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शांता कुमार

मैं अटलजी के सामने खड़ा था। वह बिस्तर पर लेटे थे-कमजोर बहुत कमजोर। तन की सीमाओं के बंधन का अहसास उनकी वाणी को विराम दिए हुए था। रंजन ने उनके कान में मेरा नाम जोर से पुकारा। वह ध्यान से देखने लगे और देखते ही रहे। मैं बहुत कुछ कहना चाह रहा था, पर कह नहीं पाया। मेरा अंतर बुझा-बुझा सा रहा। वाजपेयीजी का मौन अखर रहा था। उनकी एक कविता की पंक्तियां मेरे जेहन में घूमने लगीं-”पृथिवी लाखों वर्ष पुरानी/ जीवन एक अनंत कहानी/पर तन की अपनी सीमाएं/यद्यपि सौ शरदों की वाणी/इतना काफी है अंतिम दस्तक पर खुद दरवाजा खोलें/अपने ही मन से कुछ बोलें।” मुझे लगा वाजपेयीजी तन की अपनी सीमाओं को समझते हुए अपने ही मन से कुछ बोल रहे हैं।

मेरी आंखों में एकदम लाखों हजारों की भीड़ के सामने मंच पर दायां हाथ ऊपर और बायां हाथ नीचे करते हुए अपनी विशेष मुद्रा में भाषण देते हुए अटल जी का चित्र उभर आया। उनका भाषण लाखों श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर देता। उनके भाषण के शब्दों की भाव-भंगिमा और आंखों की अभिव्यक्ति पर ध्यान केंद्रित होते ही लगता था कि दिल की धड़कने रुकने लगी हैं और समय भी ठहर सा गया है। वह मुझे देख रहे थे और मैं उन्हें देख रहा था। मेरी आंखों में अतीत की बहुत सी यादें एक-एक कर उभरने लगीं।

1957-58 में एक विवाह समारोह में उनकी एक टिप्पणी आज भी याद है-‘मुझे विवाह का कोई अनुभव नहीं, परंतु मैंने सुना है विवाह एक ऐसा स्थान है कि जो उसके बाहर है वह अंदर जाना चाहता है और जो अंदर है वह बाहर आना चाहता है। पूरा वातावरण खिलखिलाहट से गूंज उठा था। एक चुनाव में हम सब हार गए। अटलजी भी हार गए। मैं कृष्णलाल शर्मा के साथ अटलजी से मिलने गया। मैं और अटलजी बाहर टहलने लगे। चलते-चलते अटलजी एकदम खड़े हो गए और अपने अंदाज में दोनों हाथ घुमाकर कहने लगे-”क्या हमने कभी सोचा था कि हम भी चुनाव हार जाएंगे।” मैंने पहली बार उनके चेहरे पर विषाद की रेखाएं देखी। कृष्णलाल शर्मा आए और अटलजी से पूछने लगे कि मध्यप्रदेश वाले एक कार्यक्रम के लिए समय चाह रहे हैं। वे बार-बार पूछ रहे हैं। अटल जी ने उसी अंदाज में हाथ घुमाते हुए कहा-”नहीं-नहीं, बिल्कुल नहीं, मुझे किसी कार्यक्रम में नहीं जाना है।” अटलजी के आग्रह पर हम भोजन के लिए बैठे। हम चलने लगे तो कृष्णलाल शर्मा ने फिर बड़े आग्रह से कहा ”कार्यक्रम महत्वपूर्ण है। प्रदेश वाले बार-बार आग्रह कर रहे हैं।” अटल जी ने फिर मना कर दिया। शर्माजी रुक गए और अपने हास्य अंदाज में कहने लगे-”अटलजी एक बात बताएं शांता कुमार का तो अपना परिवार है, छोटा सा व्यवसाय है। उन्हें और भी कई काम हैं, पर आप अगर कार्यक्रमों में नहीं जाएंगे तो और करेंगे भी क्या”। यह सुनते ही अटलजी जोर से हंस पड़े। हम सब भी उस हंसी में शामिल हो गए। सारी उदासी दूर हो गई। अटलजी बोले बिल्कुल ठीक है मैं और क्या करूंगा। मैं कार्यक्रम में जाऊंगा। उनके व्यक्तित्व की सहजता और स्वाभाविकता एक बड़ी विशेषता थी। एक बार अटलजी सोलन में आए। बहुत प्रयत्न करके उन्हें 11 हजार रुपये की थैली भेंट की। कार्यक्रम के बाद चाय पी रहे थे। एक कार्यकर्ता ने कहा कि आपका भाषण बहुत ओजस्वी था, पर बहुत छोटा था। अटलजी अपने अंदाज में कह उठे- ”सिर्फ 11 हजार रुपये में कितना भाषण किया जा सकता था।” पूरा वातावरण फिर हंसी में गूंज उठा।

