अजातशत्रु संपादक आचार्य शिवपूजन सहाय

-वीरेन्द्र परमार
बहुआयामी प्रतिभा के धनी साहित्य मनीषी आचार्य शिवपूजन सहाय सरस्वती के ऐसे वरद पुत्र थे जिन्होंने लगभग आधी शताब्दी तक हिंदी साहित्य की सेवा की I यह आश्चर्य की बात है कि इतने दिनों तक सारस्वत अनुष्ठान में लीन रहनेवाला लेखक मात्र सोलह कहानियाँ एवं एक उपन्यास ही हिंदी-मंदिर में समर्पित कर सका, लेकिन इसका कारण भी स्पष्ट है I आचार्य शिवपूजन सहाय का अधिकांश समय संपादन–संशोधन में ही व्यतीत हुआ I उन्होंने अपनी प्रतिभा का अधिकांश दूसरों की कृतियों के संशोधन और परिमार्जन में लगा दिया I उन्होंने कामायनी, रंगभूमि जैसी महान कृतियाँ का संशोधन किया था और भाषा के संबंध में आवश्यक परामर्श दिए थे I “शिवजी ने शायद अपने जीवन मे हजारो पृष्ठ लिखें, परंतु उन्होंने काली स्याही की अपेक्षा लाल स्याही का ही उपयोग किया–गरज कि दूसरों के लिखे हुए को सुधारने– संवारने में ही उनके जीवन का अधिकांश समय गया और इस प्रकार पिछले पचास साल में उन्होंने सैकड़ों पुस्तकों का संपादन किया, लेख सुधारे, प्रूफ देखे I प्रूफ के दो ही पंडित हिंदी में माने जाते थे–एक शिवजी और दूसरे शांति प्रिय जी I”( श्री माधव-परिषद पत्रिका, जुलाई 1963 ) आचार्य जी ने जिस विधा को स्पर्श किया, वह धन्य हो गई I वे एक कुशल संपादक, व्याकरण के निष्णात पंडित और गंभीर भाषाविद थे I युगपुरुष मुंशी प्रेमचन्द के काल में ही शिवपूजन सहाय ने सर्वथा नवीन तकनीक पर आधारित उपन्यास “देहाती दुनिया” की रचना की I हिंदी साहित्य में पहली बार आचार्य सहाय ने लोकजीवन को इतना मुखर बनाया I उन्होंने पारदर्शी भाषा में भोजपुर अंचल का जीवंत चित्रण प्रस्तुत किया है I यह प्रेमचन्द की परंपरा से बिल्कुल अलग हटकर किया गया प्रयास था I यद्यपि रेणु के “मैला आंचल” के प्रकाशन के उपरांत आंचलिकता एक साहित्यिक धारा के रूप में प्रतिष्ठित हो गई परंतु इसके बीज पूर्ववर्ती साहित्य मे विद्यमान थे I सर्वप्रथम आचार्य सहाय ने “देहाती दुनिया“ में उस बीज को आकार दिया I देहाती दुनिया उपन्यास के अतिरिक्त उनकी निम्नलिखित सोलह कहानियाँ हैं:-हठ भगत जी, अनूठी अंगूठी, तोता मैना,वीणा, विचार चित्र, मुंडमाल, सतीत्व की उज्ज्वल प्रभा, विषपान, हतभागिनी चंद्रतारा, प्रायश्चित, खोपड़ी के अक्षर, कुंजी, शरणागत रक्षा,मानमोचन, कहानी का प्लाट, बुलबुल और गुलाब I बक्सर जिले के उनवांस नामक गाँव में 9 अगस्त 1893 को आचार्य सहाय का जन्म हुआ था I इनके पिता का नाम वागीश्वरी दयाल था I उनका शैशवकाल गरीबी में व्यतीत हुआ I 1913 में उन्होंने मैट्रिक परीक्षा पास की I इसके बाद वे बनारस कचहरी में हिंदी नकलनवीस के पद पर नियुक्त हो गए I 1917 ई. में वे आरा टाउन स्कूल मे अध्यापक नियुक्त हुए I असहयोग आन्दोलन 1920 में आरम्भ हुआ I शिवपूजन सहाय तब आरा के टाउन स्कूल में हिंदी शिक्षक थे I चतुर्दिक राष्ट्रीयता की भावना हिलोरें ले रही थी I वे हाई स्कूल