अखण्ड भारत संकल्प दिवस 14 अगस्त पर विशेष

भारत का दुखान्त विभाजन — बृजनन्दन राजू 

अखण्ड भारत एक स्वप्न न होकर बल्कि विचार पूर्वक लिया गया एक संकल्प है। क्योंकि भूमि को हमने माता माना है। माता भूमि पुत्रोह्मं पृथ्व्यिा तो विभाजन को हम कैसे स्वीकार कर सकते हैं। 
जिनके लिए भारत जमीन का टुकड़ा नहीं है वह मातृभूमि के विभाजन की वेदना को कैसे भूल सकते हैं। जिनके अन्दर यह भाव विद्यमान है कि जियेंगे तो इसके लिए मरेंगे तो इसके लिए वह  अखण्ड भारत के संकल्प को कैसे त्याग सकता है। 

जो भारत सदियों से अखण्ड था उसकी सीमाएं वृहद थी वह कुछ कालखण्डों में सिमट कैसे गया। तब ध्यान में आता है कि हमारी आन्तरिक कमजोरियों और तत्कालीन परिस्थितियों के कारण देश का एक बार नहीं कई बार विखण्डन हुआ। जिनमें सबसे कष्टकारी विभाजन 1947 का हुआ जिसे रोका जा सकता था। जिस देश की स्वाधीनता के लिए वर्षों तक क्रान्तिकारियों ने अनवरत संघर्ष किया और अगणित बलिदान दिया उन क्रन्तिकारियों के स्वपनों को कांग्रेस ने मिट्टी में मिला दिया। 
अन्यथा जब हम 1905 में गुलामी के दौर में बंग भंग को विफल कर सकते थे तो 1947 में तो कांग्रेस मजबूत स्थिति में थी इससे यह सिद्ध होता है कि 1947 का विभाजन तत्कालीन कांग्रेसी नेताओं की सत्तालोलुपता का परिणाम था। इस विभाजन के पीछे अंग्रेजों की चाल तो थी ही लेकिन कांग्रेस और मुस्लिम लीग उसकी हस्तक बनीं। अंग्रेज भारत छोड़ने से पहले देश का टुकड़ों—टुकड़ों में बंटवारा करवाना चाह रहे थे। इसी उद्देश्य से लार्ड माउण्टबेटन और एडविना भारत आयी थे। पण्डित जवाहर लाल नेहरू एडविना के जाल में फंस गये और एडविना अपने मिशन में पूर्णतया सफल रही। जाते— जाते अंग्रेजों ने भारत का विभाजन कर डाला। तत्कालीन कांग्रेसी नेतृत्व किंकर्तव्यविमूढ़ की स्थिति में रहा। उसे तो सत्ता की चाहत थी। उसने सत्ता के लिए मातृभूमि का सौदा कर डाला। देश भर में डंका पीट रहे कि देश को स्वतंत्रता कांग्रेस ने दिलाई जबकि सच्चाई यह है कि कांग्रेस ने देश को आजादी नहीं विभाजन दिया। वैसे 1947 का विभाजन पहला विभाजन नहीं था भारत की सीमाओं का संकुचन उसके काफी पहले शुरू हो चुका था लेकिन ताजा घाव ज्यादा कष्टकारी होता है। उससे भी ज्यादा वह विचार घातक है जिसके आधार पर पाकिस्तान का निर्माण हुआ। अखण्ड भारत के मार्ग में भी सबसे बड़ी बाधा मुस्लिमों की पृथकतावादी सोच ही है। 

अफगानिस्तान 1876, हिमालय की गोद में बसा नेपाल, 1906 में भूटान,1914 में तिब्बत,1935 में श्रीलंका, 1937 में म्यामार और फिर 1947 में पाकिस्तान हमसे अलग हुआ। अगर हम सचेत नहीं हुए तो यह क्रम आगे भी चलता रहेगा और देश का विभाजन होता रहेगा। आज देश के कई हिस्से में विभाजनकारी शक्तियां राष्ट्र को तोड़ने में लगी हैं। ऐसी विभाजनकारी ताकतों को समाप्त करना होगा। पूर्व में हुए विभाजन से यह बात स्पष्ट हो गयी है कि जिन—जिन क्षेत्रों से हिन्दू घटा वह भाग देश से कटा।  

