“राव रामविलास शारदा लिखित ऋषि जीवन चरित्र ‘आर्य धर्मेन्द्र जीवन’ एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक दस्तावेज”

-मनमोहन कुमार आर्य, देहरादून।

ऋषि दयानन्द ने आर्यसमाज की स्थापना 10 अप्रैल, सन् 1875 को मुम्बई में की थी। ऋषि का जीवन संसार के सबसे
महान एक महापुरुष का जीवन था। उनके अनेक जीवन चरित अनेक विद्वानों ने लिखे हैं। पं0
लेखराम, पं0 देवेन्द्रनाथ मुखोपाध्याय, स्वामी सत्यानन्द, श्री हरविलास शारदा, मास्टर
लक्ष्मण आर्य आदि द्वारा लिखे गये उनके कुछ प्रमुख जीवन चरित हैं। अन्य अनेक विद्वानों ने
भी उनके छोटे बड़े जीवन चरित अपने अपने अन्दाज व महत्ता से युक्त लिखे हैं। ऐसा ही एक
जीवन चरित राव साहब रामविलास शारदा जी ने लिखा है। यह जीवन ‘‘आर्य धमेन्द्र जीवन’’ के
नाम से प्रसिद्ध है। इस जीवन चरित की एक विशेषता राजरत्न मा0 आत्माराम अमृतसरी जी
द्वारा लिखी गई 116 पृष्ठों का उपोद्घात है। यह उपोद्घात 2 जनवरी सन् 1903 को लिखा गया
था। इसका अर्थ है कि हिन्दी में लिखा गया यह जीवन चरित ऋषि दयानन्द जी की मृत्यु के बाद
20 वर्षों के भीतर प्रकाशित हो गया था। पुस्तक के आरम्भ में 7 पृष्ठों की विस्तृत विषय सूची है।
इस पुस्तक का प्रकाशन परोपकारिणी सभा की ओर से सन् 1994 में किया गया है। पुस्तक का यह पंचम संस्करण हैं। 16$377
पृष्ठों की इस पुस्तक का मूल्य प्रकाशन के समय एक सौ रुपये मात्र था।
पुस्तक की भूमिका में कहा गया है कि ऐसा कौन सा सुशिक्षित मनुष्य होगा कि जिसको पृथ्वी के महान् पुरुषों के
सच्चे जीवन वृतान्त जानने की अभिलाषा न हो, विशेषकर उन पुरुषों के जीवन की जो उसके अपने ही देश में हुए हों और
जिनके जीवन ने स्वजाति को महान् लाभ पहुंचाया हो तथा जिनके देशोपकारी कार्य उनकी
मृत्यु के पश्चात् जीवित दशा की भांति विद्यमान रहकर उनके यश और कीर्ति को फैला रहे हों।
विचार करने से ज्ञात हुआ है कि अपने से बड़े का जीवनचरित्र जानने की इच्छा स्वभाव से ही
मनुष्यमात्र में पाई जाती है, यहां तक कि गंवार-से-गंवार और जंगली जातियां भी अपने देवता
अथवा बड़े आदमियों के जीवन चरित्रों को अपनी भाषा में बना, बड़े चाव से सुनती सुनाती हैं
और उनके यश और कीर्ति गायन कर अति आनन्द उठाती हैं। इसीलिए कहा गया है कि
जीवनचरित्र जीवन सुधार का एक मुख्य साधन है और उनका पढ़ना मानो उन महान् पुरुषों से
सत्संग करना है और सत्संग के जो लाभ होते हैं वह प्रकट ही हैं। इसलिए यह कहना बहुत ठीक
है कि महान् पुरुषों का जीवनवृतान्त जाति के जीवन के लिये एक प्रकार का लवण है कि जिसके
बिना जातिरूपी शरीर की कमजोर हड्डियों में पुष्टि प्राप्त नहीं होती। अमेरिका के एक कवि ने
क्या उत्तम कहा है कि महान् पुरुषों के जीवन हमको याद दिलाते हैं कि हम भी अपने जीवनों को उत्तम (sublime) बनावें और
अपने पीछे समयरूपी बालू पर अपने पदचिन्ह छोड़ जावें। संसार के इतिहास पुकार-पुकार कर कह रहे हैं कि जीवन-चरित्रों ने
कई जातियों की काया पलट दी है और आलसी, कुटिल, खल, कामी, अधर्मियों को बड़े पुरुषार्थी, सत्यवादी, धीर, वीर, सदाचारी
और धर्मात्मा बना दिया है। यूरोप और अमेरिका को उन्नतिशिखर पर पहुंचाने वाले प्रबल साधन जीवनचरित्र हुये हैं जिनको
पढ़-पढ़ कर वहां के साधारण बालकों में भी महान् पुरुष बनने की उमंग उत्पन्न हो जाती है।
पुस्तक में प्रसिद्ध विद्वान डा0 भवानीलाल भारतीय लिखित ग्रन्थ-लेखक श्री रामविलास शारदा जी का संक्षिप्त
जीवन चरित भी दिया गया है। हम उससे कुछ सामग्री प्रस्तुत कर रहे हैं। श्री रामविलास शारदा का जन्म पौष शुक्ला 1, सम्वत्
1921 विक्रमी (1864 ई.) को अजमेर के एक वैश्य परिवार में हुआ। उनके पिता श्री रामरतन लेन-देन का काम करते थे।

