लेखक परिचय

जयराम 'विप्लव'

जयराम 'विप्लव'

स्वतंत्र उड़ने की चाह, परिवर्तन जीवन का सार, आत्मविश्वास से जीत.... पत्रकारिता पेशा नहीं धर्म है जिनका. यहाँ आने का मकसद केवल सच को कहना, सच चाहे कितना कड़वा क्यूँ न हो ? फिलवक्त, अध्ययन, लेखन और आन्दोलन का कार्य कर रहे हैं ......... http://www.janokti.com/

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modi in radioरविवार की सुबह AIR पर “मन की बात” कार्यक्रम में प्रधानमंत्री को सुन रहा था | ऐसा लगा जैसे देश का प्रधान मंत्री नहीं,प्रधान सेवक नहीं बल्कि प्रधान अभिभावक अपने घर के सदस्यों से खाने की मेज पर संवाद कर रहा है |

पुराने समय की एक कहावत है ;एक राजा को “पिता” की भांति अपनी प्रजा को “संतान” मानकर शासन करना चाहिए | ठीक ऐसी ही दूसरी कहावत में राजा को प्रजा का “सेवक” बताया गया है | वर्तमान लोकतान्त्रिक व्यवस्था में भी ये दोनों शर्तें प्रासंगिक है | और इसे चरितार्थ करते दिखाई दे रहे हैं हमारे नये प्रधानमंत्री |

घर का अभिभावक सक्षम हो ,साहसी हो, संवाद कला में निपुण हो, संघर्षशील हो ,ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ हो तो उस घर की सुख,शांति और समृद्धि बनी रहती है | प्रधानमंत्री के दिलो-दिमाग में “ मन की बात “ जैसे कार्यक्रम की कल्पना आई , संवाद की इस प्रक्रिया को उन्होंने शुरू किया है , श्रोताओं के सुझाव को भी शामिल कर रहे हैं तो कहीं न कहीं नागरिकों को  संतोष हो रहा होगा  कि देश की बागडोर योग्य हाथों में है |

दिल को छू लेने वाले अपने 20 मिनट के संबोधन में प्रधानमंत्री ने यह जता दिया है कि वे देश से जुड़े हर मुद्दे पर  भारत रुपी इस घर के सारे सदस्यों को विश्वास में लेकर आगे बढ़ने को संकल्पित हैं |

आजादी के बाद के सरकारों को देखा जाए तो उसमें प्रधानमंत्री का संवाद जनता से 15 अगस्त या फिर 26 जनवरी अथवा यदा-कदा किसी तीज-त्यौहार और किसी बड़े हंगामे पर ही हो पाता था | वो भी एक स्टीरियोटाइप भाषण वाले अंदाज़ में ! कई प्रधानमंत्री भी खुद को जनता से दूर रखना ही अपनी शान समझते थे | एक दौर तो ऐसा आया कि देश के प्रधानमंत्री जरुरी विषयों पर भी बोलने के बजाय चुप रहना ही उचित समझने लगे | परिणाम यह हुआ कि लोकतंत्र में जनता द्वारा चुनी गयी सरकार के मुखिया का जनता से ही कोई सम्बन्ध ना रहा ! क्या एक लोकतंत्र में ऐसा होना लोकतंत्र का अपमान नहीं था ?

वक्त बदला तो भागीदारीयुक्त लोकतंत्र के बढ़ते प्रभाव में जनता ने अपने पसंद का प्रधान चुना जो ना सिर्फ प्रधान है बल्कि उसके घर का अभिभावक भी है | प्रधान होना और अभिभावक होना दोनों दो चीज है | प्रधान सिर्फ आदेश दे सकता है , अभिभावक आपकी जरूरत भी सुन सकता है | प्रधान सिर्फ अपनी बात करेगा अभिभावक सिर्फ आपकी बात करेगा | प्रधान सिर्फ बड़ी समस्याओं का ही हल देख सकता है पर अभिभावक को छोटी-बड़ी समस्या में भेद नहीं करना आता | नया प्रधान , प्रधान भी है ,सेवक भी है और अभिभावक भी |

एक अभिभावक के तौर पर नरेंद्र मोदी को देश के हर समस्या की फ़िक्र है | उन्हें काले धन की भी फ़िक्र है और उन युवाओं की भी , जो नशे के आदि हो चुके हैं | मानसिक और शारीरिक रूप से विशेष सक्षम बच्चों के जीवन को आसान बनाने का उपाय भी सोचते हैं | वर्षा के अभाव में अन्न नहीं उगा पाए किसानों के साथ-साथ उन घरों की भी चिंता करते हैं जिन्हें दो वक्त की रोटी नसीब नहीं हो पाती |

“मन की बात “ कार्यक्रम के दौरान प्रधानमंत्री हर दिल को टटोलते हैं | हर किसी की बात करते हैं | हर घर के  देखभाल में अपना योगदान देना चाहते हैं | हर खुशी में वो खुश होना चाहते हैं और हर दुःख में शामिल होना चाहते हैं | रेडियो संवाद का एक ऐसा माध्यम है जिससे वे भारत के हर घर में  बात कर रहे  हैं , जहाँ वो अपने मन की भावना , अपनी सोच हर नागरिक से बाँट रहे हैं | हर घर का अभिभावक बन रहे हैं |

No Responses to “एक अभिभावक के मन की बात ”

  1. डॉ.अशोक कुमार तिवारी

    अभिभावक सहारा देता है उजाड़ता नहीं है —— बीनू जी आप बिल्कुल सच कह रही हैं – मॉडल राज्य गुजरात में ————– गुजरात में आज भी महिलाओं पर अत्याचार हो रहे हैं – बस पत्रकार बिके हुए हैं —– महामहिम कमलाबेनीवाल पर गलत इल्जाम लगाकर हटाने का षडयंत्र अत्यंत निंदनीय है और सरकार की महिलाओं के प्रति संकुचित मानसिकता की द्योतक भी है ——————————————————-
    सम्पूर्ण देश विशेष करके विकास के रोल मॉडल के तौर पर पेश किए जाने वाले गुजरात की प्रगति सामान्यजन से कितनी जुड़ी है इस पर अगर विचार करें तो:- एक महिला को न्याय न मिलने पर गुजरात की अदालत में ज‌हर पीना पड़ता है (देखिए राजस्थान पत्रिका- 27/2/13, 12/3/13 पेज न.12, 03), एक दूसरी महिला (विनु बेन वाघेला) अपने चार बच्चों के साथ आत्महत्या के लिए साबरमती नदी में कूद जाती है (देखिए राजस्थान पत्रिका- 18-1-13 पेज न.03), एक तीसरी महिला ( ममता गोहेल-24 )आर्थिक तंगी व गृह क्लेश के कारण अपने तीन बच्चों को कुएँ में फेंककर स्वयं आत्महत्या कर लेती है ( देखिए राजस्थान पत्रिका – 15-5-13, पेज नं-12 )
    गुजरात के प्रमुख नेता हीरेन पांड्या की पत्नी जागृति पाण्ड्य जो मोदी साहब के खिलाफ चुनाव भी लड़ी थीं उस व्यक्ति से मिलने जेल जाती हैं जिस पर उनके पति की हत्या का आरोप है और वो इस वारदात से इंकार करके अपने को निर्दोष बताता है ( देखिए द टाइम्स ऑफ इण्डिया – 13 /6 /13 पेज न.01)
    राजकोट पुलिस आयुक्त कार्यालय में कानून की रखवाली करने वाली महिला वकील दिव्या धीरज बेन राठोर ( 25 ) को रिपोर्ट ना लिखे जाने पर हाथ की नस काटकर आत्महत्या का प्रयास करना पड़ता है ( देखिए राजस्थान पत्रिका-16 /7 /13 पेज न-05)
