और ‘ सज्जनों ‘ को कब मिलेगी सजा

राकेश कुमार आर्य (सम्पादक उगता भारत )
नवम्बर 1984 के सिख दंगों में मारे गए निर्दोषों के हत्यारों को  34 वर्ष पश्चात दिल्ली उच्च न्यायालय ने अपना निर्णय देकर सजा सुनायी है ।न्यायालय ने कांग्रेस के बड़े नेता रहे सज्जन कुमार को उम्र कैद की सजा सुनाई है , उनके साथ ही अन्य अभियुक्त रहे भागमल रिटायर्ड नेवी कैप्टन ,बलवान खोखर पूर्व पार्षद व गिरधारी लाल को भी उम्र कैद की सजा देते हुए न्यायालय ने कांग्रेस के पूर्व विधायक महेंद्र यादव  और कृष्ण खोखर को 10 – 10 वर्ष की सजा सुनाई है । हमारा मानना है कि अपराध अपराध होता है , इसलिए अपराधी के प्रति किसी प्रकार की कोई सहानुभूति रखने का विचार भी नहीं आना चाहिए। अतः कोई ‘ सज्जन ‘  हो , या कोई  ‘ दुर्जन ‘ हो , उन्हें अपने किए की सजा मिली है तो दोषियों के साथ कैसी सहानुभूति ? – जिनके घर जले, जिनके परिजन – प्रियजन जीवित उनके सामने जला दिए गए – उनकी पीड़ा को समझना प्रत्येक संवेदनशील समाज के लिए आवश्यक है।अतः बहुत ही सराहनीय निर्णय न्यायालय ने दिया है जिसका हमें स्वागत ही करना चाहिए।हमारे देश में लोगों की एक मानसिकता होती है कि जब जिस दिशा में सब शोर मचा रहे हों तो शेष लोगों को भी उसी दिशा में शोर मचाना आरंभ कर देना चाहिए । जब 1984 के दंगों में मारे गए निर्दोष लोगों को सजा सुनाने की बात कही जा रही हो तो अब अधिकांश लोग इसी दिशा में शोर मचा रहे हैं कि दंड मिलना ही चाहिए और कठोर से कठोर दंड मिलना चाहिए – ऐसी हम सब की मानसिकता बन चुकी है । परंतु  1984 में जब यह घटना घटित हो रही थी तो उस समय हममें से अधिकांश लोग ऐसी मान्यता के थे कि सिक्खों ने इंदिरा गांधी की हत्या कर बहुत ही बड़ा पाप किया है । अतः सिक्ख संप्रदाय के लोगों को जितना अधिक से अधिक मारा जा सके, मार लो ।  हम कौन सी बात को ठीक मानें ?   न्यायाधीश भी हम हैं , अपराधी भी हम हैं।  सजा भोगने वाले भी हम और सजा सुनाने वाले भी हम । परंतु एक प्रश्न आज भी है कि सजा सुनाने वालों ने अपराध करने वाले कितने लोगों को सजा दे दी  ? क्या 2- 4 या 10 – 5 लोगों को सजा दे देने से उस समय हुए नरसंहार में सम्मिलित रहे सभी लोगों को सजा मिल गई  ? – हमारा मानना है कि कदापि नहीं ।तब इतना शोर क्यों मचाया जा रहा है ? कांग्रेस ने अपने किए की सजा स्वीकार करते हुए सिखों से माफी भी मांग ली , परंतु क्या माफी मांग लेने मात्र से  उस कांग्रेस का पाप धुल गया , जिसने  भिंडरावाले को अपने आप खड़ा किया ,उसे आतंकवादी बनाया और ऐसी परिस्थितियां स्वयं उत्पन कीं जिनसे 1984 में अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी को सेना भेजनी पड़ी। उसके पश्चात श्रीमती इंदिरा गांधी को अपना बलिदान भी देना पड़ा। यदि कांग्रेस ने अपने किए के लिए प्रायश्चित किया है , माफी मांगी है तो फिर कांग्रेस को यह भी स्पष्ट करना चाहिए कि वह इंदिरा गांधी के बलिदान को बलिदान ना कहकर उसे इंदिरा गांधी की भूलों का परिणाम कहे । एक साथ दो बातें नहीं हो सकती या तो इंदिरा गांधी का बलिदान बलिदान