पहले मंदिर, अब दरगाह भी

hazi aliडा. वेद प्रताप वैदिक

अभी केरल के सबरीमाला और महाराष्ट्र के शनि मंदिर पर देश में बहस चल ही रही है, अब एक मुस्लिम दरगाह भी उसी कतार में आ खड़ी हुई है। मुंबई की प्रसिद्ध हाजी अली की दरगाह में कब्र के आस-पास औरतों को जाने नहीं दिया जाता है। यह नियम उन औरतों पर सख्ती से लागू किया जाता है, जो मासिक धर्म से होती हैं। यही नियम मंदिरों में भी लागू किया जाता है। मुझे संतोष यह हुआ कि कम से कम इस मामले में तो मंदिर-मस्जिद एक ही हैं। दोनों ही औरतों से एक-सरीखा भेदभाव करते हैं।
यह नियम भगवान या अल्लाह या जिहोवा का बनाया हुआ तो नहीं हो सकता। औरत और आदमी दोनों ही उसकी संताने हैं। यह नियम मनुष्य के बनाए हुए हैं। पुरुषों के बनाए हुए हैं। पुरुषों से कोई पूछे कि क्या महिलाओं को मोक्ष पाने का अधिकार नहीं है? भगवान के दर्शन करने का अधिकार नहीं हैं? जिन लोगों को आप भगवान या अवतार मानकर पूजते हैं, क्या वे किसी मां के पेट से पैदा नहीं हुए हैं?
ईसा मसीह और कर्ण को भी मां की जरुरत रही है। बिना मां के कौन पैदा हो सका है? ऐसी मातृशक्ति को पूजा-अर्चना से वंचित करना धार्मिक कार्य है या अधार्मिक? यदि मासिक धर्म से इतनी आपत्ति है तो यह बताइए कि मासिक धर्म न हो तो क्या कोई औरत किसी को जन्म दे सकती है? क्या वह गर्भ धारण कर सकती है? याद रखिए उसे ‘मासिक धर्म’ कहा गया है।
इस ‘धर्म’ का अपमान क्यों करते हैं? और फिर यह बताइए कि औरतों से इतना एतराज है तो आपने मंदिरों में राम के साथ सीता, कृष्ण के साथ राधा और शिव के साथ पार्वती को क्यों खड़ा कर रखा है? क्या ये देवियां रजस्वला नहीं होती? क्या ये मासिक धर्म से मुक्त होती हैं? इसके अलावा सउदी अरब के वहाबी संप्रदाय की बात हमारे मुसलमान आंख मींचकर क्यों मानें? यदि वहाबियों की बात मानें तो मरे हुए आदमी की कब्र पूजना या समाधि पर फूल चढ़ाना तो ‘हिंदुआना हरकत’ है। सउदी अरब में तो इस पर कड़ा प्रतिबंध है।
मैं तो चाहता हूं कि मंदिरों और मस्जिदों को गिरजों और गुरुद्वारों की तरह सबके लिए खुला रखना चाहिए। यदि आप उन्हें भगवान का घर मानते हैं तो उनके दरवाजे क्या हिंदू और क्या मुसलमान, क्या मर्द और क्या औरत, क्या गोरे और क्या काले, क्या अमीर और क्या गरीब–सबके लिए खुले होने चाहिए।
जहां तक पवित्रता का सवाल है, भक्त उसका ध्यान अपने आप रखते हैं। मंदिर-मस्जिद, दरगाह में जाते वक्त लोग नहाने-धोने का खास ध्यान रखते हैं। स्त्रियों पर भी हम विश्वास क्यों नहीं करते? कौन स्त्री चाहेगी कि वह विषम स्थिति में किसी भी सार्वजनिक स्थान पर जाए?

1 thought on “पहले मंदिर, अब दरगाह भी

  1. आमतौर पर हिन्दू मन्दिर में महिलाओ का प्रेवश वर्जित नही है। लेकिन लाखो में किसी एक मन्दिर में किसी ख़ास परम्परा की वजह से प्रवेश न करने का रिवाज है तो उसे अन्यथा नही लेना चाहिए। वैसे धर्माचार्य परम्पराओ पर आज के परिपेक्ष्य में पुनर्विचार करके कोई संशोधन करते है तो समाज उसे अवश्य स्वीकार करेगा।

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