्तियों से सम्पन्न है। मनुष्य अपने मन से मनन, विचार व चिन्तन कर सकता है जबकि अन्य पशु, पक्षी आदि प्राणी ऐसा नहीं कर सकते। मनुष्य किसी विषय में चिन्तन कर सत्य व असत्य का निर्णय कर सकता है। बच्चा विद्यालय में पढ़ता है। उसको गणित के प्रश्न समझाये जाते हैं। उसको अंकों का योग करना व घटाना भी सिखाया जाता है। अब उसको संख्याओं के योग व घटाने के वह प्रश्न पूछे जाते हैं जो पहले उसे बताये नहीं गये थे। उसे अपनी बुद्धि व मन के सहारे पूछे गये प्रश्नों पर विचार, चिन्तन व मनन के द्वारा प्रश्न के सत्य उत्तर का निर्णय करना होता है और वह धीरे धीरे इस विद्या में निपुण होता जाता है। एक दिन वही बालक गणित का उच्च कोटि का शिक्षक तक बन जाता है। पशुओं को मनुष्यों की भांति भाषा, गणित, विज्ञान व अन्य विषयों को सिखाया नहीं जा सकता और न हि वेद मन्त्रों, गीत व भजनों को रटाया जा सकता है। यहां तक की मनुष्येतर प्राणी तो हमारी तरह भाषा भी नहीं बोल सकते और न ही अपने दुःखों की अभिव्यक्ति ही कर पाते हैं। ऐसे अनेक उदाहरणों से स्पष्ट होता है कि मनुष्य एक मननशील, सत्यासत्य का विवेचन करने वाला तथा सत्य-असत्य का निर्णय करने वाला श्रेष्ठ  प्राणी है।

 

आज का संसार शिक्षा के महत्व को जानता है। अशिक्षित मनुष्य का जीवन पशुओं से कुछ बेहतर वा कुछ कुछ उनके समान ही होता है। शिक्षा प्राप्त व्यक्ति अपनी मातृ भाषा व कुछ अन्य भाषाओं को बोलने व समझने का ज्ञान प्राप्त कर सकता है। बहुत से लोगों को अनेक भाषाओं का ज्ञान होता है। ऋषि दयानन्द जन्म से गुजराती थे। स्वाभाविक रूप से गुजराती उनकी मातृ भाषा थी जिसका वह बोलचाल आदि में सरलता से प्रयोग करते रहे होंगे। उन्होंने अपने ग्राम व निकटवर्ती स्थानों पर संस्कृत व यजुर्वेद आदि का अध्ययन भी किया था। वैराग्य होने पर वह ईश्वर व इश्वरेतर ज्ञान की खोज में घर से चले गयेे। उन्होंने देशाटन किया और योग तथा आध्यात्मिक सच्चे गुरुओं की खोज कर जिनसे जो ज्ञान प्राप्त हुआ, उसे ग्रहण किया। संस्कृत पर उनका असाधारण अधिकार हो गया। वह धारा प्रवाह संस्कृत बोल सकते थे व अपने उपदेश व वार्तालाप संस्कृत में ही करते थे। बंगाल के कलकत्ता स्थान पर जाने पर उन्हें केशवचन्द्र सेन जी ने अपने उपदेशों व लेखन आदि में हिन्दी को अपनाने की प्रेरणा दी। इस उपयोगी प्रस्ताव को उन्होंनें स्वीकार किया और कुछ ही काल पश्चात वह हिन्दी भाषा के अच्छे जानकार, वक्ता व लेखक बन गये। उनकी प्रायः सभी कृतियां हिन्दी या संस्कृत-हिन्दी भाषाओं में हैं। सिद्ध योगियों से योगाभ्यास सीख कर वह योग के सफल अभ्यासी बने थे। सन् 1860-1863 के बीच उन्होंने मथुरा में गुरु विरजानन्द सरस्वती से आर्ष व्याकरण अष्टाध्यायी, महाभाष्य व निरुक्त पद्धति का अध्ययन किया। अब संस्कृत भाषा में उनकी प्रतिभा व सामथ्र्य आशातीत वृद्धि को प्राप्त हुए। गुरु विरजानन्द जी ने विद्याध्ययन पूर्ण होने पर स्वामी दयानन्द जी को देश व समाज से अज्ञान, अन्धविश्वास, कुरीति, सामाजिक असामनता, फलित ज्योतिष आदि मिथ्या विश्वासों को दूर करने की प्रेरणा की। स्वामी दयानन्द जी ने गुरु जी प्रेरणा वा आज्ञा को स्वीकार किया और देश में सत्य वैदिक धर्म का प्रचार आरम्भ कर दिया।

 

