सवा अरब यह पूछ रहा है

व्यंग्य
— मनोहर पुरी —
कनछेदी, घर से भागी युवा कन्या के पिता की भांति, बहुत परेशान इधर उधर टहल रहा था। पतिव्रता पत्नी से भी नहीं बहल रहा था। कभी अपने हाथ मलने लगता और कभी बाल नोंचने लगता। उसकी हालत उस जेलर जैसी थी जिसे जेल तोड़ कर कैदियों के भागने का समाचार अभी अभी मिला हो। अथवा ऐसा नेता जिसका टिकट अभी अभी कटा हो। मैनें कुछ पल उसे देखा रहा पर मुख से कुछ नहीं कहा। जब नहीं रहा गया तो उसे एक सोफे पर बिठाया। मिट्टी के फ्रिज का शीतल जल पिलाया। वह अविश्वास प्रस्ताव का सामना करती हुई सरकार की भांति अभी लंबी लंबी सांसें भर रहा था। कुछ कहने से भी डर रहा था। मैंने जेब से रुमाल निकाल कर उसके चेहरे से पसीना पोंछा जैसे उसकी पत्नी साड़ी के पल्लू से पोंछा करती है। रुमाल कुछ देर पहले मुझे गठबंधन में सम्मिलित हुई एक नई प्रेमिका अर्थात पार्टी ने संवाददाता सम्मेलन में दिया था। हालांकि मैंने उसके विलय के लिए कुछ नहीं किया था। उसमें से घास के फूलों की भीनी भीनी आने वाली सुगंध किसी भी सांड़ को मदमस्त कर दे, कनछेदी जैसे तृण सरीखे मर्द को तो दूर से ही पस्त कर दे।
मैंने पूछा,‘‘ कनछेदी क्यों तुम इतने अधीर हो। आत्मा कहीं और विचर रही है, मेरे सामने तुम केवल शरीर हो। अपनी आत्मा को वापिस बुलाओ, और मुझे घटनाक्रम विस्तार से समझाओ।’’
‘‘कुछ नहीं भाई साहब! बहुत दिनों से एक खोज में लगा था कि आखिर विपक्षी नेताओं के पास सवा अरब लोग कहां से और कब आते हैं, जो उन्हें मोदी से कोई प्रश्न पूछने के लिए उकसाते हैं। राहुल कहते हैं कि सवा अरब लोग पूछ रहे हैं कि तालिबानी सरकार के विषय में स्थिति स्पष्ट क्यों नहीं करते। अखिलेश कहते हैं कि सवा अरब पूछ रहे हैं कि उनके सामने रोजगार वाले पकवानों की थाली क्यों नहीं धरते। दीदी कहतीं हैं कब वह दोगे जिसका तुमने वायदा किया था, जिनके बदले जनता ने तुम्हें वोटों का अंबार दिया था। कांग्रेस के एक नेता कहते हैं कि सवा अरब प्रतिदिन बैंकों में जाते हैं, परन्तु अपने खातों को खाली ही पाते हैं। कहते हैं पन्द्रह लाख रुपये कब खातों में आयेंगे, जिनसे वह वोटों के बदले की मलाई खायेंगे। बैंकों के चक्कर लगा लगा कर सवा अरब की चप्पलें घिस गई हैं। नोटबंदी के कारण जेबों से नकदी पहले ही रिस गई है।
राहुल बाबा सवा अरब को बताते हैं मोदी चोर है, परन्तु हर चुनाव में उन्हें मिलता नहीं कोई और है। इन नेताओं के पास कोई जगह नहीं जहां सवा अरब आयें, न ही इनकी औकात है कि ये सवा अरब के पास जायें। अभी तो सोशल मीडिया भी कुछ हजारों लाखों तक में ही अटका हुआ है। जरा सी भीड़ हुई तो क्रैश हो जाता है। फिर हर नेता सवा अरब का समर्थन कहां से पाता है।
कनछेदी घूंट घूंट कर पानी पी रहा था, और झूठे नेताओं को कोसता हुआ जी रहा था। बोला,‘‘ मैं रोज उनके कार्यालयों के चक्कर लगा कर थक गया हूं सब ओर सन्नाटा नजर आता है। न कोई वहां आता है न ही जाता है। कहीं कहीं तो कुत्ता भी नहीं मूतता। फिर सवा अरब से मेरे भेजे का पीछा क्यों नहीं छूटता। ’’
