एक मुकम्मल कोरोना मुक्ति का ख्वाब

-ललित गर्ग-
कोरोना महामारी ने भारत को अपने सबसे खराब और चुनौतीपूर्ण दौर में पहुंचा दिया है। अभी हम दूसरी लहर से निपटने में भी सक्षम नहीं हो पाये हंै कि तीसरी लहर की चुनौती की आशंका अधिक परेशान करने लगी है। केंद्र सरकार के प्रमुख वैज्ञानिक सलाहकार ने तीसरी लहर की पुष्टि कर दी है, इसलिए अब न तो इसमें किसी किंतु-परंतु की गुंजाइश रह गयी है और न ही इसे लेकर हैरानी-परेशानी जताने का कोई मतलब बनता है। देखना यह है कि दूसरी लहर में बरती गयी लापरवाही से सबक लेते हुए हम तीसरी लहर के आने से पहले खुद को और पूरे तंत्र को किस तरह तैयार कर पाते हैं। आजाद भारत में ऐसा संकट इसके पहले कभी नहीं आया। घोर अंधेरों एवं निराशाओं के बावजूद देश कोरोना महामारी को परास्त करने में सक्षम बन रहा है। हौले-हौले नहीं, तेज रफ्तार के साथ सभी स्तरों पर कोरोना को परास्त करने के प्रयत्न हो रहे हैं। स्वयंसेवी संस्थाएं, व्यापारिक घराने अपनी-अपनी जिम्मेदारी का निर्वाह करते हुए रोशनी बन रहे हैं। इन सबके सामुहिक प्रयत्नों से बेहतरी की उम्मीद जागी है।
बात कोरोना की पहली, दूसरी या तीसरी लहर की नहीं है, बात कोरोना महामारी से ध्वस्त हुई व्यवस्थाओं, मनोबल, आर्थिक संरचनाओं एवं पांव फैला रही स्वार्थ एवं लोभ की अमानवीय स्थितियों की है। न सिर्फ लोग बीमार हो रहे हैं और मारे जा रहे हैं, बल्कि स्वास्थ्य सेवाएं भी चरमराती नजर आती हैं। एक तरफ, यह विकरालता है, तो दूसरी तरफ लोगों की दुश्वारियां बढ़ाता रोजगार, उद्योग एवं व्यापार पर आया संकट है। हर नागरिक के जान-माल की रक्षा की जिम्मेदारी शासन पर है, लिहाजा जब उपचार न मिलने से लोगों की जान जा रही थी तो यह शासन की नाकामी ही थी। अब संक्रमण की तीसरी लहर आने की भी आशंका है, इसलिए दूसरी लहर से जूझ रही सरकारों को भी और सक्रियता दिखानी होगी। कायदे से उन्हें दूसरी लहर का सामना करने की भी तैयारी करनी चाहिए थी, लेकिन वे इसमें असफल रहीं। यह असफलता केंद्र और राज्यों, दोनों की है, क्योंकि समय रहते न तो आक्सीजन प्लांट लग सके, न अस्पतालों में बेड बढ़ सके और न ही दवाओं का भंडारण हो सका। ढिलाई सभी सरकारों ने बरतीं, लेकिन अब वे एक-दूसरे पर दोषारोपण में लगी हुई हैं। इस महासंकट से मुक्ति के संघर्षपूर्ण दौर में दोषारोपण की विकृत मानसिकता एक विडम्बना है, एक त्रासदी है एवं दूषित राजनीति का पर्याय है। खेद की बात यह है कि राजनीतिक वर्ग संकट का सामना मिलकर करने के बजाय तू तू- मैं मैं कर रहा है। इससे खराब बात और कोई नहीं कि विभिन्न दल और खासकर कांग्रेस संकट समाधान में सहयोगी बनने के बजाय राजनीतिक बढ़त हासिल करने के फेर में दिख रही है। प्रश्न है कि कब तक देश शासन-व्यवस्थाओं की लापरवाही एवं राजनीतिक दलों के संकीर्ण सोच एवं स्वार्थ की कीमत चुकाता रहेगा?