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रामविलास जी की प्रारम्भिक शिक्षा उर्दू में हुई। यही उन दिनों का चलन था। इनके चाचा हरनारायणजी के परामर्श से इन्हें
अंग्रेजी स्कूल में प्रविष्ट कराया गया। हरनारायणजी गवर्नमेंट कालेज अजमेर में पुस्तकालयाध्यक्ष थे और सुप्रसिद्ध समाज
सुधारक तथा मनीषी लेखक हरविलासजी शारदा के पिता थे। रामविलासजी ने ऋषि दयानन्द के अजमेर आगमन पर उनके
व्याख्यान सुने तथा वे अपनी युवावस्था में ही आर्यसमाज से जुड़ गये। शारदा जी के सुपुत्र देशभक्त चांदकरणजी शारदा
आर्यसमाज के प्रख्यात नेता तथा देशभक्त समाजसेवक थे। उनके पौत्र श्रीकरण जी शारदा ने वर्षों तक परोपकारिणी सभा के
मंत्री के रूप में कार्य किया। हमारा (मनमोहन आर्य) सौभाग्य है कि हमने देहरादून में श्रीकरण शारदा के दर्शन किये हैं। वह
महात्मा वेदभिक्षु जी के साथ ऋषि निर्वाण शताब्दी समारोह के लिए धनसंग्रह करते हुए देहरादून पधारे थे। हमने इन दोनों
ऋषिभक्तों के दर्शन आर्यसमाज धामावाला, देहरादून मन्दिर में किये थे। दिनांक 7 मई 1931 को रावसाहब रामनिवास शारदा
का निधन हुआ था।
प्रस्तावना में श्री रामविलास शारदा जी लिखते हैं कि स्वामी दयानन्द जैसे महान् विद्वान्, योगी, ज्ञानी, कर्मकांडी,
ध्यानी, अद्वितीय जितेन्द्रिय, त्यागी, महान् पुरुष के भावों व गुणों का अनुभव वे ही विद्वान कर सकते हैं जिन्होंने अनेक
महान् पुरुषों के जीवन पढ़े, सुने वा देखे हों और उनके अनेक गुणों का, जो साधारण दृष्टि में नहीं आते, भले प्रकार अन्वेषण
किया हो। जब मैंने देखा कि उस महर्षि को परमपद प्राप्त हुए आज 17 वर्ष व्यतीत हो गये और आर्यसमाज के किसी विद्वान्
ने उनका जीवनचरित्र देवनागरी लिपि और आर्यभाषा में नहीं निकाला जिससे वह लाभ जो कि अनेक आत्माओं को जो उसके
पढ़ने से होता न हो सका। इसके अतिरिक्त (हिन्दी में प्रमाणित जीवन चरित्र प्रकाशित न होने से) अनेक हानियां हुई हैं क्योंकि
आर्यवीर पं0 लेखरामजी के अकस्मात् बलिदान होने से उर्दू जीवनचरित्र जैसा चाहिये था वैसा नहीं निकल सका और जिन
त्रुटियों को देख कुछ आपापंथी लोगों ने अपने जिन विचारों को फैलाने का अच्छा अवसर देख ऋषि चरित्र का चित्र अपने
मनमाने ढंग पर खेंचा। ऐसी दशा में मैंने सत्य-रक्षार्थ यही उचित समझा कि ऋषि चरित्र को उसके शुद्धस्वरूप में सर्वसाधारण
के सन्मुख रख दूं ताकि वे बनावटी चित्रों से धोखा न खावें।
हमने राव साहब रामविलास शारदा जी लिखित ऋषि जीवनी की यह पुस्तक वर्षों पूर्व पढ़ी है। पुस्तक अत्यन्त
महत्वपूर्ण है। ऋषि दयानन्द जी की दिनांक 30-10-1883 को मृत्यु के बाद हिन्दी में लिखी गई यह उनकी प्रथम वृहद जीवनी
है। इससे पूर्व यद्यपि ऋषि दयानन्द के जीवनकाल में ही लिखित पं. गोपालराव हरि द्वारा लिखित दयानन्द दिग्विजयार्क
जीवन-चरित प्रकाशित हुआ था परन्तु उसके द्वारा ऋषि जीवन की बहुत सी घटनायें सम्मुख नहीं आई थी। हम समझते हैं कि
शारदा जी की इस पुस्तक ने, जब यह प्रथमबार प्रकाशित हुई होगी, इसने उर्दू न जानने वाले हिन्दी भाषी व हिन्दी पठित
ऋषिभक्तों को सन्तुष्ट किया होगा। हमने उपर्युक्त पंक्तियां ऋषिभक्तों की जानकारी के लिये लिखी हैं। इसी के साथ लेखनी
को विराम देते हैं। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य
पताः 196 चुक्खूवाला-2
देहरादून-248001
फोनः09412985121

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