पुराने कानूनों से मुक्ति के साथ संशोधन भी जरूरी

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पुराने कानूनों से मुक्ति के साथ संशोधन भी जरूरी
प्रमोद भार्गव

यह अच्छी बात है कि केंद्र सरकार कुछ उपनिवेशिक कानूनों को खत्म करने के बाद  अवशेष  रह गए कानूनों को भी समाप्त करने की भी तैयारी  में हैं । नरेंद्र मोदी सरकार ने नई पहल करते हुए अंग्रेजों के जमाने के अप्रासंगिक हो चुके 1824 कानूनों की पहचान की थी। इनमें से अब तक 1657 कानून खत्म कर दिए हैं। बावजूद अभी 167 ऐसे कानून प्रचलन में हैं, जिन्हें दफ्न किया जाना जरूरी है। लेकिन इसके साथ सरकार को यह तय करना भी जरूरी है कि आजादी के बाद जो कानून वजूद में आए हैं, उनको सरल बनाए। जिससे समस्या के समाधान में कानून रोड़ा बनने की बजाए, सहायक बनें। श्रम, राजस्व, कर और पर्यावरण सरंक्षण से जुड़े कई ऐसे कानून हैं, जिनकी उपधराएं समस्या को उलझाए रखने का काम करती है। यदि केंद्र और राज्य सरकारें कानूनों की जटिलताएं दूर कर देती हैं तो विचाराधीन मामलों का जल्द निराकरण होगा और जनता राहत का एहसास करेगी।
खत्म किए जा रहे कानून 1834 से 1898 के बीच फिरंगी हुक्मरान वजूद में लाए थे। इनमें से कई कानून आज हस्यास्पद स्थिति उत्पन्न करने वाले हैं। मसलन, 1878 में बने एक कानून के मुताबिक यदि किसी व्यक्ति को सड़क पर नोट पड़ा दिखाई देता है और वह इसकी सूचना पुलिस को नहीं देता तो उसे कारावास हो सकता है। 1887 में बने कानून के अनुसार लोग किसी भी होटल में पेयजल और की सुविधा मुफ्त पा सकते हैं। इसी तरह 1934 का एक कानून कहता है कि पतंग बनाने,बेचने और उड़ाने के लिए सरकारी अनुमति जरूरी है। अब भला इन कानूनों के बने रहने का क्या औचित्य है ?
अनेक कानून ब्रिटिश  हुकूमत के लिए तात्कालिक महत्व के थे,जिनकी जरूरत नहीं होने के बावजूद वजूद बरकरार है। इन कानूनों में बना 1836 बंगाल जिला अधिनियम, 1866 का धर्मातंरित विवाह भंग कानून और 1887 में बना गंगा चूंगी कानून शामिल हैं। इसी तरह 2013 में बने भूमि अधिग्रहण कानून के बाद पुराने भूमि अधिग्रहण कानूनों की कोई जरूरत नहीं रह गई है, लेकिन वे बने हुए हैं। नतीजन ताकतवार लोग इन कानूनों का दुरूपयोग कर अपने हित साधने में सफल हो जाते हैं। इसका सबसे ज्यादा लाभ सामंतों और जमींनदारों ने उठाया है। इन्होंने करोड़ो-अरबों रूपए की परिसंपत्तियां भारत सरकार को विलय कर देने के बावजूद इन्हीं अप्रासंगिक हो चुके कानूनों के जरिए हथिया लीं है। ये कानून दौ सौ साल से भी ज्यादा समय से अप्रचलन में आ चुकने के बाद भी बेजा फायदा उठाने के लिए अस्तित्व में हैं। लिहाजा कानून की पोथियां बेवजह मोटी बनी हुई हैं,ं क्योंकि इनमें एक प्रकृति के सभी कानून संशोधित होने के बावजूद संकलित हैं। इनसे विरोधाभास पैदा करके पहुंच वाले लोग लाभ उठाने में सफल हो जाते हैं। इसी तरह कृषि भूमि और भवनों में किराए से जुड़े कानून विसंगतियां पैदा कर रहे हैं। इन कानूनों में कब्जे को अवैध ठहराने की बजाए वैद्यता सिद्ध करने का काम राजस्व अदालतें करती हैं। यदि कब्जे को भू-राजस्व संहिता से विलोपित कर दिया जाए तो कब्जे की धारा से जुड़े शत-प्रतिशत मामले खत्म हों जाएंगे। कब्जे को वैधानिकाता देने वाला यह कानून ग्रामों में हिंसा की इबारत लिखने का काम सबसे ज्यादा कर रहा हैं। यदि इसमें संशोधन कर दिया जाता है तो आपराधिक मामलों में आशातीत उम्मीद से ज्यादा कमी आएगी।