शुद्ध साधुता की सफेदी में सिमटा विलक्षण व्यक्तित्व : साध्वीप्रमुखाश्री कनकप्रभाजी

-ः ललित गर्ग:-

इक्कीसवीं सदी तो महिलाओं के वर्चस्व की सदी मानी जाती है। उन्होंने विभिन्न दिशाओं में सृजन की ऋचाएं लिखी हैं, नया इतिहास रचा है। अपनी योग्यता और क्षमता से स्वयं को साबित किया है। उन्होंने राजनीति से लेकर चांद तक अपनी हिम्मत और हौसले की दास्तान लिखकर सिद्ध कर दिया है कि महिलाएं जिस कुशलता से घर का संचालन करती हैं उसी कुशलता से वे व्यापार, राजनीति, शिक्षा, सेवा, चिकित्सा, वकालत आदि हर क्षेत्र में अपनी क्षमताओं का उपयोग कर सकती है। इन वर्षों में अध्यात्म के क्षेत्र में भी उन्होंने एक छलांग लगाई है और जीवन की आदर्श परिभाषाएं गढ़ी हैं। ऐसी ही अध्यात्म की उच्चतम परम्पराओं, संस्कारों और जीवनमूल्यों से प्रतिबद्ध एक महान विभूति का चैतन्य रश्मि का, एक आध्यात्मिक गुरु का, एक ऊर्जा का नाम है- साध्वीप्रमुखा कनकप्रभा। वे जैन धर्म के प्रमुख तेरापंथ संप्रदाय में 19 वर्ष की उम्र में दीक्षित होकर राष्ट्रसंत अणुव्रत अनुशास्ता आचार्य श्री तुलसी की महनीय कृति के रूप में लोकप्रिय है। वे त्याग, तपस्या, तितिक्षा, तेजस्विता, बौद्धिकता, चैतन्यता की प्रतीक हैं, प्रतिभा एवं पुरुषार्थ का पर्याय हैं।
तेरापंथ धर्मसंघ के आचार्यों के निर्देशन में तेरापंथ के विशाल साध्वी संघ का नेतृत्व करने वाली संघ महानिर्देशिका और महाश्रमणी हैं, उनका साध्वीप्रमुखा पद पर मनोयन विक्रम संवत् 2028, माघ कृष्णा त्रयोदशी, शनिवार को राजस्थान के गंगाशहर (बीकानेर) में हुआ, इस वर्ष उनके साध्वीप्रमुखा चयन का गोल्डन जुबली वर्ष है एवं 9 फरवरी 2021 को वे 50वें प्रवेश में करेंगी। तेरापंथ धर्मसंघ में आचार्य का स्थान सर्वोपरि होता है। संघीय संचालन में सहयोग के लिए आचार्य समय-समय पर अंतरंग नियुक्तियां करते हैं। साध्वी समाज की व्यवस्थित सार-संभाल के लिए संघ में साध्वीप्रमुखा के चयन की परंपरा चली आ रही है। साध्वीप्रमुखा की गौरवशाली परंपरा में साध्वीप्रमुखाश्री कनकप्रभाजी पहली ऐसी साध्वीप्रमुखा हैं, जिन्होंने इस दायित्व को पचास वर्ष तक संभालकर अपने वर्चस्वी व्यक्तित्व एवं कर्मशील कर्तृत्व से अपनी विशिष्ट पहचान बनायी हैं।
‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’- मुझे अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो। ज्योति की यात्रा मनुष्य की शाश्वत अभीप्सा है। इस यात्रा का उद्देश्य है, प्रकाश की खोज। प्रकाश उसे मिलता है, जो उसकी खोज करता है। कुछ व्यक्तित्व प्रकाश के स्रोत होते हैं। वे स्वयं प्रकाशित होते हैं और दूसरों को भी निरंतर रोशनी बांटते हैं। साध्वीप्रमुखा कनकप्रभा ऐसा ही एक लाइटहाउस है यानी प्रकाश-गृह है, जिसके चारों ओर रोशनदान हैं, खुले वातायन हैं। प्रखर संयम साधना, श्रुतोपासना और आत्माराधना से उनका समग्र जीवन उद्भासित है। आत्मज्योति से ज्योतित उनकी अंतश्चेतना, अनेकों को आलोकदान करने में समर्थ हैं। उनका चिंतन, संभाषण, आचरण, सृजन, संबोधन, सेवा- ये सब ऐसे खुले वातायन हैं, जिनसे निरंतर ज्योति-रश्मियां प्रस्फुटित होती रहती हैं और पूरी मानवजाति को उपकृत कर रही हैं। उनका जीवन ज्ञान, दर्शन और चरित्र की त्रिवेणी में अभिस्नात है। उनका बाह्य व्यक्तित्व जितना आकर्षक और चुंबकीय है, आंतरिक व्यक्तित्व उससे हजार गुणा निर्मल और पवित्र है। वे व्यक्तित्व निर्माता हैं, उनके चिंतन में भारत की आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक चेतना प्रतिबिम्बित है। आपकी वैचारिक उदात्तता, ज्ञान की अगाधता, आत्मा की पवित्रता, सृजनधर्मिता, अप्रमत्तता और विनम्रता उन्हें विशिष्ट श्रेणी में स्थापित करती हैं। उनकी सत्य निष्ठा, चरित्र निष्ठा, सिद्धांत निष्ठा और अध्यात्म निष्ठा अद्भुत है। अनुशासन और प्रबंधन पटुता से उन्होंने संघ में नए आयाम उद्घाटित किए हैं।