‘‘ तुम जानते हो कि आज कल सी सी टी वी कैमरे लगाने का रिवाज है। दिल्ली की तो हर गली, सड़क और नुक्कड़ पर केजवरीवाल का यही अंदाज है। तुम भी कांग्रेस और अन्य दलों के कार्यालयों के बाहर कैमरे फिट कर दो। सवा अरब को पकड़ने की योजना हिट कर दो। ज्यों ही सवा अरब आयेंगे तुम्हें सूचना मिल जायेगी। तुम्हारी समस्या की जड़ तक हिल जायेगी।’’
‘‘पर भाई साहब सवा अरब कैमरे में कैसे आयेंगे। कमबख्त पूरे देश में नहीं समाते किसी कार्यालय, घर अथवा सभा में कैसे समायेंगे।’’
‘‘यही तो मैं तुम्हें समझाने का प्रयास कर रहा हंू। तुम जानते हो राहुल गांधी उस परिवार के युवराज हैं जो कभी झूठ नहीं बोलता। मायावती और दीदी तो स्वयं कहती हैं कि हम कभी झूठ नहीं बोलती। अखिलेश का भी यह दावा है कि केवल योगी जी ही झूठ बोलते हैं। सिद्धू जैसे तो उसके सामने झूठ का तोला तक नहीं तौलते। कुछ तो रहस्य है इनकी बातों में। कोई नई चाल है इनकी घातों में। जब ये कहते हैं कि देश के किसान आत्म हत्या कर रहें हैं, सच ही है कि कहीं न कहीं कुछ तो मर रहे हैं। इसलिए इसकी तह तक जाना जरूरी है, यही तुम्हारी इस गंभीर बीमारी का ईलाज खोजने की मजबूरी है।’’
‘‘जहां तक मेरा प्रश्न है मैं पत्रकार होने के नाते पूछ चुका हूं कि ये सवा अरब कब आपके पास आते हैं, और रात की कौन सी घड़ी में अपना कष्ट बताते हैं। फिर सवा अरब का दुःख एक जैसा क्यों होता है। मैंने तो दो नेताओं अथवा महिलाओं को एक सी बात करतेे नहीं सुना सवा अरब कैसे करेंगे, वही बात सभी के सामने कैसे धरेंगे। तुम्हारी बात में दम तो है। मैं तुम्हारी सहायता वैसे ही करने को तैयार हूं जैसे चीन और पाकिस्तान अफगानिस्तान की करने को मरे जा रहे हैं। रोज नये नये वक्तव्यों की सीढ़ी चढ़े जा रहे हैं।
खैर। हमने विश्व बैंक से लिया उधार, दस जनपथ के बाहर सी सी टी वी कैमरे फिट करवा दिए चार। आखिर सवा अरब के चित्र उतारने का प्राजेक्ट था। विश्व बैंक ने भी नहीं की कोई आनाकानी, और हमें भी नहीं बनानी पड़ी कोई झूठी सच्ची कहानी। उन्हें हम पर उतना अविश्वास था जितना वह पाकिस्तान पर करते हैं। ऋण तो देते हैं पर वसूल करने से डरते हैं। हम भी नहीं लौटायेंगे तो अमेरिका अपनी सेना तो वसूली के लिये नहीं भेजगा जैसे भारतीय बैंक भेजते हैं। ऋण मिला तो हमारा हौसला और बढ़ गया। सभी विपक्षी दलों के कार्यालयों के बाहर हमारे कैमरों का झंड़ा चढ़ गया। मीडिया वाले हैं जान कर किसी ने की नहीं कोई अपत्ति, मीडिया ही तो है , नहीं कोई तालिबानी विपत्ति।