नहीं है या फिर कांग्रेस का पंजाब में आतंकवाद फैलाने में किसी भी प्रकार का कोई योगदान नहीं । इंदिरा गांधी का बलिदान बलिदान तभी होगा जब कांग्रेस यह स्थापित करे कि उसका  पंजाब के आतंकवाद से किसी भी प्रकार का कोई संबंध नहीं रहा । जनता की भावनाओं को शांत करने के लिए चाहे कांग्रेस ने माफी मांगने का नाटक कर लिया है परंतु यह सत्य है कि कांग्रेस मां भारती के न्यायालय में कभी भी दोष मुक्त नहीं हो सकती । मां भारती के न्यायालय में उस पर मुकदमा आज भी विचाराधीन है और तब तक रहेगा जब तक इतिहास का जिज्ञासु विद्यार्थी पंजाब के आतंकवादी इतिहास में कांग्रेस के ‘ हाथ ‘ को ढूंढता रहेगा।अब हम तस्वीर के दूसरे पहलू पर भी विचार करते हैं । पंजाब में लगभग एक दशक तक चले आतंकवादी आंदोलन में जिन हजारों निर्दोष हिंदुओं की हत्याएं हुई –  उनका हिसाब कौन देगा ?  क्या उनके विरुद्ध इस देश में किसी भी व्यक्ति ने , किसी भी संस्था ने, किसी भी मानवाधिकारवादी संगठन  ने कोई केस किसी न्यायालय में डाला ? –  संभवत  किसी ने भी नहीं । ऐसा क्यों हुआ ? – क्या हमारी संवेदनाएं 1984 के सिख दंगों में मारे गए निर्दोषों के साथ ही हैं या उन  निर्दोष हिंदुओं के साथ भी हैं, जो एक दशक तक पंजाब में आतंकवाद के दंश को झेलते रहे और अपना सब कुछ लुटा – पिटा कर देश में इधर-उधर चले गए या जिनके परिजन उनके सामने बसों से उतार कर मार दिया गए या जिनके परिजनों को उन्हीं के सामने किसी भी अमानवीय ढंग से यातनाएं देते हुए समाप्त कर दिया गया ? –  आज मानवीय संवेदनाएं एक पक्षीय क्यों हो गई हैं ?  यह प्रश्न भी  आज के सभ्य समाज से  ‘सज्जन ‘ को मिली यह सजा हमसे पूछ रही है।  आज के परिवेश में जब संवेदनाएं  दोषियों के विरुद्ध अपने पूरे उफान पर हैं-  तब किसी भी संवेदनशील समाज से पूछना ही चाहिए  कि एक दशक तक जिन लोगों ने आतंकवाद की भट्टी में जलते पंजाब में अपने प्राणों का उत्सर्ग किया उनके साथ अन्याय क्यों? स्वतंत्र भारत में  1984 जैसे नरसंहार को एक बार 1948 में महात्मा गांधी की हत्या के पश्चात भी अंजाम दिया गया था । जिस पर आज तक किसी भी कांग्रेसी को या उसके समर्थक व्यक्ति को या किसी गांधीवादी को फांसी नहीं दी गई  । अहिंसा की बात करने वाले गांधीवादी और कांग्रेसी  अपने किये की सजा से आज तक बचे हुए हैं । ऐसे ही अपराधों को कश्मीर में घाटी से कश्मीरी पंडितों को भगाकर ,मारकर, उनके घर ,जमीन – जायदाद पर अधिकार करके या उनकी महिलाओं के साथ बलात्कार करके या उनकी बेटियों को जबरन अपने घर में रखने वाले दुष्ट , जल्लाद , दानव वृत्ति के लोगों के साथ भी अपनाया गया है। उन्हें भी अपने किये की आज तक कोई सजा नहीं दी गई है और यदि इन कांग्रेसियों का बस चले तो ये ऐसे दानवों को आम माफी देने के लिए भी कानून ला सकते हैं । पता नहीं ऐसे दोहरे मानदंड भारत में क्यों अपनाए जाते हैं ? अब थोड़ा सा  पंजाब के  अलगाववादी आंदोलन पर भी विचार करते हैं ।महाराजा रणजीत सिंह ने सिख साम्राज्य की स्थापना 19वी सदी के आरम्भ में की थी। यह साम्राज्य आज के पंजाब क्षेत्र का भाग था और इसकी राजधानी लाहौर थी जो आज पाकिस्तान का भाग है।