बेरोजगारी एक बड़ा संकट है। ‘सेंटर फॉर मॉनीटरिंग इंडियन इकोनॉमी’ की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में कोरोना के कहर के बीच बड़े पैमाने पर बेरोजगारी बढ़ी है। सरकारों के पास राहत की कोई तात्कालिक नीति नहीं दिख रही। तो क्या भारत एक नए संकट की ओर बढ़ रहा है, जिसमें जीवन, स्वास्थ्य, भोजन, रोजगार, पर्यावरण, जीवन निर्वाह एवं सांसें सब कुछ दांव पर लगी है। प्रश्न है कि यह जटिल एवं चुनौतीपूर्ण समय शासन की नीतियों की दूरदर्शिता और आपात एक्शन प्लान के दम पर बदला जा सकता है? पिछले चार महीनों में बेरोजगारी की दर आठ फीसदी हो चुकी है। इसमें शहरी इलाकों में साढे़ नौ फीसदी से ज्यादा की दर देखी गई है, तो ग्रामीण इलाकों में सात प्रतिशत की दर। बेरोजगारी के इस संकट से निपटने के लिए अंततः केंद्र को ही एक संबल एवं आश्वासन बनते हुए प्रो-एक्टिव कदम उठाने होंगे, दूरगामी नीति बनानी होगी और इसमें सभी राज्यों एवं आर्थिक, सामाजिक, स्वास्थ्य व विधि विशेषज्ञों को साथ लेना होगा। यह केंद्र-सरकार ही नहीं, राज्यों की सरकारों की कार्यक्षमता, विवेक एवं सुशासन जिजीविषा के लिए भी कडे़ इम्तिहान का वक्त है।
सरकारों पर निर्भरता ही पर्याप्त नहीं है, आम-जनता को भी जागरूक होना होगा। महामारी की दूसरी लहर के समक्ष सरकारें जिस तरह नाकाम हुईं, उसके लिए उन्हें लोगों के आक्रोश का सामना करना ही होगा, लेकिन यह भी ध्यान रहे कि लापरवाही का परिचय देश की जनता की ओर से भी दिया गया, कोरोना महामारी के फैलने में आम जनता की लापरवाही बड़ा कारण बनी है। विडम्बनापूर्ण तथ्य है कि आम और खास, सभी लोगों ने उन आदेशों-निर्देशों की परवाह नहीं की, जो कोरोना से बचने के लिए लगातार दिए जा रहे थे। दूसरी लहर ही विकरालता के बीच लोगों ने अमानवीयता का परिचय दिया। जमकर स्वार्थी लोगों ने दवाओं एवं आॅक्सिजन की जमाखोरी एवं कालाबाजारी की। जिससे भय एवं डर का माहौल ज्यादा बना। बिना जरूरत के भी प्रभावी एवं साधन-सम्पन्न लोगों ने चिकित्सा-सुविधाओं का बेजा इस्तेमाल किया, जिससे जरूरतमंद लोग वंचित रहे और मौत के मुंह में गये।
कोरोना वायरस के कितने और किस-किस तरह के वैरिएंट और आने वाले है, उन सब पर वैज्ञानिक गहन काम कर रही है। लेकिन अच्छी बात यह है कि वायरस के रूप जो भी हों, संक्रमण के उसके तरीकों में किसी बड़े बदलाव की संभावना नहीं है। इसका मतलब यह हुआ कि बचाव के तरीके लगभग वही रहेंगे। यानी दूरी बरतना, लोगों के निकट संपर्क में नहीं आना, मास्क पहनना, बार-बार हाथ धोते रहना, मनोबल बनाये रखना और हां बारी आने पर वैक्सीन जरूर ले लेना। बाजार, शापिंग मॉल, पर्यटन स्थल आदि से बचना होगा, शादी-ब्याह और अन्य सांस्कृतिक, धार्मिक आयोजन को कुछ समय के लिये भूलना होगा। जनता के साथ राजनीतिक वर्ग कोे भी सतर्कता बरतनी होगी। अन्यथा दूसरी लहर की तरह तीसरी लहर की देश को भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है।
पहली एवं दूसरी लहर में जो भूलें हुईं उनसे सबक सीखते हुए यह सुनिश्चित करना ही होगा कि जल्द से जल्द इतनी संख्या में लोगों को टीके लग जाएं, जो हर्ड इम्युनिटी पैदा करने में सहायक हों। इसी के साथ जनता तब तक सचेत रहे, जब तक स्वास्थ्य विशेषज्ञों की ओर से यह न कह दिया जाए कि कोरोना फिर सिर नहीं उठाएगा। ये ऐसे उपाय हैं एवं मानसिकता है जिन पर सतर्क अमल सुनिश्चित कर हरेक व्यक्ति इस महासंकट से निजात पाने में अहम योगदान कर सकता है। मगर पर्याप्त वैक्सीन का उत्पादन और उसकी सप्लाई सुनिश्चित करने, आवश्यक दवाओं की उपलब्धता बनाए रखने और मरीजों के लिए ऑक्सिजन, हॉस्पिटल्स में बेड, डॉक्टर, स्वास्थ्यकर्मी वगैरह का इंतजाम करने की जिम्मेदारी सरकारी तंत्र की ही बनती है। उम्मीद की जाए कि दोनों अपने-अपने हिस्से की जिम्मेदारी का उपयुक्त ढंग से निर्वाह करते हुए तीसरी लहर को शुरू में ही नियंत्रित कर लेंगे। यह सही है कि स्वास्थ्य ढांचे की दुर्दशा के लिए सरकारें ही जिम्मेदार हैं, लेकिन इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि जो अभूतपूर्व संकट खड़ा हो गया है, वह रातों-रात दूर नहीं हो सकता। एक मुकम्मल कोरोना मुक्ति का ख्वाब तभी आकार लेगा जब हर व्यक्ति इसके लिये जागरूक होगा।

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