अखण्ड भारत के पुरोधा

डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी बलिदान दिवस (23 जून) पर विशेष

– डॉ. महेश चन्द्र शर्मा 

डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी मूलतः शिक्षा से जुड़े हुए विद्वान व्यक्ति थे। शिक्षाविद एवं विधिवेत्ता होने की योग्यता उन्हें विरासत में प्राप्त हुयी थी। वे संवेदनशील समाजकर्मी, राष्ट्रवादी राजनेता एवं प्रखर सांसद बने। उन्होंने युगधर्म के आह्वान को स्वीकार किया।

राष्ट्रीय एकात्मता एवं अखण्डता के प्रति उनकी आगाध श्रद्धा ने उन्हें राजनीति के समर में झोंक दिया। अंग्रेजों की ‘फूट डालो व राज करो’ की नीति ने मुस्लिम लीग को स्थापित किया था। डॉ. मुखर्जी ने हिन्दू महासभा का नेतृत्व ग्रहण कर इस नीति को ललकारा। महात्मा गांधी ने उनके हिन्दू महासभा में शामिल होने का स्वागत किया क्योंकि उनका मत था कि हिन्दू महासभा में मालवीय जी के बाद किसी योग्य व्यक्ति के मार्गदर्शन की जरूरत थी। कांग्रेस यदि उनकी सलाह को मानती तो हिन्दू महासभा कांग्रेस की ताकत बनती तथा मुस्लिम लीग की भारत विभाजन की मनोकामना पूर्ण नहीं होती।

कांग्रेस ने विभाजन का प्रस्ताव स्वीकार करते हुये पूरे बंगाल एवं पूरे पंजाब को पाकिस्तान को देना स्वीकार कर लिया था। डॉ. मुखर्जी ने इसका प्रखर विरोध किया, परिणामतः बंगाल एवं पंजाब का विभाजन हुआ। विभाजन के संदर्भ में पंडित नेहरू के एक आरोप के जवाब में मुखर्जी ने कहा ‘आपने भारत का विभाजन करवाया तथा मैंने पाकिस्तान का विभाजन करवाया है।’

डॉ. मुखर्जी मुस्लिम विरोधी नहीं वरन् मुस्लिम लीग विरोधी थे। 1937 के चुनावों में डॉ. मुखर्जी के प्रयत्नों ने बंगाल में मुस्लिम लीग को धूल चटाई तथा ए.के. फजलुल हक की अध्यक्षता वाली कृषक प्रजा पार्टी की सरकार बंगाल में बनी। डॉ. मुखर्जी स्वयं इस सरकार में शामिल हुए। दुर्भाग्य से 1946 के चुनावों में सिंध व बंगाल में मुस्लिम लीग सरकार बनाने में सफल हो गयी। मुस्लिम लीग कलकत्ता और लाहौर को पाकिस्तान में मिलाने के लिए कटिबद्ध थी। डॉ. मुखर्जी के प्रयत्नों से कलकत्ता तो बच गया, लेकिन लाहौर को बचाना सम्भव नहीं हुआ। डॉ. मुखर्जी ने कांग्रेस में जाने की बजाय हिन्दू महासभा में काम करना तय किया था। लेकिन कलकत्ता में उन्होंने हिन्दू महासभा छोड़ दी, क्योंकि महासभा ने उनका यह प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया कि महासभा सभी भारतीयों के लिए अपनी सदस्यता के द्वार खोल दे। महात्मा गांधी के आग्रह पर कांग्रेसी न होते हुए भी डॉ. मुखर्जी पंडित जवाहर लाल नेहरू के प्रथम मंत्रिमण्डल में शामिल हुये। वे भारत के प्रथम उद्योग तथा आपूर्ति मंत्री बने। भारत की औद्योगिक नीति की नींव उनके ही द्वारा डाली गयी। लेकिन नेहरू की पाकिस्तान पोषक एवं हिंदू उपेक्षा की नीति के साथ चलना उनके लिए सम्भव नहीं था। अतः 8 अप्रैल, 1950 को अढ़ाई साल बाद, उन्होंने मंत्रिमण्डल से त्यागपत्र दे दिया। सत्ता उनके व्यक्तित्व को बांधने में विफल रही, उन्होंने अपनी शर्तों पर राजनीति की।