यद्यपि राजा रणजीतसिंह की मृत्यु के पश्चात उनके दुर्बल उत्तराधिकारियों के कारण यह राज्य शीघ्र ही ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के अधीन हो गया और आगे चल कर अंग्रेजी भारत का भाग बन गया।1947 में मिली आज़ादी के पश्चात पंजाब, भारत और पाकिस्तान के बीच विभाजित हो गया और भारत में आज के हरियाणा, हिमाचल प्रदेश को मिलाकर एक राज्य बना।सिखों के प्रभुत्व वाली पार्टी अकाली दल की ओर से अलग पंजाब की मांग उठने लगी । जिसे राज्य पुनर्गठन समिति ने भाषा के आधार पर न बांटने का निर्णय किया।कई हिंसात्मक विरोधों के चलते इंदिरा गाँधी सरकार ने 1966 में पंजाब को पंजाबी बोलने वाले पंजाब, हिंदी बोलने वाले हरियाणा, पहाड़ी बोलने वाले हिमाचल प्रदेश में विभाजित कर दिया।केंद्र शासित चंडीगढ़ को पंजाब और हरियाणा की संयुक्त राजधानी बनाया गया ।पंजाबी आंदोलन ने अकाली दल को पर्याप्त राजनीतिक लाभ पहुँचायाI इसके उपरान्त 1972 में चुनाव में मिली हार के पश्चात पार्टी ने आत्मचिंतन किया और 1973 में आनंदपुर साहिब संकल्प प्रस्तुत किया । जिसमे उसके कई भविष्य के प्रस्तावों को रखा गयाIइनमे पंजाब के वे क्षेत्र जो एक अलग पंजाब राज्य का भाग बनेंगे और अपने स्वयं के संविधान को बनाने का अधिकार सम्मिलित था । इसका स्पष्ट उद्देश्य एक स्वायत्त पंजाब थाIवहीँ दूसरी ओर खालिस्तान समर्थक जगजीत सिंह चौहान ने अमरीका दौरे के दौरान ‘दी न्यूयॉर्क टाइम्स’ में उन्होंने खालिस्तान को लेकर एक विज्ञापन दिया, इसने उन्हें प्रवासी सिख समुदाय से लाखों डॉलर के दान दिलवाएI12 अप्रैल 1980 को इंदिरा गाँधी के साथ मुलाकात में उन्होंने राष्ट्रीय खालिस्तान परिषद के गठन की घोषणा की  और स्वयं को उसका अध्यक्ष एवं बलबीर सिंह संधू को उसका महासचिव घोषित कर दियाIआनंदपुर साहिब संकल्प को शीघ्र ही भुला दिया गया पर 1980 के दशक में यह दोबारा प्रकाश में आया।अकाली दल और धार्मिक नेता जरनैल सिंह भिंडरांवाले ने आपस में हाथ मिलाये और खालिस्तान संकल्पों को लागू करने के लिए 1982 में धर्म युद्ध यात्रा की । हजारों लोग इस यात्रा के साथ जुड़ते गए चूँकि उन्हें लगा कि यह उनकी सिंचाई के लिए अधिक पानी और चंडीगढ़ पर अधिकार जैसी मांगों को पूरी कर सकता था।80 के दशक के आरंभ से ही इस आंदोलन ने हिंसात्मक रूप अपना लिया था और इसी बीच भिंडरांवाले ने अपने समर्थकों के साथ हरमंदिर साहिब परिसर को अपना ठिकाना बना लियाIभिंडरांवाले ने परिसर में भारी हथियार जुटाने आरम्भ कर दियेI जून 1984 में इंदिरा गाँधी सरकार ने ऑपरेशन ब्लूस्टार के दौरान हथियारबंद उग्रवादियों के विरुद्ध हरमंदिर साहिब में हमला बोल दिया जिसमें भिंडरांवाले सहित सैकड़ों लोगों की मृत्यु हुईIइसके पश्चात उठे उग्रवाद ने 31 अक्टूबर 1984 को प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी की उन्ही के दो सिख सुरक्षा कर्मियों द्वारा हमले में हत्या कर दी। विरोध में देश भर में सिखों के विरुद्ध दंगे आरम्भ हो गये । जिसमे हजारों निर्दोष लोगों की मृत्यु हो गई।