से असहयोग कर नेशनल स्कूल मे चले गए I फिर 1921 ई. में इसे भी छोड़ दिया और कलकत्ता चले गए I वे “मारवाड़ी सुधार” पत्रिका का संपादन करने लगे I इस पत्रिका के संपादन के दौरान वे बाबू महादेव प्रसाद सेठ, मुंशी नवजादिक लाल श्रीवास्तव और महाकवि निराला के संपर्क में आए एवं कुछ ही दिनों में वे इनके अन्तरंग बन गए I जब श्री हेमचन्द्र जी जोशी के संपादन में “मारवाड़ी अग्रवाल” नामक मासिक का प्रकाशन होने लगा तब लगातार ढाई साल तक चलने के बाद “मारवाड़ी सुधार” बंद हो गया I “मारवाड़ी सुधार” के बंद होने के बाद मतवाला मंडल की हास्य रस प्रधान पत्रिका “मतवाला” का प्रकाशन शुरू हुआ I महादेव प्रसाद सेठ के विशेष अनुरोध पर शिवपूजन सहाय इसके संपादक बनाए गए परन्तु संपादक के रूप में इस पर महादेव प्रसाद सेठ का नाम छपता था I कुछ ही दिनों में इस पत्रिका ने हिंदी जगत में धूम मचा दी I मतवाला ने बड़े- बड़े महारथियों की खबर ली थी और दिग्गज लोगों को भी भय बना रहता था कि “मतवाला” कहीं उनकी टोपी न उछाल दे I अप्रैल 1925 में आचार्य सहाय ने मतवाला मंडल छोड़ दिया और लखनऊ आकर “माधुरी” के सम्पादकीय विभाग में काम करने लगे I पंडित रूप नारायण पाण्डेय “माधुरी” के संपादक थे I “माधुरी” में कुछ माह काम करने के बाद वे पुनः कलकत्ता लौट आए I एक वर्ष के कलकत्ता प्रवास में उन्होंने “मौजी”, “गोलमाल”, “उपन्यास तरंग”, “समन्वय” आदि पत्रिकाओं का संपादन किया तथा 1926 ई. के प्रारंभ में पुस्तक भंडार (लहेरियासराय, दरभंगा) की साहित्यिक पुस्तकों और उसके “बालक” नामक साहित्यिक मासिक पत्र को ज्ञानमंडल प्रेस में छपवाने के लिए काशी चले गए I काशी प्रवास के दौरान शिवजी प्रेमचन्द और जयशंकर प्रसाद के निकट संपर्क में आए I सहाय जी को रायकृष्ण दास, लाला भगवान दीन, रत्नाकर जी, रामचंद्र शुक्ल, बाबू श्याम सुन्दर दास, विनोद शंकर व्यास आदि हिंदी के शीर्षस्थ साहित्यकारों का सान्निध्य लाभ मिला I महाकवि प्रसाद के यहाँ नित्य जमनेवाली साहित्यिक मंडली में आचार्य शिवपूजन सहाय का कितना महत्व था, इसके संबंध में पं. विनोद शंकर व्यास ने लिखा है–“शिवजी स्वभाव के बड़े सरल हैं, अतएव बहुत जल्दी सबके प्रिय बन जाते हैं I उनमें अभिमान और अहंकार तनिक भी नहीं है, इसीलिए सह्रदयों को अपने समीप खींच लेते हैं I प्रसाद जी का बहुत निकट स्नेह उन्हें प्राप्त था I काशी में रहने पर हमलोगों के किसी भी जमघट में शिवपूजन न हों, ऐसा कभी न होता था I हमलोगों की मंडली मे शिवपूजन जी का सम्मान विशेष रूप से था I पुस्तकों के प्रकाशन तथा संपादन का कार्य वे ही करते थे I इसलिए मेरी और प्रसाद की लिखी अधिकांश रचनाओं से वे परिचित थे I उनका निर्णय ही अंतिम समझा जाता था I प्रसाद जी जब कुछ नई रचना प्रस्तुत करते तब शिवपूजन जी को सुनाए बिना उन्हें संतोष नहीं होता था I” आचार्य सहाय ने प्रेमचंद का भरपूर स्नेह पाया था I उन्होंने प्रेमचंद के उपन्यास “रंगभूमि” का संपादन