मंत्रिमण्डल से बाहर आकर उन्होंने राष्ट्रवादी राजनैतिक दल के अपने संकल्प को पूरा किया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सरसंघचालक श्री माधवराज सदाशिवराव गोलवलकर (गुरुजी) की सहायता से भारतीय जनसंघ की स्थापना की। आजादी के आंदोलन में भारत की अखण्डता की रक्षा का मिशन लेकर डॉ. मुखर्जी राजनीति में आये थे। जनसंघ की स्थापना के साथ ही कश्मीर को भारत का अविभाज्य हिस्सा बनाने का आंदोलन उन्हांेने प्रारम्भ किया। कश्मीर को विशेष सम्प्रभुता देकर धारा 370 के अधीन अलग संविधान, अलग कार्यपालिका तथा अलग झंडा देने के प्रस्ताव को, प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू अपनी स्वीकृति दे चुके थे। संसद में बहस, आपसी वार्तालाप एवं पत्राचार के माध्यम से, उन्हांेने सरकार को समझाने का बहुत प्रयत्न किया, लेकिन अंततः उन्हें इसके विरोध में सत्याग्रह करना पड़ा।

बिना परमिट लिए उन्होंने ‘एक देश में दो विधान, एक देश में दो प्रधान, एक देश में दो निशान- नहीं चलेंगे- नहीं चलेंगे’ के नारे लगाते हुये जम्मू-कश्मीर में प्रवेश किया। शेख अब्दुल्ला की सरकार ने उन्हें जेल में डाल दिया। वहां उनकी रहस्यमय परिस्थितियों में मृत्यु हो गई। उनकी मृत्यु का खुलासा आज तक नहीं हो सका है। भारत की अखण्डता के लिए आजाद भारत में, यह पहला बलिदान था। परिणामतः शेख अब्दुल्ला हटाये गये तथा अलग संविधान, अलग प्रधान एवं अलग झण्डे का प्रावधान निरस्त हुआ। धारा 370 के बावजूद कश्मीर आज भारत का अभिन्न अंग बना हुआ है। इसका श्रेय सबसे अधिक डॉ. मुखर्जी को जाता है।

डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी कलकत्ता विश्वविद्यालय के छात्र थे। 1924 में वे विश्वविद्यालय की सिंडिकेट व सीनेट में सदस्य चुने गये तथा बंगाल विधान परिषद् में, कलकत्ता विश्वविद्यालय का उन्होंने प्रतिनिधित्व किया। 1936 में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी 33 वर्ष की कम उम्र में, कलकत्ता विश्वविद्यालय के कुलपति बन गये। कुलपति के रूप में उनके कार्यकाल के दौरान, गुरूदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर ने बंगला भाषा में दीक्षान्त भाषण दिया और इसके साथ ही बंगाल और अन्य भारतीय भाषाओं पर अंग्रेजी के प्रभुत्व का युग समाप्त हो गया। भारत के किसी भी विश्वविद्यालय में भारतीय भाषा में दिया गया यह प्रथम दीक्षान्त भाषण था।

1943 में बंगाल एक कृत्रिम अकाल का शिकार हुआ। डॉ. मुखर्जी ने इस अकाल का पूरी ताकत से सामना किया। उन्हांेने अपनी साख दांव पर लगा देश को धन देने का आह्वान किया, लोगों का उचित प्रतिसाद प्राप्त हुआ तथा लाखों लोगों को मौत के कराल जाल से बचा लिया गया। उनका बहुआयामी व्यक्तित्व था। वे महाबोधि संगठन के भी अध्यक्ष बने, वे संविधान सभा में चुने गये, वे सांसद तथा मंत्री भी रहे। अनेक क्षेत्रों में, उनकी अद्भुत संवेदनशीलता, राष्ट्रभक्ति एवं प्रतिभा का प्रकटीकरण हुआ। राष्ट्र को उनकी सबसे महत्वपूर्ण देन थी भारतीय जनसंघ नामक राष्ट्रवादी राजनैतिक दल।