स्वामी दयानन्द ने सबको, स्त्री, पुरुष, अन्त्यज, दलित सहित सभी मतों के लोगों को विद्याध्ययन व वेदाध्ययन का अधिकार दिया। उन्होंने प्राचीन काल में प्रचलित गुरुकुलीय शिक्षा पद्धति का उद्धार भी किया। उनके समय में समाज में मूर्तिपूजा, मृतक श्राद्ध, फलित ज्योतिष व भाग्यवाद का प्रचार, बाल विवाह, विधवाओं के विवाह पर प्रतिबन्ध, नारियों के वेदाधिकार का निषेध, दलितों के भी शिक्षा व वेदाधिकार पर प्रतिबन्ध, छुआछूत, जन्मना जातिवाद, पक्षपात व मानव अधिकारों का हनन, विधमिर्यों द्वारा धर्म परिवर्तन, बच्चों व बड़ों को संस्कारित करने की व्यवस्था का अभाव, ब्रह्मचर्य के महत्व से अनभिज्ञता, बहुपत्नी प्रथा, सती प्रथा, वैश्यावृत्ति आदि कुप्रथायें प्रचलित थीं। ऋषि दयानन्द ने इन्हें ईश्वरीय ज्ञान वेद के विरुद्ध बताया और तर्क व युक्ति से इसकी निस्सारता बताते हुए इन सभी का खण्डन किया। समाज में कुछ लोग बुद्धिशील होते ही हैं। लोगों पर उनके खण्डन व वैदिक मान्यताओं के प्रचार का प्रभाव हुआ। संसार में एक सच्चिदानन्द गुण, कर्म व स्वभाव युक्त ईश्वर के अस्तित्व, असंख्य अल्पज्ञ एकदेशी चेतन जीवात्माओं का अस्तित्व तथा सूक्ष्म जड़ त्रिगुणात्मक प्रकृति के अस्तित्व सहित शाकाहार, दुग्धाहार, फलाहार, अन्नाहार, शुद्ध जल का पान, योग की ध्यान विधि व वेदमन्त्रों से ईश्वर के ध्यान व उपासना का प्रचार, अग्निहोत्र, पितृ यज्ञ, अतिथियज्ञ व बलिवैश्वदेव यज्ञ का उन्होंने प्रचार किया। विश्व में सत्यार्थप्रकाश नामक सत्य अर्थों से परिचित कराने वाले धर्म ग्रन्थ की रचना व प्रचार सहित उन्हांेने ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, वेदभाष्य, संस्कारविधि, आर्याभिविनय आदि अनेकानेक ग्रन्थों की रचना व प्रचार किया। मनुष्यों की सभी शंकाओं का वैदिक मान्यताओं के आधार पर समाधान भी उन्होंने किया। पौराणिकों व विधर्मियों से शास्त्रार्थ व वातालाप आदि किये और वैदिक मान्यताओं को मानव जीवन के लिए कल्याणकारी व हितकारी भी सिद्ध किया। देश की आजादी का मूल मंत्र भी स्वामी दयानन्द ने सत्यार्थप्रकाश, आर्याभिविनय, संस्कृतवाक्यप्रबोध व अपने उपदेशों द्वारा देशवासियों को दिया। गोरक्षा व हिन्दी-संस्कृत को अपूर्व महत्व दिया व इन्हें राष्ट्रीय उन्नति में परम सहायक बताया। ऐसे अनेकानेक कार्य स्वामी दयानन्द जी ने देश, समाज व लोगों के जीवन के कल्याण के लिए किए। यह भी बता दें कि स्वामी जी का उद्देश्य केवल भारत और यहां के आर्य हिन्दू निवासियों के कल्याण तक सीमित नहीं था अपितु वह आर्य हिन्दू, मुस्लिम, ईसाई, बौद्ध, जैन व सिख आदि सभी मनुष्यों का कल्याण व परम हित करना चाहते थे। उन्होंने सभी को वैदिक विचारधारा को अपनाने का आह्वान किया। बहुत से लोगों ने अपने पूर्वमत का त्याग कर वैदिक धर्म व आर्यसमाज संगठन को अपनाया और अपनी आत्मोन्नति सहित सामाजिक व बौद्धिक उन्नति की। उनके ही प्रयासों से हिन्दुओं का धर्मान्तरण रूका और देश में आजादी का आन्दोलन चला। पं. श्यामजी कृष्ण वर्मा, स्वामी श्रद्धानन्द, लाला लाजपतराय, भाई परमानन्द, शहीद पं. रामप्रसाद बिस्मिल, सरदार अर्जुन सिंह, सरदार किशन सिंह, सरदार अजीत सिंह, शहीद भगत सिंह, महादेव गोविन्द रानाडे, ज्योतिबा फुले जी आदि या तो उनके साक्षात् शिष्य थे या उनके विचारों व सिद्धान्तों से प्रभावित थे।

 