किया था और उनकी पत्नी शिवरानी देवी के एक गल्प संग्रह की भूमिका भी प्रेमचंद ने शिवपूजन जी से लिखवायी थी I“ 1930 में पं. रामगोविंद त्रिपाठी के विशेष आग्रह पर मासिक पत्रिका “गंगा “ के संपादक होकर सुल्तानगंज चले गए I कुमार कृष्णनंदन सिंह बहादुर इस पत्रिका के संरक्षक और पं. रामगोविंद त्रिपाठी वेदांतशास्त्री इसके प्रधान संपादक थे I “गंगा” के प्रवेशांक में आचार्य शिवपूजन सहाय ने अपनी रामकहानी को इस प्रकार व्यक्त किया है–“पहले पहल मैंने लगातार दो साल तक आरा से प्रकाशित एवं सम्प्रति समाधिस्थ सचित्र मासिक पत्र ‘मारवाड़ी सुधार’ का संपादन किया था I वह केवल लक्ष्मीपात्र मारवाड़ी भाइयों की उदासीनता से बंद हो गया I इसके बाद मै कुछ दिन कलकतिया ‘मतवाला’ के सम्पादकीय विभाग में रहा और कुछ दिन लखनवी ‘माधुरी’ के साथ I फिर दुबारा कुछ दिन ‘मतवाला’ के साथ रहा I उन दिनों कलकत्ता में रहते हुए मैंने छह – छह महीनों तक ‘आदर्श’ और ‘उपन्यास तरंग’ नामक मासिक पत्रों का संपादन किया था I अंत में एक साल तक अस्तंगत ‘समन्वय’ के सम्पादकीय विभाग में खटकर काशी चला आया जहाँ लगभग चार- पांच वर्ष तक लगातार हिंदी पुस्तक भंडार (लहेरियासराय) का साहित्यिक कार्य संपादन करता रहा हूँ, बल्कि पांचवे वर्ष में सात महीनों तक मुझे ‘बालक’ के संपादन का सौभाग्य भी प्राप्त रहा है I इस प्रकार सात घाट का पानी पीने के बाद आज मैं गंगा के घाट पर पहुंचा हूँ I यदि इस घाट पर भी मेरी साहित्यिक प्यास न बुझी तो भला ऊसर में गंगा के आने का लाभ मै क्या समझूंगा I मुझे तो विश्वास है कि जैसे जह्नु आश्रम से निकलकर पार्थिव गंगा की धारा कहीं नहीं रुकी है वैसे ही जह्नु आश्रम से निकलनेवाली इस साहित्यिक ‘गंगा’ की धवल धारा भी अजस्र भाव से बहती रहेगी और इस ऊसर बिहार के शुष्क साहित्य क्षेत्र को सरल- सुखद ‘नंदन वन’ बनाकर ही दाम लेगी I इस महत्वाकांक्षा को ईश्वर ही पूरा करें तो कर सकते हैं I“
1932 ई. में शिवपूजन जी “गंगा” छोड़कर पुनः काशी लौट आए एवं पाक्षिक “जागरण” का संपादन करने लगे I इस पाक्षिक के प्रवेशांक में उन्होंने लिखा–“हममें न कोई चमत्कारपूर्ण प्रतिभा है, न कोई विलक्षण शक्ति, केवल औढरदानी विश्वनाथ का अटल भरोसा, जिसकी राजधानी से यह “जागरण” प्रकट हो रहा है, वही इसे संभाले I “उन्होंने “जागरण” का जुलाई 1932 तक संपादन किया I 1932- 33 में कुछ महीनों इंडियन प्रेस, प्रयाग में रहकर उन्होंने ‘द्विवेदी अभिनन्दन ग्रन्थ’ का संपादन किया I 1933 के उत्तरार्द्ध में वे “बालक” के संपादक होकर लहेरियासराय (दरभंगा) चले गए I जब 1939 ई. में शिवपूजन सहाय को नवस्थापित राजेन्द्र कॉलेज छपरा में हिंदी प्राध्यापक नियुक्त किया गया तो उनका काफी विरोध हुआ I बुद्धिजीवियों के लिए यह असह्य था कि एक ऐसा व्यक्ति प्राध्यापक बनकर आया है जो एम ए पास नहीं हैं I दूसरे वर्ग के बुद्धिजीवियों का अभिमत था कि प्राध्यापक होने के लिए एम ए की डिग्री आवश्यक नहीं