उग्रवाद से पंजाब एक लम्बे समय तक झुलसता रहा । जिसका दंश आम लोगों को लगता रहा। बब्बर खालसा संगठन को इनमे से कई आतंकी हमलों के लिए उत्तरदायी माना गया।इस संगठन ने 23 जून 1985 में एयर इंडिया की फ्लाइट को बीच आसमान में बम से उड़ा दिया जिसमे 329 लोगों की मृत्यु हो गयी।1990 के दशक में पुलिस के साथ हुए अनेक मुठभेड़ों में बब्बर खालसा के कई नेता मारे गए हुए जिसने इस संगठन को कमज़ोर कर दिया। इसका बड़ा श्रेय पंजाब के पूर्व डीजीपी केपी एस गिल को दिया जाता है जिन्होंने पंजाब में हिंसात्मक विद्रोह की घटनाओं में भरी कमी लायी।1995 के बाद से अब तक पंजाब में बहुत सीमा तक शांति का परिवेश स्थापित हुआ है और खालिस्तानी आंदोलन अब दुर्बल हो चुका है। यद्यपि अभी भी समय-समय पर कई लोगों पर इस आंदोलन के राजनैतिक उपयोग के आरोप लगते रहते हैं । अब इस आंदोलन को हमारे देश का परंपरागत शत्रु पाकिस्तान फिर से हवा देना चाह रहा है । नवजोत सिंह सिद्धू को मोहरा बनाकर पाकिस्तान के नए प्रधानमंत्री इमरान खान भारत को बांटने की नीति पर कार्य कर रहे हैं । वैसे भी पाकिस्तान के शासकों की यह 1947 से ही रणनीति रही है कि वह अपनी अंदरुनी समस्याओं से जनता का ध्यान हटाने के लिए भारत को अपना ऐसा शत्रु दिखाते रहते  हैं जो उन्हें मिटा देना चाहता है । पाकिस्तान 1971 में बने बांग्लादेश को लेकर आज तक  हमसे शत्रुता मानता है । यह हमारा दुर्भाग्य है कि  हमारे यहां पर ‘ जयचंद ‘ और  ‘ मीरजाफर ‘ की परंपरा अभी तक जीवित बनी हुई है  । यदि आज के संदर्भ में देखा जाए तो कांग्रेस के मणिशंकर अय्यर जैसे  ‘मीर जाफर ‘और नवजोत जैसे   ‘जयचंद’ इस देश में अनेकों हैं ,जो हमारे देश के साथ ही गद्दारी करने को तैयार हैं ।इन्हीं  ‘ मीरजाफरों ‘ और ‘ जयचंदों ‘  के कारण हमारे देश में स्वतंत्रता के पश्चात हुए उपरोक्त उल्लिखित अनेकों नरसंहारों में मारे गए लोगों के लिए आज तक न तो कोई केस डाला गया और न ही उन नरसंहारों में दोषी रहे लोगों को किसी प्रकार का कोई दंड दिया गया । यही कारण है कि देश में एक वर्ग विशेष के लोगों को कुछ भी करने की छूट है और दूसरे वर्ग से हमेशा यही अपेक्षा की जाती है कि तुम शांत रहो क्योंकि शांत रहकर अत्याचार सहना तुम्हारी संस्कृति है । दूसरों की विकृति पर भी कोई प्रश्न नहीं है और हमारी संस्कृति को हमारी दुर्बलता समझकर बार – बार हम  पर लाद दिया जाता है । यह दो रंगी नीतियां अंततः कब तक हमारा पीछा करती रहेंगी ? अब जबकि कांग्रेस के ‘ सज्जनों ‘ को उनके किए की सजा दी जा रही है तो ऐसे अन्य अनेकों ‘ सज्जनों’ को भी ढूंढने  खोजने का समय है ।  अच्छा हो कांग्रेस अपने ‘सज्जनों ‘ के किए के लिए सार्वजनिक रूप से माफी मांग ले या कोई मानवाधिकारवादी संगठन ऐसे ‘सज्जनों ‘ को फांसी के फंदे तक ले जाने के लिए कोई न्यायिक कार्यवाही प्रारंभ कर दे , जिन्होंने इस देश की आत्मा को बहुत अधिक रुलाया है और रुला रहे हैं। सजा में भी तुष्टिकरण उचित नहीं कहा जा सकता।

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