लेखक परिचय

प्रवीण गुगनानी

प्रवीण गुगनानी

प्रवीण गुगनानी, दैनिक समाचार पत्र दैनिक मत के प्रधान संपादक, कविता के क्षेत्र में प्रयोगधर्मी लेखन व नियमित स्तंभ लेखन.

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 माननीय नीतिश कुमार जी, मुख्यमंत्री बिहार ,

नमस्कार ,

आपके कथन कि “ प्रधानमन्त्री पद पर कोई हिन्दुत्ववादी व्यक्ति आसीन नहीं हो सकता “ को पढ़ने सुनने के बाद ह्रदय को ठेस लगी और आपसे खुला पत्र व्यवहार करने का मन हुआ अतः लिख रहा हूँ —

आपने कहा है कि कोई हिन्दुत्ववादी -साथ साथ साम्प्रदायिक भी जोड़ा था -इस देश का प्रधानमन्त्री नहीं हो सकता है. मुझे आश्चर्य है कि एक महत्वपूर्ण संवैधानिक दायित्व का निर्वहन कर रहा व्यक्ति इस प्रकार का दुस्साहसी, एकपक्षीय और असावधान व्यक्तव्य कैसे दे सकता है ? क्या आप इस प्रकार का व्यक्तव्य भी देने की “तथाकथित राजनैतिक जवाबदारी ” निभा सकते है कि ” कोई मुस्लिमवादी या इसाईवादी इस देश का प्रधानमन्त्री नहीं बन सकता है “?? किसी व्यक्ति को साम्प्रदायिक कहने या संकेत करने के पहले आपको अपने संवैधानिक पद की गरिमा की चिंता भी करनी चाहिए थी. प्रधानमन्त्री बनने की शीघ्रता करने का आपको अधिकार है किन्तु इस कुचक्र में आप हिंदुओं के मौलिक अधिकारों के हनन का प्रयत्न न करें. आपको यह भी सोचना चाहिए था कि आपके इस व्यक्तव्य से किसी हिन्दुमना को क्या कष्ट और पीड़ा होगी. हिन्दुधर्मी होने के नाते हिन्दुत्ववादी होने का धर्म निभाना ही चाहिए किन्तु आपके कथन के बाद मुझे लगता है कि हिन्दुत्ववादी होना कोई अपराध हो गया है !! मुझे यह भी लगने लगा है कि – आपका बस चला तो -हिन्दुत्ववादी होने से मुझे या मेरी संततियों को किसी संवैधानिक ,राजनैतिक पद पर आसीन होने का अवसर नहीं मिल पायेगा!!! मुझे इस देश में पचासी प्रतिशत की संख्या वाले समूह की एक इकाई होने का जो पिता प्रदत्त गौरव और अभिमान है उसमे आपके ऐसा कहने से कोई ह्रास नहीं हुआ है किन्तु मुझे आशंका है कि आपके या आपके जैसे तथाकथित धर्म निरपेक्ष नेताओं के ऐसे विध्वंसक विभाजनकारी व्यक्तव्य के बाद सामान्य हिन्दुजन अपने धर्म में आस्था और विश्वास पर प्रहार और आघात का आभास कर रहे है. इस राष्ट्र के एक निर्वाचित मुख्यमंत्री द्वारा पवित्र हिंदू मानसिकता पर इस प्रकार के अनावश्यक आघात और प्रहार से -कि कोई हिन्दुत्ववादी इस देश का प्रधानमन्त्री नहीं बन सकता है – भारतीय संविधान की आत्मा व भावना , इस देश की आत्मा व भावना और करोडो भोले भाले हिदुओं की आत्मा और भावना कितनी छलनी, आहत और चोटिल हुई है ; संभवतः इस तथ्य की कल्पना भी आप जैसा असंवेदनशील, शुद्ध राजनैतिक, विशुद्ध महत्वाकांक्षी और प्रधानमन्त्री पद की दौड़ में लगा व्यक्ति नहीं कर पायेगा. इस देश में कई करोड़ या लगभग एक अरब हिन्दुत्ववादी व्यक्ति है जो भारत में पिछली कई पीढ़ियों और कई सदियों से रहने वाले मेरे हिंदू (परम) पिता की संतान है, और जहां तक मेरा ज्ञान है कि ठीक इसी तरह की ही स्थिति आप की भी है. आप भी अपने घर परिवाए में हिन्दुत्ववादी आचरण करते है और अपने परिवार जनो से ऐसी ही अपेक्षा भी करते है. फिर इस प्रकार का कथन करते हुए आप की जिव्हा कम्पित क्यों नहीं हुई ?? क्या आपको अपने स्वयं के हिन्दुत्ववादी होने का आभास किसी अन्य को कराना पडेगा ???

