एक गजल सच्चाई पर

कोई टोपी कोई पगड़ी कोई इज्जत अपनी बेच देता है
मिले अच्छी रिश्वत,जज भी आज न्याय बेच देता है

वैश्या फिर भी अच्छी है उसकी हद है अपने कोठे तक
पुलिस वाला तो बीच चौराहे पर अपनी वर्दी बेच देता है

जला दी जाती है,अक्सर बिटिया सुसराल में बेरहमी से
जिस बेटी के खातिर बाप अपनी  जिन्दगी बेच देता है

कोई मासूम लडकी प्यार में कुर्बान है जिस पर
बना कर विडियो उसको तो प्रेमी बेच देता है

जान दे दी वतन पर जिन बेनाम शहीदों ने
एक भ्रष्ट नेता अपने वतन को बेच देता है

इंसान कितना गिर चुका है अंदाजा नहीं लग सकता
इंसान धर्म इमान तो क्या,बच्चो को भी बेच देता है

जाता है मरीज अस्तपताल में अपना इलाज के लिये
पर डाक्टर आपरेशन के बहाने किडनी बेच देता है

क्यों वसूलते है हफ्ता पुलिस वाले बुरा काम करने वालो से
क्योकि प्रशासन अब नेता से मिलकर थाने बेच देता है

आर के रस्तोगी  

5 thoughts on “एक गजल सच्चाई पर

  1. बहुत देर कर दी| कांग्रेस राज में प्रस्तुत किया होता तो तब साक्षात सच्चाई के शर्मसार दर्शन हुए होते लेकिन आज तो स्वयं अपने पर लज्जित एक सौ पच्चीस करोड़ भारतीय मिल उस सच्चाई की गज़ल को बदलने में लगे हुए हैं!

    1. रूबी जी, “एक गजल सच्चाई पर”आपको बहुत पसद आई इसके लिये आपका बहुत बहुत धन्यवाद|अगर आप अपना ईमेल आई डी दे सके तो आपको और भी इस तरह की गजल प्रेषित कर दूंगा | या अपना व्हाट्स अप नम्बर दे उस पर भी भेज सकता हूँ पर इसमें पहले मेरी वेब साईट पर जान होगा तब आप मेरी गजल पढ़ सकती है |

    2. मेरा अनुरोध है कि हिंदी भाषा का रोमन लिप्यंतरण कभी न करें क्योंकि ऐसा करने से भाषा की आत्मा, देवनागरी लिपि को क्षति पहुँचती है| धन्यवाद |

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