    गुजरात के राजस्व मंत्री आनंदी बेन पटेल के अनुसार गुजरात के सरकारी और निजी कार्यालयों में महिलाएँ सुरक्षित नहीं हैं ( देखिए राजस्थान पत्रिका- 04 /02 /14 पेज न.-03 )
    प्रसूति के बाद महिला पुलिस कर्मियों के स्थानांतरण आदेश पर हाईकोर्ट राज्य सरकार से नाराज तथा गरीब कल्याण मेले में आवंटित प्लॉट 04 सालों से न मिलने पर गुजरात हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को शपथपत्र पेश करने का आदेश दिया है(देखिए राजस्थान पत्रिका-28/3/14, पेज न.03)
    मेहसाणा ( गुजरात )‌ से आम आदमी पार्टी प्रत्यासी “वंदना पटेल” पर तीसरी बार जानलेवा हमला हुआ है ( देखिए – राजस्थान पत्रिका – 24/04/14, पेज- 04 ) मोदी किस भरोसे देश की महिलाओं की सुरक्षा की बात करते हैं ? ? ——— —– अत्यंत पिछ्ड़े और निरक्षर समाजों में भी शिक्षक-शिक्षिकाओं का सम्मान होता है पर के.डी.अंबानी विद्यामंदिर, रिलायंस टाउनशिप, जामनगर (गुजरात) में हिंदी शिक्षक-शिक्षिकाओं के साथ जानवरों जैसा सलूक होता है, उनके बच्चों को शांतिपूर्ण ढंग से बोर्ड की परीक्षा तक नहीं देने दिया जाता है। आकाशवाणी राजकोट के हिंदी वार्ताकार, 25 सालों के अनुभव वाले स्थायी हिंदी शिक्षक को बेइज्जत करके निकाल दिया जाता है, उनके बच्चों को सी.बी.एस.ई. की बोर्ड परीक्षा के समय भी परेशान किया जाता है, देश में भले ही लड़कियों और महिलाओं के लिए कानून हों पर रिलायंस स्कूल में हिंदी शिक्षिका की बेटी को बोर्ड परीक्षा नहीं देने दिया जाता है निर्दोष हिंदी शिक्षिका को अमानवीय प्रताड़नाएँ झेलनी पड़ती हैं क्योंकि [ उन्होंने रिलायंस स्कूल के प्रिंसिपल मिस्टर एस.सुंदरम के हिंदी दिवस (14-9-10) के दिन के इस कथन :- “बच्चों हिंदी राष्ट्रभाषा नहीं है, हिंदी टीचर आपको गलत पढ़ाते हैं।” तथा उसी विद्यालय के प्रतिदिन के प्रात: कालीन सभा में प्रिंसिपल सुंदरम बार-बार यह कहते हैं :– “ बड़ों के पाँव छूना गुलामी की निशानी है, सभी शिक्षक-शिक्षिकाएँ अपनी बड़ी-बड़ी डिग्रियाँ खरीद कर लाते हैं, गाँधीजी पुराने हो गए, उन्हें भूल जाओ, फेसबुक को अपनाओ तथा बच्चों अगर आपके मम्मी-पापा भी आप पर सख्ती करते हैं तो आप पुलिस में केस कर सकते हो ” जैसी बातों से असहमति जताई थी।
    राज्य के शिक्षामंत्री तथा मुख्यमंत्री महोदय से बार-बार निवेदन करने, महामहिम राष्ट्रपति-राज्यपाल, सी.बी.एस.ई. प्रधानमंत्री आदि के इंक्वायरी आदेश आने. के बावजूद कोई निदान नहीं मिला है, सब कुछ दबाकर चीफ सेक्रेटरी गुजरात 2011 से ही बैठे हुए हैं अर्थात राष्ट्रभाषा हिंदी का सवाल एक बहुत बड़ा मुद्दा बनकर उभर रहा है। देश की प्रमुख पार्टियाँ रिलायंस की मुट्ठी में हैं ये बातें रिलायंस के अधिकारी खुले आम करते हैं।

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