लेखक परिचय

सिद्धार्थ शंकर गौतम

सिद्धार्थ शंकर गौतम

ललितपुर(उत्तरप्रदेश) में जन्‍मे सिद्धार्थजी ने स्कूली शिक्षा जामनगर (गुजरात) से प्राप्त की, ज़िन्दगी क्या है इसे पुणे (महाराष्ट्र) में जाना और जीना इंदौर/उज्जैन (मध्यप्रदेश) में सीखा। पढ़ाई-लिखाई से उन्‍हें छुटकारा मिला तो घुमक्कड़ी जीवन व्यतीत कर भारत को करीब से देखा। वर्तमान में उनका केन्‍द्र भोपाल (मध्यप्रदेश) है। पेशे से पत्रकार हैं, सो अपने आसपास जो भी घटित महसूसते हैं उसे कागज़ की कतरनों पर लेखन के माध्यम से उड़ेल देते हैं। राजनीति पसंदीदा विषय है किन्तु जब समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों का भान होता है तो सामाजिक विषयों पर भी जमकर लिखते हैं। वर्तमान में दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर, हरिभूमि, पत्रिका, नवभारत, राज एक्सप्रेस, प्रदेश टुडे, राष्ट्रीय सहारा, जनसंदेश टाइम्स, डेली न्यूज़ एक्टिविस्ट, सन्मार्ग, दैनिक दबंग दुनिया, स्वदेश, आचरण (सभी समाचार पत्र), हमसमवेत, एक्सप्रेस न्यूज़ (हिंदी भाषी न्यूज़ एजेंसी) सहित कई वेबसाइटों के लिए लेखन कार्य कर रहे हैं और आज भी उन्‍हें अपनी लेखनी में धार का इंतज़ार है।

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यूपीए में नंबर २ का गणित कहीं दिल न दुखा दे

संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन में प्रणब के रायसीना हिल्स की ओर रुख करने के बाद प्रधानमंत्री के बाद कौन की जंग तेज़ हो गई है| पिछले हफ्ते सरकारी वेबसाईट से नंबर दो पर काबिज प्रणब का नाम क्या हटा, शरद पवार का नाम २ नंबर पर देख कई नेताओं के सीने पर सांप लोट गए| किसी को कुछ समझ नहीं आ रहा था कि आखिर यह किसके इशारे पर हुआ? खैर इन्हीं कयासों के बीच गुरूवार को हुई प्रधानमंत्री की कैबिनेट में प्रणब की कुर्सी पर रक्षा मंत्री एके अंटोनी बैठे नज़र आए तो पवार समर्थकों की हवा गुल हो गई| सरकारी वेबसाईट से वह लिस्ट भी गायब कर दी गई जिसमें पवार नंबर २ की पोजीशन पर दिख रहे थे| ज़ाहिर है यह सब प्रधानमंत्री के इशारे पर ही हुआ है लेकिन प्रधानमंत्री को किसने निर्देश दिए होंगे यह बताने की ज़रूरत नहीं है? वैसे पवार ने हाल के दिनों में कांग्रेस के प्रति काफी सहृदयता दिखाई है मगर उनकी सारी सहृदयता मैडम का दिल नहीं पिघला सकी| आखिर पवार ने भी तो उनकी महत्वाकांक्षाओं पर कुठाराघात किया था| अब किसका कितना दिल दुखा यह तो वे ही बता सकते हैं|

 

कांग्रेस का तार-तार अनुशासन

 

मध्यप्रदेश में ९ वर्षों से सत्ता से बेदखल कांग्रेस अभी तक भाजपा का विकल्प बनने में सक्षम नहीं हो पाई है| भ्रष्टाचार के मुद्दे पर शिवराज को घेरने सड़कों पर उतरे कांग्रेसियों ने अनुशासनहीनता की सारी हदें पार कर दी| बात यहाँ तक बिगड़ी कि भूरिया को आंदोलन छोड़ जाना पड़ा| वैसे यह कोई पहली बार नहीं जब भूरिया के नेतृत्व में कांग्रेसियों ने अनुशासन की तमाम मर्यादाओं को तोड़ा हो| लोग तो चटखारे लेने लगे हैं कि जब तक प्रदेश में भूरिया मौजूद हैं कांग्रेस की हालत में कोई ख़ास सुधार नहीं होने वाला| वो तो भला हो मीडिया प्रमुख का कि भूरिया को लेकर स्थानीय मीडिया मुखर नहीं है वरना तो अधिकाँश पत्रकार वार्ताओं में भूरिया की जुबान ही नहीं फूटती| यक़ीनन भूरिया बिल्ली के भाग्य से झींका टूटने की कहावत को चरितार्थ कर रहे हैं|

 

युवराज का होगा पुनर्जन्म

 