6 दिसंबर को अयोध्या का ढांचा गिरने के एकदम बाद अटलजी शिमला आए थे। चर्चा चली तो कहने लगे-कुछ पता ही नहीं था। जो भी हुआ बहुत बुरा हुआ। मुझे याद है कि अटलजी इस सारी घटना से बहुत व्यथित थे। अटलजी के प्रधानमंत्री बनने के बाद मुझे खाद्य मंत्री का कार्यभार सौंपा गया। उन दिनों मेरे सामने सबसे बड़ी समस्या यह थी कि गोदाम अनाज से भरे पड़े थे। अनाज बाहर रखा था, वर्षा पड़ती थी, अनाज खराब होता था। कुछ दिन के बाद उड़ीसा के काली हांडी से भूख से मरने वालों का समाचार मिला। मैं अटलजी से मिलने गया। सारी परिस्थिति उनके सामने रखी। अपने विशेष अंदाज में वह बोले ”तो फिर कुछ करो?” मैं बिल्कुल तैयार था-अंत्योदय अन्न योजना की पूरी जानकारी उन्हें दी। उन्होंने कहा ”पूरी योजना को एकदम मंत्रिमंडल में ले आओ।” वित्तीय कठिनाइयों के कारण मंत्रिमंडल में मेरा सुझाव स्वीकार नहीं हुआ। मंत्रिमंडल की दूसरी बैठक में भी मेरे आग्रह को स्वीकार नहीं किया गया।

मैं बहुत व्यथित था। 25 दिसंबर को अटलजी के जन्म दिन पर प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना का उद्घाटन होने वाला था। पता नहीं क्या सोचकर मैं तुरंत अटलजी से मिलने चला गया। समाचार पत्र उनके समक्ष रखा और मन की पूरी व्यथा व्यक्त की। मैंने कहा ”क्या ही अच्छा हो यदि 25 दिसंबर आपके जन्मदिन पर सड़क योजना के साथ अंत्योदय अन्न योजना का भी उद्घाटन हो जाए।” अटलजी कुछ देर मुझे देखते रहे, फिर अपने स्वाभाविक अंदाज में हाथ घुमाकर बड़े आग्रह से कहा ”ठीक है, शुरू कर दो, पर मंत्रिमंडल में..कहकर कुछ सोचने लगे। मैं पूरी तैयारी करके गया था। मैंने कहा मंत्रिमंडल की स्वीकृति के बिना भी आपको योजना प्रारंभ करने का विशेष अधिकार है। मैं पूरी तरह से तैयार था। योजना का पूरा प्रारूप एकदम सभी प्रदेशों को भेजा और 25 दिसंबर को योजना प्रारंभ हो गई। शायद यह पहली ऐसी योजना होगी जो मंत्रिमंडल की स्वीकृति के बिना प्रारंभ हुई हो। अटल जी एक व्यक्ति नहीं संस्था हैं। वह आधुनिक भारत के राजनीतिक इतिहास का एक गौरवशाली महत्वपूर्ण अध्याय हैं। पार्टी को ‘क्लास से मॉस’ बनाने में उनका महत्वपूर्ण योगदान है। अटलजी से मिलकर घर लौटा तो अतीत की कितनी ही स्मृतियों की बरसात में भीगा हुआ था।

(लेखक हिमाचल प्रदेश के पूर्व मुख्‍यमंत्री व राज्यसभा सदस्य हैं)

2 Responses to “एक संस्था सरीखे अटल जी”

  1. डॉ राजीव कुमार रावत

    भाई संजीव जी
    संपादक प्रवक्ता

    मुझे याद है कि यह संस्मरण पिछले वर्ष दैनिक जागरण में इसी अवसर पर
    छपा था

    खैर भावना की कद्र को सलाम और अटल जी को नमन

    उस व्यक्तित्व में ऐसा सम्मोहन है कि सारे लेख समय न होते हुए भी पढ़ूंगा।।

    प्रणाम

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