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    बबूल के पेड़ पर आम…!

    -तारकेश कुमार ओझा-
    preeti nes

    फिल्मों की दीवानगी के दौर में कई साल पहले एक बार प्रख्यात गायिका लता मंगेशकर मेरे जिला मुख्यालय में कार्यक्रम देने आई, तो मेरे शहर के काफी लोग भी बाकायदा टिकट लेकर वहां कार्यक्रम देखने गए। लेकिन उनसे एक गड़बड़ हो गई। तब नामचीन कलाकारों के लिए किसी कार्यक्रम में तीन से चार घंटे लेट से पहुंचना मामूली बात थी। लिहाजा मेरे कुछ परिचितों ने सोचा कि क्यों न बहती गंगा में हाथ धोने की तर्ज पर कोई फिल्म भी देख ली जाए। कलाकार तो लेट आते ही हैं। समय का सदुपयोग हो जाएगा। लेकिन फिल्म देख कर निकलते समय उन्हें विपरीत दिशा से लौटती भीड़ नजर आई। पूछने पर पता चला कि लता मंगेशकर बिल्कुल निश्चित समय पर कार्यक्रम स्थल पर आई, और कुछ गाने गाकर लौट भी गई। यह जानकर फिल्म देख कर निकल रहे कलाप्रेमियों को मानो सांप सूंघ गया। उनकी टिकट बेकार गई और लोगों में जगहंसाई हुई, सो अलग। एक कलाकार की अनुशासनप्रियता के इस प्रसंग का उदाहरण मौजूदा दौर की फिल्म अभिनेत्री प्रीति जिंटा के संदर्भ में काफी महत्वपूर्ण हैं, जो इन दिनों एक अप्रिय घटना व विवादों के चलते चर्चा में है। यह नए जमाने का फंडा बन गया है कि तथाकथित बड़े लोग अपने लिए बिल्कुल उन्मुक्त और उच्श्रंखल जीवन चाहते हैं, लेकिन इसकी स्वाभाविक प्राप्ति होने पर आम इंसान की तरह बौखला भी उठते हैं। यानी बबूल के पेड़ पर आम की तलाश करेंगे औऱ न मिलने पर हाय-तौबा मचाएंगे। क्या पता सब कुछ प्रचार पाने के लिए किया जाता हो। वैसे सच्चाई यही है कि प्रीति जिटा की कोई ज्यादा फिल्में नहीं चली। अपने कैरियर के शुरूआती दौर में प्रीति ने असम जाकर आतंकवादी संगठन उल्फा के खिलाफ कुछ बयान दे दिया, तो समाज के एक वर्ग ने उन्हें फौरन बहादुर लड़की का खिताब थमा दिया। एक सिगरेट कंपनी ने उन्हें बहादुरी का पुरस्कार भी दे डाला। देश में होने वाली लोमहर्षक घटनाओं के दौरान प्रीति को मोमबत्ती लेकर चलते और मीडिया में बड़ी-बड़ी बातें करते हुए भी अक्सर देखा-सुना जाता है। वैसे उनकी चर्चा फिल्मों में अभिनय के लिए कम और अाइपीएल खेलों में उनकी भूमिका के लिए ज्यादा होती है। अपनी जीवन शैली से वे पेज थ्री कल्चर का खूब पोषण करती है। जिंटा विवाद के दूसरे पक्ष नेस वाडिया के साथ उनकी जो तस्वीरें मीडिय़ा में आ रही है, उससे पता चलता है कि उनके साथ प्रीति की कितनी नजदीकियां थी। एेसे में बदसलूकी का उनका आरोप रहस्यमय ही जान पड़ता है। खैर रंगीन दुनिया के दूसरे विवादों की तरह जल्द ही यह मामला भी ठंडे बस्ते में चला जाएगा। लेकिन सच्चाई यही है कि प्रीति के अारोपों में सच्चाई होने या न होने के बावजूद इस प्रकरण से उन्हें जबरदस्त प्रचार जरूर मिल गया, जो समाज के लिए एक विडंबना ही है। क्योंकि तथाकथित सेलीब्रिटीज चर्चा में बने रहने के लिए गलत तरीके आजमाने लगे हैं। मी़डिया भी एेसे गाशिप्स को खूब हवा देता है। लेकिन मूर्ख तो बनती जनता ही है।

    तारकेश कुमार ओझा
    तारकेश कुमार ओझाhttps://www.pravakta.com/author/tarkeshkumarojha
    पश्चिम बंगाल के वरिष्ठ हिंदी पत्रकारों में तारकेश कुमार ओझा का जन्म 25.09.1968 को उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले में हुआ था। हालांकि पहले नाना और बाद में पिता की रेलवे की नौकरी के सिलसिले में शुरू से वे पश्चिम बंगाल के खड़गपुर शहर मे स्थायी रूप से बसे रहे। साप्ताहिक संडे मेल समेत अन्य समाचार पत्रों में शौकिया लेखन के बाद 1995 में उन्होंने दैनिक विश्वमित्र से पेशेवर पत्रकारिता की शुरूआत की। कोलकाता से प्रकाशित सांध्य हिंदी दैनिक महानगर तथा जमशदेपुर से प्रकाशित चमकता अाईना व प्रभात खबर को अपनी सेवाएं देने के बाद ओझा पिछले 9 सालों से दैनिक जागरण में उप संपादक के तौर पर कार्य कर रहे हैं।

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