कांग्रेस युवराज को कई वरिष्ठ कांग्रेसी बिन मांगे सलाह दे चुके हैं कि वे अब बड़ी जिम्मेदारी लें ताकि सरकार के समक्ष २०१४ के आम चुनाव से पहले सत्ता शीर्ष का असमंजस समाप्त हो| खबर है कि युवराज ने उनकी सलाह को आत्मसात कर मुख्यधारा में आने की स्वीकृति दे दी है| हालांकि इसका मुहूर्त उन्होंने सितम्बर के बाद का चुना है ताकि राष्ट्रपति चुनाव, उपराष्ट्रपति चुनाव और संसद का मानसून सत्र बिन व्यावधान गुजर जाए| आखिर ४० वर्ष का कथित युवा प्रौढ़ कांग्रेस में एंट्री मारने को तैयार हो ही गया| वैसे भी राजनीति में आगे जाने के लिए बचपने को परे छोड़ना ही पड़ता है| लगता है युवराज यह बात समझ गए हैं|

 

दागियों की शरण में संघ-भाजपा

 

भाजपा का राष्ट्रपति चुनाव में उधार के प्रत्याशी पीए संगमा को समर्थन देने से यह संदेश गया कि संघ भी संगमा की शरण में चला गया है| कहने वाले तो यहाँ तक कहते दिखे कि हमेशा हिंदुत्व का राग अलापने वाले संघ-भाजपा को ईसाई संगमा का समर्थन करने की कौन सी मजबूरी थी? क्या कांग्रेस माता का विदेशी मूल का मुद्दा उठाकर संगमा हिंदुत्व के प्रहरी हो गए है? खैर जो होना था वो हुआ पर जिन्ना की शान में कसीदे गढ़ने वाले और भाजपा से निष्कासित व पुनार्विस्थापित जसवंत को उपराष्ट्रपति का उम्मीदवार बनाकर संघ-भाजपा ने यह साबित कर दिया है कि दागियों का शरणागत होना ही अब इनकी नियति बचा है| चूंकि इनके अपने स्वयंसेवकों पर विवादों के घेरे छा जाते हैं लिहाजा संघ-भाजपा अपनी चाल, चेहरा और चरित्र बदलने हेतु आमादा हैं|

 

ये टाईम-टाईम की बात है

 

इन दिनों टाईम का बड़ा जलवा है| किसी जमाने में अटल बिहारी वाजपेयी को मुख्यपृष्ठ पर स्थान देने वाली टाईम पत्रिका भारतीयों की मनःस्थिति समझ चुकी है| विवादों से कुछ हो न हो प्रचार खूब मिलता है कि तर्ज़ पर वह बड़े विवादित नामों को मुख्यपृष्ठ पर स्थान देकर खूब लोकप्रियता बटोर रही है| मोदी, ममता और अब मनमोहन को लेकर उसके लेखन ने भारत में राजनीति का पारा तो चढ़ाया ही, आर्थिक संकट से जूझ रही टाईम को भी संजीवनी मिल गई| विदेशी बयानबाजी को लेकर अपना भविष्य तय करने वाली राजनीति के कथित कर्णधार सुन रहे हैं क्या?

 

पत्रकारिता की साख पर सवाल

 

बीते सोमवार गुवाहाटी में देर शाम बार के बाहर एक नाबालिक युवती को २० दरिंदों ने आधे घंटे तक जिस तरह से अपनी हवस का शिकार बनाना चाहा उससे राज्य की सुरक्षा व्यवस्था की पोल तो खुली ही, मीडिया की भूमिका भी इस मामले में संदेहास्पद हो गई है| स्थानीय टेलीविजन चैनल के रिपोर्टर का नाम इस घटना से जोड़ा जा रहा है| आरोप है कि उसने टीआरपी के चक्कर में भीड़ को उकसाया, साथ ही बेफिक्र हो घटना का वीडियो भी बनाया| टीआरपी की जंग के दुष्परिणाम पूर्व में भी सामने आ चुके हैं और इन पर लगाम लगाए जाने की चर्चा भी है, लेकिन किसी की इज्जत को तार-तार करने का यह अपनी तरह का एकलौता मामला है| जाहिर है मीडिया की साख पर सवाल तो उठने ही हैं|

 

आखरी दांव

 

उत्तरप्रदेश की राजनीति को हिलाकर रख देने वाले मधुमिता हत्याकांड में नैनीताल उच्च न्यायालय ने बाहुबली अमरमणि त्रिपाठी और उनकी धर्मपत्नी मधुमती त्रिपाठी व अन्य की उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा है| यानी कानून ही ऐसी संस्था शेष है जहां कुटिल राजनीतिक चालें काम नहीं आतीं|

सिद्धार्थ शंकर गौतम

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