नीतिश जी, एक मुख्यमंत्री होंने के नाते आपको यह बताने की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए थी कि – संविधान निर्माताओं ने इस बात को स्पष्ट रूप से समझा था कि इस देश की और इसके रहवासियों की आत्मा हिंदुत्व में बसती है. संविधान की रूपरेखा भी विभिन्न प्रकार से इस तथ्य को सम्पुष्ट करती है. संविधान समिति ने हिंदुत्व को स्पष्टतः एक धर्म या सम्प्रदाय नहीं बल्कि एक जीवन शैली माना. इसीलिए धर्म की स्वतन्त्रता के मौलिक अधिकारों की गारंटी देते हुए अनुक्छेद 25 में स्पष्ट कर दिया गया है कि खंड (2) के उपखंड (ख) में हिंदू के अंतर्गत अन्य बहुत से धर्मावलंबी भी समावेशित व समाहित होते है. कालान्तर में कई ऐसे न्यायलीन आदेश हुए जिनमें हिंदुत्व को एक जीवन पद्धति के रूप में माना गया. महात्मा गांधी से लेकर, महामना मदनमोहन, लोकमान्य और अनेकों नेताओं ने इस पुनीत तथ्य में प्रारम्भ में ही प्राण प्रतिष्ठित कर दिए थे.

आदरणीय मुख्यमंत्रीजी, खेदपूर्वक कहना पड़ रहा है कि आप जैसे नेताओं के कारण ही इस देश में ऐसा वातावरण बन गया है कि हिंदत्व को कोसने, आलोचना करने का फैशन भारतीय राजनीति में आ गया है.आज स्थिति यह हो गई है कि यदि आपको बुद्धिजीवी, प्रगतिशील राजनीतिज्ञ या सामाजिक कार्यकर्ता कहलाना है तो प्रत्येक हिंदू त्यौहार, उत्सव, मेले, यात्रा आदि के सबंध में विरोधी व्यक्तव्य देना शुरू कर दो; तब आप प्रगतिशील मान लिये जायेंगे. अपने धर्म, प्रतीकचिन्हों, मानबिन्दुओं,धर्मावलंबियों के प्रति चिंता करने और आदर प्रकट करने को सांप्रदायिकता का नाम आप जैसे नेता ही देते है. भले ही आपने यह कथन अनजाने या अनचाहे कह दिया हो किन्तु अब आप चाह कर भी उस हिंदुत्व को हुई हानि को नहीं भर पायेंगे जिस हिंदुत्व में आप भी संस्कारित व दीक्षित हुए है.

श्रीमान जी, मैं आपको बता दूँ कि यदि धर्म निरपेक्षता का व्यवहारिक, व्यापक अर्थ वाला,सटीक पर्यायवाची शब्द यदि कोई है है तो वह हिंदुत्व ही है जिसमे इस राष्ट्र का कण कण समाहित हो सकता है. हिंदुत्व शब्द के इस अर्थ से संभवतः आपको आपके कथन के अर्थ अनर्थ समझ में आ जायेंगे —हिन्सायाम दुस्य्ते या सा हिंदू – अर्थात जो अपने मन, वचन, कर्मणा से हिंसा से दूर रहे वह हिंदू है. यहाँ हिंसा की परिभाषा को भी समझे – जो कर्म अपने हितों के लिये दूसरों को कष्ट दे वह हिंसा है. इतने व्यापक, ब्रह्माण्ड सदृश शब्द “हिंदू” को आपने केवल स्वयं के प्रधानमंत्री बनने न बनने आदि की उलझन में उलझा दिया है !! प्रधान मंत्री आप या मोदी या कोई और बने इससे निश्चित ही इस राष्ट्र को फर्क पड़ता है किन्तु इस बात से तो प्रलय हो जायेगी कि कोई हिन्दुत्ववादी इस देश का प्रधानमन्त्री नहीं बनना चाहिए.कृपया लोकमान्य तिलक द्वारा दी गई हिंदुत्व की परिभाषा को भी आप समझे इससे संभवतः आपको आपके व्यक्तव्य की विभीषिका का ध्यान हो जाएगा. लोकमान्य ने कहा है – असिंधो सिन्धुपर्यंत यस्य भारत भूमिका | पितृभू, पुण्यभूश्चेव स वै हिंदू रीति स्मृतः -अर्थात जो सिंधु नदी के उद्गम से लेकर हिंद महासागर तक रहते है व इसकी सम्पूर्ण भूमि को अपनी मात्र भूमि, पितृभूमि, पुण्यभूमि, मोक्षभूमि मानते है वे हिंदू है. हिंदू शब्द के इस अर्थ और भारतीय विधि में समय समय पर दी गई हिंदुत्व की व्याख्या को पढ़ने के बाद आपको भी यह मानना ही होगा कि इस देश का प्रधानमन्त्री कोई भी बने उसका आचरण शुद्ध हिन्दुत्ववादी ही होना चाहिए.