विधि आयोग ने जिन कानूनों को समाप्त करने की राय सरकार को दी है, उन्हें 49 श्रेणियों ने बांटा है। वैसे महत्वपूर्ण इनमें तीन श्रेणियों हैं। पहले वे कानून जो इसी संदर्भ में संशोधित अधिनियम बन जाने के बावजूद किताबों का हिस्सा बने हुए हैं। दूसरे,वे जो बदलते वक्त के साथ अप्रासंगिक हो चुकें हैं और तीसरे वे विनियोग कानून हैं, जिनकी संख्या 700 से भी ज्यादा बताई गई है। विनियोग विधेयकों की उपयोगिता तात्कालिक है। ये हर वर्ष संचित निधि से राशि निकलने के लिए संसद द्वारा पारित किए जाते हैं और फिर व्यर्थ हो जाते हैं। लेकिन विधि-पुस्तकों में दर्ज बने रहते हैं। ब्रिटेन और आस्ट्रेलिया में इस तरह के कानूनों के संबंध में ऐसी इबारत भी विधेयक के मसौदे में दर्ज कर दी जाती है कि ये मकसद पूर्ति के बाद खुद-ब-खुद खत्म हो जाते हैं।
भारत के गणतंत्र घोषित होने के बाद देश का राज-काज भारतीय संविधान के अनुसार गतिशील होता रहा है। इस संविधान को डाॅ भीमराव रामजी अंबेडकर की अघ्यक्षता वाली संविधान सभा ने स्वीकृति दी थी। लेकिन पृथक-पुथक विषयों से संबंधित औपनिवेशिक कानून विधिशास्त्रों का अधिकृत हिस्सा बने रहे। लिहाजा इनकी बुनियाद कायम रही। दण्ड प्रक्रिया संहिता और भू-राजस्व संहिता भी औपनिवेशिक तर्ज पर ही बनीं चली आ रही हैं। जबकि वैधानिक, प्रशासनिक, राजस्व और पुलिस सुधारों को आजादी के तत्काल बाद अमल में लाने की जरूरत थी।
हालांकि अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने प्रशासनिक कानूनों की समीक्षा के लिए समिति गठित कर इन्हें समाप्त करने की अह्म पहल की थी। इस समिति की सिफारिश  पर 1998 में 415 कानून रद्द कर दिए गए थे। लेकिन अभी भी करीब 167 ऐसे कानून हैं,जिन पर झाडू फेरना जरूरी है। राजग सरकार अनावश्यक कानूनों को लेकर चिंतित है, अन्यथा संप्रग सरकार तो कभी भी बेवजह अड़चन पैदा करने वाले कानूनों को खत्म करने के लिए प्रतिबद्ध दिखाई नहीं दी। मोदी सरकार 44 श्रम कानूनों को भी रद्द करने की तैयारी में है। क्योंकि ये कानून कामगरों तथा नियोक्ताओं के कल्याण में बाधा बन रहे हैं। जाहिर है, बेमतलब कानूनों को आकलन के बाद चरणबद्ध तरीके से निपटाने की प्रक्रिया सराहनीय है।
यह उल्लेखनीय पहल है कि सरकार कानूनी मकड़जालों से मुक्ति की राह पर निकल पड़ी है। इसके साथ ही न्यायालयों से भी यह दरकरार है कि वे भी कामकाज के औपनिवेशिक ढर्रे से मुक्त हों ? पेचेदगियों का सरलीकरण करें। बेमतलब के गवाहों,साक्ष्यों और तकनीकि जांचों से अदालतों को भी छुटकारे की जरूरत है। ज्यादातर अदालती दस्तावेज ऐसी भाषा में तैयार किए जाते हैं,जो भाषा चलन से बाहर हो चुकी है। इस भाषा  में अभी भी मुगलकालीन अरबी व फारसी भाषा  के ऐसे शब्द प्रयोग में लाए जाते हैं, जिनके अर्थ समझने के लिए बहुभाषी  शब्द-कोश  खोजने पड़ते हैं। राजस्व अदालतें भी इसी भाषा  को चलन में लाती हैं। मसलन,अदालतें भूमि अथवा जमीन की जगह ‘अराजी‘ शब्द का इस्तेमाल करती हैं,जबकि यह शब्द कहीं भी प्रचलन में नहीं है। सर्वोच्च और उच्च न्यायालय केवल अंग्रेजी का प्रयोग करती हैं ,जबकि प्रकरण से जुड़े बुनियादी तथ्य स्थानीय भाषा में दर्ज होते हैं। इनका अंग्रेजी  में किया अनुवाद भी सही नहीं होता। उच्च न्यायालयों में हाजिर होने वाले कई वकील भी अंग्रेजी  में अपना पक्ष ठीक से नहीं रख पाते। इस कारण वे अपने मुवक्किल की पैरवी में पिछड़ जाते हैं। इसी नजरिए से कुछ समय पहले ही मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै खंठपीठ के वकीलों ने इसलिए धरना-प्रदर्शन भी किया था कि अदालतें राज्य की भाषा में काम करें। लेकिन अदालतें अंग्रेजी  के औपनिवेशिक मोहपाश  से मुक्त होना ही नहीं चाहती। लिहाजा उन्हें भी इस मोह से मुक्त होने की जरूरत है। ऊंची अदालतों में केवल अंग्रेजी के चलन से आम आदमी के अधिकारों का हनन भी हो रहा है। दरअसल भारतीय भाषाएं  अदालत की दहलीज पर जाकर ठिठक सी गई हैं।

 

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