साध्वीप्रमुखाश्री कनकप्रभाजी का जन्म लाडनूं के बैद परिवार में संवत 1998, श्रावण कृष्णा त्रयोदशी को कोलकाता में हुआ। दादाजी का नाम सदासुखजी, पिताजी का नाम सूरजमलजी और मातुश्री का नाम छोटां देवी था। आपका मूल नाम कलाकुमारी था। धार्मिक एवं श्रद्धानिष्ठ अभिभावक जन के योग अपके मन में बचपन से ही धर्म के संस्कार पनपते गये। आपने सहज भाव से खुद को साधना पथ पर अर्पित किया और ज्ञान, ध्यान, अध्ययन, साहित्य सृजन और मौन इस साधना के मूल कर्म बन गये, व्यक्तिगत अपेक्षा मानो कहीं थी ही नहीं जीवन में।
भगवान महावीर के सिद्धांतों को जीवन दर्शन की भूमिका पर जीने वाला एक नाम है साध्वीप्रमुखाश्री कनकप्रभाजी। इस संत चेतना ने संपूर्ण मानवजाति के परमार्थ मंे स्वयं को समर्पित कर समय, शक्ति, श्रम और सोच को एक सार्थक पहचान दी है। एक संप्रदाय विशेष से बंधकर भी आपके निर्बंध कर्तृत्व ने मानवीय एकता, सांप्रदायिक सद्भाव, राष्ट्रीयता एवं परोपकारिता की दिशा में संपूर्ण राष्ट्र को सही दिशा बोध दिया है। शुद्ध साधुता की सफेदी में सिमटा यह विलक्षण व्यक्तित्व यूं लगता है मानव पवित्रता स्वयं धरती पर उतर आयी हो। उनके आदर्श समय के साथ-साथ जागते हैं, उद्देश्य गतिशील रहते हैं, सिद्धांत आचरण बनते हैं और संकल्प साध्य तक पहुंचते हैं।
साध्वीप्रमुखा कनकप्रभा ने वर्तमान के भाल पर अपने कर्तृत्व की अमिट रेखाएं खींची हैं, वे इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में अंकित रहेगी। उन्हें हम साहित्य स्रष्टा के साथ-साथ धर्म क्रांति और समाज क्रांति के सूत्रधार कह सकते हैं। उनके विराट व्यक्तित्व को किसी उपमा से उपमित करना उनके व्यक्तित्व को ससीम बनाना है। उनके लिए तो इतना ही कहा जा सकता है कि वे विलक्षण हैं, अद्भुत हंै, अनिर्वचनीय हैं। उनकी अनेकानेक क्षमताओं एवं विराट व्यक्तित्व का एक पहलू है उनमें एक सृजनकार का बसना। वे एक उत्कृष्ट साहित्यकार हैं। साहित्य-सृजन व संपादन के क्षेत्र में तेरापंथ धर्मसंघ की आप प्रथम साध्वीप्रमुखा हैं। आपमें साहित्य-लेखन और साहित्य-संपादन की बेजोड़ कला है। यह आपकी सजगता और अथक परिश्रम का ही परिणाम है कि आपके द्वारा लिखित साहित्य व संपादित ग्रंथों की एक विस्तृत सूची है जो बड़े-बड़े बुद्धिजीवी, धुरंधर विद्वानों को भी आाश्चर्यचकित कर देती है। काव्य साहित्य में ‘सांसों का इकतारा’ तथा ‘सरगम’ उच्च कोटि की कृतियां हैं। आचार्यश्री तुलसी के यात्रा साहित्य को व्यापक रूप में आपने प्रस्तुत किया है। एक सौ गं्रथों का तुलसी वाङ्मय तथा इस कड़ी में आचार्यश्री तुलसी की आत्मकथा के रूप में ‘मेरा जीवन मेरा दर्शन’ के 20 भाग प्रकाशित होकर आ चुके हैं। यह न केवल तेरापंथ धर्मसंघ बल्कि हिन्दी साहित्य जगत की अनमोल धरोहर है। उन्होंने एक सफल साहित्यकार, प्रवक्ता और कवयित्री के रूप में साहित्य जगत में सुनाम अर्जित किया है।