नीतीशजी, आप इस देश के संविधान की जिन व्यवस्थाओं से मुख्यमंत्री रूप में कार्यरत होकर प्रतिष्ठा, मान,गरिमा व अधिकार संपन्न हुए है उन्ही व्यवस्थाओं से मुझे भी कुछ अधिकार प्राप्त है. आप कृपया मेरे संविधान प्रदत्त अधिकारों को चुनौती न दे व साथ ही साथ इस प्रकार की बे-तुकी चर्चा कर इस राष्ट्र के वातावारण में सांप्रदायिक जहर न घोले व सामाजिक समरसता को बनाए रखने में सहयोग प्रदान करें. मैं आपसे इस पत्र में इस तथाकथित छदम धर्म निरपेक्ष राजनीति (PSEUDO SECULARISM) के विषय में भी कुछ चिंताएं व सरोकारों को सांझा करना चाहता था किन्तु आज के लिये इतना पर्याप्त है.

आशा है आप मेरी किसी भी बात को अन्यथा न लेंगे व स्नेह बनाए रखेंगे.

आपका

एक भारतीय नागरिक

5 Responses to “एक खुला पत्र नीतिश कुमार के नाम”

  1. Capt. Arun G. Dave.

    नीतीश कुमार ने यह सिद्ध कर दिया की वह एक अवसर वादी राजनीतिज्ञ भर हैं और उनको इस देश की भलाई बुराई से कुछ भी लेना देना नहीं है. अभी तक लग रहा था की वह दूसरों से भिन्न प्रकार के नेता हैं पर अब उनकी कलाई खुल गई और वह अब क्षुद्र और सस्ती राजनीति पर उतर आये हैं .. उन्हें प्रधान मंत्री बन्ने का भूत सताने लगा है और इस चक्कर में बिहार अब फिर से अधोंमुखी होने लगा है… उन्हें मोदी का भूत भी सता रहा है की मोदी उनसे प्रधान मंत्री की दोड़ में कहीं आगे हैं….
    हमें हिंदुत्व वादी प्रधान मंत्री चाहिए…. मुस्लिम्परस्त छद्म धर्म निरपेक्षता वादी नहीं चाहिए …. पैदा तो हुए हिन्दू और अब दोगली बाद कर करते हैं हिन्दुओं को ही बेवकूफ बनाते हैं ….. रमजान के महीने में सर पर मुसलमानी टोपी बाँध कर “इफ्तार” पार्टी खाते और झूठे मुसलमान बनते इन नेताओं को शर्म भी नहीं आती ….. मुस्लिम राजनीति करते करते एक पाकिस्तान और दूसरा बंगलादेश तो बनवा दिए तुम देश्द्रोहिओं ने…..अब इस भारत माँ के कितने और टुकड़े करोगे, मूर्खों….. नीतीश अब तुम बिहार की गद्दी के लायक भी नहीं रह गए….. आधी छोड़ पूरी पर धावे, न आधी रहे न पूरी पावे…. अब, नीतीश तुम्हारा हश्र “धोबी का कुत्ता, न घर का न घाट का” जैसा होने वाली है. अगर हिंदुत्व वादिओं से इतनी चिढ है तो सनातन धर्मं में पैदा क्यूँ हुए , या तो मियां मौलवी के यहाँ पैदा होते, या फिर धर्मान्तरण कर के शुद्ध मुस्लमान बन जाते , लेकिन अभी आप न तो हिन्दू हो और मुसलमान तो अपनी दुर्बुद्धि के हिसाब से तुम्हें मुसलमान कभी मानेगा ही नहीं, चाहे तुम मक्का मदीना हज भी क्यूँ न कर आओ….. तो नीतीश अब अपनी बुद्धि को सुधार लो और धर्मनिरपेक्षता के नाम पर दोगली मुस्लिम परस्ती छोड़ दो, श्रीमान. हमारे हिसाब से इस भारत देश के मुस्लिम भी हिन्दू ही हैं , अरब वासी नहीं….. नीतीश अब यह भी जान लो की मोदी तुमसे कहीं अच्छा मुख्य मंत्री भी है और बहुत ही अच्छा प्रधान मंत्री भी बनेगा और तुमको जनता हरा कर कूड़े दान में फेंक देगी…. तो दोगला पना बंद करो….