एक सप्ताह में ही सारी बातें खुल गईं,कनछेदी की बांछें खिल गईं। सभी कैमरों ने एक बात समान रूप दिखाई, हर जगह एक ही कार आती थी भाई। काले शीशों वाली इस कार के अंदर कौन आता है और वह सवा अरब को भीतर कैसे बिठाता है। एक दिन हम उस कार के पीछे कांग्रेस कार्यालय में घुस गये। वहां कोई रोकने टोकने वाला था ही नहीं। राहुल बाबा अकेले कमरे में बैठे मक्खियां मार रहे थे, और अपने कोषाध्यक्ष पर भाषण झाड रहे थे। कार से एक भारी भरकम डील डौल वाला व्यक्ति अपने एक छोटे से बच्चे के साथ उतरा। हम बाहर दरवजे पर रुक गये ताकि अंदर की बातचीत सुन सकें। दोनों अंदर गये और एक लिफाफा लिया और बोले,’’ कल मोदी से पूछो तुमने राम मंदिर का वायदा पूरा किया है। धारा 370 भी हटाई है। अब बाकी वायदे कब पूरे करोगे। इतना कह कर वे वापिस लौटे। हमें लगा ये तो सिक्के ही निकले खोटे। उनके चेहरे देखने के लिए जरूरी था उनके सामने जाना, और अपना मतलब समझाना।
अभी वे कार में बैठने ही वाले थे कि हमने उन्हें घेेरा। पत्रकारों की भांति उन पर सवालों का दाना बिखेरा। पूछा ‘‘तुम कौन हो।’’ उन्होंने बहुत सहजता से उत्तर दिया,‘‘ दिखता नहीं हम सवा अरब हैं।’’
‘‘पर तुम तो केवल दो ही हो।’’
‘‘दो नहीं भाई हम सवा हैं। एक मैं और एक चैथाई मेरा बेटा। हुए न सवा।’’ जब तक हमारा ध्यान उनके अरबी परिधान की ओर जाता, बड़े डील डौल वाला बोला,‘‘ मैं एक अरब हूं और यह मेरा बेटा चैथाई अरब है।‘‘
हमें बात कुछ समझ में आने लगी थी। फिर भी पूछा तुम लगातार विपक्षी दलों के कार्यालयों में चक्कर क्यों लगाते हो। और इस लिफाफे में क्या ले जाते हो। लिफाफा अभी तक उसके हाथ में ही था। उसने जल्दी से लिफाफा छिपाते हुए कहा। यह हमारा मेहनताना है। यहां आ कर हमें भी तो कुछ कमाना है। पांच हजार रुपये। चार हजार मेरे और एक हजार इस चैथाई के लिए। इन दिनों पार्टी कुछ आर्थिक संकट में चल रही है इसलिए हमारी मेहनत केवल कमीशन मात्र पर चल रही है।’’
‘‘तुम तो कई विपक्षी कार्यालयों में जाते देखे गये हो।’’
‘‘वास्तव में राहुल जी जब एक चिन्तन कैम्प में थाई लैंड गये तो उन्हें यह आइडिया मिला जिसे उन्होंने अन्य नेताओं के साथ शेयर कर लिया। हम उनके पास भी अपना पारिश्रमिक लेने जाते हैं और उन्हें मोदी जी से पूछे जाने वाले सवाल सुझाते हैं अथवा नये नये आरोप बताते हैं।’’
कनछेदी बहुत प्रसन्न था। हमें बहुत खुशी थी कि हमारे देश के नेता झूठ नहीं बोलते। अपने सच पर अडिग रहते हैं। जब वे सवा अरब कहते हैं तो वास्तव में उनका अभिप्राय सवा अरब से ही होता है।
हमने पूछा,’ तुम तो अरब हो फिर भारत की राजनीति में कैसे आते हो। मोदी के खिलाफ इन नेताओं को क्यों भडकाते हो। उन्होंने झट से अपना आधार और मतदाता कार्ड हमें दिखाया ‘‘बोला मैं हूं यहां का सम्मानित मतदाता, मुझे राजनीति का हर दांव पेंच है आता। यदि स्वीकार हमारा यह आधार है, तो राजनीति में दखल देने का मुझे भी अधिकार है। दो चार को कौन पूछता है पर, सवा अरब की तो होती जय जयकार है।

मनोहर पुरी

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