ऋषि दयानन्द ने सच्चे आध्यात्मिक एवं सांसारिक जीवन को जानने व समझने के लिए ही अपने माता-पिता का सुख-सुविधाओं से भरा पूरा परिवार छोड़ा था और दर दर की खाक छानी थी। वह सफल हुए और घोर तप से उन्हें जो अमृत प्राप्त हुआ, उस संजीवनी से उन्होंने निष्पक्ष भाव से देश व विश्व के लोगों के कल्याण के लिए विश्व के एकमात्र पूर्णतः सत्य मनुष्य धर्म वैदिक धर्म का प्रचार किया जिसे उनके समय व बाद में आर्यसमाज निरन्तर करता चला आ रहा है। जीवन की सभी प्रकार की समस्याओं व शंकाओं का समाधान वेदों से ही सिद्ध होता है। संसार के सभी मत एकांगी हैं तो वैदिक मत व धर्म सर्वांगीण गुण, धर्म वाला धर्म है। वैदिक धर्म से ही ईश्वर व जीवात्मा के ज्ञान, परस्पर व्यापक-व्याप्य संबंध, ईश्वरोपासना आदि के ज्ञान सहित संसार में अभ्युदय एवं निःश्रेयस का मार्ग प्रशस्त होता है। ऋषि दयानन्द जी का जीवन प्राचीन ऋषियों, राम, कृष्ण, चाणक्य जैसा महिमाशाली था। उन्होंने ईश्वर की आज्ञा का पालन करते हुए सत्य वैदिक सिद्धान्तों, मान्यताओं व धर्म का प्रचार किया। संसार के प्रत्येक मनुष्य का यही कर्तव्य है कि वह असत्य का त्याग और सत्य के ग्रहण को करने कराने में अपना जीवन लगाये। ऐसे लोगों के लिए ऋषि दयानन्द जी का जीवन ही आदर्श है। ईश्वर की सच्ची स्तुति, प्रार्थना व उपासना का मार्ग ऋषि दयानन्द ने ही संसार को बताया। अग्निहोत्र का स्वरूप, इसका महत्व व उसके उपयोगी पक्षों से भी ऋषि ने ही देश व संसार को अवगत कराया। पितृयज्ञ, अतिथियज्ञ तथा बलिवैश्वदेव यज्ञ सहित सभी देशोपकारक एवं समाज हितकारी कार्यों का ज्ञान व प्रेरणा ऋषि दयानन्द के जीवन व कार्यों से हमें मिलती है। ऋषि दयानन्द जी का व्यक्तित्व सार्वभौमिक एवं सार्वकालिक है। सभी विश्व के लोगों को उनके जीवन चरित सहित उनके सभी ग्रन्थों को पढ़ना चाहिये और इन सबसे प्रेरणाग्रहण कर वेद और सत्यार्थप्रकाश आदि की शिक्षाओं के अनुसार आचरण करना चाहिये। उनकी बतायी वैदिक विचारधारा को अपनाने पर ही संसार का कल्याण हो सकता है। मत-मतान्तरों की उपस्थिति नये नये विवादों को जन्म देती है। इससे विश्व में पूर्ण शान्ति एवं कल्याण की अपेक्षा नहीं की जा सकती। यह महर्षि दयानन्द द्वारा प्रदत्त विचारों के मंथन का निष्कर्ष है। जिस प्रकार एक सत्य विचारधारा वाले परिवार की उन्नति होती है, परस्पर भिन्न भिन्न विचार रखने वाले पारिवारिक सदस्य में एकता का अभाव होता है, वह परस्पर लड़ते झगड़ते रहते हैं, उनकी आध्यात्मिक उन्नति तो दूर भौतिक उन्नति भी बहुत कम व न के बराबर होती है। इसी प्रकार जिस देश में सभी लोग सत्य व ज्ञानपूर्ण विचारों वाले एकमत होकर मित्रता व सौहार्द के वातावरण में कार्य करते हैं वहीं उन्नति व सुख होता है। तुलसी दास जी ने कहा है ‘जहां सुमति वहां सम्मति नाना जहां कुमति वहां विपत्ति निधाना।’ ऋषि दयानन्द ने अपने जीवन काल में वेदों के प्रचार सहित जो जो कार्य किये, उन्होंने व उनके द्वारा स्थापित आर्यसमाज ने देश व विश्व के करोड़ों लोगों के जीवनों को बदल दिया और वह सब आध्यात्मिक व सांसारिक उन्नति की दृष्टि से सन्तुष्ट व अग्रणीय हैं। जो भी व्यक्ति अपनी सार्वत्रिक उन्नति करना चाहे उसके पास यही विकल्प है कि वह आर्यसमाज के नियमों, सिद्धान्तों व मान्यताओं को जाने और उनका पालन करे। वेदों की शिक्षाओं व नियमों का पालन ही सत्य व धर्म का सच्चा मार्ग हैं। आईये, आर्यसमाज के साथ मिलकर सन्मार्ग के मार्ग पर चलने का संकल्प लें और जन्म-मरण के पाश से मुक्त होकर जीवन लक्ष्य ‘मोक्ष’ को प्राप्त करें। ओ३म् शम्।

 

 

 

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