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  2. बी एन गोयल

    BNGoyal

    मेरी समझ में एक बात नहीं आयी की श्री नितीश कुमार जो बिहार के लिए अच्छा काम कर रहे हैं और बिहार की छवि को बदलने में जिन का गहरा योगदान है उन्हें यह अनावश्यक बहस शुरू करने की ज़रुरत क्यों पड़ी ? क्या उन्हें अपनी कुर्सी पर कोई खतरा दिखाई दे रहा था ? अभी जब राष्ट्रपति के चुनाव की चर्चा जोरो पर थी और है – उन्होंने अचानक यह अग्नि क्यों प्रज्वलित कर दी | कठिनाई यह हो गयी की किसी भी पार्टी के पास देश के सुधार या विकास की कोई योजना या चिंता नहीं है | सब अपने अपने बारें में चिंतित हैं | किसी भी दल के पास एक भी पाएदार नेता नहीं हैं | किसी भी नेता के पास कोई दूर दृष्टि नहीं है | सभी लोग पी एम् यार प्रेसिडेंट की कुर्सी चाहते है जिस से की अंतिम यात्रा का लाभ मिल सके | इस से बड़ा देश का दुर्भाग्य क्या हो सकता है |

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  3. rajeshwari

    हिन्दुत्ववादियों को सरेआम गरियाना आजकल की राजनीती का एक फैशन सा बन गया है. वो सुना हैं ना “आधी छोड़ पूरी को ध्यावे, आधी मिले न पूरी पावे” ऐसे लोगों को आम भारतवासियों को सबक सिखाना चाहिए.\

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  4. Anil Gupta

    पहली बात तो ये है की कोई भी व्यक्ति धर्म निरपेक्ष नहीं हो सकता है. हाँ धर्मसापेक्ष सम्प्रदायनिरपेक्ष हो सकते हैं. इसके अतिरिक्त आज तक ‘सेकुलर’ और ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्दों की परिभाषा नहीं दी गयी है. वर्तमान में तो हर उस चीज का विरोध करना जो इस देश की सनातन संस्कृति के अनुरूप हो धर्मनिरपेक्षता माना जाता है. खेद है की ऐसा करने वाले न केवल इस देश की सनातन संस्कृति का अपमान कर रहे हैं बल्कि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा हिंदुत्व के विषय में दी गयी विस्तृत व्याख्या का भी अपमान है. हिंदुत्व सम्बन्ध में सर्वोच्च न्यायालय के विचारों को जानने के लिए ऐ.आई. आर. १९९६,एस.सी.,१११३ को पढ़ लें सारा भ्रम दूर हो जायेगा.

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  5. Bipin Kumar Sinha

    नितीश कुमार एक अवसरवादी नेता है प्रधान मंत्री बनने का सपना देख रहे है और सपना देखना बुरी बात तो नहीं पर इसके लिए घटिया वक्तव्य देना तो जरूरी नहीं था .इधर मै देख रहा हूँ जे डीयु के नेता जरा ज्यादा ही बोलने लगे है इसमें शरद यादव प्रमुख है वे कहते है कारोंके दम बढ़ते है तो कोई हल्ला नहीं होता ,ये तस्वीर है इन लोहिया के शिष्यों की नितीश usase थोड़े ही अलग है .खैर देखिये सपना और बिहार को भूल जाईये —बिपिन

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