साध्वीप्रमुखा कनकप्रभा के पास विविध विषयों का ज्ञान भंडार है। उनकी वाणी और लेखनी में ताकत है। प्रशासनिक क्षमता हैं, नेतृत्व की क्षमता है, प्रबल शक्तिपुंज हैं। वे श्रमशीलता का पर्याय हैं। उनकी ग्रहणशीलता भी अद्भुत है। जहां कहीं भी कुछ नया देखा तत्काल ग्रहण कर लिया। उनके व्यक्तित्व एवं कर्तृत्व के सतरंगे चित्र को और अधिक चमकाने वाला गुण है स्फुरणाशील प्रतिभा। उन्होंने अपनी इस प्रतिभा के द्वारा ही विकास के यात्रा पथ पर अगणित द्वीप स्तंभ स्थापित किये हैं। वे जैन शासन की एक ऐसी असाधारण उपलब्धि हैं जहां तक पहुंचना हर किसी के लिए संभव नहीं है। वे सौम्यता, शुचिता, सहिष्णुता, सृजनशीलता, श्रद्धा, समर्पण, स्फुरणा और सकारात्मक सोच की एक मिशाल हैं। कोई उनमें बौद्ध भिक्षुणी का रूप देखता है तो कोई मदर टेरेसा का। कोई उन्हें सरस्वती का अवतार मानता है तो कोई उनमें अरविंद आश्रम की श्री मां और बैलूर मठ की मां शारदा का साम्य देखता है। कोई उनमें महादेवी वर्मा की विशेषता पाता है। उनकी विकास यात्रा के मुख्य तीन पायदान हैं- संकल्प, प्रतिभा और पुरुषार्थ।
जैन साधु-साध्वियां सदैव ही पैदल विचरण करते हैं। वर्तमान अणुव्रत अनुशास्ता आचार्य श्री महाश्रमण पिछले 6 वर्ष में करीब-करीब पूरे देश की पैदल यात्रा कर चुके हैं। साध्वीप्रमुखा कनकप्रभाजी सदैव उनके साथ यात्रा करती हैं। उनकी स्वतंत्र यात्रा के भी अवसर समय-समय पर आते हंै। उनकी पदयात्राओं का उद्देश्य है व्यक्ति-व्यक्ति के मन में अहिंसा, नैतिकता एवं मानवीय मूल्यों के प्रति आस्था जगे। हर आदमी अपने अन्दर झांके और अपना स्वयं का निरीक्षण करे। आज मानवता इसलिए खतरे में नहीं है कि अनैतिकता बढ़ रही है। अनैतिकता सदैव रही है- कभी कम और कभी ज्यादा। सबसे खतरे वाली बात यह है कि नैतिकता के प्रति आस्था नहीं रही। अपनी पदयात्राओं में प्रतिदिन सुबह से शाम तक वे हजारों लोगों से सम्पर्क करती हैं, उन्हें ग्रामीण भाषा में समझाती हैं। उन्हें अपना गौरव प्राप्त करने का, अपने होने का भान कराती हैं। उनका कहना है कि महिला को प्रथम द्वितीय नहीं, उचित दर्जा मिले।
भारतीय समाज में जिन आदर्शों की कल्पना की गई है, वे भारतीयों को आज भी उतनी ही श्रद्धा से स्वीकार हैं। मूल्य निष्ठा में जनता का विश्वास अभी तक समाप्त नहीं हुआ। व्यक्ति अगर अकेला भी हो पर नैतिकता का पक्षधर हो और उसका विरोध कोई ताकतवर कुटिलता और षड्यंत्र से कर रहा हो तो जनता अकेले आदमी को पसन्द करेगी। इन्हीं मूल्यों की प्रतिष्ठापना, उनकी यात्राआंे का उद्देश्य है। त्याग, साधना, सादगी, प्रबुद्धता एवं करुणा से ओतप्रोत आप नारी जाति की अस्मिता की सुरक्षा के लिए तथा मानवीय मूल्यों को प्रतिष्ठापित करने के लिए सतत प्रयासरत हैं। मानो वे मुखवस्त्रिका के पीछे एक और ”मदर टेरेसा“ हैं।
साध्वीप्रमुखा कनकप्रभा की जीवनयात्रा एक संत की, एक अध्यात्मदृष्टि संपन्न ऋषि की तथा एक समाज निर्माता की यात्रा है। इस यात्रा के अनेक पड़ाव है। वहां उनकी सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक, साहित्यिक, शैक्षणिक आदि क्षेत्रों से संबंधित बहुमूल्य दृष्टियां एवं अभिप्रेरणाएं उपलब्ध होती हैं। अध्यात्म से लेकर संस्कार तक, साहित्य से लेकर समाज-निर्माण तक अनुभव गुम्फित है। न केवल आस्था के क्षेत्र में बल्कि व्यक्ति निर्माण एवं समाज निर्माण के क्षेत्र में भी आपके विचारों का क्रांतिकारी प्रभाव देखने को मिलता है। आप सफल प्रवचनकार हैं और आपके प्रवचनों में जीवन की समस्याओं के समाधान निहित हैं। इस तरह हम जब आपके व्यक्तित्व पर विचार करते हैं तो वह प्रवहमान निर्झर के रूप में सामने आता है। उनका लक्ष्य सदा विकासोन्मुख है। ऐसे विलक्षण जीवन और विलक्षण कार्यों के प्रेरक साध्वीप्रमुखा कनकप्रभा पर न केवल समूचा जैन समाज बल्कि संपूर्ण मानवता गर्व का अनुभव करती है।

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