नीति के आधार पर वे स्वयं सत्ता छोड़ आये थे। वे प्रखर नेता थे। संसद में भारतीय जनसंघ छोटा दल था, लेकिन उनके नेतृत्व में संसद में राष्ट्रीय लोकतांत्रिक दल गठित हुआ, जिसमें गणतंत्र परिषद, अकाली दल, हिन्दू महासभा एवं अनेक निर्दलीय सांसद शामिल थे। जब संसद में पंडित नेहरू ने भारतीय जनसंघ को कुचलने की बात कही तब डॉ. मुखर्जी ने कहा, ‘‘हम देश की राजनीति से इस कुचलने वाली मनोवृत्ति को कुचल देंगे।’’ उनकी शहादत पर शोक व्यक्त करते हुए तत्कालीन लोकसभा के अध्यक्ष श्री जी.वी. मावलंकर ने कहा, ‘‘…वे हमारे महान देशभक्तों में से एक थे और राष्ट्र के लिए उनकी सेवाएं भी उतनी ही महान थीं। जिस स्थिति में उनका निधन हुआ वह स्थिति बड़ी ही दुःखदायी है। यही ईश्वर की इच्छा थी। इसमें कोई क्या कर सकता था? उनकी योग्यता, उनकी निष्पक्षता, अपने कार्यभार को कौशल्यपूर्ण निभाने की दक्षता, उनकी वाक्पटुता और सबसे अधिक उनकी देशभक्ति एवं अपने देशवासियों के प्रति उनके लगाव ने उन्हें हमारे सम्मान का पात्र बना दिया।’’

3 thoughts on “अखण्ड भारत के पुरोधा

  1. श्यामा प्रसाद मुखार्जीकी महानता में कोई संदेह किसो को कभी नहीं रहा पर उनके बारे में -“लेकिन कलकत्ता में उन्होंने हिन्दू महासभा छोड़ दी, क्योंकि महासभा ने उनका यह प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया कि महासभा सभी भारतीयों के लिए अपनी सदस्यता के द्वार खोल दे।” यश सूचना उतनी ही सामान्य लोगों की जाकारी से परे है जितनी लोकमान्य तिलक के १९१६ में लखनऊ अच्कोर्द हिन्दू-मुस्लिम एकता को माने का..
    और इसीलिये मैं समझता हूँ की डॉ. हेडगेवार को पूर्ण तिलकवादी ना मन जय और श्यामा प्रसादजी की भी इस बिंदु पर और भी अध्यन की आवश्यकता है,,
    वैसे आजका बीजेपी वा उनके बाद का जन संघ केवल उनकी सोच का नहीं था – संघ से गए कर्य्कर्तओंने उसे सींचा, बनाया , बढ़ाया – यदि वे सौभाग्यसे जीवित रहते तो जन संघ की स्थिति अलग रहती या वे इसे हिन्दू महासभा की तरह छोड़ दिए रहते– यह एक अबूझ पहेली है…

  2. आप जैसा चिन्तक भी अगर अपनी बात की पुष्टि गाँधी के वक्तव्य से करवाना चाहे तो यह दुखद है. श्यामा प्रसाद जी मुख़र्जी का व्यक्तित्व महान था इसमें किसी को संदेह नहीं हो सकता इसमें गाँधी जी की मुहर की क्या आवश्यकता थी ? जैसे हमारे किसी भी श्रेष्ठ विचार को तब स्वीकार नहीं किया जाता जब तक उस पर पश्चिम की मुहर लग जाती उसी प्रकार लगता तथाकथित बुद्धिजीविओं को भी अपनी बात की पुष्टि के लिए गाँधी का सहारा लेना पड़ता है.

  3. श्यामा प्रशाद जी की मृत्यु संदेह की परिस्थितिओं में जेल में हुई और इसकी आज तक कोई तहकीकात तक ठीक तरह से नहीं हुई और इसमें कांग्रेस का चरित्र ही संदेह पूर्ण पाया गया और अँगरेज़ और मुस्लमान परस्त नेहरु का दामन ही दोषी है…. कांग्रेस के हाथ कई देशभक्तों के खून से रक्तरंजित हैं ….. और देश का दुर्भाग्य है कि यही देश विरोधी पार्टी बार बार सरकार बना कर विदेशी सोनिया / राहुल की अगुवाई में दोनों हाथों से लूट लूट कर स्विस बैंकों में लूट का पैसा भर रही है….कांग्रेस को समूल उखाड़ केर फ़ेंक दो और राष्ट्र का विकास करनेवाली पार्टी और ईमानदार उम्मीदवारों को वोट दो….

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