भारत विभाजन की नींव अंग्रेजों ने 1904 में ही बंग भंग के रूप में डाल दी थी। इसमें वह असफल रहे। इसके बाद 1946 में देश में चुनाव हुए। कांग्रेस और मुस्लिम लीग दो दल मैदान में थे। लीग ने मुस्लिम मतदाताओं के समक्ष पाकिस्तान का नारा लगाया वहीं कांग्रेस ने देश की अखण्डता के बारे में राष्ट्र के नागरिकों का समर्थन मांगा। हिन्दू जनता को विश्वास था कि कांग्रेस देश की एकता अखण्डता को अक्षुण रखेगी। चुनाव में कांग्रेस को बहुमत मिला इसके बाद कांग्रेस विभाजन को रोक नहीं पायी। देश के साथ कांग्रेस ने विश्वासघात किया और देश दो टुकड़ों में बंट गया। महात्मा गांधी कह रहे थे कि भारत का विभाजन हमारी लाश पर होगा। नेहरू कह रहे थे कि विभाजन हमें स्वीकार्य नहीं है। अंतत: कांग्रेस ने देश का विभाजन स्वीकार्य कर लिया। जिस अखण्ड हिन्दुस्तान की आजादी के लिए कश्मारी से कन्याकुमारी और कच्छ से कामरूप तक अनगिनत क्रान्तिकारियों ने बलिदान दिया उसका सौदा कर लिया गया। 
एक तरफ दिल्ली में आजादी का जश्न मनाया जा रहा था तो पाक में हिन्दू मां बहनों की इज्जत लूटी जा रही थी। ऐसे समय में कांग्रेसी जब नेहरू के प्रधानमंत्री बनने पर जाम से जाम लड़ा रहे थे तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक अपनी जान को हथेली पर रखकर पाक में फंसे हिन्दुओं को सुरक्षित निकालने में लगे थे। जब पाकिस्तानी सेना की टुकड़ियों ने कश्मीर की सीमा लांघने की कोशिश की, तो सैनिकों के साथ कई स्वयंसेवकों ने भी अपनी मातृभूमि की रक्षा करते हुए लड़ाई में प्राण त्याग दिये। उस समय पाकिस्तान से जान बचाकर आए शरणार्थियों के लिए 3000 से ज़्यादा राहत शिविर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने लगाए थे। 

भक्त प्रहलाद की नगरी मुल्तान जहां भगवान नृसिंह का अवतार हुआ। भगवान राम के पुत्र लव और कुश द्वारा बसाई गयी नगरी लाहौर जहां गुरू अर्जुनदेव,वीर हकीकत राय, भगत सिंह,राजगुरू और सुखदेव बलिदान हुए। विश्व में अध्ययन अध्यापन के लिए प्रसिद्ध तक्षशिला का विश्वविद्यालय, 51 शक्तिपीठों में शुमार माता हिंगलाज का मन्दिर,पांडवों की स्मृति को संजोए कटासराज मंदिर और ननकाना साहिब को हमने खो दिया। ढाकेश्वरी माता का मंदिर हमारे अधिकार क्षेत्र से बाहर है। भगवान शंकर का कैलाश पर्वत और मानसरोवर भी पहले ही हमारे अधिकार क्षेत्र से बाहर निकल गया।  इस समय 78,114 हजार वर्ग किलोमीटर भूमि पाक तथा 42,735 हजार वर्ग किमी चीन के अवैध अधिकार में है। इसमें पाक द्वारा 1963 में अपने कब्जे से चीन को उपहार में दिया गया 5180 वर्ग किमी भू क्षेत्र भी सम्मिलित है। 

