वायु प्रदूषण स्वास्थ्य के लिए बड़ी चुनौती

air pollutionप्रकृति  ने हमें स्वच्छ वायु, धरा व स्वच्छ आकाश से नवाजा है | अत: प्रकृति के इन अनमोल तोहफों को संजो कर रखना हर व्यक्ति का कर्तव्य ही नही अपितु धर्म है | भारतीय संविधान में इसी सोच से नागरिकों की कर्तव्य सूची में पर्यावरण की रक्षा करना हर व्यक्ति का दायित्व बनाया गया है | भारतीय संविधान के अनुच्छेद 51-A (g) में प्रत्येक नागरिक का दायित्व निर्धारित किया गया है कि “वह प्राकृतिक पर्यावरण खास कर जंगल, झीलें, नदियाँ और वन्य प्राणी की सुरक्षा व सुधार के आलवा सभी जीवों के प्रति करुणावान रहे” |    

वर्तमान केन्द्रीय सरकार ने पर्यावरण की इस बिगड़ती हुई दशा को मध्यनजर रखते हुए ‘स्वच्छ भारत’ अभियान की सोच उजागर की | इसी संदर्भ में गंगा सफाई अभियान भी सुर्खियाँ बना | कितनी विडम्बना है कि जिस गंगा माँ को हम अपने पापों की हरणी मानते है उसी गंगा नदी में हम हर किस्म का गंद डालते है | दूसरी तरफ जिस बेटी को हम दुर्गा का रूप मान कर पूजते हैं उसी की भ्रूण हत्या करते हैं | मोदी सरकार ने स्वच्छता अभियान को झाड़ू तक ही सीमित रखा, शायद इसलिए कि उनके घोर विरोधी राजनितिक दल आम आदमी पार्टी का चुनाव निशान झाड़ू है | शायद आम आदमी पार्टी को उसी के हथियार से मात देने के उद्देश्य से मोदी ने सभी के हाथों में झाड़ू थमा दिया |

यह शायद हमारे नेताओं का दोगलापन है जिस कारण किसी भी राजनितिक दल ने वायु प्रदूषण को अपने घोषणा पत्र का हिस्सा नही बनाया | स्वच्छ भारत की बात करने वाले यह भूल गये कि जहाँ वे रहते हैं वहां की हवा दुनिया के किसी भी शहर से ज्यादा प्रदूषित है परन्तु फिर भी दिल्ली के चुनाव दंगल में यह मुद्दा नही | शायद नेता भी जानते है कि दिल्ली के लोगों को अब धीमा ज़हर सूंघने की आदत बन गयी है |

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार दुनिया के 20 सबसे ज्यादा प्रदूषण वाले शहरों में से 13 शहर भारतवर्ष में स्थित है | भारत की राजधानी दिल्ली शहर जहाँ पौने दो करोड़ दिल धड़कते हैं वहां की वायु विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानकों से 14 गुना अधिक प्रदूषित है | भारत की राजधानी दिल्ली में रहने वाले 50% बच्चे सांस से सम्बंधित बिमारियों से ग्रस्त है | दिल्ली के अलावा अन्य अत्यधिक शहरों में कलकत्ता, मुंबई व चेन्नई का नाम शामिल है | भारत में साल 2010 के दौरान 62 लाख व साल 2014 के दौरान 70 लाख लोग वायु प्रदूषण से होने वाली बिमारियों के कारण समय से पहले जान गवां बैठे | जाहिर है कि वायु प्रदूषण जन स्वास्थ्य के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है जिस के लिए विश्व भर में चिंता जताई जा रही है |

कितनी विडम्बना है कि राजनेता अस्पताल बनाने व अधिक चिकित्सक भर्ती करने की बात तो करते हैं परन्तु ऐसे उपाय करने के बारे में नही सोचते जिससे अस्पताल व चिकित्सकों की आवश्यकता न पड़े | अर्थात जनता के स्वास्थ्य के लिए जो बुनियादी जरूरतें है उनकी पूर्ति करना उनका मकसद नही है परन्तु वोट बटोरना उनका धेय्य है |

हालाँकि वायु प्रदूषण मापने हेतु भारतवर्ष के 25 राज्यों व 4 केंद्रीय शासित प्रदेशों के 115 शहरों में 308 केंद्र स्थापित किये हैं जो कि समय-समय पर पर्यावरण की सेहत से सम्बंधित जानकारी उपलब्ध करवाते रहते हैं परन्तु सरकारें वायु प्रदूषण की ओर उतनी चिंतित नही है जितनी बड़ी यह चुनौती है | कार्यपालिका व विधानपालिका से ज्यादा तो न्यायपालिका ने पर्यावरण को सुरक्षित रखने हेतु कारगर प्रयास किये हैं | साल 1991 में भारत के उच्चतम न्यायालय ने सुभाष कुमार बनाम बिहार राज्य केस” में यह फैसला दिया था कि वायु व जल प्रदूषण रहित पर्यावरण की उपलब्धता मानव जीवन के लिए आवश्यक है | अत: यह नागरिकों को दिए मौलिक अधिकार भारतीय संविधान के अनुच्छेद – 21 में आता है | इसलिए कोई भी नागरिक स्वच्छ जल व वायु प्राप्त करने हेतु भारतीय संविधान के अनुच्छेद – 32 के अंतर्गत सीधे उच्चतम न्यायालय की शरण ले सकता है |

हाल ही में राष्ट्रीय ग्रीन बैंच ने हिमाचल प्रदेश में 447 पेड़ काटने के लिए जमीन मालिक को 20 लाख रूपए हर्जाना डाला तथा जंगल विभाग को आदेश दिए कि पर्यावरण की क्षतिपूर्ति की जाए | इस प्रकार न्यायालय ने यह बता दिया कि पर्यावरण किसी व्यक्ति विशेष की सम्पति नही बल्कि यह पूरी मानवजाति की धरोहर है जिसकी हिफाज़त करना हर व्यक्ति का दायित्व बनता है | न्यायपालिका ने ग्रीन बैंच की स्थापना करके यह संदेश दिया है कि पर्यावरण को नुक्सान करने वाले समस्त प्राणी जगत के दुश्मन है | इस संदर्भ में उच्चतम न्यायालय ने साल 1997 में एम. सी. मेहता बनाम भारत सरकार केस” में “Polluter Pays का सिद्धांत उजागर किया जिसके तहत प्रदूषण फैलाने वाले केवल पीड़ितों को राहत के जिम्मेवार नही बल्कि पर्यावरण क्षतिपूर्ति के लिए भी उतरदायी है | एक अन्य केस वैलोर सिटिज़न वेलफेयर फोरम बनाम भारत सरकार” 1998 में उच्चतम न्यायालय ने दिल्ली शहर में डीज़ल से चलने वाली बसों, टैक्सियों व तीन पहिया वाहनों पर 2001 से पाबंदी लगा दी थी तथा डीज़ल के स्थान पर CNG प्रयोग करने का आदेश दिया था | जिस के फलस्वरूप दिल्ली की वायु में सल्फर डायोक्साईड की मात्रा में कमी देखी गयी | भारतवर्ष के लिए कितनी शर्म की बात है कि अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा की भारत यात्रा के दौरान अमरीकी एजेंसी ने 1800 वायु-शुद्धिकरण संयत्र खरीदे | जाहिर है बराक ओबामा ने दिल्ली की वायु को अपने स्वास्थ्य के लिए हानिकारक माना | ग्रीनपीस विश्व गैर सरकारी संस्था ने भी राजघाट व हैदराबाद हॉउस, वहां ओबामा ने जाना था, की वायु को सेहत के लिए हानिकारक माना |

यदि वायु प्रदूषण रहित वातावरण तैयार करना है तो बढ़ती जनसंख्या के साथ-साथ वाहनों की बढ़ती संख्या पर विराम लगाना होगा तथा विकास के नाम हो रहे प्रकृति के विनाश को रोकना होगा | यदि समय रहते हमने उस ओर कारगर कदम नही उठाये तो वे दिन दूर नही जब प्रकृति सम्पूर्ण मानवजाति को अपने आगोश में ले लेगी |

विषय की गंम्भीरता को देखते हुए हाल ही में दिल्ली के उच्च न्यायालय ने मीडिया की इस खबर पर स्वयं संज्ञान लेते हुए सरकार से पूछा है कि कौन-कौन विभाग हैं जो वायु प्रदूषण की अधिकता के लिए जिम्मेवार है | अत: उम्मीद की जाती है कि एक बार फिर न्यायपालिका नागरिकों के मौलिक अधिकार “जीने का अधिकार” के संरक्षक बन कर आगे आएगी | लोगों को वायु प्रदूषण के रूप में फैले धीमे ज़हर को राहत देने का आदेश देश के हुक्मरानों को देगी | आओ हम सब मिल कर प्रकृति के दिए पर्यावरण के रूप में उपहार को स्वच्छ रखने का संकल्प लें |  

बी. आर. कौंडल

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