I उनके सामने बाबू श्यामसुंदर दास, पं. रामचंद्र शुक्ल, हरिऔधजी,लाला भगवान दीन आदि के उदाहरण विद्यमान थे जो हिंदी के आदि प्रोफेसर थे I अंततः शिवपूजन जी के समर्थकों की जीत हुई और राजेन्द्र कॉलेज के शासी निकाय ने बहुमत से उनकी नियुक्ति कर दी I वर्ष 1945 में आचार्य सहाय ने पुस्तक भंडार के जयंती स्मारक ग्रन्थ का संपादन किया I इसी अवधि में 1945-46 में राजेंद्र कॉलेज से एक वर्ष का अवकाश लेकर वे पटना आ गए तथा मासिक “हिमालय” का संपादन किया I 1947 में आरा नागरी प्रचारिणी सभा के राजेंद्र अभिनन्दन ग्रन्थ का संपादन किया I 26 दिसंबर 1949 को कॉलेज सेवा से अवकाश ग्रहण कर वे पटना आ गए और बिहार प्रादेशिक हिंदी साहित्य सम्मलेन के त्रैमासिक “साहित्य” के संपादक नियुक्त हुए I जुलाई 1950 को बिहार राष्ट्रभाषा परिषद् के मंत्री पद का कार्यभार ग्रहण किया Iबाद में इस पद का उन्नयन निदेशक के रूप में हो गया I इनके कुशल नेतृत्व में परिषद् ने पर्याप्त प्रगति की I राष्ट्रभाषा परिषद् इनके श्रम, साधना एवं तपस्या का कीर्ति – स्तम्भ है I डॉ वासुदेव शरण अग्रवाल ने ‘परिषद् पत्रिका’ जुलाई 1963 के अंक में लिखा है–“ बिहार राष्ट्रभाषा परिषद् सत्यमेव उनका कीर्ति स्तम्भ है I उसकी ईट- ईट बटोर कर तथा जोड़कर इस कीर्ति स्तम्भ को उन्होंने खड़ा किया और उनके अवेक्षण और श्रम का वरदान पाकर परिषद् निरंतर फूली- फली I कैसा विचित्र कल्पवृक्ष परिषद के रूप में वे छोड़ गए हैं I अपने वज्रासन से ध्यान की शक्ति द्वारा उन्होंने बहुत कुछ दिया I अनेक नए विषयों की उद्भावना योग्य लेखकों से करायी I उन ग्रंथो की अंतर्राष्ट्रीय ख्याति है I श्री हजारी प्रसाद द्विवेदी जी का ‘हिंदी साहित्य: आदिकाल’ और मोतीचंद्र जी का ‘सार्थवाह’ जो परिषद् के आरंभिक जीवन के प्रथम दो वर्षों में छपे थे, वे हिंदी जगत के गौरव की वास्तु हैं I” वर्ष 1960 में भारत सरकार ने उन्हें पद्मभूषण की उपाधि से अलंकृत किया और 1961 में पटना नगर निगम की ओर से उनका नागरिक अभिनन्दन हुआ I 1962 में भागलपुर विश्वविद्यालय ने उन्हें डी. लिट्. की उपाधि से विभूषित किया I आचार्य सहाय ने लिखा कम, लिखवाया ज्यादा I उनके जीवन का अधिकांश दूसरों की रचनाओं को सजाने–संवारने में बीत गया I उस युग का कोई ऐसा साहित्यकार नहीं था जिसकी कृतियों का उन्होंने संशोधन–परिमार्जन नहीं किया हो I वे भाषा के बेजोड़ पारखी थे I वे एक महान संपादक तो थे ही, महामानव भी थे–अजातशत्रु, निष्कपट, निष्कलंक I बचपन में पिताजी ने जो राम भक्ति का उपदेश दिया था, उसका आजीवन उनपर प्रभाव रहा और मर्यादा पुरुषोत्तम राम सदा उनके आदर्श रहे I छोटे से छोटे कार्य को वे ईश्वर का आदेश मानकर पूरी सहृदयता से करते थे I (निधन: 21 जनवरी 1963)
सन्दर्भ :
1.शिवपूजन रचनावली–बिहार राष्ट्रभाषा परिषद, पटना
2.कथाकार आचार्य शिवपूजन सहाय–श्री वीरेन्द्र परमार (1910)

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