हलांकि महात्मा गांधी ने हरिजन में लिखे अपने लेख में कहा था दो राष्ट्रों का सिद्धान्त बेतुका है। भारत का दो भागों में बंटवारा अराजकता से भी बढ़कर है। नेहरू ने भी गलती स्वीकार की थी कि यदि हमें पता होता कि विभाजन के बाद इतनी बड़ी मात्रा में रक्तपात होगा तो हम विभाजन को स्वीकार नहीं करते। 

महर्षि अरविन्द  ने स्वाधीनता के समय भविष्यवाणी की थी कि देर चाहे कितना भी हो पाक का विघटन और उसका भारत में विलय निश्चित है। आज स्थितियां अनुकूल हो रही हैं। पाक अधिग्रहित कश्मीरी भारत में मिलने के लिए आतुर है। वहीं बलूच में भी चिंगारियां उठ रही हैं। पाक में पंजाबी,सिंधी और बंगाली मुस्लिमों में आपस में एकता नहीं है। इसके अलावा पाकिस्तान के लाखों परिवारों का रक्त संबंध भारत से है। 

हमारी अखंडता का मार्ग सांस्कृतिक है। भले ही हमारी राजनीतिक इकाइयां अलग—अलग हों लेकिन सांस्कृतिक एकता अक्षुण रहनी चाहिए। देश तो बनते और टूटते हैं लेकिन राष्ट्र कभी टूटता नहीं है। जैसे जर्मनी एक राष्ट्र था परन्तु उसका राजनैतिक कारणों से विभाजन हो गया जो अप्राकृतिक था अन्तत: बाद में विभाजन समाप्त हुआ। यही वियतनाम में भी हुआ। वहीं सोवियत संघ एक देश अवश्य था पर वह राष्ट्र कभी नहीं हो सका यही कारण था कि वह अलग—अलग देशों में विभक्त हो गया। भारत का विभाजन भी स्थाई नहीं है वह कृत्रिम है। जिस दिन देश का जनमानस और राजनैतिक नेतृत्व एक होगा भारत पूर्णता को प्राप्त होगा। वर्तमान केन्द्रीय नेतृत्व में दृढ़ इच्छाशक्ति् है। गृहमंत्री अमितशाह ने संसद के अन्दर कहा कि जब मैं जम्मू और कश्मीर कहता हूं तो उसके अन्दर पाक अधिग्रहीत कश्मीर भी आता  है। इससे सरकार की मंशा स्पष्ट होती है। वह देश के स्वाभिमान के साथ समझौता नहीं करेगी।

जो राष्ट्र अपनी सीमाओं की सुरक्षा नहीं कर सकता वह न तो प्रगति कर सकता है और न ही अजेय रह सकता है। जैसे —जैसे समय बीतता जायेगा प्रकृति अपना असर दिखायेगी और विभाजन की रेखा समाप्त हो जायेगी। आज भारत की बढ़ती शक्ति से दुनिया के तमाम देश व्यग्र हो रहे हैं कि वह उनके लिए भविष्य में चुनौती बन सकता है। यही कारण है कि वह पाक की सहायता कर सामरिक दृष्टि से उभरते भारत को नुकसान पहुंचाना चाहते हैं। जबकि पाक की अर्थव्यवस्था तबाह हो चुकी है। वहां का जीवन नारकीय बन चुका है। पाक के कई हिस्से में विद्रोह चल रहा है। 
यदि हमारे नेता विभाजन का दृढ़ता से विरोध करते तो विभाजन को टाला जा सकता था। उस समय देश की जनता कांग्रेस के साथ खड़ी थी। यदि कांग्रेस उस सुनहरे अवसर का लाभ उठाती और राष्ट्र की अखण्डता के लिए मुस्लिम लीग और अंग्रेज दोनों की चुनौती स्वीकार करती तो देश  विभाजन से बच सकता था। लेकिन उस समय के कांग्रेस नेेताओं ने जिस सत्ता लोलुपता का परिचय दिया उसके लिए देश की जनता कांग्रेस को कभी माफ नहीं करेगी।  

(लेखक पत्रकार हैं और प्रेरणा जनसंचार शोध संस्थान नोयडा से जुड़े हैं।)
     बृजनन्दन राजू 
     8004664748  

Leave a Reply

%d bloggers like this: